निराला की यह कविता हिंदी साहित्य में विशेष स्थान रखती है क्योंकि इसे खड़ी बोली हिंदी की पहली सफल मुक्त छंद (free verse) रचना माना जाता है।
जूही की कली कविता का रचनागत काव्य सौन्दर्य
जूही की कली,शीर्षक रचना निराला जी ने 1916 ई. में प्रणीत की थी।वह द्विवेदी युग का अन्तिम चरण और छायावाद के आविर्भाव का संकेतक काल था आधुनिक कालीन हिन्दी काव्य-साहित्य के आकाश में एक दैदीप्यमान नक्षत्र के रूप में इसी कविता के माध्यम से निराला उदित होते हैं यह कविता ही उनके कवि व्यक्तित्व की उनके काव्य जीवन के आरम्भ में ही उनकी सार्थक पहचान कराती है।इस कविता में उनकी काव्य-प्रतिभा का प्रथम उन्मेष प्रकट हुआ है जो उनके काव्य जीवन का कीर्ति शिखर भी बन गया है। इसकी रचना करने के तत्काल बाद निराला जी ने इसे सरस्वती में छपने के लिए भेजा, परन्तु सरस्वती सम्पादक आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी ने सखेद इसे लौटा दिया था । वस्तुतः इस रचना में निराला जी की काव्य प्रतिभा और नये छन्दों से तो वो प्रभावित हुए थे परन्तु उनके अपने नैतिक आदर्शों के बीच उसकी श्रृंगारिकता उन्हें पसंद नहीं आयी इसीलिए इन्होंने उसे वापस कर दिया यद्यपि कालान्तर में जब निराला जी साहित्य के क्षेत्र में स्थापित हो चुके तब द्विवेदी जी ने इस रचना की सराहना की थी । निराला जी एक मनस्वी रचनाकार थे इसलिए रचना के लौटने से उनका मनोबल नहीं टूटा उन्हें अपनी प्रतिभा पर विश्वास था और अपनी अपराजेय रचना शक्ति के प्रति वे अडिग थे ।
इस्व रचना के सन्दर्भ में अपना विचार प्रकट करती हुई सुश्री रेखा खरे ने लिखा है— जुही की कली' (1916 ई.) के माध्यम से हिन्दी कविता समग्र रूप में पहली बार अंकुठ उन्मुक्तता का अनुभव कराती है—विशेषतः श्रृंगारिक कविता के सन्दर्भ में उन्मुक्तता का अनुभव और भी प्रीतिकर लगता है । छायावादी काव्य-भाषा में अनुस्यूत होती नई और सघन अर्थ-छवियों का सशक्त साक्षात्कार 'जुही की कली' कराती है । निराला जी ने इसकी रचना के माध्यम से हिन्दी कविता के सन्दर्भ में छन्दमुक्त कविता में पहल की, अतएव यह रचना अपना ऐतिहासिक महत्त्व भी रखती है ।
'जुही की कली' और मलयानिक के स्वच्छंद शारीरिक व्यापार का अंकन कर कवि ने उन्मुक्त मानवीय प्रणय व्यापार को स्वर दिया है। प्रणय-स्थिति के अंकन में इस तरह का वातावरण ताजगी से भरपूर है-
विजन-वन-वल्लरी पर,
सोती थी सुहागभरी-
स्नेह-स्वप्न-मग्न-अमल-कोमल-तनु तरुणी जुही की कली
यहाँ 'सुहाग-भरी', 'स्नेह-स्वप्न मग्न', 'अमल-कोमल-तनुतरुणी' जैसे प्रयोग इस बात का स्पष्ट संकेत देते हैं कि जुही की कली का चित्रण ही कवि का मूल अभिप्रेत नहीं है, वह ऊष्मामय मानवीय संवदेन को व्यंजित करने का माध्यम भी है । बंगला पद-विन्यास से अनुप्राणित इस अंश में शब्दावली के बीच एक विशिष्ट प्रयोग कवि ने रखा है-'सुहाग भरी', 'सो. इस मानवीय ऊष्मा' में गहरी आत्मीयता भर देता है-
वासंती निशा थी.
