आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी के व्यक्तित्व के सम्बन्ध में एक ही वाक्य कहा जा सकता है कि वे सभी प्रकार से दिव्य पुरुष थे।
आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी के व्यक्तित्व का परिचय
आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी के व्यक्तित्व के सम्बन्ध में एक ही वाक्य कहा जा सकता है कि वे सभी प्रकार से दिव्य पुरुष थे। उनका विशालकाय आजानुबाहु शरीर, श्वेत शीश एवं धवल मूँछें, बड़े-बड़े विशाल नेत्र, स्वर्णिम देहछटा, चकित कर देने वाली वाक्पटुता, सरलता, विकट अट्टहास, साथ ही हृदय की निर्मलता, निष्कपटता, इस लौकिक प्रपंच की श्रृंखलाओं एवं क्षुद्र समस्याओं से सर्वत्र मुक्त होकर, मस्ती में झूमने वाली प्रवृत्ति आचार्य द्विवेदी को दिव्य पुरुष का रूप प्रदान करती है।
आचार्य द्विवेदी न केवल शरीर तथा आचार-व्यवहार की दृष्टि से ही दिव्य थे अपितु आंतरिक दृष्टि से भी उनमें दिव्यता का पूर्ण प्रकाश था। मनुष्य अपने हृदय के कारण या अपने द्वारा किये गये कार्यों के आधार पर दिव्य कहलाता है। इन दोनों ही दृष्टियों से द्विवेदी जी दिव्य पुरुष थे। अगर कोई उनके साथ कुछ क्षण भी बिताता या उनके एक ही निबन्ध को पढ़ता तो उनके व्यक्तित्व की यह दिव्यता उसे स्पष्ट मालूम हो जाती थी। दर्शक या पाठक समझने लगता था कि मैं ऐसे महान व्यक्ति के सामने बैठा हूँ जो वैदिक काल का आश्रमवासी ऋषि, बुद्धयुगीन अहिंसावादी भिक्षु, नाथ संप्रदाय का अवधूत और सन्त संप्रदाय के साधु इन सबका सम्मिलित रूप है। इस वैज्ञानिक युग में अलौकिकता और दिव्यता पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगा हुआ है, पर हमें द्विवेदीजी को एक दिव्य तथा महान् पुरुष कहने में कोई विचिकित्सा नहीं रह जाती है।
आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी वर्तमान भारत के अद्वितीय महान चिन्तकों में से एक थे। आपको प्रबुद्ध मनीषी कहना उचित है। आपकी मनीषा दो रूपों में प्रकट प्रतीत होती है- एक तो चिन्तन एवं बुद्धि के क्षेत्र में तथा दूसरे हृदय, कल्पना एवं भावुकता के क्षेत्र में । आचार्य द्विवेदी का गहन चिन्तन एवं गंभीर विचारधारा बहुत कम चिन्तकों एवं मनीषियों में देखी जाती है। इसी प्रकार आपकी भावुकता, संवेदनशीलता तथा कल्पना- प्रवणता बहुत कम कवियों एवं कलाकारों में दृष्टिगोचर होती है। आचार्य द्विवेदी की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि आपके व्यक्तित्व में बुद्धि एवं हृदय का आश्चर्यजनक समन्वय था। हजारीप्रसाद जी के व्यक्तित्व की यही महान प्रवृत्ति आपके कृतित्व में भी प्रतिबिंबित हुई थी। इसीलिए आपका चिन्तन क्षेत्र भावुकता से मुक्त नहीं था तथा अत्यन्त भावात्मक अवसरों पर गंभीर विचार एवं चिन्तन का लोप नहीं हुआ था।
वास्तविक साहित्यकार के लिए आवश्यक लक्षणों की चर्चा करते हुए द्विवेदीजी ने एक स्थान पर लिखा था- "जो साहित्यकार अपने जीवन में मानव सहानुभूति से परिपूर्ण नहीं है और जीवन के विभिन्न स्तरों को स्नेहार्द्र दृष्टि से नहीं देख सकता है, वह बड़े साहित्य की सृष्टि नहीं कर सकता। परन्तु केवल इतना ही आवश्यक नहीं है, उसमें प्रेमपूर्ण हृदय के साथ अनासक्त बनाये रखने वाली मस्ती भी होनी चाहिए। मानव सहानुभूति से परिपूर्ण हृदय और अनासक्तिजन्य मस्ती साहित्यकार को बड़ी रचना करने की शक्ति देती है।"
