सुनीता उपन्यास की नायिका सुनीता का चरित्र चित्रण | जैनेंद्र कुमार

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सुनीता उपन्यास की नायिका सुनीता का चरित्र चित्रण जैनेंद्र कुमार जैनेंद्र जी ने सुनीता के माध्यम से भारतीय नारी के पारंपरिक और आधुनिक रूपों के अंतर्द्व

सुनीता उपन्यास की नायिका सुनीता का चरित्र चित्रण | जैनेंद्र कुमार


जैनेंद्र कुमार द्वारा रचित उपन्यास 'सुनीता' (1934) मनोविश्लेषणवादी उपन्यास विधा की एक युगांतरकारी रचना है। इस उपन्यास की केंद्रीय पात्र और नायिका सुनीता है। जैनेंद्र जी ने सुनीता के माध्यम से भारतीय नारी के पारंपरिक और आधुनिक रूपों के अंतर्द्वंद्व को बहुत गहराई से चित्रित किया है।

श्रीकांत की पत्नी 'सुनीता' जैनेन्द्र जी के इसी शीर्षक से प्रकाशित हुए उपन्यास की नायिका तो है ही, वह इस रचना का निस्संदेह प्रधान पात्र भी है। इस उपन्यास में मूलतः पुरुष और एक अन्य स्त्री-पात्र (सत्या) है। ये तीनों ही पात्र सुनीता-रूप धुरी के चतुर्दिक परिभ्रमण करते हैं। श्रीकांत इस पर इतना अधिक आश्रित है कि वह इस स्थिति में भी नहीं है कि अपने मित्र हरिप्रसन्न को अपने पास से पन्द्रह रुपये तक दे सके। सुनीता प्रयाग जाने का प्रस्ताव रखती है तो श्रीकांत तुरन्त स्वीकार कर लेता है । श्रीकान्त को सुनीता पर ऐसा अगाध विश्वास भी है कि वह उसको अपन मित्र हरिप्रसन्न के साथ घर में अकेली छोड़कर पाँच-छह दिनों के लिए लाहौर चला जाता है और वहाँ से लौटने पर सुनीता को रात्रि में भी घर पर न पाने की दशा में भी कहता है, " अवर क्वीन केन डू नो रांग ।"

इसी प्रकार हरिप्रसन्न के क्रियाकलाप में भी उसके मित्र श्रीकांत की अपेक्षा सुनीता की अधिक भूमिका है । कहा जा सकता है कि श्रीकांत तो हरिप्रसन्न के इशारों पर नाचता रहता है, जबकि सुनीता हरिप्रसन्न को बहुत कुछ अंशों में अपने इशारों पर नचाने में सफल हो जाती है। यही कारण है कि हरिप्रसन्न की इच्छा के प्रतिकूल वह उपन्यास के अन्तिम परिच्छेद में उससे यह वचन लेने में सफल हो जाती है कि वे अपने को मारेगा नहीं । जहाँ तक सुनीता की बहन सत्या का प्रश्न है, उसका उपन्यास की घटनाओं में बहुत कम योगदान है और उसकी चारित्रिक सार्थकता एक प्रकार से सुनीता को लेकर ही है। सुनीता के चारित्रिक गुण-दोषों और व्यक्तित्व पर प्रकाश डाला जा रहा है- 

वैवाहिक जीवन में असन्तोष

सुनीता का विवाह एडवोकेट श्रीकांत के साथ हुआ है । उसका वैवाहिक जीवन कुछ अंशों में सुखद नहीं कहा जा सकता । वह एक उच्चशिक्षिता युवती है और उपन्यासकार के शब्दों में- "वह तनिक भी इस तरह नहीं रहती कि लोग न समझें वह उच्चशिक्षिता नहीं है। कुछ दिनों से नौकर हटाकर घर का काम-धंधा करना शुरू कर दिया है। चौका-बासन भी करती है । हारमोनियम और वायलिन पर धूल चढ़ने देती है और पुस्तकों को भी अलमारियों में चुप लेटे रहने देती है।"
सुनीता उपन्यास की नायिका सुनीता का चरित्र चित्रण | जैनेंद्र कुमार

