सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ द्वारा रचित ‘कुकुरमुत्ता’ प्रगतिवादी चेतना की एक युगांतरकारी कविता है, जिसमें प्रतीकों के माध्यम से पूंजीवादी व्यवस्था
कुकुरमुत्ता कविता में पूंजीवादी व्यवस्था पर व्यंग्य किया गया है
सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ द्वारा रचित ‘कुकुरमुत्ता’ प्रगतिवादी चेतना की एक युगांतरकारी कविता है, जिसमें प्रतीकों के माध्यम से पूंजीवादी व्यवस्था, शोषक वर्ग और अभिजात्य मानसिकता पर तीखा व्यंग्य किया गया है।
कुकुरमुत्ता इस वर्ग प्रधानं सामाजिक ढाँचे के विरुद्ध एक व्यापक प्रतिक्रिया पर आधारित लम्बी कविता है, जिसका अन्तर्गठन अराजक बिखराव के भीतर भी लक्ष्य किया जा सकता है । छायावादी अनुभव और भाषा का काव्य धर्म निर्धारित करने वाले अभिजात्य से मुक्ति यहाँ कविता के पूरे रूप विधान में, कथ्य और शिल्प में देखी जा सकती है। यहाँ गुलाब और कुकुरमुत्ता का भेद एक सचेत वर्ग-दर्शन पर आधारित है।सुसंगत मार्क्सवाद न सही; इस प्रतीकात्मक सम्बन्ध की अवधारणा में सामन्तवाद और सर्वहारा का संघर्ष छिपा हुआ नहीं है।
'कुकुरमुत्ता' कविता दो भागों में विभक्त है। प्रथम भाग में एक नवाब के बाग का वर्णन है । फारस से मँगाया गया गुलाब अपनी विशिष्टता से पूरे बाग का सिरमौर बना हुआ था । वहीं गंदे में उगा हुआ कुकुरमुत्ता बड़ी अशिष्ट भाषा के गुलाब को ललकार- ललकार कर अपनी महत्ता का प्रतिपादन करने लगा। वह गुलाब से स्वयं को बड़ा सिद्ध करता है । कविता के दूसरे भाग में निम्न वर्ग की बस्ती का यथार्थवादी चित्र उपस्थित करते हुए नवाब की बेटी बहार और मालिन की लड़की गोली की मित्रता का उल्लेख किया गया है । एक दिन दोनों बाग में घूम रहीं थीं। गोली ने कुकुरमुत्ता देखकर बाहर को बताया कि इसका कवाब बड़ा स्वादिष्ट होता है । बहार ने कुकुरमुत्ते का कवाब खाने की इच्छा प्रकट की । गोली के घर खाना बना । बहार उसके स्वाद से संतुष्ट हुई। नवाब के मुँह में भी पानी भर आया। उन्होंने अपने माली से गुलाब के बदले कुकुरमुत्ता उगाने की बात कही माली ने असमर्थता प्रकट की कि कुकुरमुत्ता उगाने से नहीं उगता है।
कुरमुत्ता' के माध्यम से निराला क्या कहना चाहते हैं ? इस प्रश्न का उत्तर आलोचकों ने अपने-अपने दृष्टिकोण से दिया है। प्रगतिशील आलोचकों को इसमें शोषक और शोषित वर्ग का संघर्ष गुलाब और कुकुरमुत्ता के प्रतीकों के माध्यम से व्यक्त हुआ दिखाई देता है । दूसरी ओर ऐसे समीक्षक भी हैं जो इसमें साम्यवाद, साम्यवादियों तथा समाजवादी आन्दोलन का विरोध देखते हैं। ये दोनों ही दृष्टियाँ 'कुकुरमुत्ता' के मर्म तक नहीं पहुँच पाती हैं।
यह वैचारिक दृष्टि से देखें तो कुकुरमुत्ता के माध्यम से निराला छायावादी अभिजात्य का अतिक्रमण करते हुए मानो एक नए युग की प्रतिष्ठा कर रहे हैं। तथ्य यह नहीं है कि इस कविता के मूल में मार्क्सवाद का वर्गीय दर्शन विद्यमान है। लेकिन यह कविता हिन्दी साहित्य के प्रगतिवादी आंदोलन को हवा देने में अत्यन्त शक्तिशाली सिद्ध होती है, संदेह से परे तथ्य है। इस लम्बी कविता में इसकी भाषिक संरचना तो किसी भी शिल्प सिद्ध कवि के लिए ईर्ष्या का विषय हो सकती है, इसकी विषयवस्तु योजना भी अपने में अद्भुत है, उदाहरण के लिए जब कुकुरमुत्ता गुलाब को चुनौती देता है तो इस प्रतीक योजना के माध्यम से कवि का आशय साफ-साफ उभर आता है कि वह सामन्ती अभिजात्य मनोवृत्ति की निंदा किस प्रकार दलित वर्ग द्वारा करवा रहा है। दलित शोषित वर्ग का यह आक्रामक तेवर प्रगतिवादी कविता अथवा प्रगतिशील कविता का आधार है। गुलाब में प्रतिक्रयाहीनता अथवा उसकी ठण्डी तटस्थता शोषण वर्ग के कांइयापन की तरफ संकेत करता है।
