सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' द्वारा रचित 'निरुपमा' (1936) आधुनिक हिंदी गद्य साहित्य का एक महत्वपूर्ण सामाजिक-मनोवैज्ञानिक उपन्यास है।
निरुपमा उपन्यास की समीक्षा | सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला'
सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' द्वारा रचित 'निरुपमा' (1936) आधुनिक हिंदी गद्य साहित्य का एक महत्वपूर्ण सामाजिक-मनोवैज्ञानिक उपन्यास है। छायावादी काव्य में अपनी ओजस्वी और विद्रोही वाणी के लिए प्रसिद्ध निराला जी ने इस उपन्यास में गद्यकार के रूप में तत्कालीन समाज की विसंगतियों, नारी-स्वातंत्र्य और नैतिक आदर्शों का गहरा विश्लेषण प्रस्तुत किया है।
निरुपमा सन् 1935 में लिखा गया निराला का चौथा उपन्यास है । इससे पूर्व वे अप्सरा, अलका एवं प्रभावती की रचना कर चुके थे और उनकी उपन्यास कला भी मँज चुकी थी । परम्परागत तौर पर उपन्यास के छः तत्त्व बताए गये हैं-
- कथानक,
- पात्र और चरित्र-चित्रण,
- देशकाल और वातावरण,
- भाषा-शैली,
- संवाद योजना; तथा
- उद्देश्य।
यहाँ हम निरुपमा की समीक्षा इन्हीं तत्त्वों के आधार पर करेंगे और यह निष्कर्ष निकालने का प्रयास करेंगे उपन्यासकला की दृष्टि से 'निरुपमा' की रचना में निराला को कितनी सफलता प्राप्त हुई है -
कथानक
कथानक उपन्यास का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण तत्त्व है। एक अच्छा उपन्यास वही माना जाता है, जिसका कथानक घटना प्रधान हो, सभी घटनाएँ कार्य- कारण श्रृंखला से परस्पर जुड़ी हों तथा प्रासंगिक कथाएँ अधिकारिक कथा को वाली हो । कथानक में अपेक्षित विस्तार हो तथा वह विशृंखलित न हो । कथानक में गतिशीलता, रोचकता, कौतूहल जैसे गुण भी होने चाहिए । इस उपन्यास का कथानक संक्षेप में इस प्रकार है:
निरुपमा के माता-पिता का देहान्त हो चुका है। वह लखनऊ में अपने मामा योगेश बाबू के परिवार के साथ रहती है ।उसकी जमींदारी उन्नाव जिले के रामपुर गाँव में है, जिसकी देखभाल योगेश बाबू और उनके पुत्र सुरेश बाबू करते हैं। योगेश बाबू की नीयत साफ नहीं है, अपनी ही भाँजी की जमींदारी की आय वे लम्बे समय तक हड़पते रहे हैं और अब चाहते हैं कि निरुपमा का विवाह यामिनी बाबू से हो जाय जो लखनऊ विश्वविद्यालय में प्राध्यापक हैं तथा योगेश बाबू के दूर के रिश्तेदार हैं।
कृष्णकुमार रामपुर गाँव का रहने वाला युवक था । उसके पिता ने कानपुर के मकान गिरवी रखकर अपने बेटे को लंदन से अंग्रेजी में डी. लिट् करवाया था किन्तु सिफारिश न होने के कारण योग्य होते हुए भी उसे विश्वविद्यालय में नौकरी नहीं मिली । यह नौकरी उससे कम योग्य यामिनी बाबू को इसलिए मिल गई क्योंकि वे बंगाली थे और साक्षात्कार लेने वालों में बंगालियों का प्रभुत्व था । कुमार नौकरी न मिल पाने से निराश तो हुआ किन्तु वह मेहनती युवक था । जूता पॉलिश का काम करके वह अपने जीवन का भरण-पोषण करने लगा। जिस होटल में वह रहता था, उसी के सामने निरुपमा का घर था । निरुपमा की ममेरी बहन नीली थी जो अभी किशोरी ही थी।धीरे-धीरे निरुपमा कुमार को पसन्द करने लगी। मोची का काम करने से होटल वालों ने कुमार को होटल से निकाल दिया।
