सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' द्वारा रचित उपन्यास 'निरुपमा' (1936) मूलतः भारतीय समाज में नारी की अस्मिता, सामाजिक रूढ़ियों के विरोध और प्रेम के उदात्त
निरुपमा उपन्यास का उद्देश्य | सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला'
निरुपमा निराला द्वारा रचित सामाजिक उपन्यास है, जिसकी रचना सन् 1935 में की गयी थी। यह निराला का चौथा उपन्यास है। इससे पूर्व वे अलका, अप्सरा और प्रभावती की रचना कर चुके थे और एक उपन्यासकार के रूप में चर्चित हो चुके थे।उनकी उपन्यास कला में भी निखार आ चुका था तथा भाषा-शैली भी परिमार्जित हो गयी थी।
प्रस्तुत उपन्यास में लेखक ने एक ओर तो युगीन समस्याओं का निरुपण किया है तो दूसरी ओर एक प्रेमकथा के माध्यम से पाठकों का स्वस्थ मनोरंजन भी किया है । भारत के लोग कितने रुढ़िवादी हैं जो केवल इसी बात पर किसी परिवार का सामाजिक बहिष्कार कर देते हैं कि उस परिवार का कोई सदस्य विलायत होकर आया है । कैसी विडम्बना है कि अंग्रेजी में लंदन से डी. लिट् किया हुआ युवक भी सिफारिश के अभाव में अपने लिए योग्य नौकरी नहीं तलाश पाता और जूता-पॉलिश करके जीवन-यापन करता है । जमींदार किस प्रकार से ग्रामीण जनता और अपनी रिआया का शोषण करते हैं तथा धन सम्पत्ति हड़पने के लिए किस प्रकार रिश्ते-नातों को तिलांजलि देकर मामा ही भाँजी की जमींदारी और उसकी आय को हड़पने के लिए हथकण्डे दिखा रहा है, इसका कच्चा चिट्ठा निरुपमा उपन्यास में प्रस्तुत किया गया है । संक्षेप में इस उपन्यास के उद्देश्य एवं समस्याओं का निरूपण निम्न शीर्षकों में किया जा सकता है:
शिक्षित बेरोजगारों की समस्या
इस उपन्यास का एक उद्देश्य शिक्षित बेरोजगारों की समस्या की ओर ध्यान आकृष्ट करना है । कृष्णकुमार ने लंदन से अंग्रेजी में डी. लिट् की उपाधि प्राप्त की है इसके बावजूद उसे लखनऊ विश्वविद्यालय में प्राध्यापक की नौकरी इसलिए नहीं मिली क्योंकि वह बंगाली नहीं था और उसके पास कोई सिफारिश नहीं थी । यामिनी बाबू उससे कम योग्य थे किन्तु वे बंगाली थे और उनके पास अच्छी सिफारिश थी इसलिए उन्हें नौकरी मिल गयी । निराला ने इसके माध्यम से यह व्यंजित किया है कि नौकरी पाने के लिए योग्यता नहीं अपितु सिफारिश की जरुरत होती है साथ ही लोग भाई-भतीजावाद, क्षेत्रवाद एवं जातिवाद के आधार पर भी नौकरी प्राप्त करते हैं । यद्यपि यह विचित्र प्रतीत होता है कि सन् 1935 में डी. लिट् उपाधिधारी व्यक्ति की ऐसी बेकदरी हो रही थी कि उसे जूता पॉलिश करके अपना जीवनयापन करना पड़ा। भले ही इसमें कुछ अतिरंजना हो किन्तु निराला इसके माध्यम से शिक्षित बेरोजगारों की समस्या को प्रस्तुत करना चाहते हैं।
कृष्णकुमार जैसे पढ़े-लिखे एवं योग्य व्यक्ति स्वाभिमानी होते हैं।वे कम पारिश्रमिक पर कोई कार्य करना अपना और अपनी शिक्षा का अपमान समझते हैं इसलिए कृष्णकुमार ने 'सस्ता साहित्य समुद्र' के प्रकाशक लाला श्यामनारायण लाल का यह प्रस्ताव ठुकरा दिया जिसमें वे चार रुपये फार्म मेहनताना देकर मोपांसा का अनुवाद उससे कराना चाहते थे और पं. रामखेलावन सिंह 'सात रुपये प्रति घण्टे के हिसाब से उससे पढ़वाना चाहते थे।
निराला ने स्वयं भी छतरपुर महाराज का यह प्रस्ताव कि वे बंगला के भक्त कवि चण्डीदास के पदों का ब्रजभाषा पद्य में अनुवाद कर दें, इसलिए ठुकरा दिया था क्योंकि वे जो पारिश्रमिक दे रहे थे, वह बहुत कम था जो निराला को किसी प्रकार स्वीकार नहीं था । कम दाम पर साहित्यिक कार्य करना वे अपना और साहित्य दोनों का अपमान समझते थे । निराला के जीवन का यही व्यक्तिगत सत्य यहाँ कृष्णकुमार के, स्वाभिमान के रूप में व्यक्त हुआ है । उसे जूता पॉलिश करना मंजूर है किन्तु वह कम पारिश्रमिक पर साहित्यिक कार्य नहीं कर सकता ।
