एक ही समय में जन्म लिए बच्चोँ का जीवन भिन्न भिन्न क्योँ होता है?”यह एक बेहद ही गूढ और गम्भीर प्रश्न है और अकसर ज्योतिषियोँ के सम्मुख आता रहता है।
एक ही समय पर जन्मे बच्चे और उनका जीवन : एक ज्योतिषीय व्याख्या
एक ही समय में जन्म लिए बच्चोँ का जीवन भिन्न भिन्न क्योँ होता है?”यह एक बेहद ही गूढ और गम्भीर प्रश्न है और अकसर ज्योतिषियोँ के सम्मुख आता रहता है। कई बार यह भी देखा गया है कि इस यक्ष प्रश्न का समुचित उत्तर हमारे ज्योतिषी देने में हिचकिचा जाते हैँ। हम जानते हैं कि यदि दो जातकोँ का जन्म एक ही दिन और एक ही समय पर होता है तब उनकी जन्म कुन्डलियाँ एक जैसी ही बनकर सामने आती हैँ। एक जैसी जन्म पत्रिका होने के कारण दोनोँ जातकोँ का जीवन एक समान होना चाहिए। परंतु क्या वास्तव में ऐसा ही होता है...? नहीं... वास्तव में ऐसा बिलकुल भी नहीं होता है। यथार्थ में देखा जाये तो वास्तविकता इससे कहीँ अलग है। एक समान जन्मपत्रिका होने के बावजूद भी दो जातकोँ का जीवन और भविष्य अलग अलग होता है। ज्योतिष पर विश्वास नहीं करने वालों के लिए यह प्रश्न एक ब्रह्मास्त्र की तरह है। यह प्रश्न बड़े से बड़े ज्योतिष के जानकार की प्रतिष्ठा ध्वस्त करने की सामर्थ्य रखता है। इस ब्रह्मास्त्ररूपी प्रश्न के प्रहार को ज्योतिषशास्त्र रूपी अस्त्र से काटा जा सकता है।
आइये सर्वप्रथम यह जानने का प्रयास करते हैं कि हमारे ग्रंथ एक ही समय में जन्म लिए जातकोँ के भविष्य के विषय में क्या जानकारी प्रदान करते हैं।वेद और उपनिषद में बताया गया है कि आत्मा अनादि है और जन्म केवल शरीर का है।कठोपनिषद में एक स्थान पर उद्धरण आता है "कर्मणा जायते जन्तुः" यानी कर्म ही जीवन का वास्तविक निर्माता है।धर्मशास्त्र (मनुस्मृति, याज्ञवल्क्य स्मृति) कहते हैं “धर्मेण पथं प्रपद्येत” अर्थात धर्म और संस्कार ही जीवन की दिशा तय करते हैं।वेद्वाक्य में निहित है कि “यथा बीजं तथा फलम्” जैसे बीज बोया जाए, वैसा ही फल मिलता है इस प्रकार यहाँ वातावरण का प्रभाव दिखाई पडता है।
भगवद्गीता कहती है “उद्धरेदात्मनात्मानं” अर्थात मनुष्य स्वयं अपने प्रयासों से अपनी दिशा बदल सकता है।
आर्ष साहित्य यह कहता है कि जन्म समय समान होने पर भी जीवन का भविष्य समान नहीं होता, क्योंकि कर्म, संस्कार और धर्म ही वास्तविक नियंता हैं। ग्रह स्थिति केवल प्रारंभिक रूपरेखा है, परंतु जीवन का निर्माण मनुष्य के कर्म और साधना से होता है। वहीँ ज्योतिष का मानना है कि समान जन्म समय पर योग तो समान होंगे, लेकिन परिणाम अलग-अलग कर्म और परिस्थितियों से बदल जाते हैं। इस प्रकार, आर्ष साहित्य और ज्योतिष दोनों ही इस बात पर सहमत हैं कि समान जन्म समय वाले जातकों का भविष्य कभी भी पूरी तरह समान नहीं होता।
आइए इसे ज्योतिषीय व्याख्या के रूप में समझते हैं कि एक ही जन्म समय होने पर भी भविष्य अलग-अलग क्यों होता है:
लग्न और ग्रह स्थिति समान
- यदि दो जातक एक ही समय और स्थान पर जन्म लें, तो उनकी कुंडली में लग्न, नक्षत्र और ग्रहों की स्थिति समान होगी।
- इसका अर्थ है कि उनके जीवन में अवसर और चुनौतियाँ प्रारंभिक रूप से मिलती-जुलती होंगी।
देश-काल-पात्र का भेद
- ज्योतिष मानता है कि ग्रह योग केवल संभावना दिखाते हैं।
- लेकिन जिस देश, परिवार, समाज और आर्थिक परिस्थिति में जातक जन्म लेता है, वही योग अलग-अलग रूप में प्रकट होते हैं।
दशा और अंतर्दशा का अनुभव
यह बताता है कि एक ही समय जन्म लिए जातकोँ की ग्रह दशाएँ तो समान होंगी, परंतु उनका फल जातक के कर्म और परिवेश पर निर्भर करेगा।
उदाहरणस्वरूप समान शुक्र महादशा होने पर एक जातक कला में उन्नति करेगा, दूसरा भोग-विलास में फँस सकता है।
कर्म और संस्कार का प्रभाव
ज्योतिष से प्राप्त रूपरेखा और जातक के संस्कार और कर्म ही वास्तविक परिणाम तय कर पाते हैँ। इन संस्कारोँ में गर्भाधान समय का विशेष महत्व होता है। इसी प्रकार जातक के प्रारब्ध कर्म भी उसका जीवन और भाग्य तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। यही कारण है कि जुड़वाँ बच्चों अथवा एक ही समय में जन्म लिए बच्चोँ की कुंडली समान होते हुए भी उनका जीवन अलग-अलग दिशा में जाता है।
उपरोक्त विवेचना के आधार पर हम यह निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि किसी जातक के जीवन निर्धारण में केवल उसके जन्म-समय की ही नहीं, अपितु गर्भाधान-समय (संस्कार) एवं प्रारब्ध (पूर्व संचित कर्म) की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।इस प्रकार जातक का जीवन तीन महत्वपूर्ण घटकोँ पर आधारित माना जा सकता है। ये तीन घटक हैं-
- जन्म-समय (समय)
- गर्भाधान-समय (संस्कार)
- प्रारब्ध (कर्म)
इन्हीं तीन महत्वपूर्ण घटकोँ के समेकित प्रभाव से ही जातक का संपूर्ण जीवन संचालित होता है। किसी जातक की जन्म पत्रिका के निर्माण में जो सर्वाधिक महत्वपूर्ण तत्व समय होता है परंतु कर्म को भी किसी भी प्रकार से कम करके नहीं आंका जा सकता है। आइये सबसे पहले इन तीन घटकोँ को अलग अलग समझने का प्रयास करते हैं।
जन्म समय:-
किसी भी जातक के जीवन को जानने और समझने के लिए जन्मपत्रिका का निर्माण एक अहम भूमिका निभाता है। प्रत्येक जातक के जन्म के समय ब्रम्हांड में ग्रह नक्षत्रोँ की एक विशेष स्थिति बनती है जिस आधार पर जातक का जीवन निर्धारित होता है। यही कारण है कि जन्म समय का ज्योतिष में बेहद ही महत्व है। जन्म-समय को लेकर भी ज्योतिषाचार्यों में मतभेद हैं। कुछ विद्वान शिशु के रोने को जन्म का सही समय मानते हैं, तो कुछ नाल-विच्छेदन को सही ठहराते हैं। किसी भी जातक की जन्म पत्रिका निर्माण के लिए उसके जन्म का सही समय ज्ञात होना अति-आवश्यक है। वर्तमान समय में जन्म कुंडली का निर्माण जातक के जन्म के उस समय से किया जाता है जब वह माता के सम्पर्क से मुक्त हो जाता है। अधिकांशत: बच्चोँ का जन्म अस्पताल इत्यादि में होने के कारण चिकित्सकोँ द्वारा यही समय बताया जाता है और आगे चलकर इसी आधार पर जातक की जन्म पत्रिका का निर्माण होता है।
