सुनीता उपन्यास का उद्देश्य और प्रतिपाद्य जैनेन्द्र कुमार जैनेन्द्र कुमार द्वारा रचित 'सुनीता' (1934) हिंदी मनोवैज्ञानिक उपन्यास विधा की एक युगांतकारी
सुनीता उपन्यास का उद्देश्य और प्रतिपाद्य | जैनेन्द्र कुमार
जैनेन्द्र कुमार द्वारा रचित 'सुनीता' (1934) हिंदी मनोवैज्ञानिक उपन्यास विधा की एक युगांतकारी कृति है। इस उपन्यास का मूल कथ्य बाहरी सामाजिक या राजनैतिक घटनाओं से अधिक पात्रों के अंतर्मन के द्वंद्व, नैतिकता की नई परिभाषा और स्त्री-पुरुष संबंधों की सूक्ष्म परतों के इर्द-गिर्द घूमता है।
सुनीता शीर्षक उपन्यास के रचनाकाल में कोई निश्चित उद्देश्य अथवा प्रतिपाद्य निर्दिष्ट करने का कारण प्रतीत होता है। कारण यह है कि 'सुनीता' उपन्यास किसी निश्चित सामाजिक समस्या के उद्घाटन तथा उसके समाधान के लक्ष्य को लेकर लिखा गया उपन्यास नहीं है, वरन् इसके द्वारा लेखक ने पात्रों के मनोविश्लेषण को अपना ध्येय बनाया है। इस उपन्यास में ऐसी कोई निश्चित समस्या भी नहीं उठायी गयी है, जिसके सम्बन्ध में यह कहा जा सके कि लेखक उस समस्या का चित्रण अथवा समाधान करने में सफल हुआ है।ऐसी दशा में 'सुनीता' उपन्यास का प्रतिपाद्य अधिक-से-अधिक यह कहा जा सकता है कि लेखक ने प्रस्तुत उपन्यास के माध्यम से यह दिखाने की चेष्टा की है कि श्रीकांत, हरिप्रसन्न और सुनीता जैसे पात्र विशेष परिस्थितियों में पड़कर किस प्रकार का विचित्र-सा अथवा सर्वथा अनपेक्षित सा आचरण कर सकते हैं । इन पात्रों में से भी सर्वाधिक विचित्र दुराचरण श्रीकांत का रहा है।
श्रीकांत उपन्यास के आरम्भ से ही एक विचित्र-सा व्यवहार करते हुए मिलता है। समझ में नहीं आता कि वह हरिप्रसन्न से आयु में भी बड़ा था और उसकी पढ़ाई का खर्च भी उठाता था, तब वह हरिप्रसन्न के समक्ष कुछ दबा-दबा-सा और अनुप्रार्थी क्यों रहता था ? हरिप्रसन्न क्रांतिकारियों के साथ पकड़ा जाता है और उसको जेल हो जाती है। इस तरह वे दोनों मित्र बिछुड़ जाते हैं। हाँ, श्रीकांत उसके साथ सम्पर्क करने की चेष्टा में उसके सबसे बाद वाले पते पर पत्र लिखता है और उस पत्र के साथ अपनी पत्नी का फोटो भी रख देने का विचित्र आचरण करता है। पूछा जा सकता है कि वह पत्र के साथ अपनी पत्नी का फोटो क्यों रखता है ? इस सम्बन्ध में अधिक-से-अधिक यह कहा जा सकता है कि वह अपने मित्र को अपनी पत्नी से परिचित कराना चाहता है । हाँ वह हरिप्रसन्न के प्रति अनमनी रहने वाली अपनी पत्नी से इस बात की शिकायत करता है कि वह हरिप्रसन्न की बातों में रुचि क्यों नहीं लेती है ?
लगातार की खोज के पश्चात् जब श्रीकांत हरिप्रसन्न को मिल जाता है तो उसको अपने घर लिवा लाने में तो कोई असंगत बात नहीं है, हाँ श्रीकांत उसे अपने घर पर ही रहने का आग्रह करता है । यह बात कुछ अधिक विचित्र नहीं है, किन्तु श्रीकांत द्वारा लाहौर जाते समय अपनी पत्नी को हरिप्रसन्न के साथ अकेली छोड़ देना पूर्णत: उचित नहीं प्रसन्न है । उसकी साली नित्य हरिप्रसन्न से पढ़ने के लिए उसके घर आया करती थी । अतः वह कम-से-कम सत्या से तो यह कह ही सकता था कि वह उसकी अनुपस्थिति में सुनीता के साथ ही जाया करे। श्रीकांत इस तथ्य की उपेक्षा कर देता है ! यही नहीं वह लाहौर में जान-बूझकर कुछ अधिक दिनों के लिए रुक जाता है और वहाँ से सुनीता को जो पत्र लिखता है, वैसा पत्र तो लाखों में से कोई एक पति भी अपनी पत्नी को नहीं लिखेगा । इस पत्र में वह इस तथ्य पर जोर देता है कि वह कुछ दिनों के लिए उसको भूल जाये और स्वयं को हरिप्रसन्न की इच्छा पर छोड़ दे । वैसे हरिप्रसन्न कोई दुश्चरित्र व्यक्ति नहीं है किन्तु इस प्रकार के पत्र का साफ मतलब तो यह निकलता है, कि श्रीकांत अपनी पत्नी को एक प्रकार से व्यभिचार की छूट देना चाहता है।
लाहौर से श्रीकांत ने अपनी पत्नी सुनीता को जो पत्र लिखा था, वह इस प्रकार है -
प्रिय सुनी !
