चतुरी चमार कहानी का सारांश | निराला

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चतुरी चमार, सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' द्वारा रचित एक यथार्थवादी और सामाजिक चेतना से ओत-प्रोत कहानी है। चतुरी चमार कहानी का सारांश

चतुरी चमार कहानी का सारांश | निराला


तुरी चमार, सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' द्वारा रचित एक यथार्थवादी और सामाजिक चेतना से ओत-प्रोत कहानी है। इसमें ग्रामीण परिवेश में जातिगत भेदभाव, शोषित वर्ग की पीड़ा और श्रमजीवियों में उभरती नई चेतना को प्रभावशाली ढंग से दर्शाया गया है। चतुरी जाटव निराला जी के गाँव गढ़ाकोला, जिला उन्नाव का निवासी है। उसका मकान कहानी लेखक के मकान के पिछवाड़े है। चतुरी जूते बहुत मजबूत और अच्छे बनाता है जो कम-से-कम दो साल चलते हैं। उसके बनाये हुए जूते पहनकर पासी हफ्ते में तीन दिन हिरनों, खरगोशों और जंगली सुअरों को खदेड़कर फाँसते हैं। किसान अरहर की ठूठियों पर जानवरों को भगाते हुए दौड़ते हैं-कँटीली झाड़ियों को दबाकर चले जाते हैं तथा छोंकरे, बेल, बबूल, करील और बेर के काँटों से भरे घने बागों से सरपट भागते हैं, ज्वार, बाजरा आदि के खलिहानों पर मड़ाई करते हैं। द्वारिका नाई भी चतुरी के बनाये हुए जूते पहनकर न्योता बाँटता हुआ दो साल में दो हजार कोस (अर्थात् चार हजार मील) से ज्यादा चलता है, लेकिन चतुरी के जूते खराब नहीं होते । उनमें कोई परिवर्तन नहीं होता, वे टस से मस नहीं होते । इसलिए देहात में दूर-दूर तक उसके मजबूत जूतों की तारीफ है।
 
लेखक उन दिनों गाँव में ही रहता था। उसने घर बैठे ही पता कर लिया कि चतुरी सन्त साहित्य का मर्मज्ञ है । कबीरदास, सूरदास, तुलसीदास आदि ज्ञात-अज्ञात अनेक सन्त कवियों के भजन आचार्य की भाँति चतुरी उन लोगों को जो भजन गाते थे, भूले हुए पदों की याद दिला देता था। लेखक को मालूम हुआ कि चतुरी कबीर पदावली का विशेषज्ञ है। वह लेखक को जब बीच-बीच में पदों का अर्थ समझाने लगता था तो लेखक कहता – " आज, चतुरी गा लो, कल सुबह आकर अर्थ समझाना ।" लेखक को चतुरी के गाने में बड़ा आनन्द आता है। बहुत से गाने आलंकारिक थे । वे गायक उनका भी अर्थ समझते थे । लेखक रात एक बजे तक बैठा रहा । बीच-बीच में चतुरी आदि चरस पीते जाते थे । लेखक को नींद आने लगी, तो उसने चतुरी से घर जाने की अनुमति माँगी । चतुरी ने कहा कि ऐसे कैसे काम बनेगा ? अभी तो आधा चरस भी खत्म नहीं हुआ है। लेखक ने कहा अब तुम्हारी काकी भी नहीं रही, खाना भी स्वयं बनाना पड़ता है, कोई और मदद करने वाला नहीं है । सोकर सुबह जल्दी उठना भी है।" चतुरी नाराज होकर कहता है- "तुम विवाह करते ही नहीं हो, नहीं तो तेरह काकी आ जायें।" 

भगवान की इच्छा", कहकर लेखक बात को टालना चाहता है । चतुरी लेखक की पत्नी की तारीफ के पुल बाँधता तथा उनकी सुन्दरता, काम में लगे रहने की क्षमता तथा उनके मधुर कण्ठ से गीत-भजन गाने की कला आदि की प्रशंसा करता है, परन्तु लेखक सोने के लिए यह कहकर चला जाता है कि "लोग गावें, वह दरवाजा बन्द करके उनके भजन सुनता रहेगा ।"
 
