अनामदास का पोथा उपन्यास के नायक रैक्व का चरित्र चित्रण आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने इसका नाम 'रैक्व आख्यान' दिया है। रैक्व ही इस उपन्यास के नायक
अनामदास का पोथा उपन्यास के नायक रैक्व का चरित्र चित्रण
आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी द्वारा रचित 'अनामदास का पोथा' एक प्रसिद्ध सांस्कृतिक और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर आधारित उपन्यास है। इसकी कथा उपनिषद काल (विशेषकर छान्दोग्य उपनिषद) से ली गई है। इस उपन्यास के मुख्य पात्र और नायक ऋषि रैक्व हैं।आचार्य द्विवेदी ने उनके चरित्र के माध्यम से ज्ञान, प्रेम, लोक-कल्याण और मानवीय संवेदनाओं का एक अनूठा समन्वय प्रस्तुत किया है।
आधुनिक भारतीय और पाश्चात्य आचार्यों ने नायक की पहचान यह बतायी है कि उसे रचना के आरम्भ से अन्त तक रहना चाहिए।रचना के मध्य की जो घटनाएँ हों, वे भी उससे सम्बन्धित होनी चाहिए ।इस दृष्टि से इस उपन्यास 'अनामदास का पोथा' का आरम्भ और अन्त रैक्व से होता है। उपन्यास की मध्यवर्ती घटनाओं में भी रैक्व या तो उपस्थित हैं या वे उनसे प्रभावित हैं। इस उपन्यास के प्रथम अध्याय में रिक्व ऋषि से आरम्भ करके उनके पुत्र रैक्व का वर्णन किया गया है। इस उपन्यास का अन्त जाबाला और रैक्व के विवाह से होता है। जैसे-
"इसी समय सारी सभा 'जय-जय' कर उठी। रैक्व ने देखा माताजी आ गयी हैं।वे उठे और माताजी के चरणों पर साष्टांग प्रणत हो गये । माताजी ने उठकर छाती से लगा लिया । उनका इंगित समझकर जावाला भी चरणों में उसी प्रकार आ गिरी । माताजी ने दोनों को प्यार से उठाया और आचार्य की ओर देखकर कहा-"आचार्य अब विवाह की सब विधियाँ पूरी कर ली जायें ।" रैक्व ने चकित दृष्टि से माताजी की ओर देखा। जाबाला की आँखें धरती में गड़ी रहीं। सभा ने फिर एक बार जय-निनाद किया।"
इस प्रकार स्पष्ट है कि 'अनामदास का पोथा' उपन्यास के नायक रैक्व हैं।वास्तव में तो यह उपन्यास 'अनामदास का पोथा' का प्रथम भाग है। आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने इसका नाम 'रैक्व आख्यान' दिया है। इसका अर्थ है— रैक्व की कहानी । इस प्रकार भी रैक्व ही इस उपन्यास के नायक सिद्ध होते हैं।
रैक्व के चरित्र की विशेषताओं का विवेचन प्रस्तुत है-
अनाथ
रैक्व की माता की मृत्यु उनके जन्म के पश्चात् हो गयी थी । वे बालक ही थे, तभी उनके पिता की भी मृत्यु हो गयी । पिता से उन्हें शास्त्र ज्ञान तो कम प्राप्त हुआ, तप, संयम और समाधि की प्रेरणा प्राप्त हुई थी। माता ऋतम्भरा से उनकी जो बातचीत हुई उससे उनका अनाथ होना स्पष्ट है।
माँ ने प्यार से पूछा- "बेटा ! तुझे कभी दूध मिला है ?" "हाँ माँ ! जब पिता जी जीवित थे तो मिलता था, पर अब कई वर्षों से नहीं मिला।” इससे स्पष्ट है कि रैक्व के पिता का देहान्त उनके बाल-जीवन में हो गया था । माता ऋतम्भरा का कोई पुत्र नहीं था । उन्होंने रैक्व को अपना पुत्र बना लिया । माता ऋतम्भरा के पति औषस्ति ने भी रैक्व को पुत्र स्वीकार कर लिया । इससे स्पष्ट है कि रैक्व के माता-पिता नहीं थे। जिसके माता-पिता नहीं होते हैं, उन्हें अनाथ कहा जाता है।
