सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' की कहानी 'सखी' मानव मन के सूक्ष्म मनोवैज्ञानिक अंतर्द्वंद्व और प्रेम के विविध रूपों को उजागर करने वाली एक सशक्त रचना है।
सखी कहानी की समीक्षा | सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला'
सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' की कहानी 'सखी' मानव मन के सूक्ष्म मनोवैज्ञानिक अंतर्द्वंद्व और प्रेम के विविध रूपों को उजागर करने वाली एक सशक्त रचना है। यह कहानी पारंपरिक प्रेम संबंधों की सीमाओं को तोड़कर मानवीय संवेदनाओं के धरातल पर स्त्री-पुरुष संबंध को नए दृष्टिकोण से देखती है।
कहानी कला की दृष्टि से कहानी के निम्नलिखित तत्त्व आलोचकों ने बताए हैं :
- कथानक,
- पात्र एवं चरित्र-चित्रण,
- कथोपकथन या संवाद,
- देशकाल या वातावरण,
- भाषा-शैली,
- उद्देश्य ।
उपर्युक्त तत्त्वों के आधारपर' निराला जी' की 'सखी' कहानी की समीक्षा प्रस्तुत है -
कथानक
इस कहानी का कथानक अधिक बड़ा नहीं है । ज्योर्तिमयी, निर्मला, माधवी, कमला, ललिता, शुभा और श्यामा एक कॉलेज में पढ़ती है । सबकी कथाएँ अलग-अलग हैं, इससे उनकी मित्रता पर अन्तर नहीं पड़ता । एक दिन वे नाटक देखने का निश्चय करती हैं और ज्योर्तिमयी के घर पर पहुँचती है। वह सुन्दर कपड़ों में सजी हुई और उसकी मेज पर जो लिफाफा पड़ा था, उससे यह पता चला कि उसका विवाह श्यामलाल आई. सी. एस. से पक्का हो गया है । उसके बाद वे लीला के घर पहुँचती हैं जो ट्यूशन करके पढ़ती और अपने घर का खर्च चलाती है। एक दिन लीला भैंसा कुण्ड से ट्यूशन पढ़ाकर आ रही थी। तभी दो मुसलमान लड़कों ने उसका पीछा किया । लीला भागकर श्यामलाल के पास पहुँची । श्यामलाल को जब पता चला कि यह उसकी मँगेतर जोत की सहेली है तो उसने कहा कि जोत ने मेरे पत्र का उत्तर नहीं दिया । लीला ने यह बात जोत से कही तो उसने श्यामलाल जी को पत्र लिखा कि आप लीला से ही विवाह कर लें ।
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पात्र एवं चरित्र चित्रण
छायावादी कवि एवं साहित्यकार सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' के कहानी-संकलन की दूसरी कहानी सखी में एक पुरुष को छोड़कर शेष सभी स्त्री पात्र हैं, जिनके नाम हैं-निर्मला, माधवी, कमला, ललिता, शुभा, श्यामा, ज्योर्तिमयी या जोत तथा लीला । ये सभी तरुणियाँ हैं तथा आइसाबेला थार्बन कॉलेज में पढ़ती हैं । इनमें प्रमुख युवती पात्र हैं—जोत एवं लीला, जिनकी इस कहानी में प्रमुख भूमिका है । ये सभी मिलकर कभी-कभी थिएटर (नाटकघर) उस समय जाती हैं, कोई धार्मिक या अच्छा नाटक उस थिएटर में दिखाया जाता है । सभी छात्रा-युवतियाँ परस्पर घनिष्ठ सखियाँ हैं। वे आपस में एक-दूसरे से मजाक भी कर लेती हैं और मस्त रहती हैं, परन्तु पारिवारिक मर्यादाओं का पालन करती हैं।
जब ये सभी सखियाँ लखनऊ के मॉडल हाउसेज कॉलोनी, लखनऊ में रहती हैं। वे एक दिन थिएटर जाने के लिए कमला के मकान में एकत्र होने का निश्चय करती हैं।
कथोपकथन
कहानी का तीसरा तत्त्व कथोपकथन है, इससे कहानी में नाटकीयता आ जाती है तथा स्वाभाविकता बढ़ जाती है । 'सखी' कहानी की सबसे बड़ी विशेषता इसके संक्षिप्त, स्वाभाविक एवं मनोरंजक कथोपकथन हैं जो कथा के विकास में भी सहायक हैं तथा पात्रों के चरित्र पर भी प्रकाश डालते हैं-
(क) संक्षिप्त कथोपकथन- शुभा - "तो क्लास नहीं किया ?" ललिता बोली 'ना'
(ख) चरित्र-चित्रण में सहायक कथोपकथन-
श्यामा ने कहा—“पक्की कंजूस है । पैसा दाँत से पकड़ती है । सौ रुपये कम-से-कम कमाती है, पर हालत देखो, तो मालूम होगा कि महादरिद्र।"
जोत लजाकर बोली-"तुम्हें जो जीवन-चरित्र लिखने को मिले तो चौपट कर छोड़ो। हमारे कॉलेज में एक ही करैक्टर है। कहो तो, उसके यहाँ पैदा करने वाला कौन है ? ट्यूशन से अपना खर्च चलाती है, छोटे भाइयों को भी पढ़ाती है, साथ घर का खर्च भी है । बूढ़ी माँ को कोई तकलीफ न हो, इसके लिए बेचारी खटती है। मेहनत की मारी बेचारी सूखकर काँटा हो गई है। चेहरे पर आँखें ही आँखें तो हैं।"
श्यामा एवं जोत के बीच हुए उपर्युक्त कथोपकथन जहाँ श्यामा एवं जोत के चरित्र पर प्रकाश डालते हैं, वहीं लीला के चरित्र पर भी ।
मनोरंजक कथोपकथन-जोत बोली-"अच्छा महाशय जी, आपके लिए फ्री पास का प्रबन्ध हो जायेगा ।"
लीला ने धीरे स्नेह-कण्ठ से पूछा - "तुम तो म्यान से निकली तलवार - सी चमक रही हो, जोत, क्या खुशी है ?"