वस्तुतः इस कविता का मूल्यांकन इस आधार पर होना चाहिए कि निराला किस प्रकार भारतीय समाज की मनोवृत्तियों का प्रत्यक्षीकरण सामान्य वर्ग से कराते हैं-
अबे ! सुन बे गुलाब
भूल मत जो पाई खुशबू रंगो आब खून चूसा खाद का तूने अशिष्ट
डाल पर इतरा रहा है कैपिटेलिस्ट
X X X
शाहों राजों अमीरों का रहा प्यारा
तभी साधारणों से तू रहा न्यारा।
एक विद्वान समीक्षक की दृष्टि में, 'कुकुरमुत्ता' की ऊपरी बनावट से यह आभास मिलता है कि इसमें गुलाब पूँजीपति है और कुकुरमुत्ता सर्वहारा । इस प्रकार यह समझना बहुत आसान हो जाता है कि इसमें मार्क्स के वर्ग सिद्धांत का प्रतिपादन किया गया है कविता के दूसरे भाग में बहार और गोली को आमने-सामने रखने से भी इसी सिद्धांत की ध्वनि निकलती-सी जान पड़ती है। वस्तुतः 'कुकुरमुत्ता' की खून चूसा खाद का तून अशिष्ट । डाल पर इतरा रहा कैपीटेलिस्ट, पंक्तियों के आधार पर यह अनुमान लगाया गया है।इसी प्रकार 'कुकुरमुत्ता' के प्रथम संस्करण में प्रकाशित 'मास्को डायलाग्ज' नामक कविता के आधार पर कुछ आलोचकों ने इस कविता को भी साम्यवाद-विरोधी मान लिया है । यह एक कविता को सम्पूर्ण काव्य-संग्रह का मूल स्वर मान लेने की भूल है।
डॉ. परमानन्द श्रीवास्तव का कथन है कि सामंतवाद का उपभोग संस्कृति से जो रिश्ता है, वह निराला देख पा रहे हैं, यह कम महत्वपूर्ण तथ्य नहीं है।कुकुरमुत्ता का अपना तर्क, सौन्दर्य और मूल दोनों दृष्टियों से अपनी पहचान स्थापित करने के लिए है -
और अपने से उगा मैं
बिना दाने का चुगा मैं कलम मेरा नहीं लगता
मेरा जीवन आप जगता काम
मुझ ही से सधा है शेर भी मुझ से गधा है
चीन में मेरी नकल; छाता बना छत्र भारत का वही;
कैसा तना सब झगह तू देख ले
आज का फिर रूप पैराशूट ले ।
गोली जब बहार से कुकुरमुत्ता के कवाब का स्वाद बखानती हुई कहती हैं- 'सच समझ लो इसका कालिया/तेल का खूना कवाब/भाजियों का वैसा/जैसा आदमियों में नवाब !' तो नवाब के आभिजात्य से आतंकित नहीं है। पर बाहर है कि प्रभावित होती है कुकुरमुत्ता के रूप से नहीं, इस्तेमाल से/उसके लिए यह एक पदार्थ है, जिसका उपभोग मूल्य अचानक नये संदर्भ में बढ़ गया है। अन्त में नवाब भी इसी उपभोग मूल्य से अचानक नये संदर्भ में बढ़ गया है। अन्त में नवाब भी इसी उपभोग मूल्य से आतंकित जब कुकुरमुत्ता उगाने का प्रस्ताव करते हैं, माली का जवाब एक और महत्त्वपूर्ण व्यंग्य को प्रत्यक्ष करता है । यहाँ अनुभव किया जा सकता है कि लक्ष्य इस वास्तविकता को स्वीकृति दिलाना है कि सामन्तवाद की जड़ें नहीं हैं; वहाँ एक परजीवी वर्ग है- उपभोगवादी संस्कृति में जकड़ा हुआ आत्मकेन्द्रित ।
गुस्सा आया, काँपने लगे नवाब
बोले, 'चल गुलाब जहाँ ये, उगा
सबके साथ हम भी चाहते हैं अब कुकुरमुत्ता !'