विरह-विधुर प्रिया संग छोड़ किसी दूर देश में था पवन
जिसे कहते हैं मलयानिल ।
अंतिम पंक्ति में एक प्रयोग मुक्त छन्द की प्रकृति के अनुकूल एकदम अयान्त्रिक ढंग से कवि ने देखा है— 'जिसे कहते हैं मलयानिल' । बातचीत के ढर्रे का यह प्रयोग भाषा-मुक्ति के आरम्भिक सिलसिले में उल्लेखनीय है ।
आगे एक स्मृति-चित्र आता है,
जो प्रिया से बिछुड़े मलय के मानस में निर्मित होता
आई याद बिछुड़न से मिलन की वह मधुर बात,
आई याद चाँदनी की धुली हुई आधी-रात,
आई याद कांता की कंपित कमनीय गात,
लय का यह अकस्मात् परिवर्तन संयोगकालीन स्मृतिपरक संवेदना को अनुभव के धरातल पर विश्वसनीय बनाता है । इन तीन तीव्र प्रखर पंक्तियों में संयोगात्मक उत्तेजना की स्मृति बहुत जीवंत बन पड़ी है चाँदनी रात के लिए चाँदनी की धुली हुई आधी रात का प्रयोग गत्यात्मक वातावरण की सृष्टि करता है । इस मादक स्मृति से परिचालित मलय की सक्रियता को कवि शब्दों में भी उतारता है-
फिर क्या ? पवन
उपवन-सर-सरित गहन गिरि कानन
कुञ्ज-लता-पुञ्जों को पार कर पहुँचा जहाँ उसने की केलि
कली-खिली-साथ ।
'उपवन-सर-सरित्' की अबाध गति पवन की अदम्य उत्कंठा को रूपायित करती है । मलय के इस आवेगमय व्यापार को बंधन-विहीन छंद की अभिव्यक्ति दे सकता था । छंद की बँधी-बँधाई गति जैसे इस स्वच्छंदता के स्वरूप को आघात पहुँचाती है । भाषा, छंद और संवेदना की परस्पर संश्लिष्ट प्रकृति का रहस्य निराला जी ने शुरू में ही पहचान लिया था ।
विश्वंभर 'मानव' ने निराला जी की इस रचना को लक्ष्य करके लिखा है- 'जुही की कली' इनकी पहली रचना है। इसके माध्यम से इन्होंने प्रकृति के तत्त्वों के बीच उन्मुक्त-प्रेम की स्थापना की है। इसमें जूही नारी है, पवन पुरुष । पवन यद्यपि परदेश में है, पर वह दूर खिली जुही के यौवन सौन्दर्य से परिचित है। एक दिन प्रकृति का उद्दीपनकारी प्रभाव अपना मायाजाल फेंकता है और वह उतावला होकर प्रिया के देश लौटता है । आते ही उसे सोते से जगाकर उसके साथ केलि करता है । जुही कुछ कहती नहीं, पर इतना स्पष्ट है कि आनन्द का अनुभव वह सामन रूप से करती है। एक ओर सुन्दरता, दूसरी ओर उद्दाम भावना, बीच में पृष्ठभूमि की मादकता-भोग के सारे उपकरण एकत्र हैं । पवन अपनी सुकुमार प्रेयसी के साथ कोमलता का व्यवहार नहीं करता । वह झोंके की झड़ियों से उसकी देह को झकझोर डालता है, गोरे कपोलों को मसल देता है।
यह निर्दयता आनन्द-प्रदायिनी है।यौवन काल में सभी तरुणियों को इस पुरुषता का सामना विवशता से करना पड़ता है। शायद वे इसे पसंद भी करते हैं।
प्रकृति की ओर में मानव-जीवन का यह मधुरतम प्रसंग है । रीतिकाल की प्रतिक्रिया में द्विवेदी युग ने संयोग के वर्णनों का विरोध किया था। उनसे सदाचारमूलक एवं उपदेशात्मक रचनाओं की वृद्धि तो हुई, पर काव्य में शुष्कता भी बढ़ चली । सम्भवत: इसी से छायावादी कवियों ने अपने मन की वासना को व्यक्त करने के लिए प्रकृति का आवरण चुना तो फिर यह सीधी काम की भूमिका बन जाती है । सम्भव है कि यह मलयानिल बंगाल में प्रवासी के रूप में रह रहा और जुही की कली डलमऊ में खिली हो, फिर भी पवन और जुही से तात्पर्य यहाँ सामान्य तरुण-तरुणी का ही लेना चाहिए।
