कुंडली में जॉब (नौकरी) या बिजनेस (व्यापार) देखने के लिए मुख्य रूप से जन्मपत्री के दशम भाव (10th House) और सप्तम भाव (7th House) का अध्ययन किया जाता है
कुंडली में जॉब या बिजनेस कैसे चेक करें?
अधिकांशतः जातक अपने तथा अपने परिवार के भरण-पोषण के लिए तथा आत्मनिर्भर और आर्थिक रूप से सशक्त होने के लिए जीविकोपार्जन करते है, जिसमें नौकरी और व्यवसाय जैसे कार्य सम्मिलित हैं। कभी-कभी जातक के लिए यह निर्णय लेना कठिन होता है कि वह स्वयं का व्यवसाय करे अथवा नौकरी। इस प्रश्न का उत्तर जानने में ज्योतिष शास्त्र की सहायता ली जा सकती है। जब जातक अपने कार्यक्षेत्र में स्वयं निर्णय लेने में समर्थ होता है तथा उसे किसी के निर्देशन अथवा दबाव में कार्य नहीं करना पड़ता तो ज्योतिषशास्त्र में उसे व्यवसाय की श्रेणी में रखा जाता है, उदाहरण के लिए स्वयं का व्यवसाय। इसके विपरीत यदि कार्यक्षेत्र में जातक किसी के अधीनस्थ हो तथा किसी के निर्देशन में कार्य करते हों तो ज्योतिषशास्त्र में उस कार्य को नौकरी की संज्ञा दी जाती है। यदि जातक अपनी और अपने परिवार की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए कार्य करना चाहता है तो वह निश्चित रूप से नौकरी ही करता है। लेकिन इसके विपरीत यदि जातक कार्यक्षेत्र में जोखिम उठाने का साहस लेकर आगे बढ़ना चाहता है तो उसे व्यवसाय करना चाहिए। ध्यान देने योग्य बात यह है कि यदि कोई जातक किसी कंपनी के सीईओ या चीफ एक्जीक्यूटिव ऑफीसर या सीनियर मैनेजर की नौकरी करता हो अथवा सरकारी नौकरी में ही उच्च पद पर हो, और इस स्थिति में यदि जातक स्वयं निर्णय लेने में समर्थ हो, तो ज्योतिषशास्त्र में उसके कार्य को व्यवसाय ही माना जाएगा, भले ही व्यवहारिक तौर पर उसका कार्यक्षेत्र नौकरी के अंतर्गत ही क्यों न आता हो।
D10 पत्रिका का उपयोग कार्यक्षेत्र के सूक्ष्म विश्लेषण के लिए किया जाता है। सामान्यतया D10 के दशम भाव में स्थित ग्रह कार्यक्षेत्र में जातक की कार्य शैली को बताता है। उदाहरण के लिए यदि D10 पत्रिका के दशम भाव में यदि सूर्य स्थित हो तो जातक की कार्यशैली आदेशात्मक होगी, चंद्रमा स्थित हो तो जातक के कार्यक्षेत्र में लगातार बदलाव हो सकता है साथ ही संभव है कि वह पब्लिक डीलिंग से संबंधित कार्य करे। यदि मंगल हो तो जातक अपने कार्य क्षेत्र में ऊर्जावान बना रहेगा, यदि बुध स्थित हो तो जातक का कार्यक्षेत्र काफी कम्युनिकेटिव हो सकता है, यदि गुरु स्थित हो तो जातक अपने कार्यक्षेत्र में ज्ञान बाँटने, गाइड करने का कार्य कर सकता है, यदि शुक्र स्थित हो तो जातक अपने कार्य क्षेत्र में व्यवस्थित होगा तथा अपने व्यक्तित्व को लेकर संवेदनशील होगा। यदि शनि स्थित हो तो जातक अपने कार्यक्षेत्र में छोटे-बड़े सभी कार्य स्वयं ही करने में विश्वास करेगा। यदि राहु स्थित हो तो जातक अपने कार्य क्षेत्र में अत्यधिक महत्वाकांक्षी होगा, लेकिन यदि केतु हो तो जातक के कार्य क्षेत्र उतार चढ़ाव आ सकते हैं तथा वह अपने कार्य क्षेत्र को आध्यात्मिक दृष्टिकोण से देखने का काम भी करेगा।
