सुनीता उपन्यास का सारांश जैनेंद्र कुमार सुनीता जैनेंद्र कुमार द्वारा रचित हिंदी का एक प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक उपन्यास है, जो सन् 1934 में प्रकाशित है
सुनीता उपन्यास का सारांश | जैनेंद्र कुमार
सुनीता ,जैनेंद्र कुमार द्वारा रचित हिंदी का एक प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक उपन्यास है, जो सन् 1934 में प्रकाशित हुआ था। यह उपन्यास प्रेम, विवाह, स्वतंत्रता संग्राम और स्त्री-पुरुष के मानसिक द्वंद्व की जटिलताओं को रेखांकित करता है।
'सुनीता' जैनेन्द्र जी का मनोवैज्ञानिक उपन्यास है । इसका कथानक पर्याप्त विशाल है। इसके कथानक को संक्षेप में प्रस्तुत किया जा रहा है -
- श्रीकांत और हरिप्रसन्न की मित्रता- हरिप्रसन्न उसी कॉलेज में पढ़ता था, जिसमें श्रीकांत अध्ययन कर रहा था । हरिप्रसन्न के परोपकारी स्वभाव ने श्रीकांत को बहुत प्रभावित किया। श्रीकांत और हरिप्रसन्न परस्पर घनिष्ठ मित्र बन गये।हरिप्रसन्न साधनहीन था, उसकी पढ़ाई का खर्चा श्रीकांत ने ही वहन किया। कॉलेज से निकलकर हरिप्रसन्न ने एल एल. बी. करके विवाह किया और वकालत प्रारम्भ कर दी। श्रीकांत का विवाह पढ़ी-लिखी युवती सुनीता से हुआ। कॉलेज से निकलकर हरिप्रसन्न क्या कर रहा है ? इसका भी श्रीकांत को पता चलता रहा। हरिप्रसन्न का एक निश्चित पता था । वहाँ से श्रीकांत के पत्रों के उत्तर आते रहते रहते थे ।
- श्रीकांत क्रान्तिकारी-कॉलेज से निकलने के बाद हरिप्रसन्न एक षड्यन्त्र के विस्फोट में पकड़ा गया । हरिप्रसन्न को इस षड्यन्त्र में दो वर्ष की जेल हुई। इसके बाद हरिप्रसन्न को महात्मा गाँधी के असहयोग आन्दोलन में कई बार जेल हुई। दो वर्ष तक हरिप्रसन्न के पत्र आते रहे। इसके बाद श्रीकांत ने पत्र लिखे, वह डी. एल. ओ. की मुहर लगकर लौट आया ।
- हरिप्रसन्न प्रयाग में कुम्भ के मेले में दिखा -विवाह के कुछ वर्ष पश्चात् श्रीकांत और उसकी पत्नी प्रयाग के कुम्भ के मेले में गये। ये दोनों नाव में बैठे संगम की ओर जा रहे थे, तभी श्रीकांत को यमुना तट की भीड़ में हरिप्रसन्न दिखाई दिया। उसने हरिप्रसन्न को आवाज दी, पर नाव तट से बहुत दूर थी। उस समय हरिप्रसन्न के दाड़ी, मूँछ और सिर के बाल बढ़े हुए थे। कपड़े भी साधुओं जैसे थे । श्रीकांत का विश्वास था कि हरिप्रसन्न साधु नहीं हो सकता है
- हरिप्रसन्न मिला— श्रीकांत का विवाह दिल्ली निवासी की पुत्री सुनीता से हुआ था । श्रीकांत ने दिल्ली में वकालत प्रारम्भ की और मकान किराये पर लेकर रहने लगा । श्रीकांत अपना बचा हुआ समय जल्सों, कॉन्फ्रेंसों में बिताने लगा। एक शाम कॉन्फ्रेंस के बाहर भीड में श्रीकांत को हरिप्रसन्न मिल गया । हरिप्रसन्न श्रीकांत के घर नहीं जाना चाहता था, पर श्रीकांत आग्रह करके उसे अपने घर ले आया ।