निश्चय ही निराला का एक उद्देश्य शिक्षित बेरोजगारों की समस्या को प्रस्तुत करना रहा है, जिसमें उन्हें सफलता भी मिली है।
दकियानूसी, रूढ़िवादी समाज का चित्रण करना
भारतीयों की कूप- मण्डूकता का एक कारण यह भी रहा है कि वे अपने तक सीमित रहे । देश-दुनिया में क्या हो रहा है, इसे जानने के लिए बाहर निकलना पड़ेगा किन्तु जिस देश में छुआ-छूत, खान-पान का ऐसा परहेज हो कि विलायत जाने वालों को धर्मभ्रष्ट मानकर समाज बहिष्कृत कर दिया जाय, उस देश का भगवान ही मालिक है।
कृष्णकुमार के माता-पिता ने प्रगतिशील का परिचय देते हुए अपने पुत्र को विलायत में पढ़ने के लिए भेजा तथा पैसे का प्रबन्ध करने हेतु अपने कानपुर वाला मकान भी गिरवी रख दिया किन्तु गाँव वालों को यह अच्छा न लगा । विलायत जाकर जैसे कृष्णकुमार ने कोई सामाजिक अपराध कर दिया अतः उसे और उसके परिवार को धर्मभ्रष्ट मानकर गाँव वालों ने समाज बहिष्कृत कर दिया । न कोई उनके यहाँ जाता है न उन्हें निमन्त्रण देता है । यही नहीं अपितु उनको गाँव के कुएँ से पानी भरने के लिए भी रोक दिया गया । विलाइत जाने से छूत लग जाती है, व्यक्ति धर्मभ्रष्ट हो जाता है, समाज में रहने लायक नहीं रहता इस रूढ़िवादी एवं दकियानूसी सोच को निराला ने यहाँ दर्शाया है । गाँव के कुलीन ब्राह्मणों की अनौपचारिक मीटिंग में सब इस बात का श्रेय लेना चाहते हैं कि उन्होंने कुमार के परिवार पर सामाजिक प्रतिबन्ध लगाकर लोगों को धर्मभ्रष्ट होने से बचाया है।
वह बाद में गाँव वालों को जब यह पता चला कि कुमार जूता पॉलिश करने लगा है तो मन-ही-मन उसके पतन पर वे प्रसन्न होते हैं और यह चाहते हैं कि किसी प्रकार उसका परिवार भूखों मर जाये ।
जमींदारों के शोषण का चित्रण
प्रेमचन्द्र ने अपने दो प्रमुख उपन्यासों— 'प्रेमाश्रम' और 'गोदान' में जिस प्रकार जमींदारों के शोषण का चित्रण किया है उसी प्रकार निराला ने भी निरुपमा में जमींदारों के शोषण का यथार्थ चित्र अंकित किया है । गाँव के किसी परिवार को 'अरदब' में लेकर उसे खेतों तथा बाग-बगीचों से बेदखल कर देना । बायें हाथ का काम है। जमींदार ने गाँव वालों की सहायता से कृष्णकुमार को रामपुर वाले खेतों एवं बगीचों से बेदखल कर दिया। सुरेश बाबू जो अपनी फुफेरी बहन निरुपमा की जमींदारी का कारोबार देखते हैं, बडे घाघ जमींदार हैं। उन्होनें अवसर पाते ही कुमार के खेत और बाग हथिया लिए हैं जो उसके परिवार का भरण-पोषण करने के साधन थे । अब परिवार का खर्च नहीं चलता । रामचन्द्र ने अपने भाई को जो चिट्ठी लिखी है उसमें इसका उल्लेख है।
जमींदार गाँव वालों से भी बेगार लेता है। उनसे अपने खेत में हल चलवाता है । जमींदार के खेत पहले बोए जायेंगे और वह जिन किसानों से यह कार्य करने को कहेगा वे परम्परानुसार मना नहीं कर सकते । रामपुर गाँव के कुलीन ब्राह्मण भी यह सब करने को विवश हैं।
खिलावन को जमींदार की तथा गाँव वालों की बात न मानने पर 'मृत्यु - दण्ड' भुगतना पड़ा। उससे मना किया कि तुम कुमार के खेतों को बटाई पर नहीं जोतोगे किन्तु जब वह न माना तो दूसरे दिन उसकी लाश पोखर में तैरती मिली। ग्रामीण वृद्धा अपनी विपत्ति कथा निरुपमा से इन शब्दों में कहती है-“रत्ती-रत्ती जिउ देने से एक साथ मर जाना अच्छा यह देखो किसी तरह लाज बचाये हैं, असाढ़ का महीना है, अनाज नहीं रहा, छः छः रुपये वाले खेत के तीन साल में अठारह अठारह रुपये पड़ने लगे । डेढ़ी का अनाज तुम ही से लें, नजर नियाद ऊपर से, कहाँ तक दें ? खेत न जोतें तो नहीं बनता, पापी पेट ।"