द्विवेदीजी के द्वारा निर्दिष्ट साहित्यकार के आवश्यक उपर्युक्त लक्षण स्वयं उनके व्यक्तित्व के प्रधान अंग थे। उनकी मानव सहानुभूति तथा स्नेहार्द्र दृष्टि का अनेक विद्वानों ने उल्लेख किया है। इन दोनों से भी अधिक आचार्य द्विवेदी के व्यक्तित्व का प्रधान अंग थी-सतत अनासक्त बनाये रखने वाली मस्ती। अपनी रचनाओं में आचार्य द्विवेदी जी सर्वत्र एक मस्त मौला के रूप में देखे जा सकते हैं।
कबीरदास पर विचार करते हुए हजारीप्रसाद जी ने बताया है कि अवधूत लोग ही हमेशा मस्तमौला होकर रह सकते हैं- "अवधूत योगी तो वह है जो न भीख माँगे, न भूखा सोये, न झोली, पत्र और बटुवा रखे, न अनहदनाद के बजाने से विरत हो, पाँच जनों की जमात (गृहस्थी) का पालन भी करे और संसार से मुक्ति पाने की साधना जाने।"
मस्तमौला अवधूतों के सभी लक्षण आचार्य द्विवेदी की रचनाओं में देखे जा सकते हैं। जहाँ-जहाँ अनासक्त मस्ती की बात आती है या जहाँ-जहाँ किसी व्यक्ति या वस्तु में ऐसे गुण दिखाई देते हैं हजारीप्रसाद जी तुरन्त वहाँ उसे 'मस्तमौला' विशेषण से विभूषित करते रहे हैं और उससे अपना तादात्मय स्थापित करते हुए भी प्रतीत होते हैं। शिरीष वृक्ष के फूलों की चर्चा करते हुए हजारीप्रसाद जी ने लिखा है- "एक-एक बार मुझे मालूम होता है कि यह शिरीष एक अद्भुत अवधूत है। दुःख हो या सुख हार नहीं मानता। जब धरती और आसमान जलते रहते हैं, तब भी यह हजरत न जाने कहाँ से अपना रस खींचते रहते हैं। मौज में आठों याम मस्त रहते हैं। अवधूतों के मुँह से ही संसार की सबसे सरस रचनाएँ निकली हैं। कबीर बहुत कुछ इसी शिरीष के समान थे, मस्त और बेपरवाह, पर सरस और मादक । कालिदास भी जरूर अनासक्त योगी रहे होंगे। शिरीष के फूल फक्कड़ाना मस्ती से ही उपज सकते हैं और मेघदूत का काव्य उसी प्रकार के अनासक्त अनाविल उन्मुक्त हृदय में उमड़ सकता है। जो कवि अनासक्त नहीं रह सकता, जो फक्कड़ नहीं बन सकता, जो किये-कराये का लेखा-जोखा दिखाने में उलझ गया, वह भी क्या कवि है? मैं कहता हूँ कि कवि बनना है मेरे दोस्तो, तो फक्कड़ बनो। शिरीष की मस्ती की ओर देखो। लेकिन अनुभव ने मुझे बताया है कि कोई किसी की सुनता नहीं। मरने दो।"
यह उद्धरण द्विवेदीजी के अवधूत व्यक्तित्व का वास्तविक दर्पण है। यही मस्त मौलापन, यही फक्कड़पन, यही उन्मुक्त हास आचार्य द्विवेदी के व्यक्तित्व में तथा उनकी प्रत्येक रचना में पद-पद पर प्रतीत होता है। भयंकर गर्मी के मौसम में हिमालय के कठिन पाषाणों पर फल-फूल साथ लेकर झूमने वाले कुटज वृक्षों को देखकर आचार्य द्विवेदी का हृदय प्रसन्न हो गया था। वे कहने लगते थे- “ये जो ठिगने से लेकिन शानदार दरख्त गर्मी की भयंकर मार खा-खा कर और भूख-प्यास की निरंतर चोट सह-सह कर भी जी रहे हैं, इन्हें क्या कहूँ? सिर्फ जी ही नहीं रहे हैं, हँस भी रहे हैं। बेहया हैं क्या? या मस्तमौला हैं?"
