आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी के निबन्ध साहित्य का परिचय

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आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी के निबन्ध साहित्य का परिचय हिंदी साहित्य के उन महान विचारकों, आलोचकों और निबंधकारों में से हैं, जिन्होंने हिंदी गद्य को एक

आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी के निबन्ध साहित्य का परिचय


चार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी (1907–1979) हिंदी साहित्य के उन महान विचारकों, आलोचकों और निबंधकारों में से हैं, जिन्होंने हिंदी गद्य को एक नई गरिमा और ऊंचाई दी। उनका निबंध साहित्य केवल बौद्धिक विमर्श नहीं है, बल्कि उसमें भारतीय संस्कृति की गहरी समझ, लोक-जीवन के प्रति अगाध प्रेम और मानवतावादी दृष्टिकोण का एक अनूठा संगम देखने को मिलता है।

निबन्ध गद्य साहित्य की सर्वश्रेष्ठ प्रवृत्ति है। इसमें लेखक की प्रतिभा के अतिरिक्त उसके व्यक्तित्व की विशेषताएँ पूर्णरूप से पाठक के सामने उपस्थित हो जाती हैं।इसमें लेखक तथा पाठक के मध्य आदि से अन्त तक भावात्मक सम्बन्ध स्थापित करके उसका निर्वाह किया जाता है। इसी आधार पर आचार्य रामचन्द्र शुक्लजी ने लिखा था- "यदि गद्य कवियों या लेखकों की कसौटी है तो निबन्ध गद्य की कसौटी है।भाषा की पूर्ण शक्ति का विकास निबन्ध में ही सबसे अधिक संभव होता है। इसीलिये गद्य शैली के विवेचक उदाहरणों के लिए अधिकतर निबन्ध ही चुना करते हैं।

आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी के निबन्ध साहित्य का परिचय
लेखक और पाठक के मध्य सम्बन्ध स्थापना जिस प्रकार निबन्ध के द्वारा साध्य है उतनी अन्य किसी विधा के द्वारा नहीं। निबन्धकार बिना छिपाये अपने विचार तथा मान्यताएँ व्यक्त कर देता है। वह न तो उपदेश देता है, न आज्ञा । निबन्ध में व्याख्यान तथा वक्तृत्व का सामंजस्य-सा होता है। व्याख्यान जिस प्रकार एक तीव्र प्रवाह के रूप में बहकर श्रोताओं को प्रभावित करता है और वक्तृत्व में जिस प्रकार उच्छृंखलतारहित गंभीर शैली अपेक्षित है, इन दोनों का समावेश निबन्ध में होता है। निबन्ध की युक्तियाँ तर्क से समर्थित होकर पाठक को अभिभूत करती हैं। लेखक अपने हृदय और मस्तिष्क दोनों को साथ लेकर पाठकों से बातें करता है, जिससे आपसी बातचीत का आनन्द प्राप्त होता है और घर के वातावरण जैसा वातावरण बना रहता है।
 
यह सर्वमान्य सिद्धान्त है कि निबन्ध में लेखक का व्यक्तित्व निहित होना चाहिए। उसकी विषयवस्तु किसी भी प्रकार की हो सकती है, परन्तु उसमें वैयक्तिकता अनिवार्य है। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल से लेकर हिन्दी के सभी आलोचक और निबन्धकार इस धारणा से पूर्णत: सहमत हैं। इस सम्बन्ध में प्रश्न यह उठता है कि निबन्ध में निबन्धकार का अंश कितना और कैसा होता है? विषय तथा व्यक्ति में किसकी प्रधानता है ? निबन्ध में विषय और व्यक्ति दोनों का अपना पूर्ण महत्व है। व्यक्ति की प्रधानता स्पष्ट करने के लिए लेखक की जीवन सम्बन्धी घटनाओं, रुचियों तथा अरुचियों को लेकर विषयवस्तु को बिलकुल छोड़ देना जिस प्रकार त्याज्य है, उसी प्रकार गंभीरतम विषयों के विवेचन में पड़कर निबन्ध को बिलकुल निर्वैयक्तिक बना देना भी अनुचित है। यही कारण है कि सफल निबन्धकार विषयवस्तु का क्रमबद्ध निर्वाह करते हुए बीच-बीच में अपने व्यक्तित्व को उसमें स्पष्ट कर देता है। यह कार्य वह अपने व्यक्तिगत विचारों और मान्यताओं के रूप में ही करता है।

