सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' द्वारा रचित उपन्यास 'निरुपमा' के नायक कृष्ण कुमार आधुनिक, प्रगतिशील और आदर्शवादी विचारों से युक्त एक संवेदनशील युवा हैं।
निरुपमा उपन्यास के नायक कृष्ण कुमार का चरित्र चित्रण
सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' द्वारा रचित उपन्यास 'निरुपमा' के नायक कृष्ण कुमार आधुनिक, प्रगतिशील और आदर्शवादी विचारों से युक्त एक संवेदनशील युवा हैं। निराला जी ने उनके माध्यम से तत्कालीन समाज की रूढ़ियों, वर्ग-भेद और अंधविश्वासों के विरुद्ध एक प्रबुद्ध दृष्टिकोण प्रस्तुत किया है।
निरुपमा निरालाजी का चौथा उपन्यास है, जिसकी रचना उन्होंने सन् 1935 ई. में की थी। इस उपन्यास से पूर्व निरालाजी तीन अन्य उपन्यास अलका, अप्सरा और प्रभावती लिख चुके थे अतः उनकी उपन्यास कला मँज चुकी थी । इस उपन्यास में निराला ने समाज सुधार पर बल देते हुए सामंती रुढ़ियों को तोड़ने का प्रयास किया है साथ ही नारी मुक्ति आन्दोलन का सूत्रपात भी इसमें किया गया है। यद्यपि यह नायिका प्रधान उपन्यास है तथा उपन्यास का नामकरण भी नायिका 'निरुपमा' के नाम पर किया गया है तथापि उपन्यास के अन्य पात्र भी महत्त्वपूर्ण हैं।
निरुपमा उपन्यास के पुरुष पात्रों में— कृष्णकुमार, रामचन्द्र, योगेश बाबू, सुरेश बाबू, यामिनीहरण प्रमुख हैं। इनमें से कृष्णकुमार को ही उपन्यास के नायक पद पर प्रतिष्ठित किया जा सकता है क्योंकि वही कथा का केन्द्रीय पात्र है । कथानक को आगे ले जाने का कार्य भी वही करता है, सभी प्रमुख पात्रों से प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में वह जुड़ा हुआ है तथा वही अन्तिम फल का भोक्ता भी है।निरुपमा से कृष्णकुमार का विवाह भी अन्त में सम्पन्न हो जाता है अतः कृष्णकुमार को ही इस उपन्यास का नायक मानना उचित है।कृष्णकुमार के चरित्र की प्रमुख विशेषताओं का उद्घाटन निम्न शीर्षकों में किया जा सकता है -
परिचयात्मक विवरण
कृष्णकुमार रामपुर गाँव का मूल निवासी है। उसके पिता गिरिजाशंकर पहले कलकत्ते (कोलकाता) में रहकर कुछ काम करते थे। उसमें घाटा पड़ गया। कानपुर में उनके दो मकान थे जिन्हें रेहन रखकर बेटे को पढ़ने के लिए विलायत भेजा । वहाँ से कृष्णकुमार अंग्रेजी में डी. लिट् करके भारत लौटा है । उसका एक भाई रामचन्द्र और माता सावित्री देवी अभी गाँव में ही रहती हैं। कुमार को आशा थी कि लखनऊ विश्वविद्यालय में उसे नौकरी मिल जायेगी किन्तु कोई तगड़ी सिफारिश न होने के कारण यह नौकरी यामिनीहरण को मिल गयी जो उससे कम योग्य थे किन्तु उनके पास तगड़ी सिफारिश थी ।
लखनऊ में कुमार जिस होटल कोहनूर में रहता था वह निरुपमा के मामा के घर के सामने था । यहीं उसने पहली बार निरुपमा को देखा था, निरुपमा उसके गाँव की जमींदार थी । जमींदारी का प्रबन्ध, उसके मामा योगेश बाबू और उनका पुत्र सुरेश बाबू करते थे । जब कुमार को नौकरी न मिली तो जीवन-यापन के लिए उसने मोची का काम करते हुए बूट पॉलिश प्रारम्भ कर दी जिससे वह इतना तो कमा ही लेता था कि अपना और अपने परिवार का भरण-पोषण कर सके। उसने पचास रुपये का मनीऑर्डर भी गाँव में भेजा है । गाँव वालों ने उसके परिवार को समाज से बहिस्कृत कर दिया है क्योंकि उनकी धारणा है कि कुमार विलायत जाकर धर्मभ्रष्ट हो गया है।