वास्तव में आचार्य द्विवेदी भी एक अवधूत थे- कबीर की भाँति, कालिदास की भाँति और शिरीष के वृक्ष की भाँति । आपके उन्मुक्त हास का प्रत्यक्ष दर्शन कोई भी आपके उपन्यासों में प्राप्त कर सकता है। बाणभट्ट की आत्मकथा में अवधूतपाद, अघोरभैरव इसी मस्ती और फक्कड़पन को लिए हुए उन्मुक्त अट्टहास करते हैं तथा चारुचन्द्र लेख में मुसलमान अवधूत सीदी मौला इसी मस्ती को लिये हुए सभी पात्रों को चकित करते हैं। इन दोनों पात्रों के उन्मुख हास में द्विवेदीजी का व्यक्तित्व प्रत्यक्ष दीख पड़ता है।
एक प्रसिद्ध अवधूत की ही भाँति द्विवेदीजी ने मानव जाति के वर्षों के इतिहास का दर्शन किया। उसमें निहित विभिन्न परिवर्तनों और विकासों को देखते हैं तथा इतिहास विधाता. की गतिविधि को देखकर इस निष्कर्ष पर आ पहुँचते हैं-"इतिहास विधाता उसी रास्ते से अपना रथ हाँकते हैं, जिस रास्ते आदर्श-प्रेमी त्याग और कष्ट सहने जाते हैं।"
आचार्य द्विवेदी के व्यक्तित्व का यही ऐसा प्रबल पक्ष है जो पाठक पर मोहन मंत्र पढ़कर अकस्मात् प्रभावित करता है तथा अपनी ओर आकृष्ट करके अपने विचारों से सहमत कर लेता है।आचार्य द्विवेदी का अध्ययन-क्षेत्र अत्यन्त व्यापक एवं विस्तृत है। आप सतत अध्ययनशील रहे। आपकी जिज्ञासा का कोई अन्त नहीं था। ज्ञान और विज्ञान की प्यास आपमें असीम थी। जीवन के क्षेत्र में, साहित्य के क्षेत्र में तथा प्रकृति के क्षेत्र में आपके सामने यदि कहीं रहस्य दिखाई देता है, तो उसे जानने-समझने की अकुंठ जिज्ञासा भी साथ बनी रहती है। समस्याओं को उठाने में और अपने आप उनका समाधान प्रस्तुत करने में आचार्य द्विवेदी को असीम आनन्द की अनुभूति होती थी। अपनी इस अतृप्त जिज्ञासा की प्रवृत्ति का आपने स्थान-स्थान पर उल्लेख भी किया है। लोक विश्वासों और प्रवादों के भीतर छिपा हुआ सत्य आपकी जिज्ञासा का प्रमुख ईंधन था - "पोथियाँ पढ़ता हूँ, उनका सम्मान भी करता हूँ, पर लोक-प्रवादों को हँसकर उड़ा देने की शक्ति अभी संचय नहीं कर सका हूँ। मुझे ऐसा लगता है कि इन प्रवादों में मनुष्य समाज का जीवन्त इतिहास सुरक्षित है। जब कभी लोक-परम्परा के साथ किसी पोथी का विरोध हो जाता है तो मेरे मन में कुछ नवीन रहस्य पाने की आशा उमड़ उठती है। सब समय नयी बात सूझती नहीं, पर हार मैं नहीं मानता। .ये लोक-प्रवाद हमारे लिए तो बिलकुल असंगत निरर्थक से प्रतीत होते हैं। परन्तु ये भी द्विवेदीजी के लिए शोध एवं अनुसन्धान के विषय थे।"
अध्ययनशीलता एवं जिज्ञासा की प्रवृत्तियों के साथ-साथ द्विवेदीजी में सूक्ष्म निरीक्षण की प्रवृत्ति भी थी। किसी भी क्षेत्र में आपकी पैनी दृष्टि को धोखे में डालकर कोई भी विषय, घटना या समस्या आगे नहीं जा सकती थी। आपकी तीक्ष्ण दृष्टि सामान्य एवं साधारण लगने वाले सभी विषयों को पकड़ लेती थी। आपकी सूक्ष्म निरीक्षण की प्रवृत्ति जितनी तीव्र थी, आपकी गवेषणात्मक प्रवृत्ति उतनी ही प्रखर थी। यह वही प्रवृत्ति थी जो उच्च कोटि के अनुसंधानकर्त्ता या वैज्ञानिक के लिए आवश्यक होती है।
प्रकृति के क्षेत्र में भी आचार्य द्विवेदी की निरीक्षण की यह प्रवृत्ति अत्यन्त तीव्र थी। विविध वृक्षों, लताओं, पुष्पों के नाम, उनके विशेष गुण तथा उनके सांस्कृतिक इतिहास आदि का विस्तृत ज्ञान हजारीप्रसाद द्विवेदी जी को था । यह उनके शान्तिनिकेतन के शान्तिमय जीवन का वह वरदान था, जिसके कारण प्रकृति की गोद में बीस वर्ष तक रहे। अशोक, शिरीष, नवमल्लिका, चम्पा, चमेली, कांचनार आदि अनेक जातियों के पुष्पों के सम्बन्ध में आपने स्थान-स्थान पर अपने ज्ञान का परिचय दिया। इस प्रकार स्पष्ट है कि आपका व्यक्तित्व अनेक गुणों, प्रवृत्तियों तथा प्रखरताओं से परिपूर्ण था।
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