आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी एक सफल उपन्यासकार थे

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आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी एक सफल उपन्यासकार थे आचार्य द्विवेदी के उपन्यासों का उल्लेख करते हुए उनकी उपन्यास कला पर विचार हजारीप्रसाद एक उपन्यासकार

आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी एक सफल उपन्यासकार थे


चार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी हिंदी साहित्य के एक ऐसे जाज्वल्यामान नक्षत्र हैं, जिन्होंने न केवल आलोचना और निबंध के क्षेत्र में नए प्रतिमान स्थापित किए, बल्कि एक उपन्यासकार के रूप में भी हिंदी गद्य को एक सर्वथा नूतन और मौलिक दिशा दी। उन्हें एक 'सफल उपन्यासकार' कहना पूर्णतः तर्कसंगत और न्यायोचित है, क्योंकि उनके उपन्यासों ने हिंदी उपन्यास विधा को इतिहास, दर्शन, सांस्कृतिक पुनर्जागरण और मानवीय संवेदनाओं के अनूठे संगम से समृद्ध किया।

हजारीप्रसाद द्विवेदी ने अपने उपन्यासों - बाणभट्ट की आत्मकथा (1946 ई.), चारुचंद्रलेख (1963 ई.), पुनर्नवा (1973 ई.) तथा अनामदास का पोथा (1976 ई.) में अतीत को अपना क्षेत्र बनाया है। बाणभट्ट की आत्मकथा में हर्षवर्धन के शासनकाल (606-47 ई.) के कतिपय वर्षों का चित्रण है। चारुचंद्रलेख में गाहड़वाल (गहरवार) नरेश जयचंद्र (जयचंद) की पराजय (1194 ई.) के पश्चात्वर्ती समय (12वीं-13वीं शताब्दी) का चित्रण है। पुनर्नवा में समुद्रगुप्त (लगभग 330 से 380 ई.) के समय को उपन्यास का आधार बनाया गया है तथा 'अनामदास का पोथा' उपनिषद् काल से सम्बद्ध है। इस प्रकार आचार्य द्विवेदी के चारों उपन्यास ऐतिहासिक या प्रागैतिहासिक काल पर आधारित हैं। परन्तु ये ऐतिहासिक तथ्य-संग्रह मात्र नहीं हैं।

द्विवेदी जी ने इतिहास के तथ्यों तथा घटनाओं की अपेक्षा साहित्यिक-सांस्कृतिक सामग्री को अपना आधार बनाना उचित समझा है। इनका मुख्य स्रोत साहित्य तथा लोक जीवन में प्रचलित किंवदंतियाँ हैं। इन उपन्यासों में उन्होंने इतिहास के बहाने अपनी प्रतिभा तथा सर्जनात्मक कल्पना को आकार प्रदान किया है। वे तिथियों तथा घटनाओं के आग्रही नहीं थे। ये उनके लिए बाह्य तत्व थे। वे तिथियों और घटनाओं के पार जीवन की वास्तविक धड़कन को पकड़ना चाहते थे। वे उस काल की संस्कृति, सामाजिक-संरचना, मनोविज्ञान तथा आचार-विचार को उद्घाटित करने के इच्छुक थे। यहाँ यह उल्लेख करने योग्य है कि द्विवेदी जी अपने उपन्यासों को बार-बार 'गप्प' की संज्ञा प्रदान करते रहे तथा अपने उपन्यासों को 'गप्प' कहकर वे अपने को इतिहास के तथ्यों के बन्धन से मुक्त करने में समर्थ हुए। इस सम्बन्ध में उनका एक महत्वपूर्ण पत्र उद्धृत करना प्रासंगिक प्रतीत होता है। यह पत्र व्योमकेश शास्त्री का है जो हजारीप्रसाद द्विवेदी के नाम लिखा गया था। यह बताने की आवश्यकता नहीं है कि व्योमकेश शास्त्री तथा हजारीप्रसाद द्विवेदी दोनों एक ही व्यक्ति हैं। इस पत्र में आलोचक के रूप में व्योमकेश शास्त्री उपन्यासकार हजारीप्रसाद द्विवेदी को पुनर्नवा उपन्यास के विषय में अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हैं। प्रतिक्रिया केवल पुनर्नवा उपन्यास तक ही सीमित नहीं रही, अपितु द्विवेदी जी की सम्पूर्ण दृष्टि को अपने में समेटे है। व्योमकेश शास्त्री ने हजारीप्रसाद द्विवेदी को लिखा है-

