सुनीता उपन्यास का नामकरण की सार्थकता | जैनेन्द्र कुमार

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सुनीता उपन्यास का नामकरण की सार्थकता | जैनेन्द्र कुमार द्वारा रचित 'सुनीता' उपन्यास मनोविश्लेषणात्मक (psychological) उपन्यासों में एक महत्वपूर्ण स्थान

सुनीता उपन्यास का नामकरण की सार्थकता | जैनेन्द्र कुमार


जैनेन्द्र कुमार द्वारा रचित 'सुनीता' उपन्यास मनोविश्लेषणात्मक (psychological) उपन्यासों में एक महत्वपूर्ण स्थान रखता है। किसी भी साहित्यिक कृति के नामकरण की सार्थकता इस बात पर निर्भर करती है कि वह कथानक, केंद्रीय पात्र या उसके मूल उद्देश्य को कहाँ तक स्पष्ट कर पाता है।

उपन्यास का उचित नामाकरण किये जाने का तथ्य भी पर्याप्त महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि कलात्मक और आकर्षक नामकरण वाली रचनाएँ पाठकों को अनायास ही अपनी ओर आकर्षित कर लेती हैं। हाँ, नामकरण की रचना के वर्ण्य विषय के साथ संगति अवश्य होनी चाहिए । सामान्यतः नामकरण की निम्नलिखित प्रवृत्तियाँ प्रचलित हैं— 
  • कृति के नायक के आधार पर—जैसे—रामचरित मानस, पृथ्वीराज रासो, राजविलास आदि । 
  • कृति की नायिका के नामाधार पर—जैसे—पद्मावत, कामायनी, मृगनयनी, यशोधरा आदि । 
  • घटनास्थली के नामाधार पर जैसे साकेत, कुरुक्षेत्र, हल्दीघाटी का युद्ध आदि । 
  • प्रमुख घटना के आधार पर—जैसे—गबन, गोदान आदि । 
  • सांकेतिक या लाक्षणिक—जैसे—ऋतुचक्र, शहर में घूमता आईना आदि ।
यदि उपर्युक्त वर्गों पर दृष्टिपात किया जाय तो स्पष्ट होता है कि सुनीता उपन्यास का नामकरण द्वितीय तथ्य अर्थात् कृति की नायिका के नाम के आधार पर किया गया है और यह पूर्णत: उचित है।रचना का नामकरण संक्षिप्त होना चाहिए । इस दृष्टि से तीन अक्षरों के योग से बना यह सुनीता नाम सर्वथा उचित है। यह नामकरण इस दृष्टि से भी सर्वथा उचित है कि सुनीता ही इस उपन्यास की नायिका और प्रमुख पात्र है। उपन्यास के अन्य पात्रों का महत्त्व उनके सुनीता से सम्बन्धों के कारण ही है।उदाहरणार्थ, श्रीकांत सुनीता का पति है तथा हरिप्रसन्न उसके पति का मित्र है। सत्या, सुनीता की बहिन है । 'सुनीता' उपन्यास के यही प्रमुख पात्र हैं।

यह नामकरण इस दृष्टि से भी उचित है कि 'सुनीता' उपन्यास की घटनाएँ मुख्यतः सुनीता के कारण ही आकार ग्रहण हैं और उपन्यासकार ने उसी के चरित्र-चित्रण में विशेष अभिरुचि ली है । श्रीकांत और हरिप्रसन्न के चारित्रिक गुण-दोषों की अधिकतर व्यंजना उनके सुनीता के सम्पर्क में आने के तथ्यों को लेकर हुई है। ऐसी दशा में कहा जा सकता है कि इस उपन्यास का सुनीता नामकरण किया जाना सर्वथा उचित है।
 
प्रधान पात्र रचना में आदि से अन्त तक रहता है । इस तथ्य का निर्वाह 'सुनीता' उपन्यास में नहीं हो सका है । उपन्यासकार जैनेन्द्र जी ने उपन्यास का प्रारम्भ श्रीकांत के चिन्तन अथवा परिचय से किया है। जैसे- श्रीकांत ने अनिवार्य बी. ए. किया, एल. एल. बी. किया, शादी की और प्रैक्टिस शुरू कर दी । वह गिरिस्ती और प्रैक्टिस, गिरती पड़ती चलने लगी है, पर हरिप्रसन्न की याद दूर नहीं होती है। यह पक्ष खलल डालता है ।"
 