- हरिप्रसन्न श्रीकांत के घर रहने लगा— श्रीकांत के विशेष आग्रह पर हरिप्रसन्न अपना सामान मन्दिर से उसके घर ले आया। श्रीकांत के आग्रह पर हरिप्रसन्न ने दाढी-मँछ भी कटवा ली और ठीक से रहने लगा। उसने श्रीकांत से पन्द्रह रुपये माँगे। सुनीता रुपये नहीं देना चाहती थी, पर श्रीकांत के आग्रह पर उसने हरिप्रसन्न को रुपये दे दिये । जिस कमरे में हरिप्रसन्न ठहरा था, उसमें श्रीकांत तथा सुनीता का एक फोटो फ्रेम किया हुआ लगा था । एक दिन हरिप्रसन्न ने उसे देखकर कहा कि फोटोग्राफर ने यह फोटो ठीक नहीं खींचा है। इसमें श्रीकांत का चेहरा भद्दा लग रहा है हरिप्रसन्न उस फोटो को ले गया और उसे सुधार कर लाया तो उसकी सुन्दरता बढ़ गयी थी। हरिप्रसन्न एक अच्छा फोटोग्राफर और चित्रकार है, यह जानकर सुनीता के मन में उसका आदर बढ़ गया ।
- हरिप्रसन्न के विवाह का प्रयत्न- श्रीकांत और सुनीता यह चाहने लगे कि हरिप्रसन्न विवाह करके घर बसा ले और आराम से रहने लगे । उन्हें हरिप्रसन्न में ऐसे अनेक गुण मालूम हुए, जिनके सहारे वह अपनी जीविका ठोस रूप से कमा सकता है। सुनीता की छोटी बहन सत्या थी । सत्या इण्टर में पढ़ती थी। वह सुन्दर भी थी । सत्या गणित में कमजोर थी। सत्या के पिता चाहते थे कि कोई उसे ट्यूशन पढ़ा दिया करे । श्रीकांत के पूछने पर सुनीता ने बताया कि मेरे पिता एक घण्टा पढ़ाने के तीस पैंतीस रुपये महीना दे सकते हैं । इससे श्रीकांत को बहुत प्रसन्नता हुई । उसने सोचा कि इस तरह हरिप्रसन्न एक जगह बँधकर रहेगा और अपना खर्च भी चला लेगा। श्रीकांत और सुनीता ने यह भी सोचा था कि ट्यूशन पढ़ाते और पढ़ते समय अगर सत्या और हरिप्रसन्न पास-पास आ गये तो दोनों का विवाह कर दिया जायेगा ।
- राजरानी, मीरा फिल्म देखना-श्रीकांत फिल्म देखने का शौकीन नहीं था । सहसा उसने कहा कि एक सिनेमाहॉल में राजरानी, मीरा फिल्म लगी है, उसे देखने चलेंगे । सत्या भी हमारे साथ चलेगी। यह कहकर श्रीकांत सत्या को बुलाने चला गया और सुनीता से कह गया कि हरिप्रसन्न आये तो उसे रोक लेना और श्रीकांत सत्या को लेकर आया । श्रीकांत ने सत्या को ट्यूशन पढ़ाने के बदले पैंतीस रुपये मासिक मिलने की बात कही तो हरिप्रसन्न सहमत नहीं हुआ। सुनीता के जोर देने पर वह सत्या को पढ़ाने पर सहमत हुआ और सिनेमा देखने के लिए भी राजी हो गया। इस तरह सुनीता का आकर्षण हरिप्रसन्न के प्रति और हरिप्रसन्न का सुनीता के प्रति हुआ ।
- सत्या की शैतानी-सत्या हरिप्रसन्न से पढ़ना नहीं चाहती थी। उसने अपनी पुस्तक के आठ-दस पन्ने फाड़कर फेंक दिये। उसने सोचा था कि वह पढ़ने से बच जायेगी। वह विवश होकर अपनी बड़ी बहिन सुनीता के आदेश के अनुसार हरिप्रसन्न के पास गयी। हरिप्रसन्न ने उसकी पुस्तक खोलकर देखी और फटे हुए पृष्ठों के विषय में बोला" अरे ! पुस्तक फटी हुई है ।" सत्या कुछ नहीं बोली। हरिप्रसन्न ने उससे कहा कि मैं इस पुस्तक को देखने के बाद निश्चय करूँगा कि आपको पढ़ा सकता हूँ या नहीं । सत्या को लगा कि उसे मुक्ति मिल गयी है। वह अपनी बहिन सुनीता के पास चौके में लौट गयी ।