निरुपमा जब अपनी जमींदारी में रामपुर गई तथा उसे पता चला कि उसका ममेरा भाई सुरेश किस प्रकार जमींदारी के हिसाब-किताब में गड़बड़ी करता रहा है और गरीब लाचार किसानों के साथ अन्याय-अत्याचार करता है । कुमार की माता सावित्री देवी अपने छोटे बेटे रामचन्द्र के साथ गाँव में रहती हैं। उनके खेत और बाग बेदखल कर लिए गये हैं तथा गाँव वालों ने उनका सामाजिक बहिष्कार कर रखा है क्योंकि उनका बेटा कुमार विलायत हो आया है और इस प्रकार बेदीन, अधर्मी बन गया है। उन्होंने गाँव के कुएँ से उसका पानी भरना भी बंद कर दिया है। बेचारी खेत पर स्थित कुएँ से पानी भरकर लाती है । गाँव वाले अब इसे भी बंद कराना चाहते हैं। मलिकवा बटाई पर पर कुमार के खेत जोतता था । गाँव वालों के मना करने पर भी जब वह न माना तो सुरेश बाबू ने उसकी हत्या करवा दी। एक दिन उसकी लाश तालाब में तैरती मिली।
गाँव में निरुपमा के पहुँचने पर पहले नीली कुमार के घर गयी। निरुपमा ने रामचन्द्र के लिए बीस रुपये प्रतिमास का वजीफा पढ़ाई के खर्चे हेतु बाँध दिया और अपनी सदाशयता का परिचय दिया । वह कुमार की माँ के आमन्त्रण पर उसके घर भी जाना चाहती थी किन्तु सुरेश बाबू की अनिच्छा जानकर नहीं गई ।
कुमार अब नगर में कमल को दो सौ रुपये प्रतिमास पर अंग्रेजी की ट्यूशन पढ़ाने लगा था । अतः अपने भाई एवं माँ को तथा मलिकवा की माँ को लखनऊ ले आया । निरुपमा एक दिन उसकी माँ से मिलने गई। कुमार भी कमल को लेकर घर आया । तब कमल को पता चला कि उसकी सहेली निरुपमा कुमार से प्यार करती है, जबकि उसके मामा उसका विवाह बिना उसकी इच्छा जाने यामिनीहरण से कराना चाहते हैं। यामिनी- हरण चरित्र का अच्छा युवक नहीं था। वह प्रो. दुबे की पुत्री के साथ सम्बन्ध बनाकर उसे गर्भवती बना चुका था। अन्त में कमल की योजना से यामिनी का विवाह मिस दुबे से तथा निरुपमा का विवाह कुमार से हो गया । निरुपमा ने रामचन्द्र को उसके खेत, बाग, कानपुर वाले मकान स्वयं खरीदकर दे दिए तथा मलिकवा की माँ के लिए तीन बीघे माफी जमीन लिख दी। गाँव वाले भी अब कुमार को गाँव की जमींदार का पति समझकर यह कहने को विवश हो गये कि राजा को कोई दोष नहीं लगता । कितने ही विलायत के नये लोग शहरों में रहते हैं, उनका हुक्का-पानी कोई बंद नहीं करता ।
उक्त कथानक में अपेक्षित विस्तार होते हुए भी केवल आवश्यक घटनाएँ ही हैं । पाठक में कौतूहल एवं जिज्ञासा की वृत्ति अन्त तक बनी रहती है । घटनाएँ सुस्तबद्ध हैं अतः कथानक विश्रृंखलित नहीं हैं। कथानक उद्देश्यपूर्ण एवं रोचक भी है अत: हम कह सकते हैं कि कथानक की दृष्टि से यह एक सफल उपन्यास है।
पात्र एवं चरित्र चित्रण