मैं अभी चार-पाँच रोज यहाँ रहूँगा, अदालत का काम तो खत्म हुआ समझो, फिर भी मैं रहने के लिए यहाँ चार-पाँच रोज रहूँगा।
हरिप्रसन्न वहाँ होगा ही, उसको किसी तरह बाधा न होने देना, उसे भागने भी मत देना । देखो सुनीता ! इस बारे में जो जो बातें मेरे मन में उठती हैं, वह सब मैं कह नहीं सकता । हरिप्रसन्न क्यों बंद है, क्यों अँधेरा है, वह मेरी समझ में नहीं आता । वह तो हम सबसे आजाद है फिर भी वह आजादी उसके चेहरे पर कहाँ है ? कहीं उसमें उल्लास दीखता है ? जैसे अभाव ही भीतर से उसे खा रहा है।
तुमसे कहता हूँ कि उसकी किसी बात पर बिगड़ना मत सुनीता ! तुम मुझे जानती हो कि मैं तुमको गलत नहीं समझ सकता । तब तुमसे मैं चाहता हूँ कि इन कुछ दिनों के लिए मेरे ख्याल को अपने मन से तुम बिल्कुल दूर कर देना । सच पूछो तो इसी के लिए मैं ये अतिरिक्त दिन यहाँ बिता रहा हूँ । हरिप्रसन्न में कितनी क्षमता है, लेकिन उस क्षमता से लाभ दुनिया को क्या मिल रहा है ? मैं चाहता हूँ कि वह क्षमता उसकी व्यर्थ नहीं जाये। हमारा प्रयत्न हो कि वह समाज के लिए उपयोगी बने।
सुनीता ! मुझे उसकी भीतर की प्रकृति की बात नहीं मालूम, तो भी तुमसे कहता हूँ कि तुम उन दिनों के लिए अपने को उसकी इच्छा के नीचे छोड़ देना, यह समझना कि मैं नहीं हूँ तुम हो और तुम्हारे लिए काम्य कर्म कोई नहीं है। इस भाँति निषिद् कर्म भी कोई नहीं रहेगा । कम-से-कम यों अपने को हृदय अनासक्त कर पाना ही तो इष्ट है । उसके लिए नि:संदेह वही साधना की आवश्यकता है, फिर भी यह तुम कर सकती हो। तिनका जो बहाव पर बह रहा है, वह अपने को बहता हुआ रहने दे, इसमें उसे क्या मुश्किल है ? यों यह तिनका बेचारा कर भी क्या सकता है ? फिर भी अगर आदमी जैसा अहंभाव उसमें हो तो वह बहाव में बहता तो अवश्य जाये, पर बेचारा रोता झींकता भी जाये। इन कुछ दिनों अपने को सम्पूर्ण रूप से विसार देने को मैं तुम्हें कहता हूँ । चार-पाँच रोज आराम के साथ यहाँ की दर्शनीय चीजें देखूँगा। सो तुम मुझको अपने मन पर से बिल्कुल खिसकाकर देकर इन दिनों रहना।
सत्या पढ़ने आती होगी, हरिप्रसन्न पढ़ाता भी होगा। मैं कुरेद-कुरेद कर पूछकर नहीं जानना चाहता कि हरिप्रसन्न हमारे घर में क्यों हैं और कितने दिन है ? न जानने की जरूरत ही अब मुझे दीखती है। यह काम तो उसका ही अपना है, फिर भी हमारा घर तो शायद उसके लिए सराय के मानिन्द है। तुम उसकी, इस वैरागी वृत्ति को किसी तरह कम कर सको तो शुभ हो । हरिप्रसन्न के मामले में मुझे मालूम होता है कि यह असम्भव नहीं है । महात्मा शायद वह नहीं है। कलाकार से जो मैं समझता हूँ, हरिप्रसन्न उतना ही है। उससे आगे होकर वह नहीं है । कलाकार भटकता न रहे, उद्भ्रान्त न रहे, नहीं तो वह अपने को ही खाता है।
मैं अपने को अल्प प्राण गिनता हूँ। वकालत करता हूँ। गृहस्थी चलाता हूँ । इस तरह से सीमित दायरे अपने चारों ओर लेकर चल सकने वाला हरिप्रसन्न नहीं है, इसलिए मैं सोचता हूँ कि उसको मार्ग देने के लिए हम झुक जायें, टूट भी जायें तो हर्ज नहीं है।