- हरिप्रसन्न द्वारा श्रीकांत से सौ रुपये माँगना-हरिप्रसन्न जिस समय अपना सामान मन्दिर से लेकर श्रीकांत के घर पर आया था, उस समय वह अकेला था। उसकी पत्नी और सत्या अपनी माँ के घर इसलिए चली गयी थीं कि उनकी माता की तबियत खराब थी । हरिप्रसन्न ने श्रीकांत से सौ रुपये माँगे तो उसने पत्नी से पूछने की बात कही । हरिप्रसन्न को विचित्र लगा । अगले दिन जब सुनीता और सत्या आ गयीं, तब उसने श्रीकांत से फिर रुपये माँगे । श्रीकांत गाड़ी पर बैठा हवा खाने चला गया, तब हरिप्रसन्न ने सुनीता से रुपये माँगे । श्रीकांत के लौटने पर सुनीता ने उससे कहा कि घर में सौ रुपये नहीं हैं । इन्हें चैक देंगे । सत्या के साथ पढ़ने वाला लड़का चन्द्रसेन वह चैक लेकर चला गया ।
- श्रीकांत का लाहौर जाना—हरिप्रसन्न एक चित्र बनाने में लगा था । चित्र बनाने का सामान उसने श्रीकांत से ही मँगवाया था। वह चित्र पूरा नहीं हुआ था कि सहसा श्रीकांत ने अपनी पत्नी सुनीता से कहा कि मुझे एक मुकद्दमे के सम्बन्ध में तीन चार दिन के लिए लाहौर जाना है । सुनीता ने न जाने का आग्रह किया, पर श्रीकान्त ने अपनी विवशता बतायी। साथ ही आग्रह किया कि वह हरिप्रसन्न को घर से न जाने दे ।
- हरिप्रसन्न का सुनीता को क्रांतिकारियों के दल में ले जाने का प्रस्ताव — हरिप्रसन्न चित्र पूरा करके श्रीकांत के घर से जाना चाहता था । सुनीता ने इसका विरोध किया। श्रीकांत ने भी हरिप्रसन्न से कहा कि वह यहाँ से न जाये। साथ ही उसने ही हरिप्रसन्न को आश्वासन दिया कि वह तीन दिन में लौट आयेगा साथ यह भी कहा कि वह सत्या को पढ़ाता रहे । श्रीकांत लाहौर चला गया तो हरिप्रसन्न और सत्या के बीच घनिष्ठता बढ़ी । दोनों एक-दूसरे से प्रभावित होने लगे। श्रीकांत चला गया। चौथे दिन उसका पत्र सुनीता को मिला । उसने पत्र द्वारा बताया था कि उसे लाहौर में कुछ दिन अधिक रुकना पड़ सकता है । एक दिन हरिप्रसन्न ने सुनीता से आग्रह किया कि वह उसके साथ रात में क्रांतिकारियों के दल में चले और उनका नेतृत्व स्वीकार कर ले। उन्हें किसी देवी के नेतृत्व की आवश्यकता है। सुनीता ने हरिप्रसन्न का आगह स्वीकार कर लिया। कार से रात में क्रांतिकारियों के सामने पहुँचने का निश्चय हुआ। घर से कार में जाते वक्त सुनीता को लोग न देखें, इसलिए हरिप्रसन्न ने कहा कि हम लोग सिनेमा देखने चलें । वहाँ से बहुत से लोग रात में जायेंगे। इस प्रकार हम पर किसी का ध्यान नहीं जायेगा । सुनीता ने अपने सिनेमा जाने की