लग्न पत्रिका में यदि लग्नेश उपचय भाव (3,6,10,11) में हो तथा बुध या गुरु के साथ हो तो जातक का झुकाव व्यवसाय की ओर ही होगा अथवा वह काउंसलर, गाइड या मेंटर का कार्य कर सकता है, क्योंकि इस स्थिति में जातक किसी के अधीनस्थ कार्य करने में कठिनाई का अनुभव करता है। इसीप्रकार यदि लग्न पत्रिका का दशमेश भी बली होकर उपचय भाव में स्थित हो तो जातक अपने कार्यक्षेत्र में जोखिम उठाने का साहस रखता है तथा उसका झुकाव स्वयं का व्यवसाय करने में ही होगा। इसके पश्चात् D10 पत्रिका के लग्न की राशि लग्न पत्रिका के किस भाव में स्थित है। उदाहरण के लिए माना कि D10 पत्रिका के लग्न की राशि सिंह है तथा लग्न पत्रिका के लग्न में मिथुन राशि है। इस स्थिति में D10 पत्रिका के लग्न की राशि लग्न पत्रिका में तृतीय भाव में आएगी, अतः यह कहा जा सकता है कि जातक का कार्य पब्लिक डीलिंग से संबंधित होगा। इसीप्रकार यदि D10 पत्रिका का लग्न, लग्न पत्रिका में षष्ठम, अष्टम या द्वादश भाव में पड़ता हो तो जातक को अपने कार्य से संबंधित संघर्षों का सामना करना पड़ सकता है।
इसके साथ ही लग्न पत्रिका के दशमेश की स्थिति D10 पत्रिका में भी देखना चाहिए। यदि लग्न पत्रिका के दशमेश की स्थिति D10 पत्रिका में अच्छी हो (जैसे उच्च राशि में या मित्र राशि में) तो जातक का प्रोफेशन अच्छा होगा। यदि द्वितीय और एकादश भाव में कई ग्रह एकसाथ स्थित हों तो जातक को अनेक स्रोतों से धन की प्राप्ति हो सकती है।
बुध ग्रह व्यापार से तथा शनि ग्रह नौकरी से संबंध रखता है। बुध की स्थिति यदि लग्न पत्रिका व D10 पत्रिका में अच्छी हो तो जातक व्यापार की ओर अग्रसर हो सकता है, इसीप्रकार दोनों पत्रिकाओं में शनि की अच्छी स्थिति जातक के जीवन में नौकरी की प्राथमिकता को इंगित करता है। यदि लग्न पत्रिका में कोई ग्रह वक्री हो तथा वह D10 पत्रिका में केंद्र में स्थित हो तो उसकी दशा आने पर जातक का प्रोफेशन स्थिर नहीं रहता। किसी भी एक दशा के समाप्त होने पर जब दूसरी दशा प्रारंभ होने के समय जातक के करियर में उतार चढ़ाव आ सकते हैं, क्योंकि प्रत्येक ग्रह के कार्यकत्व अलग-अलग होते हैं। यदि D10 पत्रिका में चर राशियों में ज्यादा ग्रह हों तो जातक का कार्यक्षेत्र बदलता रहता है या संभव है कि एक ही कार्यक्षेत्र के अंतर्गत उसको मिलने वाले प्रोजेक्ट बदलते रहते हैं। लग्न पत्रिका के दसवें भाव में स्थित वक्री ग्रह भी जातक के कार्यक्षेत्र में बदलाव का संकेत देते हैं। यदि जातक की लग्न पत्रिका में दशमेश वक्री हो तो जातक को संघर्षों के उपरांत ही सफलता प्राप्त होती है। लग्न पत्रिका में लग्नेश यदि दशम भाव या दशमेश से संबंध बनाता है तो जातक के लिए उसका करियर बहुत महत्वपूर्ण होता है, अर्थात् वह किसी भी परिस्थिति में अपने करियर के प्रति