इसी प्रकार कहानी के अन्त में श्यामलाल एवं लीला के बीच हुए कथोपकथन कथा के विकास में सहायक, संक्षिप्त एवं स्वाभाविक हैं साहब ने पूछा- "किस क्लास में हैं आप ?"
लीला-"एम. ए. में "
कुछ आग्रह से साहब ने पूछा – “आप ब्राह्मण हैं ?" लीला "जी नहीं, कायस्थ ।"
इस प्रकार कथोपकथनों की दृष्टि से निराला जी की सखी कहानी अत्यन्त समृद्ध है।
वातावरण
प्रस्तुत कहानी में देशकाल या वातावरण की दृष्टि से लखनऊ नगर—कहानी का स्थान है तथा मॉडल हाउसेज कॉलोनी की चर्चा है, जिसमें उच्च एवं उच्च मध्यम वर्ग के लोग रहते हैं। इसमें आइसा बेला थार्बन कॉलेज की तरुणी छात्राएँ हैं, अतः वातावरण शिक्षित छात्राओं के अनुकूल चित्रित किया गया है । पाठक इस कहानी को पढ़ते समय ऐसा अनुभव करता है कि वह छात्राओं के बीच उनकी चुहलबाजी, व्यंग्य एवं मनोविनोद का आनन्द ले रहा है। ये छात्राएँ थिएटर में नाटक देखने के लिए कमला के मकान में एकत्र होने का निश्चय कर चुकी हैं । इनमें ज्योर्तिमयी अर्थात् जोत सम्पन्न परिवार की है। उसका पहनावा भी उसी के अनुरूप है । दूसरी ओर लीला एक सामान्य परिवार की स्वयं ट्यूशन कर घर का खर्च करने वाली छात्रा है ।
जोत का विवाह श्यामलाल आई. सी. एस. से होने वाला है, अतः इस प्रसंग ने वातावरण को रसमय बना दिया है।
लीला का दो मुसलमानों द्वारा पीछा किये जाने के प्रसंग से वातावरण कुछ तनावपूर्ण हो जाता है। प्यार का वातावरण भी स्त्री पात्रों के पारस्परिक मेल-जोल एवं घनिष्ठता द्वारा निर्मित. हुआ है । वातावरण आधुनिकता से पूर्ण है, क्योंकि पात्र शिक्षित एवं सुसंस्कृत है । पाठक कहानी पढ़ते समय स्वयं को आधुनिक वातावरण के बीच अनुभव करता है।
भाषा शैली
इस कहानी की भाषा सामान्य बोलचाल की है, जैसे- "ललिता ने देखा—मेज पर एक खुला अंग्रेजी लिफाफा पड़ा हुआ है उठा लिया ।"
- उर्दू शब्द-उर्दू शब्दों का जो बोलचाल में काफी प्रचलित है, इस कहानी में काफी प्रयोग किया गया है— मजाक, जमीन, मतलब, तरक्की, आइना, जरा, अजीब, दरखास्त, मंजूर, खुशी, वजह, शायद, खर्च, तकलीफ, ताउल्लुकदार, दिक्कत, तंगदस्ती, तरफ, आबरू, रकम, इकरार, इन्कार, राजी, खुद, माफ, जबान, चीजें, खत्म, रोज, मर्द, तेज, हद, कदम, फासला, हिम्मत, जनाब, तारीफ, वायदा, जवाब, खिलाफ, हमेशा, रिश्ता, जिक्र, शादीशुदा, गवारा ।
- अंग्रेजी शब्दों का प्रयोग–कहानी के स्वरूप, पात्र, वातावरण के अनुरूप लेखक ने स्वाभाविकता लाने के लिए अंग्रेजी के शिक्षित समाज में प्रचलित शब्दों का प्रचुर प्रयोग किया है—उदाहरणार्थ-थिएटर, क्लास, कॉलेज, करैक्टर, मिस, कम्पनी, पर्मानेण्ट, मिस्ट्रेस, हैट, कोट, मोटर, ड्राइवर, सीट, ट्यूशन ।
- तद्भव शब्दों का प्रयोग—संस्कृत या अन्य भाषा के जो मूल विकृत रूप में प्रयुक्त होते हैं, वे तद्भव शब्द कहलाते हैं । लेखक ने कहानी में स्वाभाविकता लाने के लिए तद्भव शब्दों का यथा-स्थान प्रयोग किया है; जैसे— पहनावा (परिधान), बूढ़ी (वृद्ध), ब्याह (विवाह), ब्याहती है (विवाह करती है) ।