उपन्यास की कथा पात्रों के माध्यम से आगे बढ़ती है। पात्रों की संख्या न बहुत अधिक न बहुत कम होनी चाहिए तथा प्रमुख पात्रों के चरित्र को उजागर करने वाली घटनाओं का समावेश उपन्यास में रहना चाहिए। पात्रों के चरित्र अति मानवीय नहीं होने चाहिए, उनमें गुण-अवगुण दोनों का समावेश होने पर वे मानवीय चरित्र प्रतीत होते हैं । इस उपन्यास के प्रमुख पात्र हैं—कृष्णकुमार, रामचन्द्र, यामिनी बाबू, योगेश बाबू, सुरेश बाबू । इनके अतिरिक्त कुछ ग्रामीण पात्र भी हैं । रामलोचन बाबू का उल्लेख मात्र है, जो निरुपमा के पिता थे । स्त्री पात्रों में निरुपमा, कमल, सावित्री देवी, नीली (नीलिमा) ही प्रमुख हैं। इनके अतिरिक्त मलिकवा की माँ, मिस सुशीला दुबे का उल्लेख भी उपन्यास में है साथ ही कुछ ग्रामीण स्त्री पात्र भी हैं।
पात्रों के चरित्र का विकास स्वाभाविक रूप से हुआ है । चरित्रों के गुण-अवगुण का कथन न होकर घटनाओं के माध्यम से चरित्रांकन किया गया है । इस उपन्यास को नायिका प्रधान उपन्यास कहा जा सकता है क्योंकि 'निरुपमा' ही उपन्यास के केन्द्र में है. वह उपन्यास के प्रारम्भ से लेकर अन्त तक विद्यमान हैं। कथा के सभी पात्रों से प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में जुड़ी है। कृष्ण कुमार को उपन्यास का नायक कहा जा सकता है। वह एक प्रतिभा सम्पन्न, उच्चशिक्षित, चरित्रवान, परिश्रमी एवं स्वाभिमानी युवक है जो किसी काम को भी करना खराब नहीं समझता। जब उसे लखनऊ विश्वविद्यालय में नौकरी नहीं मिलती तो जीवन-यापन के लिए जूता पॉलिश का काम करने में नहीं हिचकता ।
निरुपमा एक सुन्दर, शिष्ट, बड़ों का सम्मान करने वाली युवती है। वह जानती है कि उसके मामा और ममेरे भाई मिलकर उसकी जमींदारी से पैसा बना रहे हैं फिर भी वह उनके प्रति कटु नहीं हो पाती। वह संवदेनशील युवती है, कुमार से प्रेम करती है किन्तु मर्यादाओं का पालन करती हुई अपने मामा से यह नहीं कह पाती कि यामिनी बाबू से वह विवाह नहीं करना चाहती । अपनी रिआया के प्रति वह बहुत संवेदनशील हैं उसे यह अच्छा नहीं लगता कि रामचन्द्र को खेत, बागों से बेदखल कर दिया जाए इसीलिए वह सावित्री देवी को चिट्ठी लिखकर उन्हें आश्वस्त करती है कि उनके खेत और बाग उन्हें वापस कर दिये जायेंगे । यही नहीं अपितु वह रामचन्द्र के नाम कानपुर के रेहन रखे मकानों की रजिस्ट्री करने को भी तत्पर है।
योगेश बाबू एक स्वार्थी, जालसाज, छलकपट से परिपूर्ण चरित्र है जो अपनी भाँजी की जायदाद को हड़पने की फिराक में है। कमल एक सहेली के रूप में कर्त्तव्यनिष्ठ, सहयोगी स्वभाव की युवती के रूप में सामने आई है, जिसके उद्योग से निरुपमा और कुमार का विवाह सम्भव हो सका है।
संक्षेप में चरित्रांकन की दृष्टि से यह एक सफल उपन्यास कहा जा सकता है ।
देशकाल एवं वातावरण
देशकाल एवं वातावरण का यथार्थ अंकन होने से उपन्यास की कथा में विश्वसनीयता का संचार होता है । पाठक उस काल में मानसिक रूप से पहुँच जाता है जिस काल की कथावस्तु उपन्यास में चित्रित की गयी है । इस उपन्यास की रचना उस समय (1935 ई.) की गयी जब भारत का स्वतन्त्रता आन्दोलन अपने चरम पर था तथा चारों ओर सुधार की लहर चल रही थी। यह लहर बंगाल में कुछ अधिक तीव्र थी इसी कारण इस काल में लिखे गये बंगला उपन्यासों में समाज सुधार, नारी-जागरण अपने चरम पर देखा जा सकता है। निराला भी बहुत दिनों तक बंगाल में रहे थे अतः उनके मन पर भी समाज सुधार की प्रवृत्ति हावी थी ।