बात बताकर सत्या से अपने घर जाने को कहा । सत्या ने भी सिनेमा चलने को कहा तो सुनीता को बताना पड़ा कि वह रात में हरिप्रसन्न के साथ कहीं जायेगी । सुनीता और हरिप्रसन्न का क्रांतिकारियों से मिलने चलना-सुनीता कार में बैठी थी और हरिप्रसन्न उसे चला रहा था। एक स्थान पर एक आदमी कार के नीचे आता-आता बचा । हरिप्रसन्न और सत्या दोनों ने पहचान लिया कि वह श्रीकांत था, पर कार रुकी नहीं ।
- खतरे का संकेत-हरिप्रसन्न जिस कार को चला रहा था, वह जब जंगल में पहुँची तो दूर लाल प्रकाश दिखाई दिया। श्रीकांत ने कार एक ओर खड़ी करके सुनीता से कहा- " अभी हम लोग उस दल तक नहीं जा सकते। यह लाल रोशनी संकेत कर रही है कि पुलिस से खतरा है। हम लोग इन्हीं झाड़ियों में छिपकर किसी पत्थर पर बैठते हैं। सनीता और श्रीकांत पैदल चलते हुए एक स्थान पर पहुँचे। जहाँ झाड़ियों में भी छिपी एक ऐसी चट्टान थी, जहाँ सोया जा सके। हरिप्रसन्न ने वहाँ जाकर सुनीता से कहा कि वह यहाँ बैठे या सोये। मैं कुछ दूर पर रहूँगा। उसने सुनीता को आश्वस्त किया कि वह डरे नहीं, उसे कोई हानि नहीं पहुँचा सकता । इतना कहकर हप्रिसन्न कुछ दूर वाले पेड़ पर चढ़कर बैठ गया । सुनीता कुछ देर तक बैठी रही। इसके बाद पत्थर पर लेट गयी और उसे नींद आ गयी।
- हरिप्रसन्न के मन का विकार—हरिप्रसन्न कुछ समय से सुनीता को भाभी न कहकर केवल सुनीता कहने लगा था । उसका मन सुनीता के सौन्दर्य के प्रति आकर्षित होने लगा था। विवश होकर हरिप्रसन्न सुनीता के पास आया और उसे देखने लगा। इसके बाद वह सुनीता के पास बैठ गया और उसके शरीर पर हाथ फिराने लगा । सुनीता आँखें बन्द किये अपने शरीर पर हरिप्रसन्न के हाथ का स्पर्श अनुभव करती रही। इसके बाद उसने आँख खोलकर कहा- "हरि बाबू ! तुम क्या चाहते हो ? हरिप्रसन्न ने उत्तर दिया “मैं तुमको चाहता हूँ। समूची तुम को चाहता हूँ।” इसे सुनकर सुनीता ने कहा-"मैं तो तुम्हारे सामने हूँ, मुझे ले क्यों नहीं लेते हो ?" इतना कहकर सुनीता उठ खड़ी हुई, जिससे उसकी साड़ी उसके कंधे से नीचे सरक गयी। इसके बाद सुनीता ने अपने शरीर से साड़ी हटाना प्रारम्भ किया। सुनीता ने यह कहते हुए कि यह साड़ी मेरी नहीं है, पूरी साड़ी अपने शरीर से अलग कर दी । हरिप्रसन्न मना करता रहा, पर सुनीता ने अपना ब्लाऊज़ अलग करने के बाद अपनी बॉडी भी शरीर से अलग करनी चाही । जब शरीर से बॉडी अलग नहीं हुई तो सुनीता ने उसे फाड़कर अपने शरीर से अलग कर दिया । सुनीता की यह स्थिति देखकर हरिप्रसन्न ने अपनी दोनों आँखें हाथों से बन्द कर लीं । हरिप्रसन्न के मुख से शब्द नहीं निकले। सुनीता कहती रही- "हरि ! मुझे लो, मुझे पाओ ।" हरिप्रसन्न धीरे-धीरे दूर चला गया । सुनीता उसी नग्न अवस्था में वहाँ कुछ देर बैठी रही। इसके बाद उसने अपने वस्त्र