सफलता , निराला की उन कहानियों में से है जो समाज-सुधार और आदर्शवाद के मुखौटे के भीतर छिपे स्वार्थ और पाखंड को उजागर करती हैं।
सफलता कहानी की समीक्षा | सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'
सफलता , निराला की उन कहानियों में से है जो समाज-सुधार और आदर्शवाद के मुखौटे के भीतर छिपे स्वार्थ और पाखंड को उजागर करती हैं। यह कहानी उनके कथा-साहित्य की उस धारा का प्रतिनिधित्व करती है, जिसमें वे स्त्री-शोषण, विधवा-समस्या और तथाकथित प्रगतिशील विचारकों की वास्तविकता पर तीखा व्यंग्य करते हैं।
आचार्यों ने कहानी के निम्नलिखित तत्त्व निर्धारित किये हैं जो प्रत्येक कहानी में पाये जाते हैं :
- कथावस्तु या कथानक,
- पात्र एवं चरित्र-चित्रण,
- कथोपकथन या संवाद,
- देशकाल या वातावरण,
- भाषा-शैली,
- उद्देश्य,
- शीर्षक।
इन्हीं तत्त्वों के आधार पर 'सफलता' शीर्षक कहानी की समीक्षा प्रस्तुत है :
कथावस्तु या कथानक
यह कहानी विधवा विवाह पर आधारित है । नरेन्द्र की पत्नी और आभा के पति की मृत्यु हो चुकी है। तात्पर्य यह है कि नरेन्द्र विधुर और आभा विधवा है। ये दोनों मन्दिर में पूजा करने जाते हैं तथा एक दूसरे को देखते हैं । आभा नरेन्द्र की योग्यता की प्रशंसा करके अपना मार्ग पूछती है, नरेन्द्र उससे कह देता है कि प्रतीक्षा करो । आभा नरेन्द्र का तात्पर्य नहीं समझ पाती, पर नरेन्द्र उसे अच्छा लगता है । नरेन्द्र पत्र-पत्रिकाओं में लिखकर अपनी जीविका चलाता था, पर धन का उसे सदा अभाव रहता था । वह अपना खेत बेचकर बनारस और कलकत्ता में लेखन का कार्य करना चाहता है, पर उसे बहुत कम धन दिया जाता है। कलकत्ते में वह रद्दी बँगला उपन्यासों के हिन्दी अनुवाद का कार्य करता है । थोड़ा धन पाकर उससे रद्दी काम करना नरेन्द्र को अपमानजनक लगता है । वह यह काम छोड़कर अपने गाँव आता है तथा मन्दिर में आभा से मिलने पर उसके सामने विवाह का प्रस्ताव रखता है । आभा यह प्रस्ताव स्वीकार कर लेती है। गाँव में इस विवाह की बहुत निन्दा होती है। नरेन्द्र आभा को लेकर शहर चला जाता है, जहाँ वह आभा को शिक्षा तथा नृत्य का अभ्यास करता है। आभा का गला कोमल और सुरीला था। नृत्य उसने सीख ही लिया था। नरेन्द्र ने सबसे पहले अपने लिखे हुए नाटक 'अर्द्ध नारीश्वर' को प्रस्तुत किया। इसमें नरेन्द्र और आभा ने अभिनय किया था । यह नाटक बहुत सफल रहा तथा आभा और नरेन्द्र दोनों की प्रशंसा हुई । इसके पश्चात् नरेन्द्र ने अन्य नगरों में अपने लिखे नाटकों का अभिनय किया तथा प्रशंसा के साथ धन भी कमाया । अन्त में आभा ने नरेन्द्र से कहा कि गाँव में दुःख बहुत पर मन्दिर में दीप जलाने सुख अनोखा था।
पात्र तथा उनका चरित्र-चित्रण
इस कहानी के मुख्य पात्र नरेन्द्र और आभा हैं। काशी में 'आरती' पत्रिका के प्रकाश वैसे तो गौण पात्र हैं, पर उनके विषय में इस कहानी में प्रकाश डाला गया है। वे साहित्य सेवा के नाम पर पुस्तक प्रकाशन धंधा करते हैं और लेखकों का शोषण करके धन कमाते हैं। गाँव वाले नरेन्द्र और आभा के विधवा विवाह की निन्दा करते हैं। नगर के लोग इस विधवा विवाह की प्रशंसा करते हैं।
प्रधान पात्रों में नरेन्द्र परिश्रमी, विचारशील, गम्भीर और प्रभावशाली है । वह विधवा आभा से विवाह करके विद्या और नृत्य की शिक्षा दिलाता है । नरेन्द्र कुल नाटककार तथा अभिनेता है । आभा विधवा है । वह नरेन्द्र से प्रेम करती है, पर इस आधार पर विवाह करने से डरती है कि गाँव वाले उसकी निन्दा करेंगे। विवाह करने के पश्चात् वह शहर में जाकर अपनी प्रतिभा का विकास करती है तथा एक कुशल गायिका तथा अभिनेत्री के रूप में नाटक के माध्यम से धन और प्रसिद्धि प्राप्त करती है। आभा प्रतिभा सम्पन्न नारी है।