समर्पित होता है। यदि लग्न पत्रिका में शनि व केतु का संबंध हो या दशमेश और केतु का संबंध हो तो जातक के करियर में ब्रेक लगने की संभावना होती है। यदि लग्न पत्रिका में लग्न का संबंध शुक्र से हो तो संभव है कि जातक का जीवन यापन बिना किसी मेहनत के हो। D10 के लग्न का विश्लेषण करके जातक के स्टेट्स के बारे में जाना जा सकता है तथा D10 के दशम भाव का विश्लेषण करके जातक के कार्यक्षेत्र के स्टेट्स के बारे में जाना जा सकता है।
ज्योतिषशास्त्र के कुछ महत्वपूर्ण नियमों के द्वारा यह ज्ञात किया जा सकता है कि जातक नौकरी करेगा या व्यवसाय। कर्मफल दाता शनिदेव को कर्म के क्षेत्र में सर्वाधिक महत्वपूर्ण ग्रह माना जाता है। यदि पत्रिका में शनि उच्च राशि में, स्वराशि में या मूल त्रिकोण की राशि में हो, त्रिक भाव (6, 8, 12) में स्थित न हो तथा त्रिक भाव का स्वामी भी न हो तो वह गोचरस्थ शनि कहलाता है। इसके विपरीत यदि शनि अस्त हो, नीच राशि में हो, गृह युद्ध में पराजित हो या राहु/केतु के साथ हो तो उसे अगोचरस्थ शनि कहा जाता है। गोचरस्थ शनि स्वयं के व्यवसाय के लिए अच्छे परिणाम देता है तथा अगोचरस्थ शनि नौकरी के लिए अच्छे परिणाम देता है। यदि अगोचरस्थ शनि त्रिक भाव का स्वामी हो तथा त्रिक भाव को दृष्ट भी करता हो तो वह अगोचरस्थ नहीं रहता, इस स्थिति में वह गोचरस्थ बन जाता है। कार्यक्षेत्र के लिए दशमांश या D10 पत्रिका का विशेष महत्व है। D10 पत्रिका का उपयोग कार्यक्षेत्र के सूक्ष्म विश्लेषण के लिए किया जाता है। नवांश या D9 पत्रिका से ग्रहों के बलाबल तथा जातक के भविष्य की घटनाओं का विश्लेषण किया जाता है। अतः जातक के प्रोफेशन को जानने के लिए शनिदेव की स्थिति को D1, D9 तथा D10 में देखते हैं। यदि शनि D1 पत्रिका में गोचरस्थ हो तथा D9 या D10 में अगोचरस्थ हो तो जातक अपने जीवन में पहले व्यवसाय करता है तथा बाद में वह नौकरी करने लगता है। इसीप्रकार यदि शनि D1 में अगोचरस्थ हो तथा D9 या D10 में गोचरस्थ हो तो जातक अपने जीवन में पहले नौकरी करता है तथा बाद में वह व्यवसाय करने लगता है। यदि तीनों पत्रिकाओं में शनि गोचरस्थ हो तो जातक जीवन भर व्यवसाय करता है तथा यदि तीनों पत्रिकाओं में यदि शनि अगोचरस्थ हो तो जातक जीवन भर नौकरी करता है। ध्यान रखने योग्य बात यह है कि कार्यक्षेत्र के विश्लेषण में D10 का महत्व D9 से कहीं अधिक होता है।
यदि गोचरस्थ शनि, सूर्य या चंद्र अथवा दशम या दशमेश से संबंध बनाता है तो जातक के व्यवसाय में ही रहने की पूरी-पूरी संभवना होती है। यदि अगोचरस्थ शनि सूर्य या चंद्रमा अथवा दशम या दशमेश से संबंध बनाता है तो जातक के हमेशा नौकरी में ही रहने की पूरी-पूरी संभवना होती है।
