आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी द्वारा रचित "नाखून क्यों बढ़ते हैं" हिंदी साहित्य का एक अत्यंत प्रसिद्ध और वैचारिक ललित निबंध है।
नाखून क्यों बढ़ते हैं निबंध की समीक्षा | आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी
आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी द्वारा रचित "नाखून क्यों बढ़ते हैं" हिंदी साहित्य का एक अत्यंत प्रसिद्ध और वैचारिक ललित निबंध है। यह निबंध केवल एक साधारण से पारिवारिक प्रश्न से शुरू होता है, लेकिन गहराई में जाकर यह मानव सभ्यता, संस्कृति, इतिहास और मनुष्य की पाशविक प्रवृत्ति (जानवरपन) तथा मनुष्यता के संघर्ष को उजागर करता है।आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी जी का यह प्रसिद्ध निबंध "नाखून क्यों बढ़ते हैं" सर्वप्रथम सन 1951 में प्रकाशित हुआ था। बाद में इसे उनके सुप्रसिद्ध निबंध-संग्रह "कल्पलता" में शामिल किया गया, जिसका प्रकाशन भी सन 1951 में ही हुआ था।
हजारीप्रसाद द्विवेदी द्वारा लिखित निबन्ध 'नाखून क्यों बढ़ते हैं!' निबन्ध ललित कोटि का ललित निबन्ध है। ललित निबन्धों की विशेषता यह होती है कि वे हल्के-फुल्के ढंग से आरम्भ होते हैं और गम्भीर चिन्तन के रूप में सामने आते हैं। यह निबन्ध भी इसी प्रकार का है। लेखक के मन में उसकी छोटी बच्ची द्वारा उठाया गया प्रश्न चक्कर काटने लगता है। प्रश्न है-'नाखून क्यों बढ़ते हैं'।
लेखक ने इस पूरे निबन्ध में बच्ची के प्रश्न का उत्तर देने का प्रयत्न किया है और अपने गहन चिन्तन मन द्वारा एक निष्कर्ष निकाला है। बच्चे कभी-कभी माता-पिता को परेशान करते हैं, उन्हें चक्कर में डाल देते हैं। वे ऐसे प्रश्न कर बैठते हैं, जिनका उत्तर देना माता-पिता को असम्भव जान पड़ता है। अगर पिता कम जानने वाला होता है तो उसकी स्थिति दयनीय हो जाती है। 'नाखून क्यों बढ़ते हैं' यह प्रश्न एक दिन आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी से उनकी छोटी बेटी ने किया। आचार्य द्विवेदी इसके उत्तर में कुछ भी नहीं सोच सके। उन्हें जान पड़ा कि नाखून इतनी जल्दी बढ़ते हैं कि उन्हें हर तीसरे दिन काटना पड़ता है। अगर बच्चे अपने नाखून बढ़ा लें तो बच्चे माता-पिता द्वारा डाँटे जाते हैं।
आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने मनुष्य की आदिम अवस्था पर प्रकाश डालते हुए नाखूनों की उपयोगिता पर गहन चिन्तन किया है। इस अवस्था में नाखून आत्मरक्षा के साधन थे। मनुष्य के लिए अपने प्रतिद्वन्द्वियों से लोहा लेते समय नाखून अत्यन्त उपयोगी थे। यों तो दाँत भी थे, किन्तु आत्म-रक्षा के सन्दर्भ में उनका स्थान बाद में था ।
मनुष्य ने अपनी आदिम अवस्था में नाखून का प्रयोग अस्त्र के रूप में किया। इसके पश्चात् उसने अपने शरीर के बाहर अस्त्र-शस्त्र खोजने प्रारम्भ किये। इस दृष्टि से उसने मिट्टी के ढेले, पत्थर और पेड़ों की डालों को अस्त्र-शस्त्र के रूप में प्रयोग किया। इसी क्रम में हड्डियों और लोहे के बने अस्त्र-शस्त्रों का निर्माण हुआ। मानव यहीं तक सीमित नहीं रहा। उसने बन्दूक, तोप, बम और वायुयानों द्वारा आत्मरक्षा की। अब इस श्रृंखला में वह एटम बम तक पहुँच गया है।
