अनामदास का पोथा उपन्यास का सारांश आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी anamdas ka potha upanyas ka saransh इस उपन्यास का प्रकाशन वर्ष 1976 में हुआ था।
अनामदास का पोथा उपन्यास का सारांश | आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी
अनामदास का पोथा, हिन्दी साहित्य के प्रख्यात आलोचक, निबंधकार और उपन्यासकार आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी द्वारा रचित एक कालजयी ऐतिहासिक-सांस्कृतिक उपन्यास है। इस उपन्यास का प्रकाशन वर्ष 1976 में हुआ था। यह द्विवेदी जी के चार प्रसिद्ध उपन्यासों की श्रृंखला में अंतिम और परिपक्व कृति है।
यह उपन्यास मुख्य रूप से छान्दोग्य और वृहदारण्यक उपनिषद की कथाओं और दर्शन पर आधारित है, जिसमें वैदिक काल के परिवेश के माध्यम से मानव जीवन के शाश्वत सत्यों को उजागर किया गया है।
रिक्व ऋषि का पुत्र रैक्व अनाथ था । उसके पिता और माता दोनों की मृत्यु हो चुकी थी । वह समाधि लगाता और वन के कंद, मूल, फल का भोजन करता था । उसने वायु को ही सबसे प्रधान तत्त्व माना था जो प्राण के रूप में सबके शरीर में व्याप्त था।
एक दिन संध्या के समय रैक्व नदी में स्नान करने गया । तभी जोर की आँधी आयी और भयानक वर्षा होने लगी। नदी में आयी बाढ़ उसे बहा ले गयी । आँधी और वर्षा शान्त होने पर रैक्व नदी से निकला और अंधकार होने के कारण मार्ग न दिखने तथा बिना उद्देश्य के चलने लगा । एक स्थान पर वह कीचड़ में फँसी गाड़ी से टकरा गया। उसने देखा कि गाड़ी में बैल नहीं है । एक मनुष्य पास ही पड़ा है जो रैक्व को गाड़ी हाँकने वाला लगा। रैक्व ने उसकी नाक पर हाथ लगाकर देखा, उसकी साँस नहीं चल रही थी । वह मर गया था।
थोड़ी दूर पर रैक्व को एक अन्य व्यक्ति पड़ा दिखा । उसकी साँस चल रही थी, पर वह अचेत था । वह वास्तव में राजा जानश्रुति की कन्या जाबाला थी। उस समय चन्द्रमा निकल आया था । रैक्व ने अभी तक किसी स्त्री को नहीं देखा था। उसने बड़ी-बड़ी आँखों, कोमल काले केशों और बिना दाड़ी-मूँछ वाले उस जीव को देवलोक का प्राणी समझा। जाबाला के वस्त्र अस्त-व्यस्त हो रहे थे और भीगे हुए थे। रैक्व वायु को सबसे महान् तत्त्व मानता था । देवलोक के उस प्राणी को चेतना प्रदान करने के लिए रैक्व ने उसी के वस्त्रों से उसकी हवा करनी आरम्भ की। इससे जाबाला के वस्त्र सूख गये और उसे चेतना प्राप्त हुई । रैक्व उसकी आँखों, गालों और केशों को छूकर देख रहा था । सचेत होने पर जाबाला उठकर बैठ गयी तथा उसने रैक्व को अपने से दूर बैठने को कहा । रैक्व ने पूछा कि वह उसे क्या कहकर पुकारे । जाबाला ने कहा कि वह उसे शुभा कहा करे । जाबाला ने उससे कहा कि तुम मुझे मेरे घर पहुँचा दो । रैक्व ने उससे कहा कि तुम मेरी पीठ पर बैठ जाओ मैं तुम्हें वहाँ पहुँचा देता हूँ। जाबाला ने कहा कि तुम पुरुष पदार्थ हो और मैं स्त्री पदार्थ हूँ। मेरा तुम्हारी पीठ पर बैठना पाप है। तुम्हारे द्वारा ऐसा सोचना भी पाप है।
रैक्व को इसमें कोई पाप नहीं जान पड़ा। तभी जाबाला को कुछ लोग आते दिखाई दिये । वह समझ गयी कि ये उसके पिता के सेवक हैं और उसे खोज रहे हैं। उसने रैक्व को दूर छिप जाने को कहा और अपने पिता के सेवकों के साथ चली गयी।
जाबाला के चले जाने के बाद रैक्व बहुत व्याकुल हुए । उन्हें अपनी पीठ में सनसनाहट मालूम हुई । अपनी शुभा के बिना के व्याकुल रहने लगे और कीचड़ में फँसी उस गाड़ी के नीचे बैठकर समाधि लगाने लगे।
