निरुपमा उपन्यास की नायिका का चरित्र चित्रण सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा सन् 1935 ई. में रचित चौथा उपन्यास है
निरुपमा उपन्यास की नायिका का चरित्र चित्रण
निरुपमा, सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा सन् 1935 ई. में रचित चौथा उपन्यास है, जिसका शीर्षक उसकी नायिका के नाम पर रखा गया है। नायिका उस पात्र को कहते हैं जो उपन्यास की कथा के केन्द्र में होती है, सारी घटनाओं एवं पात्रों से प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में जुड़ी होती है तथा अन्तिम फल की भोक्ता होती है। उसकी चारित्रिक विशेषताएँ पाठकों को सर्वाधिक प्रभावित करती है और वह पाठकों को अपने चरित्र के द्वारा कोई सकारात्मक संदेश भी देती है । इस दृष्टि से विचार करने पर 'निरुपमा' ही इस उपन्यास की नायिका पद पर अभिषिक्त की जा सकती है। उपन्यास के अन्य स्त्री पात्र - कमल, सावित्री, नीलिमा आदि इतने सशक्त नहीं है। सच तो यह है कि ये सभी पात्र निरुपमा के चरित्र को उभारने में सहायक पात्रों की भूमिका निभाते हैं । निरुपमा का विवाह अन्त में कृष्णकुमार के साथ सम्पन्न हो जाता है अतः उसे अन्तिम फल की भोक्ता भी कहा जा सकता है। इन सभी विशेषताओं को ध्यान में रखकर यह कहना तर्कसंमत होगा कि निरुपमा उपन्यास की नायिका 'निरुपमा' के अतिरिक्त और कोई नहीं है।निरुपमा की चारित्रिक विशेषताओं का उद्घाटन निम्न शीर्षकों में किया जा सकता है -
परिचयात्मक विवरण
निरुपमा के पिता बाबू रामलोचन रामपुर गाँव के जमींदार थे किन्तु उनका निधन हो जाने पर निरुपमा अपने मामा योगेश बाबू के परिवार के साथ लखनऊ में रहती है। मामा का पुत्र सुरेश है और पुत्री नीलिमा (नीली) है जो अभी किशोर ही है। सुरेश बाबू ही जमींदारी की देख-रेख करते हैं। मामा की नीयत साफ नहीं है। जमींदारी से होने वाली आय को वे उल्टा-सीधा खर्च डालकर डकार जाते हैं। मामाजी चाहते हैं कि निरुपमा का विवाह यामिनी बाबू से हो जाय, जो लखनऊ विश्वविद्यालय में अंग्रेजी के लेक्चरर हैं तथा यामिनी बाबू के दूर के रिश्तेदार हैं । यामिनी बाबू भी निरुपा से उसकी दौलत के लालच में विवाह करना चाहते हैं । कमल निरुपमा की सहेली है । निरुपमा कृष्णकुमार से प्यार करती है जो लंदन से अंग्रेजी में डी. लिट् करके आया युवक है तथा उसी रामपुर गाँव का रहने वाला है जहाँ निरुपमा की जमींदारी है । कमल के प्रयासों से अन्ततः निरुपमा का विवाह कृष्णकुमार से हो जाता है ।
सुन्दर युवती
निरुपमा सुन्दर एवं आकर्षक युवती है । उसके सौन्दर्य पर मुग्ध होकर यामिनी बाबू और कृष्णकुमार दोनों उससे विवाह के इच्छुक हैं । कृष्णकुमार किस प्रकार निरुपमा के सौन्दर्य से अभिभूत है इसका चित्रण निम्न पंक्तियों में उपलब्ध होता है:
"कुमार अपनी कल्पना को सुन्दर प्रकृति के प्रकाश में घिरी, प्रत्यक्ष सजीव अपार रूप राशि के भीतर सलज्ज सहानुभूति देती हुई देर तक देखता रहा ।..... सुन्दर को सभी आँखें देखती हैं। अपनी वस्तु को अपना सर्वस्व दे देती हैं ।दर्शन की सार्थकता है । यहाँ एक रूप ने दूसरे रूप को आँखों ने सर्वस्व - सुन्दर आँखों को चुपचाप क्या दिया, हृदय ने चुपचाप दोनों ओर से क्या समझा, मौन के इतने बड़े महत्त्व को मुखरा भाषा कैसे व्यक्त कर सकती है।"
निरुपमा की सखी कमल भी निरू को सुन्दरी समझती है । निरुपमा के सौन्दर्य से प्रभावित होकर ही प्रो. भड़कंकड़ साहब ने उसे प्रेमपत्र लिखा था किन्तु निरू ने सरलता का परिचय देते हुए वह पत्र मामा के हाथ में रख दिया ।
कुमार की कल्पना में भी निरू का सुन्दर मुख घूमता रहता है—“ रह-रहकर सुबहवाली सूरत, वह फूली लता के भुजों के भीतर का मुख, वह पीछे का सूर्यमण्डल, वे एकटक काली-काली बड़ी-बड़ी आँखें याद आ रही थी । उस दृष्टि का भाव याद आते ही एक अज्ञात दर्द उठता था ।"
कुमार के प्रति आकृष्ट
निरुपमा कुमार के प्रति आकृष्ट है । उपन्यास के प्रारम्भ से ही इस आकर्षण का बोध होने लगता है । कुमार जिस कोहनूर होटल में रहता है वह योगेश बाबू (निरुपमा के मामा) के घर के सामने है । निरुपमा जब हारमोनियम पर गाना गाती है तो उसी स्वर में स्वर मिलाकर कुमार भी गाने लगता है और निरुपमा बंगाली में गालियाँ देकर ओझल हो जाती है किन्तु उन दोनों की आँखें मिल जाती हैं । दोनों में आकर्षण उत्पन्न होता है। भले ही योगेश बाबू निरुपमा का विवाह यामिनी बाबू से करना चाहते हैं किन्तु निरुपमा के हृदय मन्दिर का देवता कुमार ही है । रामपुर में निरुपमा कुमार के घर इसीलिए जाना चाहती है क्योंकि वह कुमार से प्रेम करती है । रामचन्द्र कुमार की मुखाकृति वाला उसका भाई है । रामचन्द्र की सहायता करना उसके प्रति स्नेह, सद्भाव दिखाना सब इसी प्रेम का परिणाम है। भले ही निरुपमा का विवाह यामिनी के साथ उसके मामा ने तय किया हो किन्तु निरुपमा फिर भी कुमार की कानपुर वाली सम्पत्ति तथा बेदखल किये गये खेत और बाग रामचन्द्र को लौटाकर अपने उस प्रेम का परिचय देती है जो कुमार के प्रति उसके मन में था।
कमल के पूछने पर वह यह स्वीकार करती है कि वह कुमार से प्रेम करती है और यामिनी बाबू से विवाह नहीं करना चाहती। यह जानकर ही कमल प्रयत्न करके उसका विवाह कुमार से करवा देती है।कुमार की माँ सावित्री देवी भी चाहती है कि निरुपमा उनकी बहू बनकर उन्हें हमेशा के लिए रोटी बनाकर खिलाये ।
सरल हृदय
निरुपमा सरल हृदय युवती है। अपने माता-पिता की मृत्यु का उसे दुःख हुआ किन्तु मामा के परिवार के साथ रहते हुए वह उस दुःख को विस्मृत कर बैठी । उसके मामा योगेश बाबू उसकी जमींदारी की आय को किस प्रकार हड़प रहे थे, इसका उसे अनुमान तक नहीं था । उसकी सखी कमल उसे मामा की नियत में आई खोट के बारे में सचेत करती हुई कहती है- "तुम्हारे मामा पर बाबा (कमल के पिता) विश्वास नहीं करते। उनका ख्याल है, तुम्हारी जमींदारी पर तुम्हारे मामा की मामूली निगाह नहीं । क्या तुम्हें मालूम है, तुम्हारी जमींदारी की कितनी आय है और तुम्हारे बाबा के देहान्त के बाद अब तक कितना रुपया तुम्हारे नाम जमा हुआ ?