"गप्प मारना कोई आप से सीखे। काल्पनिक घटनाओं का आपने ऐसा समावेश किया है कि पाठक भ्रम में पड़ जाए कि वह इतिहास पढ़ रहा है। वैसे तो जब आपने बाणभट्ट की आत्मकथा लिखी थी, उसी समय आपने यत्र-तत्र अपने श्लोक भी जोड़ दिए थे। कराला देवी की स्तुति ऐसा ही श्लोक है। एक निष्ठावान संस्कृत विद्वान ने उसे किसी प्राचीन संस्कृत का श्लोक मानकर एक बार उसकी ऐसी व्याख्या की कि मैं कुछ विश्वास के साथ कह सकता हूँ कि आपने स्वप्न में भी उसका ऐसा अर्थ नहीं सोचा होगा। हालाँकि कोई भी नहीं बता सकता कि वह या कोई अन्य व्यक्ति स्वप्न में सोचेगा और क्यों सोचेगा ? फिर भी मनुष्य का मन अटकल तो लगाता ही रहता है। लेकिन प्रतिवर्ष में तो आपने अपभ्रंश के दोहे और पद भी गढ़कर चला दिए हैं। आप और लोगों को चाहे भ्रम में डाल दें, परन्तु मुझसे आपका कुछ भी छिपा नहीं है। भ्रम में पड़ने वाले कोई और होंगे।
 
आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी एक सफल उपन्यासकार थे
मुझे अच्छी तरह याद है कि आपने 'हिन्दी साहित्य का आदिकाल' में लिखा था कि भारतीय कवियों ने ऐतिहासिक नाम भर लिया है, शैली उनकी वही पुरानी रही, जिसमें काव्य-निर्माण की ओर अधिक ध्यान था, विवरण-संग्रह की ओर कम; कल्पना विलास का अधिक मान था, तथ्य निरूपण का कम; सम्भावनाओं की ओर अधिक रुचि थी, घटनाओं की ओर कम; उल्लसित आनन्द की ओर अधिक झुकाव था, विलसित तथ्यावली की ओर कम । इस प्रकार इतिहास को कल्पना के हाथों परास्त होना पड़ा। ऐतिहासिक तथ्य इन काव्यों में कल्पना को उकसा देने के साधन मान लिए गए हैं। राजा का विवाह, शत्रु विजय, जलक्रीड़ा, शैल-वन-विहार, दौला-विलास, नृत्य-गान - प्रीति- ये सब बातें ही प्रमुख हो उठी हैं। क्रमश: इतिहास का अंश कम होता गया और सम्भावनाओं का जोर बढ़ता गया। राजा के शत्रु होते हैं, युद्ध होता है। इतिहास की दृष्टि में एक युद्ध हुआ, और भी तो हो सकते थे। कवि सम्भावनाओं को देखेगा। राजा के एकाधिक विवाह होते थे, यह तथ्य अनेकों विवाहों की सम्भावनाओं को उत्पन्न करता है, जलक्रीड़ा और वनविहार की सम्भावना की ओर संकेत करता है और कवि को अपनी कल्पना के पंख खोल देने का अवसर देता है। उत्तर काल के ऐतिहासिक काव्यों में इसकी भरमार है। ऐतिहासिक विद्वान के लिए संगति मिलाना कठिन हो जाता है। मैंने उस समय आपसे पूछा था कि इसको आप अच्छा समझते हैं या बुरा। आपने सीधे जवाब न देने की अपनी शैली में कहा था, आधुनिक इतिहासवेत्ता झुंझला जाते हैं, लेकिन जो सहृदय हैं, जिनकी दृष्टि रस ग्रहण करने की है, उन्हें तों यह अच्छा ही लगता है। मैंने आपसे फिर प्रश्न किया था कि आज के युग में इस प्रकार का रस-प्रधान कोई कथाकाव्य लिखा जाए तो कैसा हो। आपने हँसकर कहा था, कोई शक्तिशाली आधुनिक कथाकार इसका प्रयोग करे और इतिहास रस को बचाते हुए इस विशुद्ध भारतीय दृष्टि से निजंधरी कथाओं का प्रयोग करे तो परिणाम अच्छा भी हो सकता है। मैंने कहा था, किसी शक्तिशाली कथाकार की प्रतीक्षा करने के स्थान पर स्वयं ही आप ऐसा प्रयोग करें तो कैसा हो ! आपने मेरी दृष्टि में ईमानदारी के साथ ही कहा था कि प्रयोग करने से ही तो उत्तम रचना नहीं बन जाती। और फिर अनमने भाव से कहा था, करके देखा भी जा सकता है। बात बहुत पुरानी है, मैं ठीक से कह नहीं सकता कि आपको उस समय का वार्तालाप याद है कि नहीं। परन्तु पुनर्नवा पढ़ने के बाद मैं इस निश्चित निष्कर्ष पर पहुँचा कि आपने प्रयोग कर दिया है। आप मेरे सम्बन्ध में कहा करते हैं कि मैं आलोचक हूँ, सहृदय नहीं। फिर भी मुझे यह साहित्यिक प्रयोग रुचा है, जो सहृदयों को लक्ष्य करके लिखा गया है, वह अच्छा लगा है। मुझे ऐसा लगता है कि आजकल के आधुनिक कथाकार यह भूल ही जाते हैं कि कथा में साहित्य रस का होना आवश्यक है। मुझे खुशी है कि आप नहीं भूले हैं।
 