कथोपकथन अथवा संवाद योजना
कथोपकथन वैसे तो नाटक के अभिन्न अंग हैं, पर ये कहानी को भी जीवन्त बनाते हैं। आपस में बातें करते हुए पात्र कहानी से कल्पना का पर्दा उतार देते हैं। इस कहानी के संवाद अधिक नहीं हैं । केवल आभा और नरेन्द्र के तथा काशी के पुस्तक प्रकाशक से नरेन्द्र के छोटे-छोटे संवाद हैं । संवाद स्वाभाविक प्रभावशाली तथा सफल हैं उदाहरण के रूप में आभा तथा नरेन्द्र के संवादों का एक स्थल प्रस्तुत है।
आभा ने नरेन्द्र से कहा- "मुझे संसार में बड़ा दुःख है ।" नरेन्द्र ने लेख की एक पंक्ति के रूप में उत्तर दिया- "दुःख को देवता समझो ।”
भाषा-शैली
इस कहानी की भाषा कथा एवं पात्रों के अनुरूप है । इसमें अन्य कहानियों की अपेक्षा उर्दू व अरबी-फारसी शब्दों का प्रयोग भी कम किया गया है।
(i) प्रारम्भ में प्रकृति चित्रण की भाषा पर्याप्त संस्कृत-तत्सम शब्दमयी है; उदाहरण- श्वेत शेफाली-सी रँगे-रँगे प्रभात के रश्मि प्रपात-मात्र से वृन्तच्युत; जैसे- केवल देवार्चन के लिए चुनी हुई ।
(ii) साधारण बोलचाल की भाषा-घटना वर्णन में सामान्य बोलचाल की भाषा का प्रयोग किया गया है; उदाहरण- बारहदरी की बगल में तीन आदमी खड़े थे, इनके आने से पहले ये चल दिये । आभा ने देखा, मन में कहा—ये वे ही हैं, जिन्हें रोज देखती और समझती थी। इसकी शैली वर्णनात्मक है ।
(iii) अलंकारमयी भाषा-शैली-प्रारंभ में प्रकृति चित्रण की भाषा-शैली अलंकारमयी है, जिसमें रूपक, उपमा एवं उत्प्रेक्षा अलंकारों का सटीक प्रयोग किया गया है; उदाहरण- (क) साल भर ही में सुहाग का काजल उस दीप प्रकाश के ऊपर, रत्नार आँखों में प्रिय दर्शन के अंजन रूप नहीं रह गया। रूपक अलंकार है।(ख) श्वेत शेफाली-सी रँगे प्रभात के रश्मि-पात-मात्र से वृन्तच्युत, जैसे- केवल देवार्चन के लिए चुनी गयी। उपमा एवं उत्प्रेक्षा अलंकार है । ग) हृदय का दीप (रूपक) श्वेत-शेफाली-सी (उपमा), सहानुभूति का तैल (रूपक), वेदना की वर्तिका (रूपक) ।
(iv) मुहावरों का प्रयोग—हृदय धड़कना, आँखों से बिजली निकलना, किस्मत को रोना, दुम हिलाना, नाक कट जाना, आँख मूँदने पर ज्यादा दीखना, आदि ।
वातावरण
प्रस्तुत कहानी में मुख्य रूप से प्रेमी-प्रेमिका के कथानक में प्रेममय वातावरण है । मन्दिर में विधुर नरेन्द्र एवं विधवा आभा का जाना,दोनों का एक-दूसरे को देखना, परस्पर आकर्षित होना, आभा को नरेन्द्र का अपने घर ले जाना, फिर अनेक नगरों में जाना। इस प्रेममय वातावरण की सृष्टि करते हैं।
वातावरण का एक अन्य पक्ष है—व्यावसायिकता । आभा को पढ़ा-लिखाकर तथा नृत्य-गीत की कलाओं में निपुण बनाकर नाटक कम्पनी का विभिन्न नगरों में नाट्य मंचन तथा उससे पर्याप्त धन एवं यश अर्जित करना यह सब व्यावसायिक वातावरण की सृष्टि करने वाले तत्त्व हैं।
उद्देश्य
आभा के कथन के साथ कहानी एकाएक समाप्त हो जाती है और पाठकों को बहुत कुछ सोचने के लिए छोड़ जाती है । कहानी के लघु कलेवर में कहानीकार अपने उद्देश्य की कहीं विशद व्याख्या नहीं कर पाता । इसका अन्त भी ऐसा होता है जो सोचा-समझा निष्कर्ष नहीं होता । निष्कर्ष को कहानीकार पाठकों के ऊपर छोड़ देता है। प्रसिद्धि के शिखर पर चढ़ी हुई आभा का एकान्त पाकर नरेन्द्र से यह कहना - "दुःख बहुत थे जरूर; पर मन्दिर का वह दीप जलाने वाला जीवन मुझे बड़ा सुखमय लग रहा है ।" इस कहानी रूपी पादप का बीज है । वैधव्य का वह पवित्र जीवन, मन्दिर में रोज दीप जलाने जाना, देवता को प्रणाम करना, समाज और परिजनों द्वारा उपेक्षा, अपमान, व्यंग्य सहना, इसमें भी आन्तरिक शक्ति की अनुभूति का सुख है । किसी अप्राप्य सुख की लालसा भी अपने में एक अलग प्रकार का सुख है, यह सुख प्रसिद्धि एवं धन से मिलने वाले भौतिक सुखों में नहीं है । आभा यह अनुभव करती है, आगे क्या हुआ-या होगा, यह सोचने का काम लेखक पाठकों पर छोड़ देता है । कोई एक विकल्प सुझाकर लेखक कहानी के उद्देश्य को सीमित नहीं करना चाहता।