प्रस्तुत अवतरण उपन्यास के प्रथम परिच्छेद के प्रथम पृष्ठ से लिया गया है। इसमें उपन्यासकार यह संकेत करता है कि सुनीता के हारमोनियम और सितार पर धूल चढ़ी रहती थी और उनकी पुस्तकें भी आलमारियों में रखी रहती थीं—इस तथ्य का प्रमाण है कि वह अपने वर्तमान जीवन के प्रति किन्हीं अंशों में उदासीन रहती है।सुनीता की तरह उसका पति श्रीकांत भी कुछ ऊबा हुआ-सा गृहस्थ जीवन बिता रहा है, जैसा इस उद्धरण से स्पष्ट है— 
" श्रीकांत चाहता है घर में ऋतु बदले, नहीं तो वहाँ अलसता औरा जड़ता-सी छाती जाती है । बहुतेरी बार ऐसा हो गया है कि कमरे में होने पर भी कई मिनट तक उसे सुनीता से कहने को कुछ नहीं सूझा है और सुनीता भी चुपचाप रही है। तब दम घुट-घुट गया है। ऐसा क्यों नहीं हो जाना चाहिए, इसका कोई समर्थन, कोई कारण उसके मन में नहीं मिलता है।" 

सुनीता को ऐसी अनुभूति होती रहती है कि न जाने क्या कारण है कि कुछ दिनों से उसका पति उससे उदास रहने लगा है- जब काम खत्म हो गया, तब कमरे में आ गई। सोचने लगी कि वह तो मुझसे यों ही बिगड़ते रहते हैं, लेकिन क्या, सच, यों ही बिगड़ते रहते हैं? मैं अपने में उन्ह क्यों बाँधकर नहीं रख पाती ? मैंने इन पिछले दिनों अपने में से क्या खो दिया है कि उनके सामने फूल-सी नहीं खिल पाती हूँ।" 

उपन्यासकार की टिप्पणी अग्रांकित है-- 
"बात यह है कि पानी बहते-बहते कहीं बँध गया है। उसे खुलना चाहिए। जीवन को बहिर्गमन मिले और घर के भीतर की गृहस्थी को घर के बाहर की दुनिया का और अधिक संसर्ग और अधिक संघर्ष मिले तो शायद कुछ इसकी सृष्टि हो, चैतन्य जागे । वद्ध परिमाण, एक ही ढंग के रहने से नई समस्याएँ कहाँ से उठेंगी ?” सुनीता इस निश्चय पर पहुँचती है कि उसे अपने जीवन की खिड़कियों को खोल देना चाहिए, जिससे उसके जीवन में खूब हवा आती-जाती रहे । इस ऊब से छुटकारा पाने के लिए ही स्वयं-पति के सम्मुख यह प्रस्ताव रखती है कि इस बार दशहरे की छुट्टियों में कुम्भ के मेले में चलना चाहिए । श्रीकांत भी उसके इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लेता है और इस यात्रा से उनके जीवन में लेखक के अनुसार कुछ भराव भी आता है- "छुट्टियाँ आने पर वे चल दिये। जगह-जगह घूमे और सचमुच इससे उनके जीवन में भराव भी आने लगा। उन्हें परस्पर हँसना-बोलना अब कठिन नहीं होता है । मिलकर परामर्श करते हैं, योजनाएँ बनाते हैं। दुनिया में बाहर आकर एक को दूसरे की आवश्यकता की कीमत लगती है। संयुक्तता का स्वाद घर से बाहर मालूम होता है । घर जब सदा ही एक-दूसरे के सामने उपस्थित रहता है और जब उन्हें परस्पर के अभाव को अनुभव करने का तनिक भी अवकाश नहीं होता, तब एक की दूसरे में दिलचस्पी स्वभावत: फीकी-सी पड़ती जाती है। अब खुली दुनिया में आकर वे पग-पग पर दो के एक ही रहने की महत्ता का अनुभव करते हैं।"

उपन्यासकार ने दिखाया है कि हरिप्रसन्न द्वारा उनके घर आकर रहने लगने के पश्चात् उनके जीवन में नीरसता में कमी आ गयी थी-- 
"जीवन में एक फीकापन-सा, एक रीतापन-सा आ चला था । इस नए विषय (हरिप्रसन्न) के प्रवेश ने जैसे उसे ताजगी दी। कुछ लहरा आया, कुछ मुख्य बना कि जिस पर दो बातें हो लें। चाहे उलझें, चाहे सुलझें, पर जिसको लेकर दोनों एक-दूसरे के लिए जियें । यहाँ जीवन एकदम इतना ह्रस्व और शून्य है कि कोई उलझन, कोई आपसी खटपट भी सम्भव नहीं, वहाँ यही शुभ है कि कुछ हो जो रगड़ देकर चमकावे, चाहे अनबन ही पैदा करे । 