सुनीते ! आशा है, तुम मुझे समझती हो । यह भी आशा है कि अन्यथा नहीं समझतीं । मैं उस दिन की प्रतीक्षा करना चाहता हूँ, जब हरिप्रसन्न जीवन में कुछ प्रयोजन सम्पन्न करने आगे बढ़े, आइडिया दे और वह आइडिया समाज में उगता हुआ और फैलता हुआ दीखे, हरिप्रसन्न की प्रतिभा में वह चीज है, लेकिन वह सहानुभूति से सिंचे, तब न, साथ का पत्र हरिप्रसन्न को दे देना ।
—तुम्हारा श्रीकांत लाहौर से लौटकर आने पर श्रीकांत को सुनीता घर पर नहीं मिलती है, किन्तु इस तथ्य को वह बड़े सीधेपन से यह कहकर सहन कर लेता है कि 'बट अवर क्वीन कैन डू नो रांग ।' कहना न होगा कि पूरे उपन्यास में श्रीकांत विचित्र व्यवहार करता हुआ मिलता है ।
सुनीता को उपन्यास के अन्त में जिस प्रकार की दिगम्बर अर्थात् वस्त्र रहित अवस्था में दिखाया गया है—उसे, उसका चारित्रिक स्खलन ही कहा जायेगा—तथापि उसका यह व्यवहार विचित्र होने के स्थान पर विभिन्न परिस्थितियों का नैसर्गिक परिणाम भी कहा जायेगा । जाने-अनजाने उसका पति श्रीकांत सुनीता को हरिप्रसन्न की ओर ठेलता रहता है। यह भी कहा जा सकता है कि हरिप्रसन्न को मृत्यु के मुख से बचाने की दृष्टि से ही सुनीता ऐसा निन्दनीय आचरण करती है।
उपन्यासकार ने सुनीता को विवाह संस्था के सम्मुख यह प्रश्न-चिह्न भी लगाते दिखाया है कि विवाह एक धार्मिक नैतिक कर्त्तव्य है अथवा एक सामाजिक समझौता मात्र है । कहना न होगा कि यह जिज्ञासा आधुनिक वातावरण में पली हुई अनेक नारियों के मन में उठ सकती है । इस जिज्ञासा में कुछ भी विचित्रता नहीं, अस्वाभाविकता नहीं है।
सुनीता क्रांतिकारियों के दल की नेत्री बनने के लिए अपने गृहस्थ जीवन को न्यौछावर करने हेतु तैयार दिखाई गयी है। हमें यह कार्य विचित्र नहीं लगता, क्योंकि अनेक क्रांतिकारियों ने इस प्रकार का आचरण किया था—अपने माता-पिता आदि की भावनाओं की उपेक्षा भी की थी।
हरिप्रसन्न कोई विशेष विचित्र आचरण नहीं करता।उसका चरित्र जितना रहस्यपूर्ण होना चाहिए था, उपन्यासकार ने उसको उससे अधिक रहस्यपूर्ण बना दिया है । वह क्रांतिकारी दल से सम्बद्ध होने के कारण सजा भुगत चुका है । अतः अपने आगामी जीवन में भी उसके द्वारा पुलिस से बचने के लिए वेश बदलकर तथा अपने पते बदल-बदल कर रहना आवश्यक था। ऐसी दशा में कभी वह दाढ़ी-मूँछ सहित दिखाई देता है, तो कभी सिर के केश और दाढ़ी को मुड़ाई हुई दशा में। कहा जा सकता है कि हरिप्रसन्न के इस आचरण में कुछ भी विचित्रता नहीं है।
हाँ, वह जिस रूप में ट्यूशन पढ़ाकर जीविकापार्जन नहीं करना चाहता तथा शारीरिक परिश्रम का अन्य कोई कार्य करने पर जोर देता है—उसकी यह धारणा कुछ अद्वितीय अथवा विचित्र प्रतीत होती है । हरिप्रसन्न जो चित्र बनाता है, वह भी तो उसके शारीरिक श्रम के स्थान पर मानसिक श्रम का ही परिणाम था, इस प्रकार हरिप्रसन्न की इस प्रकार की धारणा और भी अधिक विचित्र प्रतीत होती है।
हरिप्रसन्न को नारियों के सम्पर्क से बचते दिखाया गया है । वह केवल फल खाकर जीवित रहता है—जो उसके गुप्त-वास की आवश्यकता का परिणाम कहा जा सकता है। हाँ, जिस प्रकार वह सुनीता के सम्पर्क में आता है और श्रीकांत की इच्छा के कारण उसे सुनीता से एकांत में मिलने और बातें करने का अवसर मिलता है-उसके कुछ कारण में हरिप्रसन्न द्वारा सुनीता को अपने दल की नेत्री बनाने की चेष्टा करने में भी विचित्रता नहीं है।हमें उसके द्वारा सुनीता से यह कहने के मूल में भी कोई विचित्रता नहीं दिखाई देती कि वह उसको प्यार करता है।