पहने तथा फटी हुई बॉडी को तह करके रख लिया । जब दिन निकलने का समय हुआ तो सुनीता ने चलने की बात कही । हरिप्रसन्न कार के पास आकर आगे बैठा । सुनीता पीछे बैठी । मोटर चल पड़ी। सुनीता का घर आ गया तो वह कार से उतर कर हरिप्रसन्न से बोली- "आप आयेंगे ?" हरिप्रसन्न ने कहा- "भाग्य लाया तो आऊँगा । " सुनीता ने कहा-"अगर तुम मुझसे प्रेम करते हो तो कहो कि अपने को नहीं मारोगे ।" हरिप्रसन्न ने कहा- "नहीं मारूँगा ।" इसके बाद सुनीता बोली- "जिससे मैं कहूँगी, उससे विवाह कर लोगे।" हरिप्रसन्न ने स्वीकार नहीं किया और कार की ओर बढ़ा। सुनीता अपने घर में चली गयी ।
- श्रीकांत का लाहौर से लौटना-जिस रात हरिप्रसन्न और सुनीता को जंगल में जाना था, उसी रात से पहले शाम के समय श्रीकांत लाहौर से दिल्ली लौट आया । वह हरिप्रसन्न के लिए फल खरीद रहा था तभी सत्या अपनी गाड़ी पर वहाँ आ गयी। उसने सोचा, अगर ये इस समय घर गये तो अनर्थ हो जायेगा । वह आग्रह करके श्रीकांत को अपने घर ले गयी। हरिप्रसन्न उसके घर कुछ देर रुक कर अपने घर जाने का आग्रह करने लगा तो सत्या ने श्रीकांत को सितार बजाकर सुनाया । इसके बाद श्रीकांत ने जाने की बात कही तो सत्या बोली- जीजा जी ! क्या मैं आपको अच्छी नहीं लगती जो आप मुझसे दूर भाग रहे हैं । आप आज यहीं पर सोइए।" श्रीकांत को सत्या की बात माननी पड़ी। वह उसी के घर अर्थात् अपनी ससुराल में ही सो गया। जब घर के सभी लोग सो गये तो श्रीकांत घर से बाहर निकला और दरवाजे पर रहने वाले जमादार से कहा- "हम बाजार जा रहे हैं, दस-बीस मिनट में लौट आयेंगे । दरवाजा बन्द मत करना । " श्रीकांत जब अपने घर पहुँचा तो देखा कि वहाँ ताला लगा हुआ है। उसकी समझ में कुछ नहीं आया । कुछ देर रुक कर वह अपनी ससुराल में आ गया। श्रीकांत जब लौटकर अपनी ससुराल पहुँचा उस समय सत्या जाग रही थी। सवेरे जब श्रीकांत सोकर उठा तो सत्या को उसके मुँह पर सन्देह की छाया नहीं दिखी। इससे सत्या को सन्तोष हो गया कि उन्हें जीजी के रात में जाने की बात नहीं मालूम है।
- श्रीकांत का अपने घर जाना-ससुराल की गाड़ी पर बैठकर श्रीकांत अपने घर आया । श्रीकांत ने जब हरिप्रसन्न के विषय में पूछा तो सुनीता ने कहा कि वे चले गये। वे मेरे रोकने से नहीं रुके। इसके बाद सुनीता अपने घर का काम करती रही ।. श्रीकांत ने उससे कहा कि हरिप्रसन्न जो तस्वीर छोड़ गया है, उसे फ्रेम कराके हम अपने स्टडी रूम में रखेंगे, जिससे हरिप्रसन्न की याद आती रहे। सुनीता उसे सुनकर कुछ नहीं बोली ।
इस प्रकार , सुनीता, केवल एक त्रिकोणीय प्रेम कहानी नहीं है, बल्कि यह मानव मन की गहराइयों, वासना पर आत्म-नियंत्रण की विजय और स्त्री के गौरव की एक उत्कृष्ट मनोवैज्ञानिक गाथा है।


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