यहाँ सुनीता और श्रीकांत के साथ अनबन की बात तो बेकार है । फिर भी हरिप्रसन्न जो कुछ काल रह गया है, उसमें दोनों किंचित् भर आए हैं। दोनों कुछ अधिक सम्मिलित, अधिक सप्राण और जीवन के प्रति कुछ अधिक उद्यत, समर्थ और सानन्द हो गये हैं। अब बीच में बात के लिए अभाव वैसा नहीं होता।"
 

हरिप्रसन्न के सम्बन्ध में जिज्ञासा भाव

उपन्यास में सुनीता के हृदय में हरिप्रसन्न के जीवन के सम्बन्ध में जिज्ञासा-वृत्ति प्रारम्भ से लेकर अन्त तक विद्यमान रहती है । उपन्यास के प्रारम्भ में जब उसका पति श्रीकांत हरिप्रसन्न को लिखे पत्र के साथ उसका फोटो भी रखकर भेजता है तो वह इस पर विशेष ध्यान नहीं देती । जब हरिप्रसन्न के नाम लिखा गया पत्र लौट आता है और श्रीकांत उससे हरिप्रसन्न के सम्बन्ध में बातें करना चाहता है, तब भी वह इस विषय में उदासीनता ही प्रकट करती है । हाँ, जब वे दोनों कुम्भ के मेले में जाते हैं और श्रीकांत हरिप्रसन्न को किनारे की भीड़ में खड़ा बताकर यह पूछता है- 

'सुनीता, तुमने उसे देखा ? नहीं देखा । पर वह तुम्हें जरूर देख पाया होगा । क्या वह जान सका कि तुम कौन हो ? लेकिन वह साधु नहीं बन सकेगा वह साधु नहीं हो सकेगा सुनीता !"

पति द्वारा हरिप्रसन्न का बार-बार उल्लेख किये जाने के कारण सुनीता की भी उसके प्रति जिज्ञासा जाग्रत हो उठती है- "सुनीता मन-ही-मन में उस व्यक्ति को स्पष्ट करके समझना चाहती है, विपदाओं को सामने रखकर उनमें भटकने को बढ़ गया है और आराम को किनारा ही देता रहा है । वह हरिप्रसन्न के बारे में कुछ कौतूहल रखती है और मन-ही-मन उसको 'कुछ सनकी भी समझती है। उसे अवश्य उस पर करुणा होगी, ऐसा वह समझती है।उसे लगता है कि उस बेचारे को कोई भी नहीं मिली। लेकिन इस करुणा को वह अपने भीतर ही संजोये रखती है।"
 
कहा जा सकता है कि हरिप्रसन्न को बिना देखे भी उसके प्रति सुनीता के हृदय में करुणा का जो भाव जाग्रत हो जाता है, वह उत्तरोत्तर बढ़ता ही जाता है। हाँ, अपने पति को उस समय हरिप्रसन्न के बारे में ही बातें करते देखकर वह उसको झिड़कते हुए कह उठती है... 

ऐसे मौकों पर सुनीता अनायास ही ऊँची हो पड़ती है, "उसने कहा, लौटकर तुम, मैं कहती हूँ, उसकी तलाश करने जाना । नाहक पहले से फिक्र बाँधकर क्या होगी ?" कारण यह था-- सुनीता न चाहती थी कि हरिप्रसन्न को लेकर श्रीकांत अपने शब्द व्यय करे। इस प्रकार के शब्दों से हरिप्रसन्न उसके निकट कुछ अधिक रहस्यमय, अधिक ओझिल, अधिक दूर ही बनता था, स्पष्ट नहीं बनता था और वह स्पष्ट मूर्त रूप में उसको चाहती थी। उसके मान के लिए वह एक खिलौना, एक गोरखधंधा बन गया था, जिसके साथ मन कभी-कभी खेल सकता था । उनकी रूपरेखा—परिभाषा न दे पाती थी । वह श्रीकांत से इस बारे में बिल्कुल बात करना नहीं चाहती थी । वह अपनी जिज्ञासा को अपने से बाहर तक भी नहीं करना चाहती थी। फिर भी वह किसी तरह पा लेना चाहती थी कि इस हरिप्रसन्न नाम के अनोखे बालक जीव की माँ भी है अथवा नहीं ! है तो उस माँ का वह क्या करता है ! बहिन है या नहीं ! बहिन है, तो वह भाई को गँवाकर क्या करती है ? उसके अगर भाई बन्धु हैं तो वे कैसे हैं ? अपनी कल्पना से इन सब जिज्ञासाओं को पैदा करके वह इनका उत्तर बना-बनाकर अपने को दे लेती है ।"