बोला माली फरमायें मुआफ खता
कुकुरमुत्ता अब उगाये नहीं उगता ।
कविता की रूपगत विशिष्टता यह है कि 'व्यंग्यार्थ एक साथ कई स्तरों पर प्रकट -इस व्यंग्य से वंचित कोई भी नहीं है— कुकुरमुत्ता भी नहीं, जिसके पक्ष में कविता का सारा ढाँचा खड़ा किया गया है -
उलट दे मैं ही जसोदा की मथानी
और भी लम्बी कहानी
सामने ला मुझे कर बेंड़ा
देख कैंडा
तीर से खींचा धनुष मैं राम का
काम का
पड़ा कंधे पर हूँ हल बलराम का
मैं ही डाँडी से लगा पल्ला
सारी दुनिया तोलती गल्ला
यह व्यंग्य दूर तक चलता है जिसकी लपेट में लेनिनग्राड भी आ जाता है और लेखक भी।
वस्तुतः निराला ने 'कुकुरमुत्ता' को सामान्य-जन का प्रतीक माना है । गुलाब अभिजात्य का प्रतीक है। प्रथम खण्ड में कुकुरमुत्ता गुलाब को कोई उत्तर नहीं देता है, जो स्वाभाविक ही है क्योंकि उच्चवर्गीय का ठण्डा व्यवहार होता ही है, उसका अहं उसे मौन और अनुत्तेजित रखता है। इसके विपरीत कुकुरमुत्ते में ठेठ देसी अकड़ और बड़बोली है क्योंकि 'सामान्य जन' में निश्छलता, अकृत्रिमता और आत्मविश्वास होता है। कुकुरमुत्ता बढ़-बढ़कर बकवास तो बहुत करता है लेकिन प्रतिशोध लेने की शक्ति उसमें नहीं है, इसीलिए वह गुलाब के लिए 'अशिष्ट' जैसे शालीन सम्बोधन का प्रयोग करके ही रह जाता है । भारत का आम आदमी (सामान्य जन) भी ऐसा ही है । प्रतिशोधहीन, संकोचशील, मशीन का पुर्जा बनने के लिए उत्सुक शब्द-वीर और क्रांति का अवसर जाने पर दुम दबाकर भाग जाने वाला । कविता के अन्त में माली का यह कहना कि 'कुकुरमुत्ता उगाये नहीं उगता' भी भारतीय जन समाज की ही विशेषता प्रकट करता है। साधारण और सामान्य को पैदा नहीं किया जा सकता है।
इस प्रकार 'कुकुरमुत्ता' का प्रतिपाद्य है साधारण भारतीय मनुष्य का यथार्थ रूप प्रस्तुत करना । इससे निराला प्रचारक 'प्रगतिशील' कवि के बदले, सत्यदृष्टा कवि सिद्ध होते हैं। इसमें एक है निष्क्रिय व्यंग्य जो 'साधारण भारतीयजन' की विशेषता है। समाज और राजनीति की विकृतियों पर व्यंग्य कर लेना लेकिन उसको बदलने के लिए किसी प्रकार का प्रयत्न न करना।
'कुकुरमुत्ता' देखने में सहज सौन्दर्याभिमंडित परन्तु यदि उसकी मूल संचेतना का अध्ययन किया जाय तो हमें यह स्पष्ट गोचर होगा कि निराला यहीं से एक सार्थक और सहज तथा यथार्थ अनुभूति सम्बन्ध स्वतंत्र चेतना कवि के रूप में हमारे सामने प्रकट होते हैं । वस्तुतः भारतीय समाज की 'पैसिव' अन्तर्मुख एवं ठस व्यवस्था है और उसका निर्माणकर्त्ता उसकी सिद्धि और उसका साथ, वह साधारण मनुष्य है निराला उसी का प्रतिपादन करते हैं । उसी को सिद्ध करना चाहते हैं और इसी की मूलवत्ता खोजना चाहते हैं। इस तरह 'कुकुरमुत्ता' का प्रतिपाद्य भी वही उपेक्षित किन्तु एकमात्र मूल्यवान भारतीय जन साधारण है । वह बदरूप हो सकता है परन्तु वह गंदे में उत्तर देता एक सिंहासन यंत्र की तरह अपनी आन्तरिक निर्मलता से सम्पन्न और निश्चित है।