चतुरी चमार कहानी का सारांश | निराला
निराला जी के जगने तक भगत होती रही, फिर कब बन्द हुई यह उन्हें पता नहीं चला । काफी दिन चढ़ जाने पर लेखक की आँख खुली । उन्होंने मुँह धोकर दरवाजा खोला तो चतुरी दरवाजे की ओर एकटक देखते हुए बैठा दीखा ।लेखक पूछता है— "चतुरी, तुम सोए नहीं", तो वह कहता है-"कबीर पदावली के अर्थ समझाने आया हुँ" वह कबीर की एक-दो उलवाँसियों के अर्थ स्पष्ट करता है । उसे विश्वास है कि कहीं गिरह लगती है अर्थात् अर्थ स्पष्ट नहीं होता, तो स्वयं कबीर साहब गाँठ खोल देते हैं । वह एक पद सस्वर गाता है, फिर एक-एक कड़ी का अर्थ समझाने लगता है । लेखक चतुरी से कहता है- "चतुरी ! अगर तुम पढ़े-लिखे होते तो पाँच सौ की जगह पाते ।" इस पर चतुरी को अपने सत्रह साल के बेटे अर्जुन के बेपढ़ा-लिखा होने का ध्यान आता है तो वह लेखक के पास उसको पढ़ने के लिए भेजने की बात विनयपूर्वक कहता है । लेखक चतुरी को एक दीपक लेकर पुत्र को भेजने की बात कहता है, क्योंकि लेखक के पास एक ही लालटेन है। यदि अर्जुन बहुत पास सटकर बैठेगा, तो गाँव वाले एतराज करेंगे कि एक हरिजन लड़के को वे इतना पास बैठा लेते हैं। गाँव में छुआछूत का रिवाज चला आ रहा है । लेखक गुरुदक्षिणा के रूप में चतुरी को बाजार से रोज गोश्त लाने तथा महीने में दो दिन चक्की से आटा पिसाकर लाने का काम बता देता है, जिसकी मेहनत भी वे चतुरी को देंगे । चतुरी खुश हो जाता है। लेखक पुनः चतुरी के जूतों की तारीफ करते हैं। वह कहता है—“ हाँ, दो साल चलता है।" दबे हुए दर्द के साथ दुःखी होकर यह भी कहता है—“काका ! जमींदार के सिपाही को हर साल एक जोड़ी जूता देना पड़ता है ।" ऐसा कहकर डबडबाई आँखों से देखता हुआ जुड़े हाथों से सेवई-सी बँटने लगता है। लेखक को सहानुभूति के साथ हँसी आ जाती है। 

चतुरी का लड़का अर्जुन लेखक के पास पढ़ना-लिखना सीखने को आने लगता है। चतुरी भी लेखक के लिए प्रतिदिन बाजार से गोश्त ला दिया करता है। घी में पके हुए मसालेदार गोश्त की सुगन्ध पाकर समय-समय पर लोध, पासी तथा धोबी भी स्वाद चखने के लिए आ जाते हैं । लेखक इन छोटी जातियों को गोश्त खिलाने को ब्रह्मभोज कहता है। इस तरह लेखक का घर साधारण जनों का अड्डा हो गया, जिसे वह 'हाउस ऑफ कॉमन्स' (House of Commons) कहता है। अर्जुन अब पढ़ाई में धीरे-धीरे आगे बढ़ने लगा है और दादा, मामा, काका, नाना, नानी, लिखना-पढ़ना सीख गया है । अब अर्जुन अपने बाप को दादा और माँ को दादी कहता है । एक दिन अर्जुन का बड़ा - भाई लेखक से कहता है-"बाबा, अर्जुनवा और तो सब लिख-पढ़ लेता है, पर भैया नहीं लिखता ।" लेखक उसे समझाता है कि किताब में दादा-दादी से 'भैया' की बहुत बड़ी इज्जत है । भैया तक पहुँचने में उसे अभी दो महीने लगेंगे । तात्पर्य यह है कि 'आ' की मात्रा समझना और लगाना सरल है। 'ऐ' की मात्रा समझना कठिन है। भैया में 'ऐ' की मात्रा समझने में अर्जुन को अभी दो महीने लगेंगे।
 