चरम तत्त्व वायु
तरुण तपस्वी रैक्व ने चिन्तन करते हुए यह जाना कि सबसे श्रेष्ठ और परम तत्त्व वायु है।आचार्य हजारीप्रसाद जी ने लिखा है- तरुण तापस रैक्व जब अपने आसन से उठा तो तीसरा पहर हो गया था । उस दिन उसने अपनी समाधि में इस बात का अनुभव किया था कि समस्त चैतन्य जगत् को जो चीज सचमुच प्राणवन्त बनाये हुए है, वह वायु है। वस्तुतः प्राण भी वायु ही है तो इस प्राण को ही क्या मूल तत्त्व माना जा सकता है ? कुछ दिन पहले उसने किसी ऋषि से सुना था कि समस्त पदार्थों का परम तत्त्व प्राण ही है। प्राण में ही समस्त तत्त्व विलीन हो जाते हैं। प्राण ही सबको जीवन्त बनाये हुए है।यह प्राण ही वायु के रूप में बाह्य जगत् में व्याप्त है । परन्तु वायु क्या चरम और परम है या इसके भी परे कोई चीज है ।"
लौकिक व्यवहार से सर्वथा शून्य
वन प्रदेश में समाधि लगाने वाले और कन्दमूल, फल से पेट भर नदी का जल पीने वाले रैक्व लौकिक व्यवहार से सर्वथा शून्य थे। रैक्व ने किसी स्त्री को नहीं देखा है। उन्होंने व्याकरण में स्त्री पद तो पढ़ा था, पर इस पद का अर्थ अर्थात् स्त्री पदार्थ क्या होता है, इसे वे नहीं जानते थे । उन्होंने जब जाबाला को देखा तो उनकी क्या दशा हुई, यह इन पंक्तियों से स्पष्ट हो जायेगा-
"एकाएक उनका ध्यान उसकी आँखों की ओर गया । ऋषि कुमार विस्मित होकर देखने लगे । ऐसी आँखें तो मनुष्य की नहीं होतीं। ये तो बिल्कुल मृग की आँखें हैं। अवश्य ही इस प्राणी ने कहीं से मृग की आँखें लेकर अपने चेहरे पर बैठा ली हैं । वे धीरे-धीरे आँखों के चारों ओर उँगली फिराकर देखने लगे कि कहीं जोड़ के चिह्न हैं या नहीं । नहीं थे। ऋषि कुमार उसके चेहरे पर झुक गये । अवश्य ही कोई रहस्य है।"
बिना दाढ़ी मूँछों के चेहरे, उज्ज्वल गौर वर्ण और चिकने लम्बे केशों के कारण रैंक्व ने जाबाला को देवलोक का प्राणी समझा और उसी रूप में उसकी स्तुति करने लगे।
कुमारी और विवाहिता का अन्तर
रैक्व यह भी नहीं जानते कि कुमारी और विवाहिता में क्या अन्तर है । इसी आधार पर उन्होंने ऋजुका से पूछा - "क्या तुम कुमारी नहीं हो ?" जबकि ऋजुका ने अपने पति की मृत्यु की बात बता दी थी । उसका पुत्र उसके साथ था । इतने पर रैक्व नहीं जान पा रहे थे कि ऋजुका कुमारी है या नहीं । यह लोक व्यवहार है कि कोई बालिका तभी तक कुमारी रहती है, जब तक उसका विवाह नहीं हो जाता । विवाह से कौमार्य समाप्त हो जाता है। अगर विवाह से पूर्व कोई कुमारी पुत्र को जन्म देती है तो उसे व्यभिचारिणी कहा जाता है और उसका पुत्र अवैध समझा जाता है । इस प्रसंग से स्पष्ट है कि रैक्व इस लोक व्यवहार से सर्वथा शून्य थे । यह सब ज्ञान समाज में रहने से होता है, जबकि रैक्व अभी तक वन प्रदेश में अकेले घूमते रहे थे ।
सत्संग का अभाव
