सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' द्वारा रचित प्रसिद्ध रेखाचित्र/कहानी 'चतुरी चमार' का मुख्य पात्र 'चतुरी' ग्रामीण समाज के शोषित, वंचित किंतु स्वाभिमानी और
चतुरी चमार कहानी के आधार पर चतुरी का चरित्र चित्रण
सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' द्वारा रचित प्रसिद्ध रेखाचित्र/कहानी 'चतुरी चमार' का मुख्य पात्र 'चतुरी' ग्रामीण समाज के शोषित, वंचित किंतु स्वाभिमानी और जागरूक वर्ग का प्रतिनिधित्व करता है।सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' छायावाद के प्रमुख स्तम्भ हैं। 'चतुरी चमार' कहानी-संग्रह में उन्होंने विषय-वस्तु के अनुरूप कहानी का नया रूप आविष्कृत किया है । इस संकलन की प्रथम कहानी 'चतुरी चमार' संस्मरणात्मक कहानी है, जिसमें निराला जी ने बड़े आत्मीय ढंग से चतुरी चमार का चरित्र-चित्रण किया है।कहानी के आधार पर उसका चरित्र-चित्रण निम्नलिखित प्रमुख बिंदुओं में देखा जा सकता है:
निवास स्थान
चतुरी जाटव लेखक के गाँव का निवासी है । लेखक की इच्छा है कि चतुरी जाटव के विषय में लिखते समय उसके लिए आदरसूचक 'वे' शब्द का प्रयोग किया जाय, परन्तु गाँव नाते चतुरी उसका भतीजा लगता है, अतः उसके लिए लेखक 'वह' शब्द का प्रयोग करता है, आदर या गौरव सूचक 'वे' का नहीं ।
उत्तम जूता निर्माता
चतुरी जूते बहुत मजबूत बनाता है, परन्तु उनमें डिजाइन का परिवर्तन नहीं करता । चतुरी के बनाये जूते टस से मस नहीं होते तथा जिला बाँदा के जूतों से वजन में हल्के होते हैं ।
सन्त साहित्य का मर्मज्ञ
चतुरी सन्त साहित्य का मर्मज्ञ है, यद्यपि वह पढ़ा-लिखा नहीं है । वह कबीरदास के पद स्वर लय के साथ सुन्दर तरीके से गाता तो है ही, वह अपने हिसाब से उन पदों के गूढ़ अर्थ भी जानता और समझाता है । वह कबीर पदों का विशेषज्ञ है। एक दिन गाँव में 'भगत' का आयोजन किया जाता है, जिसमें गाँव के विभिन्न गायक शरीक होते हैं । कोई सूरदास के पद गाता है, कोई तुलसीदास के, तो कोई पलटूदास आदि अनेक ज्ञात-अज्ञात सन्तों के भजन गाते हैं। भगत सुनने के लिए चतुरी लेखक से भी आग्रह करता है। लेखक मचिया पर बैठकर भजन सुनता है । चतुरी लोगों को भूले हुए पदों की याद दिला दिया करता है, मानो वह सबका आचार्य हो । चतुरी लेखक से कहता है-"काका, ये निर्गुण पद बड़े-बड़े विद्वान् नहीं समझते ।" वह लेखक से एक पद का मतलब पूछता है, तब लेखक कहता है कि, है आज नहीं कल सुबह आकर मतलब समझाना ।"
बीच-बीच में गायक लोग चरस की चिलम पीते जाते थे । भगत होते रात काफी हो गयी थी । लेखक को नींद आ रही थी, उसने चतुरी से चलने की अनुमति माँगी ।
लेखक के प्रति चतुरी का आत्मीय भाव-लेखक चतुरी को बताता है कि उसकी काकी (लेखक की पत्नी) तो भगवान के यहाँ चली गयीं, इसलिए उसे खाना भी बनाना पड़ता है । कोई दूसरा मदद के लिए है नहीं, तनिक आराम न करेंगे तो सुबह उठ नहीं पायेंगे । लेखक की इस बात को सुनकर चतुरी आत्मीय भाव से काकी की प्रशंसा करता है कि वे बहुत पढ़ी-लिखी थीं। उसने उनसे कई चिट्ठियाँ लिखवाई थीं। वे रोटी भी करती थीं, बर्तन भी मलती थीं और रोज राम पढ़ती थीं, वे बहुत अच्छा गाती थीं, गजलें और न जाने क्या-क्या, खूब ऊँची आवाज में गाती थीं । चतुरी अत्यन्त आत्मीय भाव से लेखक से यह भी कहता है, "तुम ब्याह करते नहीं, नहीं तो तेरह काकी आ जायें ।"