उसे यह भी पता नहीं कि सुरेश बाबू किसानों और ग्रामीणों के साथ कैसा अन्याय, अत्याचार करते हैं। गाँव में जाने पर उसे पता चला कि किस प्रकार मलिकवा की बात न मानने पर मृत्यु के मुख में जाना पड़ा। रामचन्द्र के खेत और बाग बेदखल कर दिये गये और गाँव वालों ने उन्हें गाँव के कुएँ से पानी भरने से भी मना कर दिया । गाँव के जमींदार को इस प्रतिबन्ध पर रोक लगाते हुए गाँव वालों को दण्डित करना चाहिए था पर सुरेश बाबू ने तो गाँव वालों का ही साथ दिया।
जब निरुपमा ने सुरेश बाबू से जमींदारी का हिसाब-किताब माँगा तो उनके पास कोई सही ब्यौरा न था । निरुपमा की सरलता ही इस सबके पीछे थी । वह सोचती थी कि मामा के संरक्षण में उसके हित सुरक्षित हैं पर उसे यह पता नहीं था कि योगेश बाबू और सुरेश बाबू किस प्रकार उसकी आमदनी में सेंध लगाकर उसे हानि पहुँचा रहे थे । जब कभी निरुपमा मामा और सुरेश बाबू के पास जाती तो यह उनके बीच चलने वाली जमींदारी की बातचीत बन्द हो जाती है । “उसे यह भी नहीं मालूम कि अब तक कितना रुपया जमा हुआ। उसे रुपये की भूख नहीं। जमींदारी थी, वह भी पिता की स्मृति के रूप में न मिली होती तो वह न चाहती।"
यह भी उसकी सरल हृदयता का प्रमाण है कि वह मामा की इच्छा का विरोध नहीं करती और न चाहते हुए मामा द्वारा मनोनीत वर यामिनी बाबू से विवाह करने को तैयार है । वह तो कमल का सत्प्रयास रंग लाया और वह चरित्रहीन यामिनी बाबू से विवाह बंधन बँधने से बच गयी तथा कुमार से उसका विवाह सम्पन्न हो सका।
सहृदय एवं उदार — निरुपमा एक सहृदय एवं उदार युवती है । उसे जब कुमार के भाई रामचन्द्र की निर्धनता के बारे में पता चलता है तो वह उसकी शिक्षा के लिए बीस रुपये प्रतिमाह का वजीफा नियत करती है। भले ही कुमार ने कृतज्ञता ज्ञापित करते हुए यह सहायता लेने से इन्कार कर दिया तथापि यह घटना निरुपमा की सहृदयता का परिचय तो देती ही है ।
इसी प्रकार जब मलिकवा की माँ उसे अपना दुखड़ा सुनाती है, तब वह उपयुक्त अवसर आने पर उसके भरण-पोषण का प्रबन्ध करने हेतु तीन बीघा माफी जमीन उसके नाम कर देती है । रामचन्द्र को वह उसके बेदखल किये गये खेत और बाग ही नहीं लौटाती अपितु अवसर आने पर कानपुर के रेहन रखे मकानों को खरीदकर उनकी रजिस्ट्री रामचन्द्र के नाम करवा देती है और इसकी सूचना पत्र द्वारा रामचन्द्र की माँ को देती है।
गाँव पहुँचने पर वह कुमार की माँ के आमन्त्रण को स्वीकार तो करती है किन्तु सुरेश बाबू की अनिच्छा के कारण उनके घर नहीं जा पाती तथापि रामचन्द्र जब नीली को छोड़ने उसके घर आता है तो उसकी खातिर कर वह अपनी उदारता एवं सहृदयता का परिचय देती है । यही नहीं अपितु लखनऊ में वह कुमार की माँ से मिलने उनके घर जाती है और गाँव में उनके घर न आ सकने के लिए क्षमा-याचना करती है।
वह इतनी उदार है कि अपने मामा के छल के बारे में सब कुछ जानकर भी उनसे कुछ नहीं कहती और सुरेश बाबू के जीवन-यापन के लिए कुछ अच्छी व्यवस्था करने की बात सोचती है- "मैं तो सोचती हूँ दादा के लिए मैं इससे भी अच्छी कुछ व्यवस्था कर दूँ।
अन्तर्द्वन्द्व से ग्रस्त
निरुपमा के चरित्र में कई स्थलों पर उपन्यासकार ने यह दिखाया कि वह अन्तर्द्वन्द्व से ग्रस्त है । विशेष रूप से जब वह अपनी जमींदारी रामपुर गाँव में गयी और कुमार की माँ ने उसे अपने घर आने का आमन्त्रण भेजा । नीली ने जब निरुपमा को यह बताया कि कुमार बाबू की माँ ने उसे बुलाया है तो वह वहाँ जाने के है सम्बन्ध में सोचने लगी किन्तु सुरेश बाबू ने संकेत में ही यह कह दिया कि गाँव वाले उस परिवार के विरोध में हैं अतः वह जाना चाहे तो जाये किन्तु गाँव वालों से बैर बन जायेगा । निरुपमा चाहते हुए भी कुमार मामा के घर नहीं जा सकी । जब नीली ने उसे वहाँ जाने का स्मरण दिलाया तो वह कहने लगी- “जहाँ गाँव वाले नहीं जाते वहाँ मेरा भी जाना ठीक नहीं, पहले मुझे मालूम नहीं था।"