मुझे मालूम है कि जब आप नीरस कामों से थक जाते हैं तो इस प्रकार के गप्पों की रचना में विश्राम पाते हैं। कालिदास की लालित्य योजना लिखते समय आपके चित्त में अनेक मूर्तियाँ उभरी थीं, जिन्हें आप रूपायित करना चाहते थे। शोधकार्यों में पग-पग पर प्रमाण की आवश्यकता होती है और कल्पना को यथासंभव दूर ही रखने का प्रयत्न होता है। आप ऊबे हुए थे। आप चाहते थे कि भावानुप्रवेश को प्रत्यक्ष दिखाएँ और इसलिए आपने पुनर्नवा का आरम्भ किया था।

व्योमकेश शास्त्री का पत्र पर्याप्त विशाल है। उपर्युक्त कथन जिसे उद्धृत किया गया है, वह केवल पत्र का एक अंश मात्र है। इसे उद्धृत करने का तात्पर्य यह है कि स्वयं उनके ही शब्दों में उनकी उपन्यास-रचना-प्रक्रिया को समझा जा सके। द्विवेदी जी ने पर्याप्त तटस्थ भाव से अपने उपन्यासों की जो विशेषताएँ बतायी हैं, वास्तव में वे ही उनके उपन्यासों की विशेषताएँ हैं। आचार्य द्विवेदी ने अपने उपन्यासों में काल्पनिक घटनाओं का समावेश किया है तथा वे पाठक में उन घटनाओं के सत्य होने का भ्रम उत्पन्न करने में समर्थ हैं। आचार्य द्विवेदी ने विवरण संग्रह तथा तथ्य निरूपण की ओर अधिक ध्यान नहीं दिया है। वे इतिहास की सम्भावनाओं की ओर अधिक प्रयत्नशील रहे हैं। वे इतिहास के वास्तविक रूप से बचते हुए विशुद्ध भारतीय दृष्टि से निजनिर्मित कथाओं का प्रयोग करते रहे तथा कथा में साहित्य रस की अद्भुत सृष्टि करते रहे। द्विवेदी जी जिस प्रकार अपने चिन्तन में पश्चिम से आक्रांत नहीं हैं, उसी प्रकार अपने रचना शिल्प में भी मौलिक हैं। उनके उपन्यासों का रचना-शिल्प पूर्णरूप से भारतीय है। जिसे यथार्थवादी उपन्यास कहते हैं, उस प्रकार के उपन्यास द्विवेदी जी के नहीं हैं। वे उनसे सर्वथा भिन्न हैं। कथा रस तथा साहित्य-रस के अर्थ में द्विवेदी जी के उपन्यास अद्वितीय हैं। उनका रूपात्मक ढाँचा तथा उनकी भाषा अप्रतिम है। इस दृष्टि से आचार्य द्विवेदी के उपन्यासों की तुलना किसी अन्य लेखक के उपन्यासों से नहीं की जा सकती।
 
