सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' द्वारा रचित 'चतुरी चमार' हिंदी साहित्य की एक अत्यंत यथार्थवादी, प्रगतिशील और सामाजिक चेतना से ओत-प्रोत कहानी है।
चतुरी चमार कहानी की समीक्षा | सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला
सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' द्वारा रचित 'चतुरी चमार' हिंदी साहित्य की एक अत्यंत यथार्थवादी, प्रगतिशील और सामाजिक चेतना से ओत-प्रोत कहानी है। यह कहानी ग्रामीण समाज में व्याप्त जातिगत भेदभाव, सामंती शोषण और दलित वर्ग के आत्म-सम्मान के संघर्ष को प्रमुखता से रेखांकित करती है।
हिन्दी के आचार्यों ने कहानी के निम्नलिखित तत्व बताए हैं -
- कथानक,
- चरित्र-चित्रण,
- कथोपकथन,
- देशकाल/वातावरण,
- भाषा-शैली,
- उद्देश्य ।
कथानक
कथानक को कथावस्तु भी कहा जाता है । कथावस्तु की स्थिति शरीर में ढाँचे जैसी होती है, उसका अभाव कहानी को नीरस बना देती है । 'चतुरी चमार' कहानी का कथानक बहुत झीना है, इसमें संस्मरणात्मक तत्त्व अधिक हैं ।
चतुरी जाटव का घर लेखक के घर के पास था । चतुरी अनपढ़ था उसने निराला जी से निवेदन किया कि वे उसके पुत्र अर्जुन को पढ़ा दिया करें। अर्जुन लेखक निराला जी से पढ़ने लगा । निराला जी की अनुपस्थिति में उनके पुत्र ने अर्जुन को पढ़ाया और बहुत डाँटा फटाकारा । इससे निराला जी को बहुत दुःख हुआ उन्होंने अपने पुत्र को समझाया कि वह ऐसा न करे ।
कुछ समय बाद भारत में कांग्रेस का आन्दोलन चला । यह आन्दोलन गाँवों में भी पहुँच गया और वहाँ कांग्रेस की स्थापना हो गयी । महावीर जी के मन्दिर पर लगा कांग्रेस का झण्डा धुलकर इसलिए सफेद हो गया कि उसका रंग कच्चा था । जमींदार ने थानेदार से गाँव में कांग्रेस होने की शिकायत की। थानेदार ने सफेद झण्डे को कांग्रेस का नही माना। जमींदार ने गाँव वालों को दबाने के लिए उन पर लगान का झूठा दावा कर दिया । किसान मुकदमा हार गये और उनके बैल नीलाम हो गये । चतुरी ने निराला जी से आर्थिक सहायता लेकर उसके विरोध में मुकदमा लड़ा और जीत गया । इस प्रकार चतुरी को अपने खेत वापस मिल गये। इस तरह इस कहानी का सुखद अन्त हुआ ।
पात्र एवं उनका चरित्र चित्रण
इस कहानी के प्रमुख पात्र इसके लेखक निराला जी और उनके पडौस में रहने वाला चतुरी जाटव है। इस कहानी के लेखक का चरित्र छुआछूत न मानने वाले एवं चतुरी का चरित्र परिश्रमी, ज्ञानी और स्वाभिमानी रूप में हुआ है ।
अन्य पात्रों में चतुरी का पुत्र अर्जुन तथा लेखक का पुत्र है, जो अर्जुन को पढ़ाने का काम करता है । अन्य गौण पात्रों में जमींदार का सिपाही, तिलकधारी पण्डित, जमींदार, दरोगा जी, ऑनरेरी मजिस्ट्रेट तथा जमींदार का वकील है जो ऑनरेरी मजिस्ट्रेट का रिश्तेदार है । कहानी में गाँव के भगत का और पंचमा का भी जिक्र है।