अर्जुन ने एक किताब पढ़ ली थी और अब वह दूसरी किताब पर आ गया था। इधर धीरे-धीरे आम पकने लगे थे । लेखक आम खिलाने के विचार से ससुराल से अपने पुत्र को गाँव बुला लाता है । वहाँ अपने नाना-नानी के पास रहकर वह कक्षा चार में पढ़ता था, उम्र होगी उसकी 8-10 साल । लेखक के घर में कोई स्त्री न थी, अतः यहाँ उसका मन नहीं लगता था । अब अर्जुन लेखक के पास रोज पढ़ने के लिए आता था । अतः वह इस बार ऊबा नहीं । अर्जुन से उसकी गहरी दोस्ती हो गई । अर्जुन लेखक के पुत्र का वैसे ही काका लगता था, जैसे लेखक अर्जुन के बाप का । लेखक का पुत्र उम्र में अर्जुन से छोटा था, अर्जुन उससे लगभग पौने दो गुनी उम्र का था । इससे अर्जुन को अपने से छोटी उम्र के लड़के से 'काका' कहना स्वभाव के विपरीत लगता था, परन्तु लेखक का लड़का उससे अधिक पढ़ा-लिखा और फिर ब्राह्मण का लड़का था, अत: अर्जुन दबकर उसे काका कहता था । लेखक के पुत्र के दुर्व्यवहार का तीन-चार दिन में ही असर यह पड़ा कि अर्जुन का स्वास्थ्य खराब होने लगा । डर के कारण अर्जुन लेखक से शिकायत भी नहीं करता था । जब लेखक डाकखाने या बाहर से गाँव लौटता, तो उसे पता चलता कि उनका चिरंजीव, अर्जुन के घर होते या अर्जुन को अपने घर पर ही घेर कर पढ़ाते और उस बेचारे पर हावी रहते । लेखक अपने पुत्र के ब्राह्मण-संस्कारों की बात समझ गया । जाटव दबेंगे, ब्राह्मण दबाएँगे । लेखक सोचता है कि बुराई दूर करने का उपाय है—दोनों ही जड़ें मार दी जायें, परन्तु यह बात सहज पूरी होने वाली नहीं है । भारत में ऊँच-नीच की जड़ें बहुत गहरी हैं।
 
लेखक चतुरी के पुत्र अर्जुन को स्नेह देकर पढ़ाता था, उसे अपनी ही तरह का आदमी समझता था । उसका विचार था कि अर्जुन की पढ़ने में जो कमजोरियाँ हैं, वे धीरे-धीरे दूर हो जायेंगी, परन्तु लेखक का पुत्र चार दिन में ही अर्जुन की सारी कमजोरियों का पता लगा लेता है और लेखक की अनुपस्थिति में उसे बुरी तरह डाँटता- फटकारता है ।
 
एक दिन लेखक डाकखाने होता हुआ मियाँगंज के बाजार में जाता है । वहाँ उसे चतुरी बाजार में जूते बेचते हुए दिखाई दे जाता है । चतुरी बातों ही बातों में अपने लड़के अर्जुन के साथ लेखक के पुत्र द्वारा किये जा रहे दुर्व्यवहार का इशारा करता है । लेखक अपने पुत्र की करतूत समझ जाता है । 