'शेफालिका' भी प्रकृति के क्षेत्र में एक वासना प्रधान रचना है । इसकी प्रेरणा 'जुही की कली' वाली रचना से ही मिली प्रतीत होती है, क्योंकि दोनों में कुछ बातों की समानता है । दोनों ही पत्रांक पर सोती हैं, दोनों ही रस-भोग के योग्य अवस्था वाली हैं, दोनों ही का यौवन उभार पर है— शेफालिका का जुही से कुछ अधिक क्योंकि उसकी तो चोली के बंद तक खुल-खुल जाते हैं। दोनों के कपोलों पर कवि की दृष्टि है—एक के कपोल मसल दिये जाते हैं, दूसरी के कपालों पर न जाने कितने मधुर चुम्बन अंकित किये होते हैं । एक का प्रेमी पवन है, दूसरी का गगन है। एक के साथ केवल काम-क्रीड़ा का उल्लेख है— यद्यपि उसमें तृप्ति भी सम्मिलित है, दूसरी तृप्त काम होकर विदा लेती है। यौन-भावना 'जुही' की अपेक्षा 'शेफालिका' वाली रचना में अधिक मुखरित है।
निराला जी की रचनाओं की विशेषताओं के उद्घाटन के अनुक्रम में डॉ. सरजू प्रसाद मिश्र उनकी 'जुही की कली' रचना पर अपना विचार प्रकट करते हुए लिखते हैं— 'जुही की कली' निराला जी की प्रथम प्रकाशित रचनाओं में से एक ही है। उसकी कला देखकर समझ सकते हैं कि हिन्दी काव्याकाश में उदित होते समय निराला जी का भाव-जगत कितना प्रौढ़ हो चुका था।
वासंती निशा में सुहाग-भरी अमल कोमल तनुतरुणी जुही की कली विजन वन-वल्लरी पर पत्रों की शय्या में आँखें बंद किये सोई थी । उसका प्रियतम मलयानिल इस देश में निवास करता था । शास्त्रीय भाषा में कली पोषित पतिका है। उसके प्रियतम को मिलन की पुरानी स्मृतियाँ, चाँदनी रात और कांता की कंपित देह याद आई। फिर क्या था, वह उतावला होकर चल पड़ा और उपवन सर-सरित, गहन-गिरि-कानन और लता पुंजों को पार कर अपनी प्रेयसी के पास पहुँचा । नींद में डूबी सुहाग-भरी नायिका उसका आना न जान सकी । पवन नायक ने उसके कपोल चूम लिए फिर भी वह न जागी । तब पवन ने उसकी सारी देह झकझोर डाली। युवती चौंककर जग गई। अब वह स्वाभाविक लज्जा के साथ प्रेम-रंग में डूब गयी ।
इस कविता में 'जुही की कली' का मानवीकरण किया गया है । यह दुहरी अर्थव्यंजना वाली कविता है । जुही की कली के धीरे-धीरे खिलने और वियोगिनी तरुणी के प्रवासी प्रियतम के मिलन से दोनों भाव साथ-साथ चित्रित किये गये हैं। दोनों भावों में से कोई किसी को आच्छादित नहीं करता है। दोनों अंत तक अपने प्रकृत रूप में रहते हैं। यह निराला जी की अप्रितम प्रतिभा का चमत्कार है। केशव दास की भाँति रूपकों की क्रीड़ा या रीतिकालीन कवियों की बनावटी कारीगरी का यहाँ कोई निशान भी नहीं है । कविता में सहज, सरल, सुन्दर प्रवाह है। प्रथम कुछ पंक्तियों में सोती हुई कली का अत्यन्त सजीव वर्णन है । नायिका एवं कली में शब्द प्रयोग द्वारा अद्भुत साम्य दिखाया गया है। 'पत्रांक' के पत्रों की शय्या और वैभवशाली तकिया गद्दे की शैय्या में अद्भुत सादृश्य हैं ।
यहाँ ध्यान रखने योग्य की बात यह है कि वियोग की अनुभूति नायिका में न होकर नायक में है । वासंती निशा होने पर भी जुही की कली बेचैन नहीं है। वह जानती है कि उसका प्रियतम बहुत दूर है, इसीलिए वह निश्चित होकर सोई हुई है । हिन्दी के आलोचकों का ध्यान इस ओर नहीं गया है । इसीलिए उसे 'पोषित पतिका' नायिका कहकर संतोष कर लिया जाता है। यदि ऐसा होता तो निराला जी रीतिकालीन कविता का पिण्ट पेषण ही करते, उसमें नवीनता क्या रहती ? लेकिन यहाँ कवि की मौलिकता है । अपनी युवा एवं तरुणी पत्नी से दूर परदेश में रहने वाले पति की मनोदशा तथा जल्द से जल्द घर पहुँचने की आतुरता की निश्छल अभिव्यक्ति यहाँ हुई है । यदि कविता में सहज यथार्थ का चित्रण करना अपराध नहीं है, तो निराला की यह कविता स्वाभाविकता शृंगार-भावना के चित्रण में बेजोड़ है। हिन्दी में प्रायः अविवाहित नारियों एवं कुमारियों को ही प्रेम का आलंबन बनाया गया है लेकिन निराला जी ने दाम्पत्य प्रेम के शृंगार का चित्रण किया है । 