लेखक ने स्पष्ट किया है कि नाखून मनुष्य की पशुता के सूचक हैं। प्राचीनकाल में मनुष्य इनका प्रयोग हथियारों के रूप में करता था। आचार्य द्विवेदी ने प्राणि-विज्ञानियों के सन्दर्भ में अन्वेषण के आधार पर लिखा है कि प्रारम्भ में मनुष्य के पूँछ होती थी, किन्तु कालान्तर में वह गिर गयी और उसका उगना बन्द हो गया। लेखक ने आशा व्यक्त की है कि किसी दिन नाखूनों का बढ़ना भी रुक जायेगा । लेखक ने नाखूनों के बढ़ने का अर्थ पाशविकता और उनका काटना मनुष्यता के रूप में स्वीकार किया है। प्राचीनकाल में मनुष्य के लिए नाखूनों का बढ़ाना आवश्यक था, इसके समर्थन में आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने राम की वानर सेना का उल्लेख किया है। राम ने रावण से युद्ध करने के लिए जो सेना एकत्र की उसमें वानर और रीछ नहीं थे, अपितु ऐसे मनुष्य थे जो पूर्णरूप से विकसित नहीं हो पाये थे। वे वृक्षों पर और पर्वत कन्दराओं में निवास करते थे। वानरों और रीछों के समान वे अपने नाखूनों को काटते नहीं थे। एक प्रकार से नाखून उनकी आत्मरक्षा तथा शत्रु पर प्रहार करने के साधन थे ।
लेखक ने नाखूनों के विवेचन के साथ-साथ में अन्तर को भी स्पष्ट किया है। उसके अनुसार आहार-निद्रा आदि पशु मानव और पशु स्वभाव तो मानव में वैसा ही है, जैसा अन्य पशुओं में है। इतने पर भी मनुष्य और पशु में पर्याप्त अन्तर है।जिन विचारकों ने मानव शरीर का अध्ययन किया है, वे स्वीकार करते हैं कि मनुष्य कभी पशुओं के समान जीवन व्यतीत करता था। इसके प्रमाण के रूप में विचारकों ने कुछ आश्चर्यजनक बातें कही हैं। जैसे मनुष्य की पीठ में जो रीढ़ की हड्डी है, वह कमर के नीचे पीछे की ओर टूटी-सी लगती है। यह इस बात का संकेत है कि कभी मनुष्य के शरीर में पूँछ थी। इसी प्रकार मानव शरीर में हाथ-पैरों के नाखून बढ़ना इस बात के प्रमाण हैं कि मनुष्य नाखूनों से शत्रु पर प्रहार करता था। अब मनुष्य ने इतने घातक आयुध बना लिये हैं कि उसे शत्रु को नाखूनों से नोचने की आवश्यकता नहीं है, पर अब उसके नाखून बढ़ रहे हैं हाथ और पैरों दोनों के।
द्विवेदीजी के अनुसार प्राचीन ग्रन्थ कामसूत्र में नाखून का विशद वर्णन देखने को मिलता है। कामसूत्र में बताया गया है कि लगभग दो हजार वर्ष पूर्व मनुष्य अपने नाखूनों को सौन्दर्य का प्रतीक मानता हुआ उन्हें सजाता और सँवारता था। विलासिता के साधनों में नाखूनों की गिनती हुआ करती थी। प्रेम-प्रसंगों में नाखून बड़े उपयोगी माने जाते थे। प्राचीनकाल में भी मनुष्य नाखूनों को काटता अवश्य था, पर उन्हें आकर्षक ढंग से काटता था, नाखून काटने की अनेक शैलियाँ प्रचलित थीं।