शीर्षक
विधवा आभा एवं विधुर नरेन्द्र की इस प्रेम-कहानी का शीर्षक है 'सफलता' । आभा दुःख, अपमान एवं उपेक्षा का जीवन जी रही है । नरेन्द्र विद्वान, कवि, लेखक एवं साहित्यकार है, परन्तु विधुर होने के कारण वह भी एकाकी जीवन बिता रहा है और दुःखी है, दोनों एक-दूसरे के प्रति आकर्षित हैं, नरेन्द्र मन्दिर की सीढ़ियों से उतरते हुए आभा के युवा-सौन्दर्य पर एक दृष्टि अवश्य डालता है, आभा भी उसे देखती है । बहुत दिनों बाद वह विद्वान आचार्य को एक दिन सीढ़ियों से उतरते समय रोक लेती है और अपने दुःखी होने की बात कहकर उससे दुःख से मुक्त होने का उपाय पूछती है । वह उसे दो बार धैर्य रखने की सलाह देता है। फिर एक दिन उसे गाँव में ही अपने घर ले जाता है और कहता है कि वह उसके अँधेरे घर को प्रकाशित करे । वह नरेन्द्र के पीछे-पीछे चलकर उसके घर आ जाती है। वह उसे पत्नी रूप में स्वीकार करता है । गाँव के बड़े-बूढ़ों में इन दोनों के इस आचरण की कुचर्चा एवं निन्दा होती है ।वह आभा को दिल्ली ले जाता है और शिक्षित बनाता है तथा नृत्य गीत की शिक्षा देता है। हिन्दी-उर्दू पढ़ना-लिखना सिखाता है और नृत्य गीत की कलाकार के रूप में उसे मंच पर उतारता है । लखनऊ, प्रयाग, कानपुर, कलकत्ता आदि नगरों में नाटकों का अभिनय स्वयं करता है तथा आभा से भी कराता है। उसकी प्रशंसा अखबारों में छपती है। वह प्रसिद्ध अभिनेत्री बन जाती है। दोनों के पास ख्याति और धन भी हो जाता है। इस प्रकार आभा को जीवन में बड़ी सफलता मिलती है । इस दृष्टि से इस कहानी का शीर्षक 'सफलता' सार्थक है। इस शीर्षक में भी एक व्यंग्य छिपा है। एक दिन एकान्त में वह नरेन्द्र से कहती है कि इस सुखमय जीवन से उसका मन्दिर में देवता के समक्ष दीपक जलाना अधिक सुखमय था । तात्पर्य यह है कि लेखक निराला भौतिक सुखमय जीवन को ही सफलता नहीं मानता। इस भौतिक सुखमय जीवन से नित्य मन्दिर जाकर देवमूर्ति के समक्ष दीपक जलाना और समाज की उपेक्षा, अपमान सहने का जीवन आभा को अधिक सुखमय लगा। सुख केवल भौतिक साधनों से प्राप्त नहीं होता है। मन की पवित्रता, दुःखों को सहने की क्षमता में व्यक्ति की आन्तरिक क्षमता और पवित्रता कहीं अधिक महत्ता प्रदान करती है। भौतिक सफलता सच्ची सफलता नहीं है।यही इस कहानी के शीर्षक 'सफलता' का व्यंग्यार्थ है।लेखक का 'सफलता' शीर्षक इसी व्यंग्यार्थ को व्यंजित करता प्रतीत होता है। अतः 'सफलता' शीर्षक सर्वथा सार्थक है ।
इस प्रकार 'सफलता' निराला की सामाजिक चेतना और उनकी निर्भीक आलोचना-दृष्टि का सशक्त उदाहरण है। यह कहानी स्त्री-मुक्ति के नारों की सतह के नीचे छिपे पुरुष-स्वार्थ को बेनकाब करती है, और यह सवाल उठाती है कि क्या तथाकथित प्रगतिशील समाज पुरानी रूढ़ियों से वास्तव में अलग है, या केवल शोषण का रूप बदल जाता है। आभा का अंतिम कथन कहानी को केवल सामाजिक टिप्पणी से आगे बढ़ाकर एक मानवीय और दार्शनिक प्रश्न तक ले जाता है — सच्चा सुख बाहरी चमक में है या भीतरी शांति में।


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