सूर्यकांत त्रिपाठी निराला की कविता कुकुरमुत्ता पूंजीवादी व्यवस्था और सामंती सभ्यता पर तीखा व्यंग्य है। इस कविता का मुख्य प्रतिपाद्य शोषण की निंदा और व
कुकुरमुत्ता कविता का प्रतिपाद्य मूल भाव | निराला
सूर्यकांत त्रिपाठी निराला की कविता कुकुरमुत्ता पूंजीवादी व्यवस्था और सामंती सभ्यता पर तीखा व्यंग्य है। इस कविता का मुख्य प्रतिपाद्य शोषण की निंदा और वर्ग-संघर्ष है। कुकुरमुत्ता सन् 1942 में रचित एक लम्बी रचना है जो अपने अनगढ़पन और अजूबेपन के लिए काफी चर्चित रही है. निराला ने भाव-भाषा-विचार सभी दृष्टियों से इसे अपने समय की सबसे सुन्दर कविता घोषित किया है. निराला के मोहभंग की जो प्रक्रिया 'अणिमा' की कविताओं से शुरू होती है, उसी की तार्किक निष्पत्ति है-'कुकुरमुत्ता'. इसमें निराला का मोह भंग जितना व्यक्तिगत है, उतना ही सामाजिक, सांस्कृतिक, ऐतिहासिक और मूल्यकेन्द्रित भी. कहना न होगा कि निराला की यह कविता समकालीन बोध और यथार्थ से साक्षात्कार करने की एक उद्दाम कोशिश है, जिसमें निराला ने व्यंग्य को एक प्रखर और सार्थक हथियार के रूप में इस्तेमाल किया है.
निराला स्वयं सर्वहारा के प्रतीक थे. इस कविता में कुकुरमुत्ता की आवाज में निराला का ही स्वर और विद्रोह व्यक्त हुआ है. इस संदर्भ में रामविलास शर्मा का यह कथन बहुत सटीक लगता है-“निराला हँस रहे थे वेदान्त पर, समाजवाद पर, काँग्रेसी नेताओं पर, छायावाद पर अपनी पुरानी मान्यताओं पर. नाम से ही हास्यास्पद 'कुकुरमुत्ता' को अपना अस्त्र बनाकर उन्होंने उसे ब्रह्म के समान विश्वव्यापी बना दिया, उसके सहारे उन्होंने सबसे बदला लिया. वे जो अपने को सभ्य, शालीन और सुसंस्कृत समझते थे, कुकुर- से ओछे साबित हुए. कुकुरमुत्ता सिर्फ एक ढेला था जो निराला ने हल्ला मचाती हुई भीड़ पर फेंक दिया था.”
डॉ. रमेश कुन्तल मेघ ने 'कुकुरमुत्ता' कविता को सौन्दर्य बोध की नवीन दृष्टि से महत्वपूर्ण रचना माना है. हास्य, हास्यास्पद, विडम्बना, भड़ौआ, स्वांग आदि लोक कौशल से संयुक्त यह कविता नया काव्यशास्त्र और आधुनिक लोक सौन्दर्य बोध का संकेत करती है. सारी रचना में ज्यादातर एककालिता (सिन्क्रॉनी) है.