'सुहागभरी' से उसके स्वकीयत्व को प्रकट किया गया है । 'स्नेह- स्वप्न- मग्न' से यह बताया गया है कि वह भी सुख-स्वप्नों में डूबी हुई है । कल्पित मिलन आनन्द ले रही है ।
वंसत की मादकता से जाग्रत विगत मिलन स्मृतियों का चित्रण तीन लम्बी पंक्तियों से किया गया है—
आई याद बिछुड़न से मिलन की वह मधुर बात,
आई याद चाँदनी की धुली हुई आधी रात,
आई याद कान्ता की कम्पित कमनीय गात,
इन पंक्तियों को पढ़ने में अन्तिम पंक्तियों की अपेक्षा अधिक समय लगता है। इस दीर्घावधि के द्वारा परदेश और घर की दूरी की व्यंजना की गयी है । 'कमनीय गात' में 'कम्पित' विशेषण मिलन-क्षण के आलिंगन से उत्पन्न रसमग्नता एवं रोमांच को प्रकट करता है ।
'फिर क्या ?' से 'कली खिली साथ' तक निराला ने जो शब्द विन्यास रखा है, वह संकेत और व्यंजना का उत्कृष्ट नमूना है। 'उपवन-सर-सरित गहन गिरी-कानन से मिलन की उत्कण्ठा एवं पवन की तीव्र गति की सूचना मिलती है। कुंजलता पुंजों से उलझे हुए पवन का आभास मिलता है । इन पंक्तियों को पढ़ने से श्वास फूल जाती है, जिससे पढ़ने वाले की दशा स्वयं पवन के श्रम एवं तीव्रता को उजागर कर देती है । 'निर्दय उस नायक ने' से काव्य अंत तक श्रृंगार-क्रीड़ा एवं अंततः नायिका के भी रस में निमज्जित हो जाने का वर्णन है। अंत में कली को 'नम्र मुखी' कहकर सहज लज्जा की उत्पत्ति बताकर शृंगार को अश्लील होने से बचा लिया गया है।
अपनी सहज ध्वन्यात्मकता के बावजूद यह कविता अभिजात्य से मुक्त है । दूधनाथ सिंह के शब्दों में यह 'कहीं भी भारतीय कविता की दो हजार वर्षों की अभिजात परम्परा से अलग की कविता नहीं है, फिर भी यह प्रेम रोमांस और विलास की अद्भुत छवियों वाली कविता है और छायावादी काव्य-ऐश्वर्य को प्रकट करती है । पुनरुत्थानवादी सुधार प्रधान युग में इसका विरोध होना स्वाभाविक ही था।
इस तरह हम देखते हैं कि निराला जी के काव्य-जीवन के आविर्भाव काल में लिखी गई उनकी यह रचना जुही की कली अनेक दृष्टियों से पर्याप्त प्रौढ़ है । भाष- भाव और छंद विन्यास का जैसा उपयुक्त प्रवाहमय और माधुर्यपूर्ण प्रयोग निराला जी ने अपनी इस कविता में किया है वह देखते ही बनता है। प्रारम्भिक रचना होते हुए भी जैसा काव्य-सौन्दर्य इसमें परिलक्षित होता है वैसा विरल कवियों के काव्य में दृष्टिगत होता है । यह रचना उनकी काव्य प्रतिभा का प्रथम उन्मेष तो है ही काव्य रचना के प्रति भी उनकी गहन दृष्टि की भी परिचायक है।भाव-सौन्दर्य का जो रूपांकन इस छंद में निराला जी ने किया है उसका माधुर्य वैविध्य कविताओं को भी पीछे छोड़ता है ।
संक्षेप में यह कहना पर्याप्त होगा कि उनकी यह रचना अनेकशः काव्य सौन्दर्याभिमंडित और भावोत्कर्ष विधायिनी एवं सम्मोहक है । इसकी ध्वन्यात्मकता रूप विन्यास और कोमलकान्त पदावली सभी में एक अद्भुत आकर्षण और सौन्दर्य है । मेरे विचार से काव्य के निष्कर्ष पर उनकी यह आरम्भिक काव्य रचना सर्वतोभावेन श्लाघनीय है ।


COMMENTS