गर्भाधान समय:-
जन्म-समय तो ज्ञात किया जा सकता है किंतु गर्भाधान का समय ज्ञात करना दुष्कर कार्य है। इसलिए हमारे शास्त्रों में 'गर्भाधान-संस्कार' के द्वारा बहुत सीमा तक उस समय को ज्ञात करने की व्यवस्था बतायी गयी है। भारतीय वैदिक संस्कारोँ में गर्भाधान एक महत्वपूर्ण संस्कार बताया गया है। जिस प्रकार जातक के जन्म के समय ब्रम्हांड में ग्रह नक्षत्रोँ की एक विशेष स्थिति बनती है ठीक उसी प्रकार गर्भाधान के समय भी ब्रम्हांड में ग्रह नक्षत्रोँ की एक विशेष स्थिति बनती है। ज्योतिष में गर्भाधान केवल एक जैविक प्रक्रिया मात्र ही नहीं है, अपितु ग्रह-नक्षत्रों से प्रभावित एक आध्यात्मिक घटना मानी जाती है। इस संस्कार के लिए ग्रह-नक्षत्रों की भूमिका अत्यंत ही महत्वपूर्ण बतायी गई है। इस अध्य्यन को दो भागोँ में विभक्त किया जा सकता है-
1 ग्रहों की भूमिका:
सूर्य: तेज, आत्मबल और नेतृत्व का कारक है।
चंद्रमा: मन और भावनाओं का कारक, संतान के स्वभाव को प्रभावित करता है।
शुक्र: सौंदर्य, कला और प्रेम का कारक, संतान की आकर्षकता और कोमलता से जुड़ा है।
बृहस्पति: ज्ञान और धर्म का कारक, संतान को विद्वान और धर्मपरायण बनाता है।
इस प्रकार गर्भाधान के समय निर्धारण में ग्रहोँ की विशिष्ट स्थिति और उनका बल जन्म लेने वाली संतान के अच्छे भाग्य और जीवन को सकरात्मक दिशा प्रदान करते हैं।
2.मुहूर्त का महत्व:
गर्भाधान के लिए शुभ मुहूर्त का चयन किया जाता है। पंचांग के पांचोँ अंगोँ तिथि, वार, नक्षत्र, योग और करण का प्रयोग करते हुए शुभ मुहूर्त निकाला जाता है। जहाँ तक नक्षत्रोँ का प्रश्न है तो रोहिणी, मृगशिरा, पुनर्वसु, उत्तरा फाल्गुनी जैसे नक्षत्र श्रेष्ठ बताये गये हैं। वहीँ अमावस्या, संक्रांति, ग्रहण आदि समय वर्जित बताया गया है। गर्भाधान का दिन, समय, तिथि, वार, नक्षत्र, चंद्र-स्थिति, दंपतियों की कुंडलियों का ग्रह-गोचर आदि सभी बातों का गहनता से परीक्षण के उपरांत ही गर्भाधान का मुहूर्त की गणना की जाती है।
योग्य संतान के लिए शुभ मुहूर्त, ग्रहों की अनुकूलता और शुद्ध संकल्प सभी आवश्यक है। गर्भाधान की ज्योतिषीय व्याख्या हमें यह सिखाती है कि संतानोत्पत्ति केवल शरीर की प्रक्रिया नहीं, बल्कि ग्रहों की ऊर्जा और संस्कारों का संगम है। इसलिए गर्भाधान को शुभ समय, शुद्ध संकल्प और देवपूजन के साथ करना श्रेयस्कर बताया गया है। गर्भाधान के समय ग्रहों की स्थिति संतान की जन्मकुंडली में परिलक्षित होती है। यह स्थिति संतान के स्वभाव, गुण, रुचि और जीवन-पथ को प्रभावित करती है। इसे इस प्रकार समझा जा सकता है कि यदि गर्भाधान के समय गुरु और चंद्रमा शुभ हों, तो संतान विद्वान और शांत स्वभाव की होती है। और यदि मंगल और शनि की अशुभ दृष्टि हो, तो संतान में संघर्षशीलता और कठोरता अधिक हो सकती है।