बाद में कुमार कमल सुषमा चटर्जी के यहाँ ट्यूशन पढ़ाकर दो सौ रुपये प्रतिमाह कमाने लगा और अपने परिवार—–माता तथा छोटे भाई को लखनऊ ले आया । कमल कुमार के प्रति आकृष्ट थी किन्तु जब उसे पता चला कि कुमार और निरुपमा एक-दूसरे से प्रेम करते हैं और निरुपमा का विवाह उसके मामा उसकी इच्छा के विरुद्ध यामिनी बाबू से करना चाहते हैं तो कमल ने प्रयास करके और यामिनी बाबू की चारित्रिक शिथिलता की बात निरुपमा को बताकर कुमार और निरुपमा का विवाह सम्पन्न करवा दिया है ।
उच्च शिक्षित युवक
कुमार उच्च शिक्षित युवक है। उसने लंदन से अंग्रेजी में डी. लिट् की उपाधि प्राप्त की है। उसकी माँ ने पिता से कहकर उसकी उच्च शिक्षा की व्यवस्था हेतु कानपुर के अपने मकान गिरवी रख दिये किन्तु कैसी विडम्बना है किं इतनी ऊँची डिग्री पाकर भी सिफारिश के अभाव में उसे लखनऊ विश्वविद्यालय में अध्यापन की नौकरी नहीं मिली । हमारे यहाँ नौकरी योग्यता से नहीं सिफारिश से मिलती है।
कुमार को उसकी योग्यता के अनुरूप काम जब नहीं मिला तब उसने जीवन-यापन के लिए जूता पॉलिश करने का काम प्रारम्भ कर दिया । एक सूटेड-बूटेड युवक को जूता पॉलिश करते देखकर लोगों को कौतूहल होता किन्तु जब वह उनका कार्य मनोयोग से करता तो वे उसी से काम करना पसन्द करते । इस प्रकार वह जूता पॉलिश करके इतना तो कमा ही लेता जिससे उसका और गाँव में रहने वाले उसके परिवार का खर्चा चल जाता । बाद में वह एक वकील की बेटी कमल सुषमा चटर्जी से अंग्रेजी की ट्यूशन पढ़ाने लगा, जिसके बदले में उसे दो सौ रुपये प्रतिमाह मिलता।
बेरोजगारी का शिकार
उच्च शिक्षित कुमार को सिफारिश के अभाव में बेरोजगारी का शिकार बनना पड़ा। कुमार अंग्रेजी में डी. लिट् उपाधि प्राप्त व्यक्ति है किन्तु उसे न तो इसका अहंकार है और न ही वह परिश्रम से जी चुराता है। पढ़े-लिखे लोग शारीरिक श्रम करने में अपनी हेठी समझते हैं और ऐसा काम करने से बचते हैं जो दूसरों की नजरों में छोटा समझा जाता है। नौकरी न मिलने पर कुमार जीवन-यापन हेतु बूट पॉलिश का धन्धा अपना लिया और ऐसा करने में उसे न तो लज्जा का अनुभव हुआ और न संकोच का । वह पॉलिश करने का मेहनताना केवल एक पैसा लेता था, जबकि दूसरे मोची दो पैसे और कभी-कभी तो इकन्नी तक लेते थे। उसकी मलमन साहत का यह एक और प्रमाण था।
भले ही मोची को काम करने से उसकी सामाजिक प्रतिष्ठा को खतरा हो गया हो किन्तु कुमार ने तब तक यह काम किया जब तक उसे कमल को पढ़ाने का काम नहीं मिल गया । जीवन-यापन के लिए कोई भी काम करने में उसे संकोच न था। गाँव वालों को जब यह पता चला कि कुमार लखनऊ में जूता गाँठता है तो वह उससे और भी अप्रसन्न हो गये । पहले ही विलायत जाने के अपराध में उन लोगों ने उसके परिवार का बहिष्कार कर रखा था, अब तो उससे और भी नाराज हो गये । किन्तु उसे किसी की परवाह न थी । वह किसी भी मेहनत करने वाले काम को बुरा नहीं मानता।
सुन्दर एवं शालीन युवक
कुमार सुन्दर एवं शालीन युवक है । उसकी सुन्दरता से प्रभावित होकर ही निरुपमा उसके प्रति आकृष्ट होती है । लेखक के अनुसार - "कोई भी कुमार को सुन्दर कहेगा । उसके सोते समय युवती किस भाव से किस दृष्टि से देख रही थी, नहीं मालूम। पर उसके सोने पर भी उसके ललाट, चिबुक, नाक और मुँदी आयत आँखें विद्या के परिचय से प्रदीप्त रहती हैं । लम्बे बाल कानों को ढककर कपोलों तक आ जाते हैं।"
सुन्दर को सभी आँखें देखती हैं । रूप ही दर्शन की सार्थकता है । कुमार और निरुपमा दोनों एक-दूसरे की ओर मौन-भाव से देख रहे थे। जैसे ही कुमार की नजर ने निरुपमा को अपनी ओर देखते पकड़ा, वह मुख फेरकर दूसरी ओर देखने लगी- होठों में मुस्करा रही थी ।