सुनीता हरिप्रसन्न के रहस्यपूर्ण व्यक्तित्व के सम्बन्ध में कल्पना किया करती थी कि उसके “दो बहिनें हैं, तीन भाई हैं, माँ बुढ़िया है आदि। पर वे ही उत्तर उसे कभी नितांत अप्रामाणिक भी लगते हैं और फिर जिज्ञासा पंख उठाती है। हरिप्रसन्न के भाई-बहिन हैं? इन सबको छोड़कर हरिप्रसन्न तो तब कहाँ है ! और जहाँ है वहाँ क्यों है ? वह कैसे रहता है ? और जैसे रहता है, वैसे क्यों रहता है ? आदि ।"
 
अभिप्राय यह है कि हरिप्रसन्न से साक्षात्कार होने से पूर्व ही सुनीता उसके रहस्यमय व्यक्तित्व के प्रति इतनी अधिक जिज्ञासा रखती थी कि जब उसको श्रीकांत घर ले आता है तो वह उसके रहस्यावरण को हटाकर उसके असली रूप को समझने की ओर निरन्तर प्रयत्नशील रहती है और इस प्रयास में अंततः उसका यह प्रस्ताव भी स्वीकार कर लेती है कि वह क्रांतिकारियों के दल की नेत्री बन जाये । 

घर की देख भाल में प्रमुख भूमिका

यह सत्य है कि सुनीता का पति श्रीकांत वकील है, तथापि जहाँ तक गृहस्थी को चलाने का प्रश्न था, उसकी पूर्ण रूपेण, स्वामिनी सुनीता ही थी। खर्चे को घटाने के लिए उसके पति ने नौकर को हटा तो दिया था, किन्तु इस तथ्य को लेकर वह उसको बराबर उपालम्भ देती रहती थी। हरिप्रसन्न के आने पर उसके लिए फल लाने की समस्या उठती है तो वह कमरे की सफाई करती दशा में दीख जाने की खीझ उतारती हुई कह उठती है—
 
"नौकर कोई मैं अपने लिए चाहती हूँ ? कोई मैं यह हालत पसन्द करती हूँ कि एक आदमी मालिक हो और दूसरा नौकर हो ? क्या मैं यह नहीं जानती कि संब आदमियों के जी है और नौकर के भी जी होता है ? चौका-बासन के लिए या अपने किसी काम के लिए मुझे नौकर नहीं चाहिए। अब देखो, खुद बाजार दौड़ गये हैं । वह आये हुए हैं—-उनके साथ कुछ बैठते-बतलाते और नौकर होता तो दस काम सँभाल लेता । कुछ कहो, मैं हाथ बँटाने के लिए एक नौकर जरूर रख लूँगी। धोती का फेंटा कसी मुझे देखकर वह मन में कहते होंगे" वह फल लेकर लौटे श्रीकांत के आने पर भी सुनीता कहती है- देखो नौकर होता तो इन्हें क्यों भोगना पड़ता और मुझे कहते हैं। मैं नौकर के बिना नहीं रह सकती ।"

यह सच है कि अपने पति की बात मानकर उसने नौकर नहीं रखा था, किन्तु घर के आय-व्यय का सारा उत्तरदायित्व सुनीता ही निभाते मिलती है । श्रीकांत तो इस मामले में उसका इतना मोहताज है कि हरिप्रसन्न को अपने पास से पन्द्रह रुपये तक नहीं दे सकता । वह हरिप्रसन्न से स्पष्ट कह देता है-- "पन्द्रह रुपये ! हाँ, हाँ, हाँ। लेकिन इनके लिए उन्हीं से कहना होगा। इतनी बड़ी रकम तो वह मेरे हाथ में कभी नहीं रहने देतीं । तुम्हें इन्कार न करेंगी।" 