संक्षेप में कहा जा सकता है कि 'सुनीता' उपन्यास का उद्देश्य अथवा प्रतिपाद्य इस तथ्य का उद्घाटन करना माना जा सकता है कि कुछ प्राणी अर्थात् श्रीकांत, सुनीता और हरिप्रसन्न जैसे नर-नारी किस प्रकार का विचित्र-सा आचरण कर सकते हैं। उनका यह आचरण नैतिक और धार्मिक दृष्टि से चाहे अनुचित समझा जाये, किन्तु मानव की प्रकृति रहस्यपूर्ण है और उसके द्वारा विचित्र प्रकार के आचरण करने को असम्भव नहीं कहा जा सकता।मानव मनोविज्ञान सम्बन्धी अध्ययनों से भी इस बात की पुष्टि होती है कि मानव विचित्र प्रकार के व्यवहार कर सकता है।
स्पष्ट रूप से और साधारणतया इस 'सुनीता' उपन्यास का कोई उद्देश्य प्रतीत नहीं होता है। यदि हरिप्रसन्न के आचरण तथा श्रीकांत द्वारा दिये गये उस सहयोग पर विचार करें तो इस उपन्यास का उद्देश्य देश की स्वतन्त्रता में सभी कुछ बलिदान करने का समर्थन समझा जा सकता है। हरिप्रसन्न में किसी बात की कमी नहीं है । वह अच्छा कलाकार है उसे चित्र की कमी समझते देर नहीं लगती है। वह पर्याप्त समय लगाकर उस चित्र की कमी को दूर कर देता है। इस बात को श्रीकांत और स्वीकार करते हैं कि हरिप्रसन्न द्वारा कुछ रेखाएँ मिटाने और बढ़ाने से चित्र का सौन्दर्य बढ़ गया है, चित्र प्रभावशाली बन गया है । ऐसा कलाकार चाहे तो अपनी इसी कला के माध्यम से सुखमय जीवन व्यतीत कर सकता है। हरिप्रसन्न सर्व का अभाव और कष्ट का जीवन अपने देश को विदेशी शासन से मुक्त कराने के लिए बिता रहा है। वह पूर्ण रूप से शिक्षित है। श्रीकांत की साली सत्या को गणित पढ़ाना और सत्या का सन्तुष्ट होना ही हरिप्रसन्न की योग्यता का प्रमाण है । ऐसा व्यक्ति कहीं भी नौकरी पाकर चैन से रह सकता है । श्रीकांत और सुनीता दोनों ही चाहते हैं कि हरिप्रसन्न का विवाह सत्या से कर दिया जाये । यह इच्छा भी हरिप्रसन्न की योग्यता का प्रमाण है। हरिप्रसन्न का जीवन अपने देश के लिए है, अपनी मातृ-भूमि के लिए है। यही कारण है कि वह विवाह के बंधन में नहीं बँधना चाहता है । रिवाल्वर का खेल खेलने वाला हरिप्रसन्न कभी भी पुलिस की गोली का शिकार बन सकता था । इसी कारण उसने विवाह की बात कभी नहीं सोची। श्रीकांत की आर्थिक दशा अच्छी नहीं है, फिर भी वह हरिप्रसन्न को धन देता था । सुनीता एक सामान्य गृहस्थिन होती हुई भी क्रांतिकारियों की नेत्री बनने को सहमत हुई ? इस आधार पर यह कहा जा सकता है कि जैनेन्द्र जी का उद्देश्य 'सुनीता' उपन्यास के द्वारा भारतीयों की देश की स्वतन्त्रता के प्रति आस्था को रेखांकित करना रहा है।
इस प्रकार 'सुनीता' उपन्यास का उद्देश्य समाज को चमत्कृत करना नहीं, बल्कि मनुष्य को उसके अपने ही भीतर झांकने के लिए मजबूर करना है। जैनेन्द्र कुमार ने यह सिद्ध किया है कि पाप और पुण्य, या नैतिक और अनैतिक की परिभाषाएं उतनी सरल नहीं हैं जितनी समाज की ऊपरी सतह पर दिखाई देती हैं; वे मानव मन की परिस्थितियों और नीयत पर निर्भर करती हैं।


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