भाषा पर द्विवेदीजी जी का पूर्ण अधिकार था। संस्कृत का पांडित्य आपके उपन्यासों पर छाया रहा है। अपने वर्णन-कौशल के लिये द्विवेदी जी विख्यात थे। चाहे प्राकृतिक दृश्य हों या नगर अथवा नृत्य अथवा संगीत, द्विवेदी जी अत्यन्त मनोहारी वर्णन करते थे। द्विवेदी जी के उपन्यासों की भाषा अति काव्यात्मक और अलंकृत है। कहीं भी वह अस्वाभाविक नहीं लगती। 'बाणभट्ट की आत्मकथा' के लंबे अंतहीन काव्यात्मक वाक्य संस्कृत कवि बाणभट्ट की शैली का अनुकरण करते हैं तथा यह भ्रम उत्पन्न करने का प्रयत्न करते हैं कि यह कादंबरीकार की ही कृति है। इसमें वर्णन इतिवृत्तात्मक न होकर चित्र प्रस्तुत करने वाले हैं। बिम्बधर्मिता इस भाषा की विशेषता है। इस भाषा में एक संगीतात्मक लय विद्यमान है, एक धारा का प्रवाह है। भाषा का यह रूप द्विवेदी जी के सभी उपन्यासों की विशेषता है। सूक्ष्मतम अनुभवों तथा भंगिमाओं को व्यक्त करने वाली यह भाषा सर्वथा समर्थ भाषा है। यह संस्कृतनिष्ठ समास - बहुल भाषा है। इसे अत्यन्त सहज लोकभाषा भी कह सकते हैं। द्विवेदी जी ने भाषा के इन दोनों रूपों का स्वाभाविक निर्वाह किया है। शास्त्रीय भाषा के बीच सहसा आंचलिक प्रयोग द्विवेदी जी की विशेषता थी। भावों, परिस्थितियों तथा चरित्रों के अनुकूल भाषा को मोड़ने में सफल होना द्विवेदी जी की अद्वितीय विशेषता है। आपके उपन्यासों में संस्कृत के अप्रचलित शब्द तो मिलेंगे ही साथ ही अरबी-फारसी के प्रचलित तथा ग्रामीण आंचलिक शब्द भी मिलेंगे।बीच-बीच में उन्होंने हास्य और व्यंग्य के ऐसे प्रसंग जोड़ दिये हैं कि वातावरण का भारीपन समाप्त हो जाता है।