भोजन के उपरान्त जब हरिप्रसन्न श्रीकांत से पन्द्रह रुपये देने की बात दोहराता है तो उसका पुनः उत्तर है कि वह उसकी पत्नी को चौका बरतन से निबट लेने दे । हरिप्रसन्न आपत्ति करता है कि इस बारे में उनसे कहने की क्या आवश्यकता है ?
तो श्रीकांत का उत्तर है--- 
श्रीकांत ने हँसकर कहा, "खजांची, मुनीम और मालिक तीनों वही है। मैं कहाँ से पाऊँगा ।" 
सुनीता पन्द्रह रुपये श्रीकांत को देते हुए यह समझदारी प्रदर्शित करती है, "देखो यह मत जताना कि मुझे कुछ भी मालूम है, या रुपये मुझसे लाए हो।" इस सम्बन्ध में पूछे जाने पर वह स्पष्ट करती है, "तुम्हीं सोचो, अपनी गर्जमन्दी का प्रकट होना किसको अच्छा लगता है ?" 
सुनीता पन्द्रह रुपये तो आसानी से दे देती है, किन्तु जब उसको श्रीकांत द्वारा यह सूचना दी जाती है कि हरिप्रसन्न को सौ रुपयों की आवश्यकता है, तो वह बिगड़ उठती है- 
नहीं कोई-सौ-सौ रुपये नहीं हैं।" 
श्रीकांत कहने को हुआ— 'सुनी।' 
"नहीं, वह अभी कहीं नहीं जायेंगे। कह दो, हमारे पास फालतू रुपया नहीं है।" 
श्रीकांत ने कहा-'सुनीता' । 
"" 
'वह घर पर आराम से रहे क्यों नहीं ? हम कोई महाजन नहीं हैं । 
"तो मैं कह दूँ रुपया नहीं है ।" 
"हाँ कह दो, फिजूल बात के लिए पैसा नहीं है। सत्या को पढ़ाएँ तो पैंतालीस-चालीस जितना चाहे माहवार वह ले लें, पता तो हो कि रुपया कहाँ जाता है। कहते हो कि दुबले दीखते हैं। तो फिर किस पेट को भरने के लिए यह पैसा है, जानूँ तो । " 
तथा 
"सुनने की कोई बात नहीं है । कह दो उन्हें कहीं जाने की जरूरत नहीं है । वह क्यों भटकते हैं ? कह दो भटकना है तो हम कोई बैंक नहीं हैं।"

हाँ, जब स्वयं हरिप्रसन्न उससे रुपयों की माँग करता है तो वह उसको स्पष्ट इन्कार नहीं कर पाती और घर में नकद रुपये न होने की बात बताते हुए उसको अपनी सोने की चूड़ियाँ दिखाकर पूछती है कि क्या इनसे आपका काम चल सकेगा ? अंततः वह हरिप्रसन्न के लिए रुपयों का प्रबन्ध इस रूप में करवाती है कि स्वयं-पति से उसको सौ रुपये का चैक दिलवा देती है।