यहीं लेखक बाजार में जाते हुए अपने बारे में लोगों की चर्चा सुनता है कि यह पढ़ा-लिखा, ज्ञानी समझा जाने वाला ब्राह्मण होने पर भी गोश्त खाता है तथा बीड़ी पीता है । लेखक बादाम ठंडाई का सामान लेकर बाजार से लौट रहा होता है तो एक तिलक खौर लगाये पण्डित जी लेखक को देखकर कहते हैं—“अच्छा तो आप ही हैं, आप धन्य हैं।" लेखक मन में कहता है, नहीं, मैं वन्य (जंगली) हूँ, 'मजाक करता है खूसट ।' परन्तु लेखक पण्डित जी के पैर और तिलक देखकर उन्हें प्रणाम करता है। पण्डित जी आनन्द से गद्गद हो जाते हैं। लेखक के बारे में पण्डित जी ने जो शिकायत सुनी थी कि यह शिक्षित होने पर भी गोश्त खाता है, वह मानो लेखक के प्रणाम करने पर दूर हो गयी। उनकी दृष्टि बता रही थी— "यह वैसा नहीं— जरूर गोश्त न खाता होगा, बीड़ी न पी होगी, लोग पाजी हैं ।" लेखक पण्डित जी का आशीर्वाद लेकर घर का रास्ता पकड़ता है और दरवाजे पर आकर रुक जाता है । सूर्यास्त हो रहा था, हल्का-सा प्रकाश था, लेखक को घर के अन्दर चल रही बातचीत सुनाई देती है। उसके चिरंजीव अर्जुन को पढ़ाते समय जोर से डाँट रहे हैं। बेचारा अर्जुन 'गुण' और 'गणेश' शब्द का शुद्ध उच्चारण नहीं कर पाता है। वह 'गणेश' को 'गड़ेस' बोलता है। लेखक का पुत्र हँसकर डाँटते हुए अर्जुन से कहता है-"गड़ेस-गड़ास करता है, साफ नहीं कह पाता । क्यों रे, रोज दाँतौन करता है ?" अर्जुन सहम कर छोटी-सी 'हूँ' कहकर सिर झुकाकर रह जाता है । लेखक धीरे से दरवाजा ढकेलकर खम्भे की आड़ से देख रहा है कि उसके चिरंजीव अर्जुन को उसी तरह देख रहे हैं, जैसे गोरे काले को (अंग्रेज लोग काले हिन्दुस्तानी को) देखते हैं । अर्जुन हताश हो रहा था कि पढ़ाई उसके वश की बात नहीं है । तभी लेखक के पुत्र महोदय फिर अर्जुन को डाँटकर कहते हैं- "बोलता है, या लगाऊँ झापड़, नहा लूँगा, गर्मी तो है ।" अर्थात् जाटव को झापड़ लगाने में उसके शरीर का स्पर्श होगा, तो नहाना पड़ेगा । जितनी छुआछूत अपने देश में उस समय थी, आज भी, उतनी दिखाई देती है । लेखक नाराज होता है अपने पुत्र पर कि वह अर्जुन को इतना क्यों डाँटता है; अर्जुन खड़ा खड़ा रो रहा था । लेखक का पुत्र अपनी सफाई देता है कि यह 'गुण' शब्द का भी शुद्ध उच्चारण नहीं कर पाता। आप भी तो उसे पढ़ाते हैं । लेखक कहता है- तुम हँसते क्यों थे ? लेखक अपने पुत्र से कहता है कि वह अब आज से अर्जुन से नहीं बोल सकेगा । इस पर लेखक का पुत्र कहता है कि वह यहाँ नहीं रहना चाहता । उसे मामा के यहाँ पहुँचा दिया जाय । यहाँ के आम खट्टे हैं । लेखक नाई के साथ अपने चिरंजीव को उसके मामा के यहाँ भेज देता है और चतुरी को सांत्वना देता है । 
कुछ महीने लेखक अपने गाँव में ही रहता है तथा अर्जुन कुछ लिखना पढ़ना सीख जाता है । बहुत दिनों से लेखक ने शहरों की हवा नहीं खाई थी, अतः वह कलकत्ता, बनारस, प्रयाग आदि का सफर करता हुआ लखनऊ में डेरा डालता है। कुछ स्वीकृत पुस्तकों को उसे छपवाना था । अमीनाबाद के एक होटल में एक कमरा लेकर वह निश्चिन्त भाव से साहित्य साधना में लग जाता है ।
 
होटल में रहकर लेखक देहात में जाने वाले शहरी युवक मित्रों से सुना करता था कि पूरे देश में जो आन्दोलन चल रहा था, वह गाँवों में भी पहुँच चुका है। उसके गाँव गढ़ाकोला के किसानों ने भी आन्दोलन किया है, जो चतुरी आदि के कारण फिस्स हो गया है । किसान इकट्ठे होकर झण्डा-गीत गाया करते हैं। छः-सात सौ तक की जमीन को किसान लोग इस्तीफा देकर छोड़ चुके हैं। सालभर बाद आन्दोलन की प्रतिक्रिया हुई तो जमींदार, किसानों के विरुद्ध दावा करने और कठोरता से प्रजा को दबाने लगे। तब गाँव के नेता सहायता के लिए लेखक के पास आये और बोले-“आप गाँव चलो और लिखो कि किसानों पर अत्याचार हो रहा है । आप रहेंगे तो हमारी भी हिम्मत बँधी रहेगी ।" लेखक ने कहा कि वह पुलिस तो है नहीं, जो उनकी रक्षा कर सके । मार खाकर वह चुप रहने वाला तो है नहीं । कहीं ऐसा न हो, शक्ति का दुरुपयोग हो । गाँव वालों ने कहा कि वह बस बैठा रहे, इतने से ही गाँव वालों को जो करना है, वह करते रहेंगे ।
 