वास्तविकता यह थी कि निरुपमा ने कई बार कुमार के घर जाने के बारे में सोचा पर उधर चलते पैर ही न उठे। वह विचार करती थी कि दादा (सुरेश) की इच्छा का अनादर करने वहाँ जाना ठीक न होगा । ऐसा करने पर उसकी सम्पूर्ण शोभा चली जायेगी, जिसे लेकर बहन की तरह सर ऊँचा कर वह सुरेश के सामने खड़ी होती है । साथ ही मनुष्यता का भी विचार आया। जमींदार के धर्म का पालन करते हुए उसके दादा ने एक प्रकार कुमार का सर्वस्व हर लिया है, एक जमींदार होकर सामाजिक मामलों में उनका पक्ष नहीं लिया, बल्कि अपना स्वार्थ देखा (जो वास्तव में निरू का स्वार्थ है) । ऐसे में कुमार की माँ उसके बारे में क्या धारणा बनायेगी, चाहते हुए भी वह कुमार और उसके परिवार को मदद नहीं पहुँचा पा रही थी, इस संकोच के कारण भी वह कुमार की माँ से मिलने उनके घर नहीं गयी।
सुरेश बाबू ने जब देखा कि निरुपमा रामचन्द्र की माँ के घर नहीं गई तो प्रसन्न “अच्छा हुआ तुम नहीं गयीं । उनके यहाँ जाने पर दूसरी भी तुम्हें बुलातीं और न जाने से अच्छा न होता । जमींदारी करने पर प्रतिष्ठा का विचार रखना पड़ता है ।"
यामिनी बाबू से वह प्रेम नहीं करती और न ही उनसे विवाह करने की इच्छुक है किन्तु मामा और दादा के स्नेह एवं शील के कारण वह अपने मन की बात उन्हें नहीं बता पाती और जब-तब मामा या दादा की योजनानुसार यामिनी बाबू के साथ अनिच्छा से घूमने चली जाती है।
किन्तु लखनऊ में जब उसे अवसर मिला तो कुमार की माँ से मिलने वह उनके घर गयी और गाँव में उनके घर न आ पाने के लिए क्षमा-याचना भी की।
कमल की सखी
निरुपमा की सखी कमल सुषमा चटर्जी है जो पहले निरुपमा की सहपाठिनी थी किन्तु जब जब प्रो. भड़कंकड़ साहब ने निरुपमा को प्रेमपत्र लिखा तब मामा ने उसका पढ़ना बन्द करवा दिया। भले ही उसकी पढ़ाई बन्द हो गयी किन्तु कमल से उसकी मित्रता बराबर बनी रही। कमल उसकी अन्तरंग सखी है । वह उसके बारे में सब कुछ जानती है और वही उसे इस सम्बन्ध में सचेत करती है कि उसके मामा छल-कपट एवं जालसाजी से उसकी जायदाद की आमदनी हड़प रहे हैं तथा उनकी नीयत में खोट है।
यही नहीं अपितु जब कमल ने निरुपमा को कुमार के घर देखा और उसका कुमार की माँ के प्रति भाव देखा तो वह समझ गयी कि निरुपमा कुमार से प्रेम करती है । कमल ने जब निरुपमा से यह जान लिया कि वह कुमार से प्रेम करती है और उससे ही विवाह करना चाहती है, यामिनी बाबू से नहीं तो कमल ने निश्चय कर लिया कि वह कुमार के प्रति अपने सहज आकर्षण को त्याग देगी और कुमार एवं निरुपमा का विवाह करवायेगी।
यही नहीं कमल ने मिस सुशीला दुबे की वह चिट्ठी भी निरुपमा को दिखायी जिसमें मिस दुबे ने स्वीकार किया था कि किस प्रकार यामिनी बाबू ने प्रेम का नाटक रचकर उसे गर्भवती कर दिया है। निरुपमा ने चिट्ठी पढकर गुस्से से तमतमाते हुए कहा- “हूँ, समझी ! तुम जो कुछ भी कहो, मैं करने के लिए तैयार हूँ, मेरी आँखों से जितना अंधकार था सब कटता जा रहा है।"
कमल ने ही उसे सुझाव दिया कि वह यामिनी बाबू से कहे कि निरू की इच्छा है कि विवाह मामा के घर से न होकर सेन रोड वाले मेरे घर से हो। बारात वहीं आये । वहाँ कमल ने कुछ ऐसी व्यवस्था कर दी कि बँगले के नीचे वाले खण्ड में यामिनी बाबू का विवाह अवगुंठनवती सुशीला दुबे से करवा दिया और ऊपर वाले खण्ड में कुमार का विवाह निरुपमा से हो गया। यामिनी बाबू को इस रहस्य का पता तब चला जब उन्होंने वधू के मुख से घूँघट हटाया किन्तु तब तक कमल सभी महिलाओं को यामिनी बाबू की हरकतों के बारे में बता चुकी थी। इस प्रकार कमल ने सखी धर्म का निर्वाह करते हुए अन्ततः कुमार और निरुपमा का विवाह करवा ही दिया।
उक्त विवचेन के आधार पर यह कह सकते हैं कि निरुपमा इस उपन्यास का आदर्श चरित्र है तथा केन्द्रीय पात्र होने से वही इसकी नायिका थी । पाठकों पर भी सर्वाधिक प्रभाव उसकी चारित्रिक विशेषताओं का पडता है।


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