रैक्व में कोई दोष नहीं था, उनमें कमी थी। बहुत-सी बातें भले लोगों के साथ बैठने और समाज में रहने से ज्ञात होती हैं । बहुत-सी बातों की परीक्षा अकेले में नहीं हो पाती, समाज में रहकर ही होती है । माता ऋतम्भरा ने रैक्व के सत्यवादी होने के प्रसंग में यह बात स्पष्ट की है—माता ऋतम्भरा ने कहा कि एकान्त में निवास करने वाला कोई व्यक्ति अपने आपको सत्यवादी कहता है । वह सत्यवादी है या नहीं, इसकी परीक्षा उसके एकान्त निवास से नहीं हो सकती । वह जब समाज में रहेगा और उससे कोई ऐसी बात पूछी जायेगी, जिसे सत्य बता देने से उसकी हानि सम्भव है यदि वह हानि की चिन्ता न करता हुआ सत्य भाषण करता है, तभी वह सत्यवादी कहा जायेगा । यदि वह अपनी हानि का विचार करके सत्य न कहकर अपने अनुकूल पड़ने वाली बात कहता है तो उसे असत्यवादी कहा जायेगा । यही विचार कर ऋषि औषस्ति ने रैक्व को सत्संग का आदेश दिया था। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा था--तेरी तपस्या में दो कमियाँ हैं—एक तूने सत्संग नहीं किया है, दूसरे शास्त्रों का अध्ययन नहीं किया है । शास्त्रों का अध्ययन भी आवश्यक है। लोक में योग्यता और प्रतिभा का ज्ञान शास्त्रों की जानकारी से ही माना जाता है । वास्तविकता यह थी कि माता ऋतम्भरा द्वारा रैक्व को पुत्र स्वीकार करने के बाद उनके पति ऋषि औषस्ति ने भी रैक्व को पुत्र स्वीकार कर लिया था। वे नहीं चाहते थे कि वह उनका पुत्र शास्त्रज्ञान रहित हो और समाज उसे पण्डित न समझे । रैक्व जब शास्त्रों का अध्ययन करने माता ऋतम्भरा के समीप लौटा तो उन्होंने यही कहकर अपनी प्रसन्नता व्यक्त की—“देखो बेटा ! सब लोग आशा करते हैं कि मेरा बेटा शास्त्रज्ञ और तत्त्व ज्ञानी होगा।तत्वज्ञानी तू है, पर शास्त्रज्ञ भी होना चाहिए । वेदों का ठीक से अध्ययन करना होगा, सभी शास्त्रों का मनन करना होगा।"
रैक्व जब सभी शास्त्रों का अध्ययन करके लौटै तो माता ऋतम्भरा ने उनसे कहा- "बेटा ! मैं आज बहुत प्रसन्न हूँ। मैंने तेरी विद्वत्ता की प्रशंसा कई लोगों से सुनी है। तूने अनेक शास्त्रों का अध्ययन कर लिया है, आज मैं बहुत प्रसन्न हूँ।
लगभग यही प्रसन्नता माता ऋतम्भरा के पति महर्षि औषस्ति ने भी प्रकट की- 'वत्स ! मैंने तुम्हारी कुशाग्र बुद्धि और शास्त्रीय मीमांसा की ग्राहिका शक्ति के बारे में बहुत सुना है । तुमने जिन शास्त्रों का अध्ययन किया है, उनके उद्देश्य को ठीक से समझा है न वत्स ! "
शुभा के प्रति आकर्षण
रैक्व ने केवल आँधी और वर्षा वाली रात में जाबाला को देखा था और उसकी कुछ बातें सुनी थीं । जाबाला के प्रति रैक्व का प्रमुख आकर्षण उसके नारी रूप का ही था । उसकी मधुर वाणी और महत्त्वपूर्ण बातों ने भी रैक्व को बहुत प्रभावित किया था । जाबाला ने रैक्व को यह तो नहीं बताया था कि मेरा नाम शुभा है। उसने केवल इतना ही कहा था तुम मुझे 'शुभा' कहकर पुकार सकते हो । भोले-भाले रैक्व ने समझ लिया कि देवलोक के उस प्राणी का नाम शुभा है । रैक्व जाबाला अर्थात् शुभा से इतने प्रभावित थे कि उसे अपना गुरु मानते थे। रैक्व का विश्वास था कि शुभा से अधिक योग्य और मेधावी कोई नहीं है । वे सभी को इतना कहकर फटकार देते थे कि तुम कैसे समझोगे तुमने शुभा को तो देखा ही नहीं । इसमें कोई सन्देह नहीं कि शुभा या जाबाला का सबसे अधिक प्रभाव तो उसके सौन्दर्य का ही था । वास्तविकता यह थी कि वे शुभा भी जाबाला से प्रेम करने लगे थे । रैक्व ने अपनी माता ऋतम्भरा से कहा था । अब समाधि नहीं लगती माता! समाधि लगाता हूँ तो शुभा सामने आ जाती है। रैक्व अभी कामवासना और स्त्री पुरुष के यौन सम्बन्ध से परिचित नहीं थे।