चतुरी प्रातः आकर लेखक को कबीर की उलटवाँसी तथा उसका गूढ़ अर्थ भी सुनाता है । उसे विश्वास है कि वह कबीरपंथी है, अतः जहाँ गिरह लगती है; अर्थ समझ में नहीं आता है, वहाँ कबीर साहब स्वयं खोल देते हैं, अर्थ सुझा देते हैं । लेखक चतुरी के ज्ञान की प्रशंसा कर देते हैं कि वह अगर पढ़ा-लिखा होता तो उसको पाँच सौ रुपये महीने तक की नौकरी मिल जाती।
चतुरी की अपने पुत्र को पढ़ाने लिखाने की चाह-लेखक के कहने पर उसे अपने पढ़े-लिखे न होने का दुःख होता है। वह लेखक से निवेदन करता है कि वे उसके सत्रह साल के बेटे 'अर्जुन वा' को पढ़ा दिया करें। लेखक उसकी बात मान लेते हैं, इस शर्त के साथ कि चतुरी लेखक के लिए शहर से गोश्त ला दिया करेगा और उसे महीने में दो बार आटा पिसाकर लाना पड़ेगा । चतुरी खुशी से तैयार हो जाता है।
शोषण का शिकार
लेखक से अपने बनाए जूतों की प्रशंसा सुनकर यद्यपि चतुरी खुश तो होता है, परन्तु भीतर दर्द दबाकर दुःखी होकर कहता है, "काका, जमींदार के सिपाही को एक जोड़ा हर साल देना पड़ता है। एक जोड़ा भगतवा को देता है, एक जोड़ा पंचमा को । जब मेरा ही जोड़ा दो साल चलता है तब ज्यादा लेकर कोई चमड़े की बरबादी क्यों करें ? मतलब यह है कि उसके जूते कम ही बिक पाते हैं, क्योंकि उसकी मजबूत बनाई हुई जोड़ी दो साल तक चलती है।
गाँव के जमींदार दरोगा को लेकर आते हैं। वे किसानों पर जमीन खाली कराने के लिए मुकदमे दायर कर देते हैं। गाँव वाले चंदा इकट्ठा करके मुकदमों की पैरवी करते हैं। ऑनरेरी मजिस्ट्रेट, जिनके एक रिश्तेदार जमींदार की तरफ से वकील थे, किसानों पर जमींदार को डिग्री दे देते हैं। डिग्री में कुछ लोगों के बैल वगैरह नीलाम कर दिए जाते हैं। चन्दे के रूप में एकत्र किया हुआ सब रुपया मुकदमों में खर्च हो जाता है । चतुरी की मदद के लिए कुछ नहीं बचता है। चतुरी दुःखी होकर लेखक के पास आता है । लेखक चतुरी की शक्तिभर मदद करने का आश्वासन देता है। लेखक चतुरी से पूछता है कि उसका क्या इरादा है ? चतुरी का दिल बैठ जाता है । वह लेखक से कहता है कि वह मुकदमा तो लड़ेगा, पर गाँव वाले इतने डर गये हैं कि कोई गवाही न देगा । लेखक चतुरी से पूछता है कि फिर क्या किया जाय ? चतुरी लेखक से कहता है कि सारी जिम्मेदारी वह स्वयं ले लें। लेखक गाँव के कुछ पक्के गवाह ठीक कर देता है।
सत्तू बाँधकर पैदल दस कोस उन्नाव चलकर, दूसरी पेशी के बाद पैदल ही लौटकर हँसता हुआ चतुरी लेखक को बताता है कि पुश्त-दर- पुश्त जमींदार के सिपाही को मुफ्त में एक जोड़ी जूता उसे हर साल देना पड़ता है, वह शर्तनामा के रजिस्टर में दर्ज नहीं है ।
इस प्रकार, चतुरी एक भोला-भाला, जूते बनाकर रोजी-रोटी की जुगत करने वाला, शोषण का शिकार, कहानी लेखक की आत्मीयता का पात्र, अपने काम को ईमानदारी से करने वाला, सरल प्रकृति का इंसान है। लेखक ने उसके चरित्र का यथार्थ चित्रण इस कहानी में किया है। 'यह कहानी की अपेक्षा संस्मरणके अधिक निकट है।


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