कविता में गुलाब पूंजीपति वर्ग और दिखावटी सभ्यता का प्रतीक है जबकि कुकुरमुत्ता शोषित सर्वहारा वर्ग और सच्चे लोक-जीवन का प्रतीक बनकर उभरता है। कुकुरमुत्ता गुलाब से सीधे संवाद करता हुआ उसकी सारी बनावट और कृत्रिमता को उजागर कर देता है। वह कहता है कि गुलाब की सुंदरता, रंग और खुशबू गरीबों के खून चूसकर आई है। पूंजीपति अपनी चमक-दमक और ऐश्वर्य गरीबों के शोषण पर टिका रखते हैं लेकिन बाहर से बहुत सभ्य और सुंदर दिखते हैं। निराला ने कुकुरमुत्ता के माध्यम से स्वाभाविकता की तुलना कृत्रिमता से की है। गुलाब को विशेष देखभाल और खाद की जरूरत पड़ती है जबकि कुकुरमुत्ता बिना किसी सहारे के गंदगी में भी उग आता है। यह दर्शाता है कि सच्चा जीवन आत्मनिर्भर और स्वाभाविक होता है जबकि पूंजीवादी सभ्यता पूरी तरह दूसरों के शोषण पर टिकी हुई है। कविता में नवाब की बाड़ी का प्रसंग आता है जहां गुलाब को विशेष महत्व दिया जाता है लेकिन अंत में कुकुरमुत्ते को नवाब की बेटी के लिए कबाब बनाने में इस्तेमाल कर लिया जाता है। इससे साफ होता है कि शोषित वर्ग की उपयोगिता केवल शोषक वर्ग की भोग-विलास तक सीमित है। जब काम पूरा हो जाता है तो उसे फेंक दिया जाता है।
कविता में कुकुरमुत्ता एक बिम्ब नहीं बल्कि बिम्बों के पुंज रूप में है, जो सामान्य जनता की महाशक्ति के विराट् रूप को व्यक्त करता है. सर्वहारा कुकुरमुत्ता के बिम्ब पुंज में वह चीन का छाता, भारत का छत्र, आज का पैराशूट, विष्णु का सुदर्शन चक्र, यशोदा की मथानी, राम का धनुष बलराम का हल, सुबह का सूरज, शाम का चाँद, नाव का पाल और डाँडी का पल्ला है. दोहराने पर डमरू, वीणा, मृदंग, तबला, वॉयलन, बेन्जो, घण्टा-घण्टी, ढोल, डफ, शंख, तुरही मजीरा- करताल है. धर्म में कास्मोपोलिटन, मेट्रोपोलिटन तथा कैपिटल में लेनिनग्राद है. नाच में कत्थक, कथकेलि, बालडांस, मनिपुरी-गरबा अफ्रीकन नाच है. वास्तुरूपों में पिरामिड, यूक्लिड, रामेश्वर, मीनाक्षी, जगन्नाथ, भुवनेश्वर, कुतुबमीनार - ताज, ऐरियन-परशियन-गाथिक आर्च है. कविकुल में आदि कबि व्यास, भास, कालिदास, हाफिज, टैगोर, टी. एस. इलियट की प्रोग्रेसिव लेखनी है.
यह निसंकोच कहा जा सकता है कि इस कविता के द्वारा निराला ने अपने छायावादी तथा जनवादी फूहड़ (एब्सर्ड) और हास्यास्पद (ल्यूड्रिक्रस), व्यक्तिवादी तथा विश्ववादी दार्शनिक अवधारणाओं की चीरफाड़ की है. विश्वकोशीय ज्ञान (भूगोल, इतिहास, संस्कृति, समाज- सौन्दर्य, नृवंशशास्त्र, प्राणीशास्त्र आदि से संयुक्त) तथा सर्वहारा-सौन्दर्य बोध की नवीन दृष्टि इस रचना में सर्वत्र दृष्टिगोचर होती है. सम्पूर्ण कविता कूट भाषा वाली है.
इस कविता का मूल भाव शोषण के विरुद्ध विद्रोह की भावना है। निराला कहते हैं कि कृत्रिम सभ्यता की चमक बहुत जल्दी फीकी पड़ जाती है जबकि शोषित वर्ग की सच्चाई और संघर्ष की शक्ति स्थायी है। कविता पूंजीवाद, औपनिवेशिक मानसिकता और आभिजात्य दिखावे की कलई उधेड़ती है और लोक-जीवन की सच्चाई को प्रतिष्ठा प्रदान करती है। इस रचना में निराला ने हास्य, व्यंग्य और प्रयोगशील भाषा का अनोखा मिश्रण किया है जो हिंदी कविता को नई दिशा देता है।कुकुरमुत्ता आज भी प्रासंगिक है क्योंकि पूंजीवादी असमानता और दिखावे की संस्कृति आज भी समाज में मौजूद है। निराला की यह कविता उनकी प्रगतिवादी चेतना और सामाजिक विद्रोह का सुंदर उदाहरण है।


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