लेखक के गाँव में कांग्रेस पार्टी भी सक्रिय थी, परन्तु जिले के साथ उसका कोई सम्बन्ध न था । तिरंगा झण्डा भी एक बड़े बाँस में महावीर स्वामी की मूर्ति के सामने गढ़ा था। उसके रंग कच्चे होने के कारण वह बरसात में धुलकर सफेद हो गया था। इन दिनों मुकदमे और जाँच-पड़ताल भी चल रही थी । कुछ किसानों पर हरी-भूसे की तीन साल की बाकी दिखाकर जमींदार ने ऑनरेरी मजिस्ट्रेट की अदालत में दावा भी दायर कर दिया था । लेखक अपनी डाक देखने के लिए मगरायर जा रहा था तो बाहर दरोगा जी मिल गये। लोगों ने कहा कि अभी लेखक न जाए, गाँव में दरोगा जी आये हुए हैं । जमींदार ने दरोगा जी से धीरे से लेखक के बारे कुछ में कहा । लेखक उसे सुन नहीं पाया । जमींदार दरोगा को झण्डा उखड़वाने के लिए ले जा रहे थे। दरोगा जी महावीर जी के अहाते में सफेद रंग का झण्डा देखकर कुछ सोचने लगे और बोले कि यह तो महावीर जी का झण्डा है, मन्दिर का झण्डा है, कांग्रेस का होता तो तिरंगा होता। जमींदार ने दरोगा जी को बहुत समझाया कि यह कांग्रेस का झण्डा है, धुलकर सफेद हो गया है। दरोगा जी समझदार थे, वे अपने डेरे पर लौट गये । उन्होंने झण्डा नहीं उखड़वाया । दरोगा जी ने पूछा—क्या इस गाँव में कांग्रेस है। लेखक ने कहा कि इस गाँव के लोग तो कांग्रेस का मतलब भी नहीं जानते । इतना कहकर लेखक उठकर खड़ा हो गया कि उसे अपनी डाक देखने जाना है। 

इस बार चतुरी तथा गाँव वालों का बचाव हो गया। कांग्रेस गाँव में है, यह तो लेखक के प्रभाव के कारण सिद्ध न हो सका था, परन्तु मुकदमा चलता रहा। ऑनरेरी मजिस्ट्रेट ने किसानों पर डिग्री दे दी, क्योंकि जमींदार की ओर से जो वकील था, वह मजिस्ट्रेट का एक रिश्तेदार था। बाद में चतुरी की बारी आयी । अन्य किसानों ने फैसले के विरुद्ध मुकदमे दायर कर दिए। अभी तक किसानों का जो सम्मिलित धन मुकदमों में लग रहा था, वह सब खर्च हो गया। पहले ही डिग्री में कुछ लोगों के बैल नीलाम कर लिये गये। लोग घबरा गये, चतुरी को मदद की आशा न रही। गाँव वालों ने चतुरी आदि के लिए दूसरी बार चन्दा न किया । वह सूखकर उदास लेखक के सामने खड़ा हो गया । लेखक ने शक्तिभर मदद करने के लिए उसे आश्वासन दिया । लेखक ने उससे उसका इरादा पूछा तो उसने मुकदमा अवश्य लड़ने का इरादा प्रकट किया, परन्तु शंका की कि गाँव वाले इतने डर गये हैं कि शायद गवाही नहीं देंगे । लेखक भी निराश हुआ । उसने चतुरी से पूछा, "फिर क्या किया जाये ?" चतुरी ने कहा लेखक ही प्रभाव डालने का काम करें, जिससे कुछ गवाह तैयार हो जायें।लेखक ने कुछ पक्के गवाह ठीक कर लिये । सत्तू बाँधकर, रेल छोड़कर पैदल दस कोस उन्नाव तक चलकर वह मुकदमा लड़ा। दूसरी बार चतुरी लौटकर हँसता हुआ बोला- "काका ! जूते और पुर वाली बात अब्दुल अर्ज में दर्ज नहीं है, सो उसे पुश्त-दर- पुश्त मुफ्त जूते बनाकर नहीं देने पड़ेंगे ।" इस प्रकार इस कहानी का सुखद अंत हुआ।

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