सामान्य की प्रतिष्ठा को स्थापित करने के लिए निराला कुकुरमुत्ता में आकर सारी काव्य-प्रणाली शिल्प और भाषिक संरचना की नये सिरे की छानबीन करते हैं। यह छानबीन और खोज और नया संगठन लगभग पुराने के सम्पूर्ण अस्वीकार या उसके परित्याग से उपजा है। निराला ने यह समझ लिया है कि सामान्य की इस प्रतिष्ठा में अभिजात भाषा शिल्प सौंदर्य अंतः गठन और गीतात्मकता काम नहीं देगी । इसलिए कविता के लगभग सभी अभिजात अवशेषों से यहाँ छुटकारा पाने की अद्भुत कोशिश है । सारी कविता की परिकल्पना व्यंग्य के धरातल पर हुई है और कई दृष्टियों से कुकुरमुत्ता एक सफलतम व्यंग्य काव्य है, किन्तु मात्र इतना ही नहीं है बल्कि व्यंग्य के साथ ही विनोद और हास्य का भी अच्छा खासा पुट जगह-जगह मिलता है। कुकुरमुत्ता की भाषिक संरचना भी सर्वथा नये प्रकार की है। यहाँ लगभग सारी छायावादी शब्दावली का निषेध है । संस्कृत की तत्सम शब्दावली, उसके माधुर्य, ओज और सौन्दर्य की जगह ठेठ, बीहड़ और पुराने मानदण्ड के अनुसार 'देशज', 'वर्जित' और 'अकाव्यात्मक' शब्दों में पूरी कविता लिखी गयी है। यह एक चुनौती है और इसका निर्वाह 'निराला' जी ने सफलतापूर्वक किया है।
अंत में मैं डॉ. इंद्रनाथ मदान के शब्दों में कहना चाहूँगा कि "दरअसल कुकुरमत्ता विषय-वस्तु, शिल्प संगठन, भाषिक संरचना, व्यंग्य और हास्य इन सभी दृष्टियों से एक सर्वथा विद्रोही, आधुनिक और महत्त्वपूर्ण कृति तो है ही, लेकिन उसका उससे भी बड़ा महत्त्व एक और कारण से है। अपने इस अध्ययन से मैं इस परिणाम पर पहुँचा हूँ कि 'कुकुरमुत्ता' हर क्षेत्र में 'काव्य अभिजात्य' से मुक्ति का एक संदेश देता है। यही इस कविता की उलपब्धि है और यही इस कविता में 'निराला' जी का अभिप्रेत भी है। यह मुक्ति 'कुकुरमुत्ता' के हर पहलू में है। उसके विषयगत चुनाव में, उसकी भाषिक संरचना में, उसके शब्द प्रयोग में, उसके व्यंग्य-विनोद और हल्के फुल्केपन में और उससे प्रतिष्ठापित साधारण की सार्थकता में। 'काम आभिजात्य' की इसी मुक्ति के संदेश को लेकर 'निराला' जी एक महान और विद्रोही क्षमतावान आधुनिक कवि की भूमिका के बारे में हमारे सामने आते हैं।
इस प्रकार निराला ने बोलचाल की ठेठ, व्यंग्यात्मक और आक्रामक भाषा का प्रयोग करके पूंजीवादी व्यवस्था के सौंदर्यशास्त्र को ध्वस्त किया है और उत्पादन की असली शक्ति यानी श्रमिक वर्ग के स्वाभिमान को स्थापित किया है।


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