इसी गद्यांश में हरिप्रसन्न का नाम आ गया है । तात्पर्य यह है कि लेखक जैनेन्द्र जी ने श्रीकांत के पश्चात् उसके मित्र हरिप्रसन्न को वरीयता दी है। अगला अर्थात् दूसरा गद्यांश श्रीकांत के हरिप्रसन्न सम्बन्धी चिन्तन का है, जो इस प्रकार है- "हरिप्रसन्न का अब ठीक पता नहीं है। कॉलेज में वह मिलाया मिला कि वह श्रीकांत के जी में बस चला । खूब चतुर, खूब कर्मण्य, खूब सप्राण और एकदम अज्ञेय-ऐसा वह था । सबके काम आता था, सदा व्यस्त रहता था, किन्तु उसके बारे में ज्यादा जानकारी किसी के पास नहीं थी ।"
 
'सुनीता' उपन्यास के पहले खण्ड में सुनीता को स्थान नहीं दिया गया है। सुनीता का नाम उपन्यास के दूसरे खण्ड के तीसरे गद्यांश में आता है। जैसे— अब जब पक्की सड़क की राह चलते-चलते श्रीकांत गृहस्थ वकील बन गया है, तब सोचता है कि अरे ! हरिप्रसन्न कहाँ है ? वह भला है कि गृहस्थी में नहीं है और वकालत में नहीं है। क्या अब भी वह जीवन के साथ जीवन करने में वैसा ही उदात्त है । मैं तो जिम्मेदार नागरिक बन गया हूँ । परीक्षण हमारे लिए नहीं हैं, कानून सम्मत नागरिकता हमारे लिए है ।
 
सोचता हूँ और फिर अपनी कुर्सी पर बैठा सामने शून्य में हाथ बढ़ाकर मानो ऐसे विचारों को धकेल कर अपने से परे भी हटता है।पत्नी सुनीता हल्की पढ़ी-लिखी है और दोनों सम्मत हैं कि विवाह निभाने योग्य संस्था है। समाज कैसे चले, नागरिकता कैसे यदि जीवन-परिचय के लिए समझ लिया जाये और कानून तोड़ने के लिए क्या, सच, मानवता नहीं कायम है। उस रूढ़ संस्था के सहारे, जिसे कुटुम्ब कहते हैं और जो विवाह पर टिकी है।"
 
सुनीता उपन्यास का नामकरण की सार्थकता | जैनेन्द्र कुमार
इस प्रकार स्पष्ट है कि जैनेन्द्र जी ने अपने 'सुनीता' उपन्यास के आरम्भ में सुनीता का उल्लेख बहुत बाद में किया है। इस आधार पर सुनीता को इस उपन्यास का प्रमुख पात्र नहीं कह सकते और न उसके नाम पर उपन्यास का नामकरण उचित लगता है।नायक अथवा प्रधान पात्र नाम उपन्यास में अन्त तक रहना चाहिए। उसकी उपस्थिति उपन्यास के अन्त तक आवश्यक है। इस आधार पर सुनीता को इस उपन्यास का प्रमुख पात्र कहा जा सकता है, क्योंकि उपन्यास के अन्त वाली पंक्ति के प्रारम्भ में विराजमान है। जैसे- 'श्रीकांत ने अपने वक्ष में टिके हुए सुनीता के चेहरे को धीमे-धीमे झपकते हुए हँस कर कहा—“उस तसवीर में, जिसके चिर जिज्ञासा में हरिप्रसन्न ने 'तू' से सम्बोधित किया है, वह पीछे कुछ और है, पहले नारी है। मैं भी क्या तुमसे कहूँ कि अरे ओ छलनामयी ! अरे है तू । "
 