सूर्य, चंद्रमा, मंगल तथा राहु पूर्ण परमात्मांश ग्रह कहलाते हैं। सूर्य की महादशा के पश्चात् जातक के जीवन में क्रमानुसार चंद्रमा, मंगल और राहु की महादशा आती है। ये सभी महादशाएँ जातक के प्रोफेशन के लिए बहुत महत्वपूर्ण होती हैं। अतः यदि पत्रिका में इन चारों पूर्ण परमात्मांश ग्रहों में से कोई भी दो ग्रह D10 पत्रिका में लग्न/लग्नेश या दशम/दशमेश से संबंध बनाते हो तो जातक का झुकाव स्वयं का व्यवसाय की ओर होता है तथा वह उसके लिए मेहनत भी करता रहता है।
पत्रिका में दशम भाव जातक के कार्यक्षेत्र की तथा तृतीय भाव परिश्रम और साहस की सूचना देता है। अतः यदि D10 पत्रिका में दशम भाव से तृतीय भाव के बीच पाँच ग्रह स्थित हों और उनमें से कम दो ग्रह पूर्ण परमात्मांश ग्रह (सूर्य, चंद्र, मंगल, राहु) हो तो यह जातक की इच्छाशक्ति को बढ़ाता है तथा उसके जीवन में व्यवसाय की प्राथमिकता को दर्शाता है। इसीप्रकार यदि D10 पत्रिका में सप्तम से बारहवें भाव के बीच पाँच ग्रह स्थित हों तथा उनमें से कम से कम दो ग्रह पूर्ण परमात्मांश ग्रह हों तो यह जातक के जीवन में नौकरी की प्राथमिकता को दर्शाते हैं।
चूँकि तृतीय भाव साहस को दर्शाता है तथा स्वयं के व्यवसाय के लिए जातक में साहस का होना अत्यंत आवश्यक है इसलिए D10 पत्रिका में तृतीय भाव का विश्लेषण करके यह जाना जा सकता है कि जातक स्वयं का व्यवसाय करने में रुचि रखता है अथवा नहीं। यदि D10 पत्रिका के तृतीय भाव में पाप ग्रह स्थित हो तथा भाव को शुभ ग्रह दृष्ट कर रहा हो तो तीसरा भाव बली माना जाता है। इसके विपरीत यदि तीसरे भाव में शुभ ग्रह स्थित हो और भाव को पाप ग्रह दृष्ट करता हो तो तृतीय भाव निर्बल हो जाता है।
लग्न पत्रिका में पंचमेश के नक्षत्र स्वामी की स्थिति का विश्लेषण भी किया जाता है। यदि वह नक्षत्र स्वामी ग्रह शनि या मंगल की राशियों में हो तो जातक के तकनीकी क्षेत्र में शिक्षा प्राप्त करने की संभावना होती है। यदि वह नक्षत्र स्वामी ग्रह सूर्य या बुध की राशियों में हो तो जातक के अर्ध-तकनीकी क्षेत्र में शिक्षा प्राप्त करने की संभावना होती है। यदि वह नक्षत्र स्वामी ग्रह चंद्रमा, शुक्र या गुरु की राशि में हो तो जातक के द्वारा सामान्यतः तकनीकी क्षेत्र को छोड़कर अन्य किसी क्षेत्र में शिक्षा प्राप्त करने की संभावना होती है। यदि वह नक्षत्र स्वामी ग्रह लग्न/लग्नेश या दशम/दशमेश से संबंध बनाता है तो जातक अपनी शिक्षा का उपयोग अपने व्यवसाय में करता है। यह संबंध D10 में भी देखना चाहिए। वराहमिहिर द्वारा लिखित वृहद् जातक के अनुसार लग्न से दशम भाव में स्थित ग्रह के द्वारा जातक को धन की प्राप्ति होती है। इसप्रकार यदि दशम भाव में सूर्य हो तो जातक को पिता से, चंद्रमा हो तो माता से, मंगल हो तो शत्रुओं से, बुध हो तो दोस्तों से, गुरु हो तो बड़े भाइयों से, शुक्र हो तो पत्नी या स्त्री से, शनि हो तो नौकर से धन की प्राप्ति होती है।