इस कारण शुभा या जाबाला के प्रति उनके भाव को निर्मल और प्रशंसनीय ही माना जायेगा । रैक्व शुभा या जाबाला के लिए उतने व्याकुल नहीं थे, जितनी जाबाला उनके लिए थी, पर रैक्व का प्रेम भी उथला नहीं था । वे जाबाला से मिलने के लिए व्याकुल थे । माता ऋतम्भरा ने यह कहकर उनकी परेशानी बढ़ा दी थी कि तुझे शुभा के पास कौन जाने देगा । वह राजकुमारी है । वह महल में रहती है । यही कारण है कि रैक्व ने जब अपनी शुभा या जाबाला को माता ऋतम्भरा की कुटिया में अकेली देखा तो उन्हें विश्वास नहीं हुआ कि वे स्वप्न देख रहे हैं अथवा जाग रहे हैं। उन्होंने जाबाला से कहा- 'शुभा ! मैंने स्वप्न में तुम्हें कई बार देखा है पर आज जाग्रत अवस्था में देख रहा हूँ । पर कौन जाने आज भी स्वप्न ही देख रहा होऊँ । बताओ शुभा ! कहीं मैं स्वप्नावस्था में तो नहीं हूँ ।" ऐसा कहकर रैक्व ने अपनी आँखों पर कई बार हाथ फेरा ।
जाबाला ने मृदु कण्ठ से उत्तर दिया- "नहीं तापस कुमार ! तुम स्वप्नावस्था में नहीं, जाग्रत अवस्था में ही अपनी शुभा को देख रहे हो । कहो, प्रसन्न तो हो "
शुभा के प्रति रैक्व का आकर्षण शुभा है, यह बात माता ऋतम्भरा और महर्षि औषस्ति दोनों ने ही कही थी। महर्षि औषस्ति ने तो यहाँ तक कहा था कि तुम अपने प्रिय के आधार पर परम वैश्वानर को पा सकते हो।
झक्की और जिद्दी
रैक्व जो समझते थे, उसी पर डटे रहते थे । वे अपनी बात का विरोध सहन नहीं कर पाते थे। किसी को शूद्र कह देना उनके लिए सामान्य बात थी । उन्होंने राजा जानश्रुति को एक बार शूद्र कह दिया था और एक बार आचार्य औदुम्बरायण को फटकार दिया था। बाद में शुभा ने जब आचार्य औदुम्बरायण का स्वागत न करने का दोषी बताया तो अगली बार जब आचार्य औदुम्बरायण उनके पास गये तो उन्होंने प्रणाम किया।
रैक्व की झक्की और क्रोधी प्रवृत्ति के कारण लोग उनके पास जाने से भयभीत होने लगे थे। वैसे रोगी जन अपनी रोग निवृत्ति के लिए रैक्व के पास जाते थे और उन्हें लाभ होता था । अन्त में रैक्व अपनी उसी गाड़ी के नीचे ध्यान या समाधि करने लगे थे । राजा जानश्रुति ने अपनी कन्या जाबाला का विवाह रैक्व से करने का निश्चय कर लिया था । इसके लिए उन्होंने उपायन के रूप में कुछ सामान भेजा।रैक्व ने उसे लौटा दिया ।अन्त में राजा जानश्रुति रैक्व का ज्ञानोपदेश सुनने गये तो रैक्व ने मौन धारण कर लिया । जब माता ऋतम्भरा ने रैक्व का विवाह जाबाला से करा दिया तो उन्होंने जानश्रुति को उपदेश दिया ।
इस प्रकार रैक्व के चरित्र में अनेक आकर्षक विशेषताएँ हैं। वे उपन्यास के नायक होने योग्य हैं।'अनामदास का पोथा' में रैक्व का चरित्र एक ऐसे आदर्श मनुष्य का है जो शुष्क वैराग्य से ऊपर उठकर 'प्रेमयुक्त ज्ञान' को अपनाता है। वे यह संदेश देते हैं कि संसार से भागना वीरता नहीं है, बल्कि संसार में रहकर, प्रेम और करुणा के साथ लोक-कल्याण करना ही सच्ची साधना है।


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