निरुपमा में उन्होंने एक ओर तो यह दिखाने का प्रयास किया है कि जमींदार अपनी रिआया को किस प्रकार लूटते-खसोटते हैं । उनके खेतों पर बेदखली आ जाती है, साथ ही ग्रामीण जनता अभी भी दकियानूसी है । विलायत (इंग्लैण्ड) जाकर जो वापस आ गया है वह अब ब्राह्मण नहीं रहा, धर्मभ्रष्ट हो गया ऐसी इनकी मान्यता है । इसी कारण कुमार के परिवार को गाँव समाज से बहिष्कृत कर दिया गया है। कोई उनके परिवार से सामाजिक सम्बन्ध नहीं रखना चाहता, उन्हें अछूत समझा जा रहा है। यही नहीं उसके परिवार को गाँव के कुएँ से पानी भी नहीं भरने दिया जा रहा है। कृष्ण कुमार, कमल और निरुपमा के चरित्र सामंती रुढ़ियों को तोड़कर समाज के सम्मुख और आदर्श प्रस्तुत करते हैं। उनके मार्ग में बाधाएँ आती हैं, पर वे उनसे विचलित नहीं होते और संघर्ष करते हुए अपने लक्ष्य तक पहुँचते हैं । कमल और निरुपमा जैसे नारी चरित्रों के माध्यम से निराला ने नारी मुक्ति आन्दोलन का पथ भी प्रशस्त किया है।
गाँव वाले अभी तक दकियानूसी विचारधारा के एवं रुढ़िवादी लोग हैं। छुआछूत में विश्वास करने वाले ये लोग विलायत गये व्यक्ति को धर्मभ्रष्ट मानकर जाति बहिष्कृत कर देते हैं । किन्तु जब वही कुमार निरुपमा से विवाह कर लेता है तो मुखिया का यह चतुराई भरा कथन पूरी स्थिति को सॉफ कर देता है—“पागल हो, राजा से कोई बैर करता है । अब वे दिन नहीं हैं। लखनऊ में कितने बिलइतिहा हैं, उनके हाथ का पानी बंद हैं ?
समग्रतः कहा जा सकता है कि देशकाल और वातावरण का सफल चरित्र उपन्यास में हुआ है।
संवाद योजना
संवाद या कथोपकथन नाटक का प्रमुख तत्त्व है किन्तु उपन्यास में भी इसकी योजना प्रायः दो पात्रों के वार्तालाप के रूप में देखी जाती है संवादों से प्रायः तीन काम लिए जाते हैं। ये कथा को गति प्रदान करते हैं, पात्रों के चरित्र पर प्रकाश डालते हैं तथा उपन्यास की कथावस्तु में नाटकीयता का संचार करते हैं जो रोचकता को बनाने में सहायक होती है। संवाद सरल, सहज, छोटे-छोटे होने चाहिए तभी वे सार्थक कहे जाते हैं। गाँव वालों की मीटिंग में जो संवाद योजना उपन्यासकार ने की है, उसे यहाँ उदाहरण के रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं-
'बाजपेई जी' व्यंग्य में ललई बोले-“किसुन तो आप लोगों में है ?"
"हम लोगों में !" बाजपेई नाराज होकर बोले—“हमारा बीस विस्से में खानपान हेत व्यवस्था, किसुन कनवजिया है ?"
"लोग तो कहते हैं" गुरुदीन स्तर ऊँचा कर बोले ।
सब बने हुए हैं ।" "
अब मुँह बिगाड़कर बेनी बाजपेई ने कहा- "ऐसे बहुत हैं कितने रह गये बाजपेई जी ?" शीतल ने हँसकर पूछा, "अब भी उतने ही हैं।" मन्त्री ने उसी तरह उत्तर दिया।
स्पष्ट है कि निरुपमा उपन्यास की संवाद योजना उत्कृष्ट कही जा सकती है।
भाषा शैली
उपन्यास की भाषा यथासंभव सरल, सहज एवं प्रवाहपूर्ण रखी जाती है। उसमें आवश्यकतानुसार लाक्षणिकता, प्रतीकात्मकता, आलंकारिता का समावेश भी होता है, साथ ही उसमें अंग्रेजी, उर्दू के प्रचलित शब्दों का भी आवश्यक होने पर प्रयोग किया जाता है।
निराला की भाषा संस्कृतनिष्ठ हिन्दी है, साथ ही उसमें बंगला भाषा का कुछ पुट भी विद्यमान है । संस्कृत शब्दों की बानगी निम्न प्रकार है:
- संस्कृत शब्द- त्रस्त स्तर, हास्यास्पद, दुर्बल, प्रभा, आश्रय स्थल, अप्रसन्न, सलज्ज, परिमार्जित, निरवरोध, मेघमालावली, मन्दस्मित, नेतृत्व । सूक्ष्मदर्शी, आलोचक, आपादमस्तक, कर्कश, प्रत्यालोचन, कमनीयत्व ।
- उर्दू शब्दों की सूची इस प्रकार है—इन्कार, शिद्धत, आराम, मंजिल, दफ्तर, वक्त, निगाह, बरदाश्त, कमजोर, खूबसूरत, मियाद, करार, मुख्तार, गुंजाइश, कोशिश, मुमकिन, मकरुज ।
- अंग्रेजी शब्द-सेन्टेड, डी. लिट्, चाँसलर, प्रिंसिपल, थीसिस, पी-एच. डी. यूरोप, ग्रामोफोन, टागोर स्कूल, टेलीग्राफ, पोस्ट, बैडमिण्टन ग्राउण्ड, मोटर, टेबल, टाई, कोट, कैप, डिग्री, कल्चर, बैरिस्टर, प्रोफेसर ।
- लोकभाषा के शब्द-दुधहड़, ही ही ही ही, नेवाड़, मसहरी पाँयने ।
- बंगाली शब्द-घूँचो, गोरु, गाधा, तो मारे, करियाछि जीवनेर ध्रुवतारा ।
हिन्दुस्तानी, नौटंकी भाषा में मुहावरों की बानगी भी देखी जा सकती है। यथा- रोटियाँ चलना, हाथ में होना, सन्न हो जाना, इब की छड़ी न उठाना, सरदर्द लेना, थाह न पाना, राम की इच्छा होना, इंकार के तार बजना, ठसक होना आई ।
इस उपन्यास में लेखक ने आवश्यकतानुसार शैली के रूप बदले हैं।कहीं वर्णनात्मक शैली है तो कहीं विवरणात्मक शैली प्रयुक्त है। कहीं संवादात्मक शैली है तो कहीं मनोविश्लेषणात्मक शैली प्रयुक्त की गयी है ।
निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि निराला का भाषा पर पूर्ण अधिकार है । बंगला से प्रभावित होने के कारण हो सकता है कि कहीं-कहीं पर वाक्य गठन थोड़ा शिथिल हो गया हो अन्यथा भाषा की दृष्टि से यह सब सफल उपन्यास कहा जा सकता है।
उद्देश्य
उद्देश्य उपन्यास का प्रमुख तत्त्व होता है, अन्य सभी तत्त्व उद्देश्य की पूर्ति के निमित्त होते हैं । निरुपमा उपन्यास की रचना के पीछे लेखक ने कई उद्देश्य व्यक्त किये हैं, जिनका विवेचन निम्न बिन्दुओं में किया जा सकता है:
- लेखक का प्रत्यक्ष उद्देश्य सामंती रुढ़ियों के प्रति विरोध व्यक्त करना है । जिस प्रकार प्रेमचन्द ने गोदान में किसी के शोषण की व्यथा व्यक्त की है, उसी प्रकार निरुपमा में निरालाजी ने इस शोषण को वाणी दी है। एक बुढ़िया गाँव की जमींदार निरुपमा के सामने अपने दुःख को इन शब्दों में व्यक्त करती है- "रत्ती-रत्ती जिउ देने से एक साथ मर जाना अच्छा है । यह देखो, यह देखो किसी तरह लाज बचाये हैं, अषाढ़ का महीना है अनाज नहीं रहा, छः-छः रुपये वाले खेत के तीन साल में अठारह-अठारह रुपये पड़ने लगे । डेढ़ी का अनाज तुम्हीं से लें, नजर नियाद ऊपर से । कहाँ तक दें ? खेत न जोतें तो नहीं बनता, पापी पेट । यह कहकर वृद्धा रोने लगी और सुरेश बाबू के सिपाही नहीं चाहते कि जनता का दुःख-दर्द निरुपमा जाने। मलिकवा को बात न मानने का दण्ड गाँव वालों ने जमींदार से कहकर ऐसा दिलाया कि बेचारे की लाश सवेरे पानी में तैरती मिली, यही नहीं अपितु रामचन्द्र और उसकी माँ के खेत-बाग बेदखल कर दिये गये ।