हरि के प्रति करुणा और श्रद्धा की भावना

सुनीता के हृदय में प्रारम्भ में हरिप्रसन्न के प्रति जिज्ञासा की भावना होती है जो शनैः-शनैः उसके प्रति करुणा, श्रद्धा और सम्मान की भावना में परिणत हो जाती है । अपने पति के मुख से उसने हरिप्रसन्न के सम्बन्ध में जो रहस्यपूर्ण बातें सुनी हैं, उन्हें सुनकर प्रारम्भ में वह यह जानना चाहती है कि यह व्यक्ति जीवन से इस प्रकार विमुख क्यों रहता है ?–यह जान-बूझकर आपत्तियों को निमंत्रण क्यों देता रहता है ? हाँ जैसे ही हरिप्रसन्न उसके सम्पर्क में आता है, सुनीता उसके प्रति किन्हीं अंशों में करुणा और सम्मान की भावना व्यक्त करने लगती है । जब वह यह देखती है कि दाढ़ी के कारण हरिप्रसन्न की आकृति अच्छी नहीं लगती तो वह अपने पति पर यह दवाब डालती है कि वह उसकी दाढ़ी साफ करवा दे । भोजन के सम्बन्ध में पूछे जाने पर जब उसे यह बताया जाता है कि हरिप्रसन्न अन्नाहार नहीं करता है, तो भी वह यह सहिष्णुता दिखाती है कि उसको जबरदस्ती अन्नाहार न कराया जाए। हरिप्रसन्न को भोजन कराते समय वह उसकी भावनाओं का जिस प्रकार समादर करते हुए उसके प्रति चिंता व्यक्त करती है, वह इस तथ्य का प्रमाण है कि उसके हृदय में उसके प्रति करुणा-श्रद्धा का संचार हो उठा है- 
"रोटी शायद आपको अच्छी नहीं मालूम होती है ?" 
उसने जल्दी से कहा, "नहीं नहीं, ।' 
'तो आप खा क्यों नहीं रहे हैं ? न आदत हो तो जाने दीजिए, फल तो हैं ?" वह आगे कहती है— 
"क्या मैं समझें, आप आते रहेंगे। (श्रीकांत की ओर संकेत करके) यह बहुत अकेले रहते हैं और आपको बहुत याद करते थे ।" 
यह जानकर कि हरिप्रसन्न के लिए तीस-पैंतीस रुपये माहवार की व्यवस्था करनी है तो वह यह प्रस्ताव रखती है कि यदि वे उसकी छोटी बहिन सत्या को पढ़ा दिया करें तो यह प्रबन्ध आसानी से हो सकता है। हरिप्रसन्न श्रीकांत से तो इस विषय में इन्कार कर देता है, किन्तु सुनीता के आग्रह की उपेक्षा नहीं कर पाता है। जब श्रीकांत उसको यह बताता है कि हरिप्रसन्न सत्या को नहीं पढ़ा पाएगा, तो 'क्या' ? प्रश्न करती हुई सुनीता हरिप्रसन्न की ओर देखती है। इस पर हरिप्रसन्न की जो दशा हो जाती है, उसको उभारते 
हुए उपन्यासकार ने दिखाया है— 
"हरि को जाने क्या होने लगा ? सुनीता के अधिकार-भाव में जैसे ऐसी निरर्थकता है कि उसमें आपत्ति उठाने की जगह हरि के लिए भी नहीं है। मैं चाहती हूँ ? तब भी यह न होगा ? क्यों जी अब भी तुम कह सकते हो, 'न होगा ?' अब जरा कहिए तो कि 'न होगा ।' यह कहती हुई उन आँखों की ओर देख-देखकर हरि जाने क्या होता गया । उसने कहा- भाभी मैंने इन्कार तो नहीं किया ।" 
सुनीता भी इस अवसर पर उसको आपके स्थान पर तुम कहकर सम्बोधित करती हुई कहती है- " तुम इन्कार करना भी क्यों चाहोगे ?" इसी प्रकार वह हरिप्रसन्न को सिनेमा देखने के लिए भी यह कहकर बलात् तैयार कर लेती है कि "तो तमाशे में हम चल रहे हैं न ?" 
सिनेमा देखने के पश्चात् वह इस तथ्य को बल देती है कि कल हरिप्रसन्न को दोपहर का भोजन उन्हीं लोगों के यहाँ करना है और सत्या को पढ़ाना प्रारम्भ कर देना है। हरिप्रसन्न का यह कथन सुनकर कि आप यही समझिए कि मैं आऊँगा और यदि न आ सकूँ तो क्षमा करने के लिए प्रस्तुत रहिएगा, उसका उत्तर होता है- 

और नहीं तो क्या दण्ड देने का अधिकार मुझे मिला है, क्षमा नहीं करूँगी ? हाँ, अगर आप कहें कि दण्ड मैं आपको दे सकती हूँ, तो अवश्य क्षमा करना मैं आपको पसंद न करती ।" 
सुनीता उसके साथ अपनी बहिन सत्या का विवाह कराने की भी अभिलाषा सँजोने लगती है और उसके हृदय की वेदना के सम्बन्ध में चिंतातुर रहती है- 
'उसका हृदय उसे बताता था कि वह आदमी हरिप्रसन्न जितना है, उतना ही नहीं है । साहसिक हो जाने पर भीरु भी है । निश्चित दीखता है, पर वेदना से अछूता भी नहीं है। उसमें वेदना है, वेदना है—सुनीता का मन उसे दो-दोहराकर मानो यह सूचना देता था। किसको लेकर वह वेदना है ? इस बारे में भी जैसे उसके भीतर कुछ अनुमान था । फिर भी मानो उसका पूरी तरह लेखा-जोखा वह खोज लेना चाहती थी।"
 