इस दृष्टि से आचार्य द्विवेदी के निबन्धों में व्याक्त और विषय का पूर्ण सामंजस्य स्पष्ट रूप से लक्षित होता है। विषयवस्तु के चुनाव, उसके अन्त तक निर्वाह आदि में भी आचार्य द्विवेदी का व्यक्तित्व निहित है। निबन्धों में अपने वैयक्तिक विचार और मान्यताओं को स्पष्ट करते समय द्विवेदी जी का व्यक्तित्व उभरकर प्रकट हुआ है। जिस प्रकार आचार्य द्विवेदी के विचारात्मक निबन्धों में उनका व्यक्तित्व स्पष्ट रूप से लक्षित होता है, उसी प्रकार उनक भावात्मक निबन्ध भी गंभीर चिंतन से सर्वथा मुक्त नहीं हैं।

आचार्य द्विवेदी के निबन्धों का वर्गीकरण

श्रेष्ठ निबन्धों में विषय एवं व्यक्ति दोनों पर ध्यान देना उचित है। निबन्ध में विषय एवं व्यक्ति का समन्वय-सा करने का प्रयत्न करना चाहिए। वर्तमान युग के निबन्धों पर विचार करने से यह स्पष्ट रूप से लक्षित होता है कि निबन्धों को विषय एवं व्यक्ति के आधार पर दो विभागों में विभक्त कर सकते हैं-विषय प्रधान निबन्ध तथा व्यक्ति प्रधान निबन्ध । विषय प्रधान निबन्ध वे होते हैं, जिनमें लेखक किसी गंभीर विषय को लेकर उस पर अपनी सारी प्रतिभा लगाकर बड़ी गंभीरता के साथ विचार करने में व्यस्त हो जाता है, पर वह सदा यह ध्यान रखता है कि उसके गंभीर विवेचन से पाठक ऊब न जायें। इस प्रकार के निबन्धों की शैली लगभग विचारात्मक तथा व्याख्यात्मक होती है। इन निबन्धों में विषय से सम्बन्धित विचारों को महत्व दिया जाता है। तात्पर्य यह है कि विषय प्रधान निबन्ध लेखक के मस्तिष्क के क्षेत्र से सम्बन्धित होते हैं। ठीक इसके विपरीत व्यक्ति प्रधान निबन्ध उन निबन्धों को कहा जाता है जिनमें विषय का महत्व कम रहता है तथा किसी संवेदनशील घटना से प्रभावित होकर लेखक का कोमल हृदय जाग्रत होता है तथा पिघल जाता है। इसमें किसी प्रकार का संदेह नहीं है कि इस प्रकार के निबन्ध की शैली भावात्मक होगी तथा उसमें वर्णनात्मकता का भी योग होगा। इस प्रकार के निबन्ध में हृदय पक्ष जाग्रत रहता है तथा उसमें राग तत्व एवं कल्पना तत्व का भी पर्याप्त योग होता है। इस दृष्टि से विचार करने पर आचार्य द्विवेदी के निबन्धों को तीन भागों में विभाजित किया जा सकता है-

विषय प्रधान निबन्ध

वे निबन्ध जिनमें विषय वस्तु की ही प्रधानता रहती है तथा जिनमें विचार गंभीर, शैली पुष्ट तथा सुगठित और भाषा विचारों के अनुकूल, पारिभाषिक शब्दों से सुशोभित तथा सुदृढ़ रहती है। इनके अन्तर्गत आचार्य द्विवेदी के सांस्कृतिक-सैद्धान्तिक समीक्षा से संबंधित, शिक्षा तथा भाषा सम्बन्धी सुधारपूर्ण निबन्ध, साहित्य के इतिहास एवं लोक साहित्य आदि से सम्बन्धित निबन्ध आते हैं। जैसे- भारतवर्ष की सांस्कृतिक समस्या, भारतीय संस्कृति की देन, संस्कृतियों का संगम, हमारी संस्कृति और साहित्य का सम्बन्ध, भारतीय संस्कृति की प्राण-शक्ति, समालोचना का स्वतंत्र मान, तत किम्, साहित्य का मर्म, मानव-सत्य, महिलाओं की लिखी कहानियाँ आदि । हिन्दी उपन्यासों में यथार्थ का आतंक, हमारी राष्ट्रीय शिक्षा प्रणाली, हिन्दी तथा अन्य भाषाएँ, सहज भाषा का प्रश्न, हमारे पुराने साहित्य के इतिहास की सामग्री, हिन्दी का भक्ति साहित्य आदि ।
 