- लेखक का एक उद्देश्य गाँव वालों में 'प्राचीन रूढ़ियों को अभी तक मानना' दिखाना है । यदि गाँव का कोई व्यक्ति परदेश (विलायत) पढ़ने चला जाय तो वे उसे धर्मभ्रष्ट मान लेते हैं, उसका सामाजिक बहिष्कार कर देते हैं। कुमार ने इंग्लैण्ड जाकर डी. लिट् किया, यह गाँव वालों के लिए गौरव की बात न होकर लज्जा की बात है । उन्होंने कुमार के भाई रामचन्द्र और उसकी माँ को समाज बहिष्कृत कर दिया कोई उनके हाथ का पानी भी नहीं पीता । यही नहीं अपितु गाँव के कुएँ से उनका पानी भरना भी बन्द करा दिया। मजबूरी में वे खेत के कुएँ से पानी लाते हैं।
- निराला ने देश में बढ़ती बेरोजगारी की ओर भी संकेत किया है । कुमार ने लंडन से अंग्रेजी में डी. लिट् की उपाधि प्राप्त की फिर भी उसे कोई नौकरी नहीं मिल सकी । कम योग्य व्यक्ति यामिनी बाबू को सिफारिश एवं भाई-भतीजावाद के चलते नौकरी मिल गयी किन्तु कुमार को योग्य होने पर भी नहीं मिल सकी ।यह विडम्बना नहीं तो और क्या है कि निराला ने कुमार जैसे पढ़े-लिखे व्यक्ति को मोची का काम करते जूता पॉलिश करके अपनी जीविका चलाते दिखाया है।
- निराला ने इस उपन्यास के माध्यम से लोगों में धन के प्रति बढ़ती लिप्सा का भी चित्रांकन किया है। धन के लिए वे रिश्ते-नातों को भी भुला बैठते हैं और सगे-सम्बन्धियों की सम्पत्ति हड़पने में भी संकोच नहीं करते। योगेश बाबू अपनी निराश्रित भाँजी निरुपमा की जमींदारी की सारी आमदनी हड़प रहे हैं और अब यह चाहते हैं कि उन्हीं की तरह उनका बेटा भी इसी जायदाद से अपना घर भरता रहे । इसीलिए वे यामिनी बाबू से निरुपमा का विवाह बिना उसकी इच्छा के करने को तत्पर हैं । निरुपमा को गाँव (रामपुर) जाने पर यह अच्छी तरह आभास हो गया कि सुरेश बाबू वहाँ क्या गुल खिला रहे हैं।
- निरालाजी ने कमल, निरुपमा और कृष्णकुमार जैसे चरित्रों के माध्यम से जनवादी चेतना से ओत-प्रोत नवशिक्षितों की प्रवृत्ति को उजागर किया है जो सामंती रुढ़ियों को तोड़कर अपना रास्ता स्वयं बनाने को प्रयत्नशील है । बाधाएँ उनके मार्ग में आती हैं पर वे बिना विचलित हुए उनसे संघर्ष करते हैं और अन्ततः अपना लक्ष्य स्वयं पा लेते हैं ।
- निराला ने नारी मुक्ति आन्दोलन का भी परोक्ष रूप में समर्थन किया है। नारी कोई वस्तु नहीं है, उसकी भी इच्छा-अनिच्छा का ध्यान उसका विवाह करते समय रखा जाना चाहिए। कमल ने निरुपमा का विवाह अन्ततः कृष्णकुमार से करवाकर यह साबित कर दिया कि यदि नारी युक्ति से काम ले और अपनी योजनाओं को कारगर ढंग से लागू कर सके तो उसे अपना लक्ष्य पाने में सफलता मिलती है ।
- नव- शिक्षितों का चारित्रिक पतन भी लेखक ने यामिनी बाबू और मिस दुबे के विवाह पूर्व बने शारीरिक सम्बन्ध के रूप में दिखाया है। मिस दुबे गर्भवती हो चुकी थी. अतः कमल ने योजनाबद्ध ढंग से यामिनी बाबू का विवाह मिस दुबे से हलपूर्वक करवा दिया और यामिनी बाबू निरुपमा से विवाह करने की आशा मन में लिए रहे तथा उसकी जायदाद नहीं हड़प सके ।
उक्त विवेचन के आधार पर यह कहना तर्कसंगत होगा कि निरुपमा निरालाजी की सोद्देश्य रचना है । इसकी रचना करके निराला के एक साथ कई उद्देश्यों की पूर्ति की है तथा औपन्यासिक तत्त्वों की दृष्टि से 'निरुपमा' को एक सफल उपन्यास कहा जा सकता है।


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