कुमार संगीत प्रिय व्यक्ति है । होटल में वह अक्सर गुनगुनाता रहता है । जब निरुपमा हारमोनियम पर गा रही थी 'तोमारे करियाछि जीवनेर ध्रुवतारा' तब वह भी उसी स्वर में स्वर मिलाकर भावावेश में गाने लगा । हारमोनियम बंद हो गया और भारी कण्ठ वाला रवीन्द्र संगीत ग्रामोफोन पर बजने लगा । कुमार ने उस गाने के साथ ही स्वर मिलाया क्योंकि वह कलकत्ते में रह चुका था और 'टैगोर स्कूल' से उसका परिचय था । अचानक रिकार्ड बंद हो गया और कुमार ने भी गाना बंद कर दिया । निरुपमा ने उसे लक्ष्य कर कहा 'छँचो, गोरु, गाधा' । कुमार निर्विकार चित्र से 'भज गोविन्द' गाने लगा । कुमार उन गालियों में छिपी प्रेम की मधुर भावना को समझ गया । निरुपमा की छवि को आँखों में लिए कुमार सो गया।
सामाजिक दुर्भावना का शिकार
कुमार जानता था कि समाज के लोगों को उसका यूरोप जाना पसन्द नहीं है । गाँव वाले कूप मण्डूकता से ग्रस्त थे और सोचते थे कि विलायत जाने वाला व्यक्ति अपने धर्म की रक्षा न कर पाने से धर्मभ्रष्ट हो जाता है। यूरोप जाते वक्त वह जानता था कि उसे समाज का सामना करना पड़ेगा। गाँव वालों ने उसके परिवार का सामाजिक बहिष्कार कर दिया था। उसकी माँ और भाई को गाँव वाले बिरादरी से बहिष्कृत कर चुके थे। कोई न तो उन्हें अपने यहाँ बुलाता था और न उनके यहाँ कोई आता था। यही नहीं गाँव के कुएँ से उनका पानी भरना बंद करा दिया गया था । रामचन्दा ने पत्र में ये सब बातें कुमार को लिखी थीं— “खर्च नहीं चलता, माँ के पास भी खर्च नहीं, गाँव वालों को कुछ भी सहानुभूति नहीं, न्योते नहीं आते।"
रामपुर गाँव में कुलीन ब्राह्मणों की आपसी बातचीत से भी यह पता चलता है कि उन लोगों ने परस्पर मिलकर कुमार के परिवार को सांसत में डाला था । बाजपेई को संबोधित कर मन्नी सुकुल बोले— “कानपुर में अपनी अम्मा को बुलाकर मिले और घर न आये, तो क्या गाँव वाले इतने बेवकूफ हैं कि नहीं समझे कि वहाँ अम्मा ने सपूत को चौके में बुलाकर खिलाया होगा ।"
मन्नी को बाजी मारते देखकर गुरुदीन त्यौरियाँ चढ़ाकर बोले— “उसी के बाद रामचन्दा कुएँ पर मिला, हमने कहा—यह तेवारियों का कुआँ है, जहाँ बाप ने खुदवाया हो, वहाँ जाव भरो। फिर क्या भरने पाया ?"
सीतल कहाँ पीछे रहने वाले थे—“लेकिन घरों में आना-जाना हमने बन्द कराया है, नहीं तो तुम्हारे साथी अब तक कितने बेधर्म हो चुके होते ।"
गाँव वालों को जब यह पता चला कि 'किसुनकुमार' लखनऊ में जूता पॉलिश करते हैं तो मारे घृणा के सब लोग जैसे जमीन में गढ़ गये । वास्तविकता यह थी कि गाँव वालों को यह बुरा लगता था कि उनके ही गाँव का एक व्यक्ति अपने लड़के को पढ़ाने के लिए अपनी सम्पत्ति रेहन रखकर पुत्र को विलायत पढ़ने भेजता है, जबकि वे ऐसा कर पाने में असमर्थ हैं। अब उन्हें बदला लेने का अवसर मिला है तो क्यों चूकें ।
जमींदार के शोषण से त्रस्त
निरुपमा उपन्यास में निराला ने जमींदारों के उस शोषण का उल्लेख भी किया है जो जमींदारी प्रथा के चलते किसानों को झेलना पड़ता है । गरीब किसान जमींदारों की बेगार करने को बाध्य हैं। यही नहीं अपितु वह उनके खेत, बाग भी बेदखल कर लेता है। कुमार के खेत और बाग रामपुर में थे जिन्हें रामपुर के जमींदार के मुख्तार सुरेश बाबू ने बेदखल कर दिया और अब ऊपर कुमार परिवार का कोई अधिकार न रहा । बेचारों का खर्च भी नहीं चलता है । रामचन्द्र ने अपने भाई कुमार को जो पत्र लिखा है उसमें इसका उल्लेख है । जब निरुपमा को जो रामपुर की वास्तविक जमींदार थी इसका पता चलता है तो वह रामचन्द्र को उसके खेत और बाग पुनः दिला देती है। यही नहीं अपितु कुमार के जो कानपुर वाले मकान रेहन रखे थे उन्हें निरुपमा खरीदकर उन मकानों की लिखा-पढ़ी भी रामचन्द्र के नाम करवा देती है