इस दृष्टि से विचार करें तो श्रीकांत की पत्नी सुनीता को प्रमुख अथवा प्रधान पात्री आधी योग्यता प्राप्त है, वह इस उपन्यास के अन्त तक उपस्थित है । एक अन्य दृष्टि से विचार करें तो सुनीता इस उपन्यास की विशिष्ट पात्र कही जा सकती है और उसके नाम पर इस उपन्यास का नामकरण उचित सिद्ध किया जा सकता है ।वह दृष्टि है, परिवर्तन की और निर्माण की। सुनीता के अतिरिक्त, इस उपन्यास के प्रमुख पात्र श्रीकांत तथा हरिप्रसन्न जैसे बन गये थे, उपन्यास के अन्त तक वैसे ही रहे । श्रीकांत हरिप्रसन्न काधिकार उसे अभिन्न समझता था। श्रीकांत की हरिप्रसन्न के प्रति मित्रता तथा अभिमत उसी प्रकार बनी रहे। वह वकील था और कचहरी में प्रैक्टिस करता था । उपन्यास के अन्त तक उसके जीवन-यापन का साधन वकालत बनी रही।
 
हरिप्रसन्न क्रांतिकारी था, उसने विवाह नहीं किया। वह विवाह को बाधा मानता था और उपन्यास के अन्त तक मानता रहा । परिवर्तन केवल सत्या में हुआ । कहाँ सत्या एक धर्म भीरू नारी थी और कहाँ वह अपने पति की अनुपस्थिति में क्रांतिकारी युवकों के समूह में गयी और उनका नेतृत्व स्वीकार किया । यही स्थिति सुनीता के चरित्र और व्यक्तित्व दोनों को पूर्णरूप से बदल देती है। जो सुनीता अपने घर तक और अपने पति तक सीमित रहने वाली नारी थी, वह रात में हरिप्रसन्न के साथ जंगल में जाने का साहस कर सकी ।
 
उस प्रसंग को जैनेन्द्र जी ने इस प्रकार आरम्भ किया है, "उसको सुनीता में बहुत विश्वास है, सुनीता टूटेगी नहीं, पीछे हटेगी नहीं, यह वह खूब जानता है । यह भी जानता है कि सुनीता से जो कुछ भी आशा रखे और जितना कुछ भी वह माँगे, उसके प्रति दान में सुनीता चूकेगी नहीं, श्रीकांत ने तो आगे से अपने को पहले भी ऋणी कर लिया है । किन्तु श्रीकांत नहीं, तब तक उसका ऋण चिह्न भी सुनीता के मार्ग में रुकावट बनकर नहीं खड़ा रहेगा, यह हरिप्रसन्न को भरोसा है। सुनीता तो अपनी मालिक खुद ही है । वह अपने संचालन के लिए किसी की अपेक्षाकांक्षी सी नहीं है।"
 
इस चिन्तन से स्पष्ट है कि हरिप्रसन्न ने सुनीता को पहचान लिया है। अब वह पतिभक्ता सामान्य गृहिणी नहीं है। अब वह अपनी स्वामिनी स्वयं है और अपना निर्णय स्वयं कर सकती है। यह सुनीता के व्यक्तित्व का सर्वथा आश्चर्यजनक परिवर्तन है। हरिप्रसन्न एक रात अपने क्रांतिकारी साथियों से मिलने गया था। सुनीता ने जब हरिप्रसन्न से यह पूछा कि कल रात तुम कहाँ गये थे तो हरिप्रसन्न ने जो कुछ कहा उससे स्पष्ट है कि हरिप्रसन्न सुनीता में कितना रूप परिवर्तन करना चाहता है। वह प्रसंग इस प्रकार है-
 
"यही बन्दोबस्त करने गया था कि आज रात दल के सब लोग इकट्ठे हों। उन्होंने कहा है कि आज रानी माता दर्शन देंगी। क्या मुझे उन्हें जाकर यह सुनाना होगा कि रानी वह माता नहीं है, वह पतिव्रता गृहिणी है ।"
 
"पतिव्रता गृहस्थिन में हो रहे व्यंग को सुनीता ने अपने को छूने भी नहीं दिया । उसने हँसकर कहा-"हरी बाबू ! मैं देवी माता कैसे हूँ, यह मैं क्या जानूँ ? यह जानती हूँ कि चौका-बर्तन का धंधा कर लेती हूँ-सो तुम्हें रोटी बनाकर खिला देती हूँ। मेरा यह गृहस्थिन का रूप क्या कभी मुझसे अलग कर पाओगे ?"
 