लेकिन ये सभी ग्रह यदि अच्छी स्थिति में हो तभी धन की प्राप्ति करवा सकते हैं, अन्यथा ये ग्रह धन की हानि भी करवा सकते हैं। दूसरे नियम के अनुसार लग्न पत्रिका के दशमेश का नवांश स्वामी जातक के लिए आय के स्रोत का कार्य करता है। जन्म कुंडली में यदि वह नवांश स्वामी ग्रह अपने मित्र की राशि में हो तो जातक को मित्रों की सहायता से धन प्राप्त होता है। यदि वह नवांश स्वामी ग्रह अपने शत्रु राशि में स्थित हो तो जातक को शत्रुओं के कारण धन की प्राप्ति होती है। यदि वह नवांश स्वामी ग्रह स्वराशि में हो तो जातक अपने पुरुषार्थ से धन अर्जित करता है। एक अन्य नियम के अनुसार यदि शुभ ग्रह लग्न में, द्वितीय भाव में या एकादश भाव में स्थित हो तो जातक आसानी से धन की प्राप्ति करता है। लेकिन यदि लग्न, द्वितीय या एकादश भाव में अशुभ ग्रह स्थित हो तो धन की प्राप्ति के लिए जातक को परिश्रम करना पड़ता है। यदि इन भावों मिले-जुले (शुभ और अशुभ) ग्रह हों तो अपनी अपनी दशाओं में वे तदनुसार परिणाम देते हैं।
उपरोक्त कुंडली गौतम अडानी की है (DOB: 24-06-1962, TOB: 5:15, POB: Ahmedabad)। इसमें शनि स्वराशि के होकर बली है लेकिन राहु केतु अक्ष पर भी है, जिसके कारण शनि को अगोचरस्थ माना जा सकता है लेकिन दसवें भाव से तृतीय भाव तक चारों पूर्ण परमात्मांश ग्रह (सूर्य, चंद्रमा, मंगल और राहु) स्थित हैं अतः जातक का स्वयं के व्यवसाय की ओर झुकाव को बताता है। जातक की नवांश पत्रिका निम्नानुसार है:
जातक की नवांश पत्रिका में भी शनि को अगोचरस्थ माना जा सकता है क्योंकि वह षष्टम भाव का स्वामी है, परंतु इसके बावजूद भी शनि अपने मित्र की राशि में अपने मित्र के साथ केंद्र में स्थित है अतः शनि की स्थिति अच्छी है। नवांश पत्रिका में भी दसवें और तीसरे भाव तक दो पूर्ण परमात्मांश ग्रह मंगल और राहु स्थित है जबकि सप्तम से बारहवें भाव तक केवल एक ही पूर्ण परमात्मा ग्रह चंद्रमा स्थित है। अतः नवांश पत्रिका भी जातक के स्वयं के व्यवसाय की ओर झुकाव होने की पुष्टि करते हैं।
जातक की D10 पत्रिका निम्नानुसार है:
D10 पत्रिका में शनि स्वराशि के होकर त्रिकोण भाव में स्थित है लेकिन राहु-केतु अक्ष में भी हैं अतः यहाँ भी शनि को अगोचरस्थ ही हैं। दसवें से तीसरे भाव तक चारों परमात्मांश ग्रह (सूर्य, चंद्रमा, मंगल और राहु) स्थित हैं। अतः इन तीनों पत्रिकाओं के विश्लेषण से यह कहा जा सकता है कि जातक का स्वयं का व्यवसाय होगा लेकिन संभव है कि प्रारंभ में उसे नौकरी करना पड़े। गौतम अडानी जी ने प्रारम्भ में नौकरी ही की थी, बाद में वे स्वयं के व्यवसाय की ओर मुड़ गए। यह लेख मैंने गुरुदेव श्री नितिन कश्यप जी तथा गुरुदेव श्री वी पी गोयल जी को नमन करते हुए उनके व्याख्यानों से प्रेरित होकर लिखा है।
इस प्रकार जातक की लग्न पत्रिका, नवांश पत्रिका तथा दशमांश पत्रिका के वृहद् विश्लेषण के द्वारा जातक की आजीविका के बारे में जाना सकता है तथा उसे इस दिशा में सही मार्गदर्शन दिया जा सकता है।
- डॉ. सुकृति घोष
प्राध्यापक, भौतिक शास्त्र
शा. के. आर. जी. कॉलेज
ग्वालियर, मध्यप्रदेश

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