विभिन्न वैज्ञानिक शोधोँ से यह बात स्पष्ट रूप से प्रमाणित हो चुकी है कि माता-पिता का पूर्ण प्रभाव उनकी संतान पर पड़ता है। और इनमेँ भी विशेष रूप से माँ का प्रभाव पडता है क्योंकि माता अपनी संतान को तकरीबन नौ महीनोँ तक अपने पेट में आश्रय देती है। विभिन्न वैज्ञनिक और चिकित्सीय तकनीकि इस बात की पुष्टि भी करती हैं। अत: जिस समय एक दम्पत्ति गर्भाधान कर रहे होते हैं, उस समय ब्रह्मांड में ग्रहोँ और नक्षत्रों की व्यवस्था होने वाली संतान पर अपना पूर्ण प्रभाव डालती हैं। इस महत्वपूर्ण तथ्य को ध्यान में रखते हुए हमारे शास्त्रों में गर्भाधान के मुहूर्त की व्यवस्था रखी गई है और इस पर विशेष बल भी दिया गया है।
3.प्रारब्ध:-
तीसरा और महत्वपूर्ण घटक उन कर्मोँ के प्रभाव से सम्बंधित है जो जन्म के समय जातक को प्राप्त होते हैं। संचित कर्मों का यह एक छोटा सा भाग होता है जो जातक को जन्म के समय प्राप्त होता है और प्रारब्ध के नाम से जाना जाता है। प्रारब्ध के रूप में प्राप्त कर्म वे कर्म होते हैं जो हमें वर्तमान जीवन के लिए प्राप्त होते हैं। सामान्य बोलचाल की भाषा में इन्ही पूर्वार्जित कर्मोँ को हम भाग्य भी कहते हैं जिन्हे हमें भोगना होता है। इसे अंग्रेजी में डेस्टिनी के नाम से भी जाना जाता है। जन्मकुँडली के बारह भाव हमें बताते हैं कि वे कौन से योग हैं, वे कौन से फल हैं जिनकी प्राप्ति जातक को होने वाली है। प्रत्येक भाव दो प्रकार के अवयवोँ से मिलकर बना होता है प्रथम जड और दूसरा जीव कहलाता है। भावस्थ राशि, भावस्थ ग्रह और भाव के कारकत्व निश्चित होने के कारण जड भाग के अंतर्गत बताये गये गये हैं वहीँ दूसरी ओर भावेश, ग्रहोँ का गोचर इत्यादि जीव के अंतर्गत बताये गये हैं। भाव में स्थित ग्रह जो कि भाव का जड पक्ष होता है भाव को नियंत्रित करने में अहम भूमिका निभाता है। ग्रहोँ की स्थिति इस बात का सूचक होती है कि हम इस प्रकार करेंगे और हमें इस प्रकार के फलोँ की प्राप्ति होगी। जातक की जन्मकुंडली का जड भाग ही उसके प्रारब्ध कर्मोँ के रूप में जाना जाता है। इस प्रकार जातक के जीवन की रूपरेखा के निर्धारण में प्रारब्ध कर्मोँ का बहुत बडा योगदान रहता है।
इस आधार पर हम यह निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि यदि किसी भी दो जातकोँ के जन्म के समय गर्भाधान समय, जन्म समय और प्रारब्ध एक समान हो तो इस बात में कोई संशय नही रह जाता कि उनका जीवन एक समान हो। परांतु क्या वास्तव में ऐसा सम्भव है? यदि सूक्षमता के साथ इस बिंदु पर विचार किया जाये तो हम पाते हैं कि ऐसा किसी भी परिस्थिति में सम्भव नही है। यहां सबसे