यह सुनीता का अब तक का रूप था। वह नारी थी, पत्नी थी, गृहस्थिन थी । वह कभी घर से बाहर निकलने की बात सोच भी नहीं सकती थी । वह घर से निकलना साधारण नहीं था । आधी रात के समय घर से बाहर सूने और भयानक जंगल में जाना और वह भी एक पर पुरुष के साथ। यह जाना घूमने या मनोरंजन के लिए नहीं था, अपितु क्रांतिकारियों के दल की नेत्री, देवी बनने के लिए जाना था । 

सुनीता हरिप्रसन्न से केवल इतना वचन चाहती थी कि सवेरा होन से पहले वह अपने घर लौट आये । हरिप्रसन्न ने सुनीता के घर लौट आने की शत-प्रतिशत सम्भावना व्यक्त नहीं की। उसने इतना ही कहा—“ चाहो तो लौट भी सकती हो।"

तात्पर्य यह है कि सुनीता का क्रान्तिकारियों के दल के सामने प्रस्तुत होकर तथा उनकी नेत्री का पद स्वीकारने के बाद घर लौटना एक सम्भावना है, पूर्ण निश्चिय नहीं है। उस पूर्ण निश्चय के अभाव में भी सुनीता अँधेरी रात में हरिप्रसन्न के साथ गयी और चार बजे रात तक जंगल में रही। सुनीता का यह सर्वथा परिवर्तन वाला रूप है । इस प्रकार महान् परिवर्तन 'सुनीता' उपन्यास के किसी भी पात्र में नहीं हुआ है । यह परिवर्तन ही सनीता को उपन्यास की सबसे विशिष्ट महान् और महत्त्वपूर्ण पात्र बनाता है। इस परिवर्तन ने सुनीता को एक साधारण नारी, एक साधारण गृहस्थिन नहीं रहने दिया, वह भारत माता का स्वतन्त्र भारत की प्रतीक बन गयी है।
 
सुनीता का यह परिवर्तित रूप ही उसे इस उपन्यास के पात्रों की श्रेष्ठता पर स्थापित करता है । सुनीता के इस परिवर्तित रूप ने ही क्रांतिकारी विचारों वाले तथा मनोवैज्ञानिक मान्यताओं के साहित्यकार जैनेन्द्र जी को इस बात के लिए विवश किया कि वे अपने इस उपन्यास का नामकरण 'सुनीता' करें।
 
सुनीता में जो परिवर्तन हुआ,उसके लिए एक उपन्यास का नामकरण कोई पुरस्कार नहीं है, एक तुच्छ भेंट है। साहित्यकार और स्थापित कथाकार जैनेन्द्र जी के पास उससे अधिक सुनीता को देने के लिए कुछ था ही नहीं, इसके अतिरिक्त वे उसे अन्य क्या दे सकते थे ? 

इस विवेचन के पश्चात् यह कहने का साहस किया जा सकता है कि इस उपन्यास का नामकरण 'सुनीता' सवर्था उचित है। इस उपन्यास का नामकरण इससे अच्छा नहीं हो सकता था । यह नामकरण लघु अर्थात् छोटा है। इसमें केवल तीन अक्षर सु + नीता हैं। इससे छोटा भी नाम हो सकता था, नारियों के दो अक्षरों के नाम भी हो सकते हैं और हुए हैं। उमा, रमा, सती, सीता, राधा, विभा, सुध, लता, उषा, निजा, आदि अनेक नाम स्त्रियों के हो सकते हैं और हुए हैं, पर उपन्यास का इतना छोटा नाम बोलने, सुनने और स्मरण करने में असुविधा होती है। सम्भवतः इसी कारण जैनेन्द्र जी ने इस उपन्यास का तथा इसकी नेत्री का तीन अक्षरों का नाम 'सुनीता' रखा । यह नामकरण सर्वथा प्रशंसनीय है।

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