जमींदार साहब अंग्रेजी राज का समर्थन तथा प्रजा पर अत्याचार करते हैं । वे किसानों के विरुद्ध ऑनरेरी मजिस्ट्रेट की अदालत में मुकदमा दायर करा देते हैं । बेचारे किसान चन्दा इकट्ठा करके मुकदमा लड़ते हैं जमींदार उन किसानों की जमीन नीलाम करा देते हैं। जमींदार का सिपाही भी जमींदार के अत्याचार का माध्यम है । चतुरी तथा अन्य जाटवों को उसे प्रतिवर्ष एक जोड़ी जूता मुफ्त देना पड़ता है। ऑनरेरी मजिस्ट्रेट भी अंग्रेजी हकूमत का ही अंग है । वकील भी उसी का रिश्तेदार है । किसानों की मदद करने वाला कोई नहीं । पण्डित जी पुराने ढर्रे के ब्राह्मण हैं जो रूढ़िवादी हैं । दरोगा जी भी जमींदार की शिकायत पर गढ़ाकोला गाँव में यह तहकीकात करने आते हैं कि कहीं इस गाँव में कांग्रेस पार्टी किसानों को अंग्रेजी राज के विरुद्ध भड़काकर आन्दोलन तो नहीं करा रही है । वह तो अच्छा हुआ कि निराला जी से दरोगा की भेंट हो जाती है और उनके व्यक्तित्व से प्रभावित होकर वह बिना कोई कार्यवाही किये चला जाता है । संकेतों में ही निराला जी ने इन पात्रों के विषय में बहुत कुछ कह दिया है।इस प्रकार चरित्र-चित्रण की दृष्टि से यह कहानी श्रेष्ठ कही जा सकती है ।
कथोपकथन
कथोपकथन नाटकों का अनिवार्य तत्त्व है, परन्तु कहानी को आकर्षक, स्वाभाविक एवं प्रवाहमयी बनाने के लिए कथोपकथन अति आवश्यक तत्त्व है । पात्रों का वार्तालाप संक्षिप्त होना चाहिए। 'चतुरी चमार' कहानी के कथोपकथन संक्षिप्त एवं स्वाभाविक हैं। उदाहरण के लिए-
पण्डित जी बोले-" आप ही हैं ?" उसने कहा- "हाँ, यह है ।"
पण्डित जी ने अपने देहाती साथी से पूछा- "आप बे-मे सब पास हैं ?" उनका साथी अत्यन्त गम्भीर होकर बोला- "हाँ, जिला में दूसरा नहीं है ?"
संक्षिप्तता का उदाहरण-अर्जुन से डाँटकर पूछा गया-
- क्या ?"
वही गुण, बोल"
अर्जुन ने कहा- "गुड़"
उसने आज्ञा दी―"बोल, गणेश"
रोनी आवाज में अर्जुन ने कहा— 'गड़ेस'
चिंरजीव ने डाँटकर कहा- "गड़स-गड़ास करता है। साफ नहीं कह पाता । क्यों रे, रोज दाँतौन करता है ?"
उपर्युक्त उदाहरण में कथोपकथन अत्यन्त स्वाभानि एवं दोनों पात्रों चिंरजीव एवं अर्जुन के अनुरूप हैं ।
इस वार्तालाप की शैली कृत्रिम नहीं है, बल्कि यात्रों के चरित्र एवं स्तर तथा स्वभाव के अनुरूप हैं ।
कथोपकथन कहानी के घटनाक्रम को आगे बढ़ाने वाले भी होते हैं। यथा
चतुरी सूखकर मेरे सामने खड़ा हो गया । मैंने कहा- "चतुरी ! मैं शक्तिभर तुम्हारी मदद करूँगा ।"
तुम कहाँ तक मदद करोगे, काका"
" तो
तुम्हारा क्या इरादा है ?"