कुछ विद्वान द्विवेदी जी के उपन्यासों की भाषा को क्लिष्ट बताते हैं, परन्तु आचार्य द्विवेदी के उपन्यासों में ऐसा चमत्कार उत्पन्न करने हेतु प्रयास नहीं किया गया है। यह भाषा परिस्थिति अर्थात देश-काल की सहज माँग से जन्मी है। भाषा के सम्बन्ध में स्वयं आचार्य द्विवेदी ने अपने निबन्ध 'मनुष्य ही साहित्य का लक्ष्य है' में लिखा है- "मनुष्य अपने आहार और निद्रा के साधनों को जुटाने के लिए जिस भाषा का व्यवहार करता है, वह उसकी अनायास लब्ध भाषा है; परन्तु यदि उसे इस धरातल से ऊपर उठाना है तो उतने से काम नहीं चलेगा। सहज भाषा आवश्यक है, पर सहज भाषा का मतलब है-सहज ही महान बनाने वाली भाषा, रास्ते में बटोरकर संग्रह की हुई भाषा नहीं। सीधी लकीर खींचना टेढ़ा काम है। सहज भाषा पाने के लिए कठोर तप आवश्यक है। जब तक आदमी सहज नहीं होता, तब तक भाषा का सहज होना असम्भव है। स्वदेश और विदेश के वर्तमान और अतीत के समस्त वाङ्मय का रस निचोड़ने से वह सहज भाव प्राप्त होता है। हर अदना आदमी क्या बोलता है या क्या नहीं बोलता, इस बात से सहज भाषा का अर्थ स्थिर नहीं किया जा सकता। क्या कहने या क्या न कहने से मनुष्य उस उच्चतर आदर्श तक पहुँच सकेगा, जिसे संक्षेप में 'मनुष्यता' कहा जाता है, यही बात मुख्य बात है।"
 
आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी के उपन्यासों की भाषा मार्ग में एकत्र की हुई भाषा नहीं है, अपितु सहज ही मनुष्य को उच्चतर आदर्श तक ले जाने वाली तथा उसे महान बनाने वाली भाषा है।
 
आचार्य द्विवेदी ने 'पुनर्नवा' उपन्यास के अतिरिक्त अपने शेष तीनों उपन्यासों में पाठकों को भ्रमित करने हेतु औपन्यासिक छल का सृजन किया है। बाणभट्ट की आत्मकथा तथा चारुचंद्रलेख के आरम्भ में कथामुख और अंत में उपसंहार का विधान करके आचार्य द्विवेदी ने मूल लेखक के बारे में भ्रम उत्पन्न किया है। अनामदास का पोथा में भी अनामदास नाम का एक छद्म व्यक्ति आरम्भ और अन्त में उपस्थित रहा है। द्विवेदी जी का यह शिल्प इन उपन्यासों में सर्जनात्मक छूट प्राप्त करने का शस्त्र बन गया है। उन्होंने ऐतिहासिक तथ्यों में सम्भावनाओं तथा निजंधरी कथाओं का विचित्र समावेश किया है।

'बाणभट्ट की आत्मकथा' हर्षकालीन भारत को आधार बनाकर विरचित उपन्यास है। यह कादम्बरी के प्रसिद्ध लेखक बाणभट्ट का जीवनवृत्त है, जिसे उपन्यासकार ने आत्मकथा के रूप में प्रस्तुत किया है। कथा का अधिकांश भाग कादंबरी तथा हर्षचरितसार पर आधारित है। इस उपन्यास की शैली कादम्बरी से मिलती-जुलती है, विशेष रूप से दृश्य वर्णनों में। इस उपन्यास के अनेक प्रसंगों को आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी द्वारा रत्नावली, कुमारसम्भव, मेघदूत, मृच्छकटिक, नाट्यशास्त्र, महाभारत आदि ग्रन्थों द्वारा पुष्ट किया गया है। भारतीय परम्परा, आचार-विचार, उत्सव, रहन-सहन तथा प्रकृति चित्रण आदि के सन्दर्भों को उपर्युक्त ग्रन्थों के उद्धरणों से प्रामाणिक बनाने का प्रयत्न किया गया है।

इस प्रकार आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी संख्या की दृष्टि से कम (केवल चार) उपन्यास लिखने के बावजूद अपने गहरे दार्शनिक बोध, सांस्कृतिक गरिमा, लोक-कल्याण की भावना और बेजोड़ भाषा-शिल्प के कारण हिंदी के सबसे सफल और अद्वितीय उपन्यासकारों की श्रेणी में शीर्ष स्थान पर प्रतिष्ठित हैं। उनके उपन्यास केवल मनोरंजन के साधन नहीं हैं, बल्कि वे मनुष्य को उसकी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़कर उसे एक बेहतर इंसान बनाने का मार्ग प्रशस्त करते हैं।

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