जमींदार तो गाँव का राजा है।भला कोई राजा से बैर करता है उसका किया धरा सब जायज है । इसी धारणा के कारण ग्रामीणजनों को जमींदारी व्यवस्था में पिसना पड़ता था।
निराला ने प्रगतिशील चरित्रों की सृष्टि करके नवशिक्षित तरुण-तरुणियों- कृष्णकुमार, निरुपमा, कमल के माध्यम से सामंती रुढ़ियों को तोड़कर समाज के सम्मुख एक आदर्श प्रस्तुत किया है।
नारी मुक्ति का पथ प्रशस्त करना
निरुपमा उपन्यास का एक अन्य उद्देश्य नारी मुक्ति का पथ प्रशस्त करना भी है 'निरुपमा' एक पढ़ी-लिखी युवती है किन्तु स्वभाव से भोली, सरल एवं सहज है।उसकी जायदाद को, जमींदारी की आमदनी को उसके अपने मामा धीरे-धीरे हड़प रहे हैं, पर वह उधर से असावधान हैं । उसे यह अच्छी तरह मालूम है कि वह यामिनी बाबू को प्रेम नहीं करती, कृष्णकुमार से प्रेम करती है फिर भी मामा द्वारा मनोनीत यामिनी बाबू को अपने भावी वर के रूप में स्वीकार कर लेती है और मामा तथा दादा सुरेश की इच्छा को ध्यान में रखकर यामिनी बाबू के साथ घूमने फिरने चली जाया करती है।
कमल उसकी तुलना में अधिक चतुर, दुनियादारी के मामलों में अधिक व्यावहारिक युवती है । वह निरुपमा को उसके मामा की नीयत के बारे में बताती है और उसे इस सम्बन्ध में सचेत करती है कि उसके मामा धीरे-धीरे उसकी जमींदारी को किस प्रकार हड़पते जा रहे हैं। यामिनी बाबू से निरुपमा का विवाह भी वे इसीलिए करवा रहे थे, जिससे विवाह के बाद भी जमींदारी की देखभाल उनके जिम्मे रहे । जमींदारी की आमदनी को तो वह हड़प ही रहे थे साथ ही यह चाहते थे कि निरुपमा उनसे कर्ज लेकर रुपया यामिनी बाबू को दे दे और यामिनी बाबू उससे कानपुर के रेहन रखे मकानों की रजिस्ट्री करवा लें । तत्पश्चात् उस कर्ज और ब्याज के चक्कर में निरुपमा को ऐसा उलझा दें कि उसकी जायदाद पर ही कब्जा कर लें किन्तु कमल की सजगता के कारण उनकी चाल कामयाब नहीं हो सकी। यामिनी बाबू के लिए दुबे से विवाह पूर्व शारीरिक सम्बन्ध बन चुके थे । मिस दुबे ने जब पत्र में लिखकर कमल को सूचित किया तो कमल ने वह पत्र निरुपमा को दिखा दिया। इससे यामिनी बाबू की वास्तविकता उजागर हो गयी । कमल और कृष्णकुमार के प्रेम के बारे में जानकर कमल ने ही चतुराई दिखाते हुए कुमार और निरुपमा का विवाह इस प्रकार करा दिया कि यामिनी बाबू और उसके मामा योगेश बाबू को इसकी भनक तक नहीं लग सकी । यामिनी बाबू का विवाह मिस सुशीला दुबे से करवाकर कमल ने अपनी बुद्धिमत्ता का परिचय दिया।
उक्त घटनाक्रम के द्वारा निराला यह व्यंजित कर रहे हैं कि आज की पढ़ी-लिखी नवयुवतियाँ अपना भला-बुरा स्वयं सोचकर अपने सम्बन्ध में स्वयं निर्णय लेने में सक्षम हैं । वे अबला मात्र नहीं है तथा किसी की कठपुतली बनकर अपना जीवन नहीं बिता सकतीं। नारी मुक्ति की दिशा में इस उपन्यास की घटनाएँ संकेत करती प्रतीत होती हैं।
उक्त विवेचन के आधार पर यह कहा जा सकता है कि.निरुपमा उपन्यास में लेखक ने अनेक समस्याओं का चित्रण किया है। निराला ने बड़ी कुशलता से यहाँ उन समस्याओं का उल्लेख कर दिया है जो वर्तमान पीढ़ी को अपने समय में झेलनी पड़ रही हैं इसलिए यह उपन्यास आज भी नया और प्रासंगिक लगता है। निश्चय ही उपन्यासकार को अपने उद्देश्य में पूर्ण सफलता प्राप्त हुई है, यह इस उपन्यास को पढ़कर इसके आधार पर प्राप्त निष्कर्षों से पता चल जाता है।


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