"मुकदमा लडूंगा, पर गाँव वाले डर गये हैं, गवाही न देंगे।"
इस कहानी के कथोपकथन अत्यन्त स्वाभाविक, संक्षिप्त एवं पात्रानुकूल हैं।
वातावरण
उपन्यास के समान कहानी में भी देश, काल एवं परिस्थिति के अनुकूल बाह्य एवं अन्तः प्रकृति के चित्रण द्वारा वातावरण सृजन की आवश्यकता होती है, परन्तु कहानी में वातावरण चित्रण में अधिक घनत्व होना चाहिए । कहानी के लघु आकार के कारण उसमें विस्तार से वातावरण का चित्रण संभव नहीं है । इस कसौटी पर 'चतुरी चमार' कहानी खरी उतरती है। कहानी के प्रारम्भ में ही लेखक अपने मकान एवं चतुरी के मकान की स्थिति का वर्णन करते हुए कहता है—
"मेरे ही नहीं, मेरे पिताजी के, बल्कि उनके भी पूर्वजों के मकान के पिछवाड़े, कुछ फासले पर, जहाँ से होकर कई और मकानों के नीचे और ऊपर वाले पनालों का, बरसात और दिन-रात का शुद्ध-अशुद्ध जल बहता रहता है, ढाल से कुछ ऊँचे एक बगल चतुरी चमार का पुश्तैनी मकान है।" इस कहानी में देशकाल या वातावरण का सटीक वर्णन किया गया है।अंग्रेजी राज में जगह-जगह सरकार के विरुद्ध होने वाले आन्दोलनों का जिक्र भी देशकाल के चित्रण के अन्तर्गत है।
भाषा शैली
भाषा-शैली भी कहानी का महत्त्वपूर्ण तत्त्व है । कहानीकार विषय, घटना, पात्र आदि के अनुरूप भाषा एवं शैली का प्रयोग करता है 'चतुरी चमार' कहानी में प्रायः बोल-चाल की सरल भाषा का प्रयोग किया गया है। लेखक ने ग्रामीण भाषा के शब्दों का पर्याप्त प्रयोग किया है, यथा-" पासी हफ्ते में तीन दिन हिरण, चौगड़े और बनैले सुअर खदेड़कर दौड़ाते हैं कँटीली झाड़ियों को दबाकर चले जाते हैं, छोकड़े बेल, बबूल, करील और बेर के काँटों के भरे रुँधवा बागों से सरपट भागते हैं, लोग जेंगरे पर मड़नी करते हैं ।"
प्रसंगानुसार शुद्ध साहित्यिक भाषा का भी प्रयोग दिखाई देता है, यथा- "दूसरों के लिए वह श्रद्धेय अवश्य हैं, क्योंकि वह उपानह-साहित्य में आजकल के अधिकांश साहित्यकारों की तरह अपरिवर्तनवादी हैं।
शैली की दृष्टि से विचार करें तो लेखक ने वर्णनात्मक एवं व्यंग्यात्मक शैलियों का प्रयोग किया है। कहीं विचारात्मक शैली भी दिखाई देती है।
उद्देश्य
कहानी किसी विशेष प्रभाव को अंकित करने, किसी विशिष्ट चरित्र को चित्रित करने, किसी विशिष्ट अनुभूति को अभिव्यक्ति देने के उद्देश्य से लिखी जाती है । कहानी का उद्देश्य केवल मनोरंजन भी हो सकता है। कहानीकार अपने दृष्टिकोण के अनुरूप कहानी को विशिष्ट रूप देता है । 'चतुरी चमार' कहानी में निराला जी ने 'चतुरी जाटव' का चरित्र-चित्रण किया अवश्य है, परन्तु मात्र 'चतुरी जाटव' का चरित्र- चित्रण करना ही लेखक का उद्देश्य नहीं है। उसने चतुरी जाटव के चरित्र-चित्रण के माध्यम से तत्कालीन सामाजिक, धार्मिक, राजनीतिक व्यवस्था पर भी प्रकाश डाला है । समाज में ब्राह्मण उच्च वर्ण का एवं सम्माननीय माना जाता है, जाटव आदि बेचारे दलित हैं, तभी तो निराला जी का 10 साल का पुत्र, चरीटव के 17 वर्षीय अर्जुन पर धौंस जमाता है।
लेखक ने समाज में व्याप्त शोषण की प्रथा को भी चित्रित किया है। बेचारे चतुरी, भगतवा एवं पंचमा को हर साल जमींदार के सिपाही को एक-एक जोड़ी जूते मुफ्त में देने पड़ते हैं। इस शोषण पर प्रहार करना भी इस कहानी में लेखक का उद्देश्य है। एक तिलकधारी पण्डित जी के चित्रण में लेखक का उद्देश्य बिना पढ़े-लिखे धर्म के ठेकेदारों की कलई खोलना है। बी. ए. एम. ए. को पण्डित जी बे-मे कहते हैं। गोश्त खाने एवं बीड़ी पीने के कारण लेखक को घृणा की दृष्टि से देखते हैं। समाज में व्याप्त गरीबी का चित्रण करना भी कहानीकार का उद्देश्य है। किसानों की दुर्दशा एवं जमींदारों के अत्याचार को चित्रित किया गया है।
इस प्रकार निराला जी की 'चतुरी चमार' कहानी एक सोद्देश्य कहानी है। लेखक की गरीबों-निर्धनों के प्रति करुणा एवं सक्रिय सहानुभूति इस कहानी में स्पष्ट झलकती दिखाई देती है। 'चतुरी चमार' हिंदी कहानी साहित्य में दलित विमर्श और प्रगतिशील चेतना की एक ऐतिहासिक रचना है, जो सामाजिक न्याय और मानवीय गरिमा की सशक्त पैरवी करती है।


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