लेखक ने स्वाधीनता शब्द में निहित विचार पर गम्भीरता के साथ प्रकाश डाला है। अन्य भाषाओं में यह शब्द उस अर्थ में नहीं है, जिस अर्थ में भारतीय भाषाओं में प्रयुक्त हुआ है। अंग्रेजी का शब्द 'इण्डिपेंडेन्स' अधीनता अर्थ का प्रतिपादक है। भारतीय भाषाओं में इस शब्द का पर्याय नहीं है। हमने अपनी आजादी के जितने भी नामकरण किये, उनमें 'स्व' जुड़ा हुआ है। यह 'स्व' की भावना अनायास ही नहीं आ गयी है, अपितु हमारी समूची परम्परा ही अनजाने में हमारी भाषा द्वारा प्रकट होती रही है।
प्रस्तुत निबन्ध में इन दोनों महापुरुषों के सत्य और अहिंसा विषयक विचारों पर भी प्रकाश डाला गया है। सत्य और अहिंसा द्वारा हम आज भी अपने जीवन को सुखमय बना सकते हैं। खेद है कि हमारे नेतागण सत्य, अहिंसा और प्रेम को भूलकर कुछ ऐसे नारे लगा रहे हैं, जिनसे हमारी समस्याएँ बढ़ती जा रही हैं।
लेखक यह मानता है कि आज मनुष्य का चिन्तन बदल गया है। वह अपने आपको सभ्य बताने लगा है और चाहता है कि उसे अब जंगली या असभ्य न कहा जाय। इसी कारण उसके चिन्तन में यह परिवर्तन आया है कि नाखूनों को काटकर यह सूचित करना चाहता है कि पशुता और हिंसा से उसे घृणा है। मनुष्यता का मार्ग अपनाकर ही जीवन सफल और सार्थक हो सकता है। यह चिन्तन आज के मनुष्य के जीवन में गहराई से व्याप्त हो गया है। इसी चिन्तन के कारण मनुष्य अपनी और अपने देश की सुख-समृद्धि और शान्ति की बात करने लगा है।
निबन्ध में लेखक ने यह चिन्ता प्रकट की है कि पशुता दो प्रकार से प्रकट होती है-एक तो नाखूनों के बढ़ने और दूसरी अस्त्र-शस्त्रों को बढ़ावा देने की। लेखक की धारणा है कि मनुष्य, मनुष्यता की ओर बढ़ना चाहता है,इसलिए वह नाखूनों को काटता है और अस्त्र-शस्त्रों के निर्माण पर रोक लगाने का प्रयत्न करता है। इसके साथ ही लेखक ने यह भी बताया है कि नाखूनों का बढ़ना, दाँतों का दुबारा उगना, बालों का बढ़ना आदि सहज प्रवृत्तियाँ हैं। मनुष्य का नाखून काटना इस बात का सूचक है कि वह पशुता को कम करना चाहता है। यह अलग बात है कि वह पशुता को काट नहीं पा रहा है पर उसकी यह चाह है कि पशुता कम हो और मनुष्यता का मार्ग उन्नत हो।
आचार्य द्विवेदी ने सम्भावना व्यक्त की है कि भविष्य में कोई ऐसा दिन आ सकता है, जब मनुष्य के नाखूनों का बढ़ना बन्द हो जाये। इसका तात्पर्य यह नहीं है कि मनुष्य उस समय पशु नहीं रहेगा, उसकी पशुता समाप्त हो जायेगी, आचार्य द्विवेदी को विश्वास है कि मनुष्य की पशुता कभी नहीं मिटेगी, क्योंकि वह अपनी संहार क्षमता बढ़ाता जा रहा है। यह भावना इस बात का प्रमाण है कि मनुष्य में अब भी पशुता है।
संक्षेप में कहें तो "नाखून क्यों बढ़ते हैं" मात्र एक जैविक प्रक्रिया पर लिखा गया लेख नहीं है, बल्कि यह मानव मन का एक गहरा सांस्कृतिक और नैतिक विश्लेषण है। द्विवेदी जी इस निबंध के माध्यम से यह संदेश देते हैं कि भले ही हमारी पाशविक प्रवृत्तियां (नाखूनों की तरह) बार-बार सिर उठाएं, लेकिन मनुष्य का कर्तव्य है कि वह अपनी चेतना, संयम और विवेक से उन्हें बार-बार काटता रहे ताकि संसार में प्रेम, सौहार्द और मानवता की जीत हो सके।


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