एक दिन रैक्व ने नदी के किनारे दूसरा स्त्री पदार्थ देखा। उसके भी दाड़ी-मूँछ नहीं थी । उसके बाल काले नहीं श्वेत थे ।वह शुभा के समान सुन्दर भी नहीं थी । वे वास्तव में औषस्ति ऋषि की पत्नी ऋतम्भरा थीं । रैक्व को अनाथ समझकर वे अपने आश्रम में ले आयीं । रैक्व ने उनसे पूछा कि तुम्हें क्या कहूँ उन्होंने कहा—तु मुझे माँ कहा करो । ऋतम्भरा की कोई सन्तान नहीं थी । उन्होंने रैक्व को अपना पुत्र बना लिया । रैक्व उनके साथ आश्रम में रहने लगा । वह शुभा को महाज्ञानी और अपना गुरु मानता था और उससे मिलने को व्याकुल था, पर शुभा का परिचय न जानने के कारण विवश था ।
एक दिन रैक्व नदी पर स्नान करने जा रहे थे । उन्हें मार्ग में एक स्त्री मिली, जो बहुत दुर्बल और अवश थी । उसका बच्चा मरणासन्न था । उसके आग्रह पर रैक्व ने नदी से पानी लाकर उसके बालक को पिलाया तो वह कुछ सचेत हुआ । उस स्त्री की प्रार्थना पर रैक्व उसे माता ऋतम्भरा के आश्रम में ले आये । ऋतम्भरा के पूछने पर उसने अपना नाम ऋजुका बताया । उसने कहा कि उसका पति राजा जानश्रुति की गाड़ी हाँकता था । एक बार वह उनकी पुत्री को लेकर उसकी मौसी के पास जा रहा था । मार्ग में आँधी आयी जिसमें उसका पति मर गया और राजा की पुत्री जीवित बच गयी। राजा के सेवकों ने उसका शव जाने कहाँ फैंक दिया। यह मेरा बालक है । यह मेरे पति की निशानी है मैं इसे पालकर बड़ा करना चाहती थी। मैं किसान की पत्नी हूँ ।मैं भीख नहीं माँग सकती। आप मुझे कोई काम दे दें । ऋतम्भरा के आश्रम में कोई काम नहीं था । उन्होंने कोई काम मिलने तक ऋजुका को अपने आश्रम में रहने की अनुमति दे दी । रैक्व के पूछने पर माता ऋतम्भरा ने बताया कि यह तेरी दीदी है।
माता ऋतम्भरा और रैक्व दोनों इस बात से अप्रसन्न हुए कि राजा ने अपने सेवक और उसके परिवार की चिन्ता क्यों नहीं की ? वे सोचने लगे कि शुभा तो बुद्धिमती है । वह अपने साथ आये और मरे हुए गाड़ीवान तथा उसके परिवार को क्यों भूल गयी ?
इधर रैक्व अपनी शुभा से मिलने को व्याकुल था, उधर रैक्व के निश्छल व्यवहार ने शुभा का मन मोह लिया था । वह सदा रैक्व का चिन्तन करती थी और उससे मिलने के लिए व्याकुल थी पर लज्जा के कारण किसी से कुछ कह नहीं पाती थी।
राजा जानश्रुति की सन्तान एकमात्र पुत्री जाबाला थी । राजा की पत्नी की मृत्यु जाबाला के बचपन में ही हो गयी थी। उन्होंने दूसरा विवाह नहीं किया । जाबाला के गुरु आचार्य औदुम्बरायण ब्राह्मण थे। उन्होंने जाबाला को उच्च शिक्षा दी। राजा और आचार्य दोनों ही चाहते थे कि जाबाला का विवाह उसी के समान उच्च शिक्षित युवक से हो । राजा शूद्र जाति के थे । उनकी जाति के युवकों में पढ़ने के प्रति रुचि नहीं थी। राजा ने जाबाला के योग्य वर को खोजने का काम आचार्य औदुम्बरायण को ही सौंप दिया था । रैक्व के वियोग में जाबाला दिन-प्रतिदिन सूखती जा रही थी। शुभा को पता चला था कि कोई ब्रह्मचारी उसकी टूटी गाड़ी के नीचे समाधि लगाते हैं। तब तक उसे रैक्व के मिलने की आशा थी । अब पता चला कि वे कहीं चले गये हैं तो उनके न मिलने से निराश जाबाला व्याकुल थी। यही उसके सूखते जाने का कारण था ।