- सरल एवं सहज- 'सखी' कहानी की भाषा बिल्कुल सरल, सहज एवं स्वाभाविक है, यथा-" भई, तुम लोग जाओ, माफ करो, मुझे समय नहीं है ।"
- मुहावरों का प्रयोग — निराला जी ने यत्र-तत्र मुहावरों का भी प्रयोग किया है जिससे भाषा की व्यंजकता में वृद्धि हुई है; जैसे— (i) चौपट करके छोड़ना, (ii) पैसा दाँत से पकड़ना, (iii) जमीन पर कदम न पड़ना, (iv) सिर चढ़ना, (v) सूखकर काँटा होना ।
'शैली वर्णनात्मक शैली- कथा को आगे बढ़ाने के लिए हर कहानी में वर्णनात्मक शैली का सहारा लिया जाता है । निराला जी की 'सखी' कहानी में भी कई स्थलों पर यह शैली देखने को मिलती है। उदाहरण- "वह तेज कदम चलने लगी । वे भी उसी हिसाब से बढ़ते गये-तीन ही चार हाथ का फासला था। ऐसे समय उनके साहस की ऐसी बात सुनी, जो उसकी मर्यादा के प्रतिकूल थी।"
भावात्मक शैली-जहाँ उमड़ते हुए भाव को व्यक्त किया जाता है, वहाँ भाषा में भावात्मक शैली स्वभावतः आ जाती है ।इस कहानी में भी इस शैली का प्रयोग किया है । उदाहरण–'' वजह कोई न थी। सोचकर कुछ कह दे, हृदय और मस्तिष्क में उतनी जगह न थी एक अजीब भाव में सारी देह भरी हुई थी, तः देर के लिए दबने वाले स्वर में भी उच्छ्वास उमड़ रहा है।"
व्यंग्यात्मक शैली – जब लीला की श्यामलाल आई. सी. एस. के बंगले में उनसे भेंट हुई। अपनी बातचीत एवं भेंट के विषय में वह जब जोत को बताती है, तो जोत श्यामलाल जी को जो पत्र लिखती है उसमें वह लीला तथा श्यामलाल जी के मिलन पर व्यंग्य करती हुई लिखती है-आज लीला दीदी से आपके मिलने की सांगोपांग बातें मालूम हुईं। जिस मजनू की जो लैला होती है, वह इसी तरह उसे अपने आप मिलती है। अपनी लैला की आप रक्षा करें ।"
उद्देश्य
कहानी सोद्देश्य भी लिखी जाती है, कोई संदेश, कोई उपदेश देने के लिए भी। केवल पाठकों का मनोरंजन करना भी कहानी का उद्देश्य हो सकता है, जैसे हास्य कहानियों में । 'सखी' कहानी का उद्देश्य नारी पात्रों की मनोवृत्तियों का चित्रण करना है, जिसमें सर्वाधिक चित्रण जोत (ज्योर्तिमयी) की विशाल हृदयता का है जो अपनी प्यारी एवं सम्माननीय सखी लीला के लिए अपनी प्रेम-भावना को दबाकर अपने होने वाले पति श्यामलाल आई. सी. एस. से अपने पत्र द्वारा प्रार्थना करती है कि वे उसकी बहन (सखी) लीला को अपना लें । लीला की घरेलू स्थिति अच्छी नहीं थी, उसे ही ट्यूशन करके घर का सारा खर्च चलाना पड़ता था उसका विवाह कैसे हो पाता, घर में दो छोटे भाई, अकेली बूढ़ी माँ । जोत के सखी के लिए किये गये इस त्याग को चित्रित करना ही इस कहानी का उद्देश्य प्रतीत होता है।
शीर्षक
कहानी का शीर्षक है-सखी।इसमें एक सखी जोत ने अपनी प्रिय सखी लीला के लिए जो त्याग किया है, उससे कहानी के 'सखी' शीर्षक की सार्थकता सिद्ध होती है।
'सखी' केवल एक प्रेम कहानी न होकर वैयक्तिक स्वतंत्रता और मानवीय संबंधों के सहज विकास की वकालत करती है। निराला यह संदेश देते हैं कि जहाँ सामाजिक मर्यादाएँ कृत्रिम दीवारें खड़ी करती हैं, वहीं सच्ची आत्मीयता और मित्रता ही संबंधों को स्थायित्व और गरिमा प्रदान करती है।


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