व्यक्ति प्रधान निबन्ध

विषय प्रधान निबन्धों में किसी गंभीर विषय के सम्बन्ध में यथा-सैद्धान्तिक आलोचना, भाषा की समस्या आदि पर विचार करते समय आचार्य द्विवेदी को पूर्णतः निर्वैयक्तिक होकर विचार करना पड़ा था। ऐसे अवसरों पर द्विवेदी जी ने बताया है कि व्यक्तिगत रुचि एवं अरुचि के आधार पर विचार करना अनुचित है। इस न्यूनता की पूर्ति व्यक्ति प्रधान निबन्धों में ही सम्भव है। हजारीप्रसाद जी के व्यक्तिगत निबन्धों के सम्बन्ध में विचार करते समय यह स्पष्ट रूप से ध्यान रखना चाहिए कि उनके व्यक्तिगत निबन्धों में ऐसे बहुत कम हैं जिनमें कोरे व्यक्तित्व तथा कोरी भावना को प्रधानता प्राप्त हुई हो। इन निबन्धों में आचार्य द्विवेदी का व्यक्तित्व निखर कर सामने आया है तथा इनकी शैली प्राय: भावात्मक हो गयी है। इन निबन्धों में गंभीर विचारों तथा मान्यताओं की न्यूनता नहीं है। केवल वर्णन शैली में अन्तर है। द्विवेदी जी के विषयनिष्ठ निबन्धों में शैली गंभीर होती है तथा व्यक्तिनिष्ठ निबन्धों में व्यक्तित्व की प्रधानता होने के कारण शैली भावात्मक, सरल, सरस तथा मन्दमारुत के झोंके-सी प्रतीत होती है, लेकिन इसके अन्तर्गत एक गंभीर व्यंजना सर्वत्र निहित होती है। आचार्य द्विवेदी के सर्वश्रेष्ठ व्यक्तिनिष्ठ निबन्ध हैं- वह चला गया, महात्मा के महाप्रयाण के बाद, अशोक के फूल, शिरीष के फूल, आम फिर बौरा गये, एक कुत्ता और एक मैना, मेरी जन्मभूमि, सत्य का महसूल, नाखून क्यों बढ़ते हैं, ठाकुरजी की बटोर, गतिशील चिन्तन आदि।
 

वस्तुनिष्ठ निबन्ध

आचार्य द्विवेदी के वस्तुनिष्ठ निबन्धों की प्रमुख विशेषता विषयवस्तु की विविधता तथा उसके पीछे विद्वान लेखक का विस्तृत अध्ययन, गहन चिन्तन एवं मनन है। मानव संस्कृति की परिभाषा, भारतीय संस्कृति और उसका वैशिष्ट्य, भारतीय समाज, जनजीवन तथा समाज की ज्वलन्त समस्याएँ और उनके सुलझाने का मार्ग, भारतवर्ष की आर्थिक समस्या, शिक्षा प्रणाली की समस्या आदि आचार्य द्विवेदी के वस्तुनिष्ठ निबन्धों के प्रमुख विषय हैं। इनके अतिरिक्त आचार्य द्विवेदी के अन्य महत्वपूर्ण निबन्ध हिन्दी भाषा एवं हिन्दी साहित्य से सम्बन्धित हैं। हिन्दी भाषा की समस्याएँ, उसके प्रचार के मार्ग, साहित्यिक संस्थाओं के कर्तव्य आदि भाषा सम्बन्धी निबन्धों के अतिरिक्त द्विवेदी ने हिन्दी आलोचना, आलोचना के सिद्धान्त तथा लोक साहित्य आदि विषयों पर भी महत्वपूर्ण वस्तुनिष्ठ निबन्धों की रचना की है।

हिन्दी निबन्ध साहित्य के क्षेत्र को अत्यन्त व्यापक बनाने का श्रेय आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी जी को ही प्राप्त हुआ था। आचार्य द्विवेदी ने अनेक महत्वपूर्ण निबन्धों तथा उनसे सम्बन्धित विषयों पर भी विशुद्ध विचार व्यक्त किये हैं। इन सबके पीछे पाठक को विद्वान् लेखक आचार्य द्विवेदी के गंभीर जीवनदर्शन एवं प्रखर पाण्डित्य की अनुभूति होती है आचार्य द्विवेदी ने विभिन्न विषयों के सम्बन्ध में जो विचार व्यक्त किये हैं, वे सब स्वस्थ एवं मौलिक हैं। उनमें लेखक का उदारवादी दृष्टिकोण सर्वत्र लक्षित होता है। विषयवस्तु में बहुज्ञता अथवा अनेकरूपता का दर्शन आचार्य द्विवेदी की निजी पहचान है। आपके वस्तुनिष्ठ निबन्ध आपके प्रखर पांडित्य, गंभीर मनन एवं चिन्तन की सूचना देते हैं।

संक्षेप में कहें तो, आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी का निबंध साहित्य हिंदी भाषा की एक अमूल्य धरोहर है। उन्होंने इतिहास के सूखे पत्तों में भी अपनी कल्पना और ज्ञान से रस भर दिया और पाठकों को अपनी जड़ों (भारतीय संस्कृति) से जुड़ते हुए आधुनिक बनने का मार्ग दिखाया।

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