पातिव्रत्य के प्रति शंकालु दृष्टिकोण

सुनीता आधुनिक काल की सुशिक्षिता युवती है, अतः पातिव्रत्य की मर्यादा के प्रति उसके हृदय में परम्परागत नारियों जैसी श्रद्धा-भावना नहीं है। मीराबाई सम्बन्धी चित्र को देखने से यह तथ्य प्रखर रूप से उभर उठा है । एक ओर तो वह मीराबाई को इस तथ्य के लिए दोष नहीं दे पाती कि उसने अपने पति की आज्ञा का उल्लंघन क्यों किया था, जबकि दूसरी ओर वह उसके पति के प्रति भी इस दृष्टि से संवेदना की भावना रखती है कि उनका मीरा के प्रति रुष्ट रहना स्वाभाविक ही था ।"
 
अपनी इस द्विधामयी मनःस्थिति के कारण ही जब श्रीकांत उससे यह कहता है, तुम कह सकोगी क्या कि राणा के प्रति मीरा ने अन्याय नहीं किया ? कि राणा के प्रति मीरा ने अप्रेम भाव नहीं दरसाया ? अप्रेम अन्याय है", तो सुनीता का उत्तर है-

"मैं तो इतना ही कहती हूँ कि राणा ने अन्याय नहीं किया। यह मैं राणा की ओर से भी कहती हूँ मीरा की ओर से भी कहती हूँ। राणा के मन की व्यया की ज्वाला में जिन कृत्यों को क्रूर कर जावे, वे ऐसे भस्म हो जाते हैं, जैसे यज्ञ में समिधा । मैं तो राणा के साथ रो सकती हूँ, पर मीरा के साथ भी मुझे इजाजत दे दो कि मैं रोना चाह लूँ । मीरा के मन को जानने पर मीरा को दण्ड देने योग्य जी नहीं रक्खा जायेगा ।" 

हरिप्रसन्न के प्रति कामासक्ति

सुनीता का हरिप्रसन्न की ओर आकर्षण अंतत: कामासक्ति की सीमा तक पहुँचता है। उसके इस कामाकर्षण के मूल में कुछ उसके पति श्रीकांत मूर्खता की सीमा तक पहुँची सरलता का कारण है और कुछ हरिप्रसन्न के द्वारा मातृभूमि के लिए अपना जीवन न्यौछावर कर देने की उदात्त लालसा के प्रति श्रद्धा-भाव का कारण है । एक बार वह हरिप्रसन्न से पूछ ही लेती है कि क्या तुम मुझसे भागकर दूर जाना चाहते हो ? यदि ऐसी बात है तो मुझसे भी कह दो, जिससे मैं भी तुमसे दूर भाग जाऊँ। वह उससे व्यंग्यपूर्वक कहती है कि शायद तुम यह कहना चाहते हो कि यदि मैं नहीं भागती तो प्रलय होगी। अच्छी बात है, मैं भाग जाती हूँ। 

संक्षेप में कहा जा सकता है कि सुनीता इस उपन्यास का केन्द्रीय पात्र है और इस उपन्यास की कथावस्तु के विकास में वही प्रधान कारण है । वह जैनेन्द्र जी की अन्य नायिकाओं की भाँति किन्हीं अंशों में नैतिकता-अनैतिकता के चक्कर में स्वयं को समझने वाली युवती है। अपने पति की इच्छा से वह उसके मित्र हरिप्रसन्न से यह वचन मुक्त लेने में तो सफल हो जाती है कि वह जान-बूझकर स्वयं को नहीं मारेगा ? हाँ, जिस रूप में वह अपने वैवाहिक जीवन बन्धन को तोड़कर क्रांतिकारियों की नेत्री बनना स्वीकार करती है तथा उसके सम्मुख वस्त्रहीन तक हो जाती है, उसके इस आचरण को निन्दनीय ही कहा जायेगा।

इस प्रकार कहा जाए तो सुनीता जैनेंद्र के उपन्यासों की एक ऐसी अनूठी नायिका है जो पारंपरिक सतीत्व के बंधनों को तोड़कर एक व्यापक मानवीय धरातल पर खड़ी होती है। वह केवल एक गृहस्थ स्त्री नहीं है, बल्कि पुरुष के अहंकार को पिघलाने वाली और उसे जीवन की नई दिशा देने वाली एक शक्ति है। वह पवित्रता, साहस, त्याग और मनोवैज्ञानिक जटिलता का एक अनूठा मिश्रण है।

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