कुमार भी इस शोषण का शिकार बना, जिसके चलते उसकी माँ और भाई को अनेक प्रकार के कष्ट सहने पड़े । यही नहीं अपितु जो मलिकवा उसके खेत बटाई पर लिए हुए था। उसने जब गाँव वालों की और सुरेश बाबू की बात नहीं मानी तो उसकी लाश पोखर में तैरती मिली ।
स्वाभिमानी युवक
कुमार स्वाभिमानी युवक है। जब योग्य होते हुए भी सिफारिश न होने के कारण उसे लखनऊ विश्वविद्यालय की नौकरी न मिली तो भी उसने हिम्मत नहीं हारी और जूता पॉलिश करके अपना जीवन-यापन करने लगा। कुमार में स्वाभिमान की भावना कूट-कूट कर भरी हुई है। इसी स्वाभिमान के चलते उसने निरुपमा द्वारा रामचन्द्र का शिक्षा के लिए नियत की गयी 20 रुपये प्रतिमास की छात्रवृत्ति को कृतज्ञता प्रकट करते हुए लेने से इन्कार कर दिया क्योंकि वह नहीं चाहता था कि लोग उसे इतना अक्षम समझें कि वह अपने भाई को लिखा-पढ़ा भी नहीं सकता ।
उसे जूता पॉलिश करना मंजूर है किन्तु प्रकाशक का शोषण बर्दाश्त नहीं जो उसे चार रुपये फार्म का पारिश्रमक देकर मोपांसा का अनुवाद कराना चाहते थे । काम करेगा तो अपनी शर्तों पर अन्यथा जूता पॉलिश कर लेगा । यह सिद्धान्त की बात है । इसी प्रकार पण्डित राम खेलावन सिंह सात रुपये प्रति घण्टे के हिसाब से पढ़वाना चाहते थे, वह भी उसे मंजूर नहीं हुआ।
यामिनी बाबू जब बिना काम करवाये उसे पैसे देने के लिए राजी हो गये तो भी कुमार ने उनके दिये पैसे नहीं लिये। वह उन्हें धन्यवाद देते हुए कहता है, "मैं इस तरह की सहायता नहीं चाहता ।"
कमल ने कुमार को उसकी योग्यता के कारण ही अपना ट्यूटर नियुक्त किया था जहाँ वह 200 रुपये प्रति मास पर उसे दो घण्टे अंग्रेजी पढ़ा दिया करता था ।
निरुपमा के प्रति आकृष्ट
कुमार प्रारम्भ से निरुपमा के प्रति आकृष्ट था और उसके सौन्दर्य पर मुग्ध था। वह निरुपमा के घर के सामने वाले होटल में रहता था अतः निरुपमा को सौन्दर्य से देखने का अवसर उसे मिलता रहता था । गीत गाने पर जब निरुपमा ने नाराज होकर उसे 'छँचो, गोरु, गाधा' कहा तो भी उसे बुरा नहीं लगा । निरुपमा को उसकी और उसके परिवार वालों की चिन्ता इसलिए है क्योंकि निरुपमा मन ही मन उसे प्रेम करती है।
निरुपमा ने लखनऊ में कुमार की माँ से मिलकर यह भी जान लिया था कि कुमार जिसे अपनी पत्नी बनाना चाहेगा, उसकी माँ उसे बहू के रूप में स्वीकार कर लेंगी। कमल ने भी जब निरुपमा के मन की बात जान ली कि वह कुमार से प्रेम करती है और कुमार भी निरुपमा को चाहता है तब उसने प्रयास करके उन दोनों का विवाह करा दिया । गाँव वाले भी अब उसे अपना जमींदार समझकर सारा विरोध भूल गये । मुखिया का यह कथन—“पागल हो राजा से कोई बैर करता है ।" इस बात की पुष्टि करता है कि अब गाँव वालों ने भी उसे स्वीकार कर लिया है और उसके विलायत हो आने से अब उन्हें कोई ऐतराज नहीं है।
उक्त विवेचन के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि कृष्णकुमार इस उपयास का सर्वाधिक प्रभावशाली पात्र है और नायक पद के लिए सर्वाधिक उपयुक्त पात्र है।कृष्ण कुमार एक ऐसे आदर्शवादी और कर्मठ नायक हैं जो प्रेम, स्वाभिमान और समाज-सुधार के मूल्यों का सटीक संतुलन प्रस्तुत करते हैं।


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