आचार्य औदुम्बरायण जाबाला के लिए आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए एक महात्मा के पास गये । उन्होंने बताया कि राजा जानश्रुति नरक में जायेगा । जो गाड़ीवान मर गया, उसकी पत्नी और पुत्री की क्या दशा है, यह राजा ने नहीं सोचा । आज इस राजा के राज्य अनेक स्त्री, वृद्ध और बालक भूखे-प्यासे हैं। महात्मा ने राजा की पुत्री के रोग निवारण के लिए कोहलियों का नाटक करने को कहा । आचार्य ने राजा के जनपद को घूमकर देखा तो पता चला कि दो वर्ष से अकाल पड़ा है और प्रजा दुःखी है। उन्होंने यह बात जाबाला को बतायी और राजा से मिलकर प्रजा को अन्न वितरित करने का प्रस्ताव किया । सारी प्रजा को भिक्षाजीवी नहीं बनाया जा सकता है । प्रजा को काम देने के लिए कोहलियों के नाटक के लिए रंगमंच बनाने की बात सोची गयी ।
इधर रैक्व को अपनी दीदी ऋजुका से मालूम हुआ कि दो वर्ष से अकाल पड़ने के कारण राज्य की प्रजा बहुत दुःखी है तो उन्होंने प्रजा के पास जाकर उसका दुःख जानने का निश्चय किया । माता ऋतम्भरा ने रैक्व से कहा कि मैं भी तेरे साथ चलूँगी, पर इससे पहले राजा से मिलना ठीक रहेगा। रैक्व और उसकी माता ऋतम्भरा राजा जानश्रुति से मिलने चले । राजधानी में पहुँचकर माता ऋतम्भरा ने रैक्व से एक स्थान पर रुकने को कहा और वे अकेली राजा के पास गयीं। उनके आने की सूचना राजा को दी गयी । उस समय राजा आचार्य औदुम्बरायण से चर्चा कर रहे थे। उन्होंने माता ऋतम्भरा को तुरन्त बुलवा लिया और उनका स्वागत किया । ऋतम्भरा ने जाबाला से मिलना चाहा। वे अकेले में जाबाला से मिलीं और उसका कष्ट पूछा । जाबाला ने संक्षेप में रैक्व की बात बता दी । माता ऋतम्भरा ने कहा कि वह इस समय मेरा पुत्र है और मेरे साथ हैं। हम दोनों प्रजा का कष्ट जानने निकले हैं। इससे जाबाला को बहुत प्रसन्नता हुई।
राजा जानश्रुति ने अकाल से पीड़ित प्रजा की सहायता के लिए कोहलियों के गन्धर्व पूजा सम्बन्धी नाटक के लिए रंगमंच बनाने की व्यवस्था की और काम के बदले अन्न देने का आदेश दिया । उस दिन भारी वर्षा होने से किसानों ने खेत जोतने आरम्भ कर दिये थे । उन्हें भविष्य में अन्न मिलने की आशा हो गयी थी । कोहलियों के नाटक में तपस्वी ऋष्यश्रृंग की तपस्या भंग करने के लिए इन्द्र के द्वारा अप्सराएँ भेजने की बात की । अप्सराओं ने ऋष्यश्रृंग को घेरकर नृत्य आरम्भ किया। उनमें एक अप्सरा सुव्रता ऋष्यश्रृंग से बहुत प्रभावित हुई। उसने अपने चिकने और काले बालों से ऋष्यश्रृंग के पैरों की धूल पोंछी । नाटक का यह अभिनय अपनी मौसरी बहन अरुन्धती के साथ जाबाला भी देख रही थी। उसे लगा कि यह तो मेरी और रैक्व की कहानी है। मुझसे यही भूल हुई कि मैंने अपने केशों से रैक्व के पैरों की धूल नहीं पोंछीं । जाबाला बुरी तरह रोने लगी । मौसरी बहन अरुन्धती ने बातें करके उसका रैक्व से प्रति प्रेम होने की बात जान ली ।
नाटक समाप्त होने के बाद आचार्य औदुम्बरायण ने अपने शिष्य आश्वलायन से जाबाला के विवाह का निश्चय कर दिया । यह बात जिस समय आचार्य ने कही, उस समय जाबाला की मौसरी बहन अरुन्धती वहाँ थी । वह जाबाला का प्रेम रैक्व के प्रति होने की बात तो नहीं बता सकी, पर उसने उस विवाह प्रस्ताव का प्रबल विरोध किया और अप्रसन्न होकर अपने घर चली गयी । यह विवाह रुक गया । इससे अप्रसन्न होकर आचार्य औदुम्बरायण अपना घर छोड़कर चले गये ।
ऋतम्भरा के पति ऋषि औषस्ति ने भी रैक्व को अपना पुत्र बना लिया । उन्होंने रैक्व को परामर्श दिया कि वह तपस्या बहुत कर चुका, अब विद्वानों के पास जाकर शास्त्र का अध्ययन करे और भले लोगों का सत्संग करे । इसी क्रम में रैक्व की मित्रता आचार्य औदुम्बरायण के शिष्य आश्वलायन से हो गयी । बातों-बातों में उसे पता चला कि रैक्व का प्रेम जाबाला के प्रति है । उसने आचार्य औदुम्बरायण के पास एक पत्र भेजकर जाबाला से विवाह करना अस्वीकार कर दिया।