महत्वपूर्ण तथ्य और ध्यान देने योग्य बात यह है कि हमें इन तीन घटकोँ में से केवल एक घटक अर्थात जन्म-समय ठीक ठीक ज्ञात होता है। जहाँ तक गर्भाधान समय की बात है तो सामान्य रूप से ज्ञात नही होता है परंतु इसे ज्योतिषीय गणना के माध्यम से ज्ञात किया जा सकता है। अब यदि थोडी देर के लिए यह मान भी लिया जाये कि किन्ही दो जातकोँ का जन्म समय और गर्भाधान समय समान है तब उस संचित कर्म का क्या जो जन्म जन्मांतर से जातक के द्वारा किए गये हैं और जिसका कि एक अत्यंत ही सूक्ष्म भाग उसे प्रारब्ध के रूप में वर्तमान जन्म में भोगने हेतु प्राप्त होता है। ये कर्म किसी भी सूरत में दो जातकोँ के लिए समान नही हो सकते हैं। इस प्रकार तीसरा घटक अर्थात प्रारब्ध न तो हमें ज्ञात होता है और न ही उसे ज्ञात किया जा सकता है। ज्योतिष कहता है कि जन्म समय समान होने के बावजूद भी किन्ही दो जातकोँ का भविष्य एक समान नही हो सकता है, क्योंकि ग्रह योग केवल प्रारंभिक संकेत देते हैं। यथार्थ में उनका भविष्य और जीवन का वास्तविक परिणाम कर्म, संस्कार, परिवेश और अवसरों के चुनाव से तय होते हैं। इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि एक ही समय जन्म लेने वाले जातकोँ का जीवन एक-दूसरे से भिन्न पाया जाता है।
ज्योतिष मनुष्य के वर्तमान और भावी जीवन पर प्रकाश डालता है और एक बेहद उपयोगी मार्गदर्शक के रूप में कार्य करता है। समय-समय पर इसे देश, काल व पात्र के अनुसार अद्यतन करने की भी आवश्यकता है। ज्योतिष शास्त्र समुद्र की भांति ज्ञान का अथाह सागर है। इसे पूर्ण रुपेण समझ पाना अत्यंत ही दुष्कर कार्य है। इसमेँ व्यक्ति जितना अधिक गहराई में उतरता जाता है उसका ज्ञान और ज्योतिष को समझने की उसकी उत्कंठा उतनी ही अधिक बलवती होती जाती है। सामान्य रूप से देखने में आता है कि अधिकतर लोग ज्योतिष के प्रति अत्यंत ही संकुचित द्रष्टिकोण अपनाते हैं और नासमझी के कारण इस गूढ विषय का माखौल उडाते हैं। श्रेयस्कर तो यह होगा कि ऐसे लोग ज्योतिष के संबंध में क्षुद्र और संकुचित दृष्टिकोण अपनाना त्यागकर इसके विराट स्वरूप को समझने का प्रयत्न करेँ जिससे उनको और सम्बंधित जनोँ को लाभ की प्राप्ति हो सके और जीवन सफल हो सके। एक ही समय में जन्मे जातकोँ के भविष्य की ज्योतिषीय व्याख्या सम्बंधित यह लेख आर्ष साहित्य, विभिन्न किताबोँ और अन्य सूचना माध्यमोँ पर आधारित है। यह एक छोटा सा प्रयास है जिसमेँ इस जटिल प्रश्न पर हल्का सा प्रकाश डालने का प्रयास किया गया है। इस दिशा में अभी शोध जारी है और काफी कार्य और किया जाना है। निश्चित रूप से आगे आने वाले शोध कार्य ज्योतिष शास्त्र जैसे गूढ विज्ञान के विभिन्न रहस्योँ से पर्दा उठाने का प्रयास करेंगे।
- इंजी. संजय श्रीवास्तव,
बालाघाट, मध्यप्रदेश 9425822488


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