जाबाला के पिता राजा जानश्रुति ज्ञान के प्रति बहुत रुचि रखते थे । एक दिन जाबाला ने रैक्व से मिलने के लिए माता ऋतम्भरा के पास जाने का निश्चय किया । उसने अपने पिता से आज्ञा माँगी तो वे भी साथ चले । जाबाला माता ऋतम्भरा से अकेली मिलना चाहती थी । राजा जानश्रुति ऋषि औषस्ति के आश्रम में उनकी अनुमति पाने को रुक गये और जाबाला माता ऋतम्भरा के पास गयी । ऋतम्भरा उसे अपनी कुटिया में अकेली छोड़कर राजा के अतिथि सत्कार का प्रबन्ध करने चली गयीं । इसी बीच रैक्व ऋतम्भरा की कुटिया में आये, जहाँ जाबाला बैठी थी। रैक्व उसे देखकर बड़े प्रसन्न हुए । जाबाला ने उन्हें बाहर चले जाने और कुछ देर बाद आने को कहा। रैक्व समझ रहे थे कि आँधी वर्षा वाले समय भी इस शुभा ने मुझे चले जाने को कहा था और मेरे जाते ही चली गयी थी। आज भी यह चली जायेगी। इस कारण उन्होंने वहाँ से जाने में अरुचि दिखाई, पर जाबाला के आग्रह पर चले गये।
कुछ समय बाद ऋतम्भरा अपनी कुटिया में आयीं और जाबाला से बात करने लगीं। उन्होंने एक ब्रह्मचारी को भेजकर रैक्व को बुलाया और रैक्व तथा जाबाला दोनों को आशीर्वाद दिया।माता ऋतम्भरा ने जाबाला और रैक्व के प्रेम की बात राजा जानश्रुति और आचार्य औदुम्बरायण को बता दी। आश्वलायन का पत्र पाकर आचार्य औदुम्बरायण दुःखी थे कि अब जाबाला का विवाह किससे होगा ? माता ऋतम्भरा की बात सुनकर वे भी प्रसन्न हुए ।
अब रैक्व अपनी गाड़ी के पास बैठकर समाधि लगाने लगे थे। उनके पास रोगमुक्त होने के लिए प्रजाजन आने लगे थे। एक बार आचार्य औदुम्बरायण उनके पास गये तो उन्होंने आचार्य का स्वागत नहीं किया था । शुभा अर्थात् जाबाला ने रैक्व को स्वप्न में बताया कि ऐसा करके तुमने अविनय और अपराध किया है। तब से रैक्व आचार्य औदुम्बरायण का आदर करने लगे थे।
राजा जानश्रुति ने आचार्य औदुम्बरायण से परामर्श करके जाबाला का विवाह रैक्व से करने का निश्चय कर लिया। इधर रैक्व के पिता बने ऋषि औषस्ति ने रैक्व को बताया था कि ब्रह्मचर्य के बाद विवाह करके गृहस्थ बनना चाहिए और सन्तान उत्पन्न करनी चाहिए। इसके बिना पितृऋण से मुक्ति नहीं मिलती।
राजा जानश्रुति ने रैक्व के पास विवाह का दहेज रथ, अन्न, रत्न आदि भिजवाया । रैक्व ने वह सब अस्वीकार कर दिया तथा सबको भगा दिया। इसके बाद राजा जानश्रुति ने माता ऋतम्भरा से प्रार्थना की। वे जाबाला और रैक्व के विवाह में सम्मिलित होने को सहमत हो गयीं । राजा अपनी कन्या जाबाला और बहुत-सा दहेज लेकर रैक्व के पास पहुँचे और यज्ञ के रूप में उनका उपदेश सुनाना चाहा। रैक्व ने संकेत से बताया कि आज मेरा मौन है । राजा ने कहा कि मैं मौन समाप्त होने तक बैठा रहूँगा। यज्ञ के बाद मेरी इस कन्या से आपका विवाह होगा।माता ऋतम्भरा ने इसकी अनुमति दे दी है और वे आ रही हैं। रैक्व विरोध नहीं कर सके और दोनों का विवाह हो गया ।
इस प्रकार 'अनामदास का पोथा' केवल एक कथा नहीं है, बल्कि यह मनुष्य के भीतर के अहंकार के टूटने और उसमें छिपे 'प्रेम व करुणा' के जागृत होने की कहानी है। आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने यह सिद्ध किया है कि शुष्क ज्ञान की अपेक्षा मानवीय संवेदनाएँ और लोक-कल्याण ही जीवन का अंतिम और सर्वोच्च सत्य हैं।


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