ज्योतिष शास्त्र में लग्न पत्रिका में लग्न के अंश तथा पत्रिका में विभिन्न भावों में स्थित ग्रहों के भोगांशों का विशेष महत्व है। इनकी सटीक जानकारी होने
ग्रहों के अंशों का महत्व
ज्योतिष शास्त्र में लग्न पत्रिका में लग्न के अंश तथा पत्रिका में विभिन्न भावों में स्थित ग्रहों के भोगांशों का विशेष महत्व है। इनकी सटीक जानकारी होने पर ही किसी पत्रिका का भली प्रकार विश्लेषण किया जा सकता है।
ज्योतिष के ग्रंथों में ग्रहों की बालादि अवस्थाओं का वर्णन है, जो कि ग्रहों के भोगांशों पर निर्भर करती हैं। यदि कोई ग्रह विषम राशि में 0° से 6° के बीच में हो तो इसे ग्रह की बाल अवस्था कहा जाता है तथा बाल अवस्था का ग्रह कुंडली में लगभग 25% परिणाम ही दे पाता है। यदि ग्रह विषम राशि में 6° से 12° के बीच में हो तो उसे ग्रह की कुमार अवस्था कहा जाता है तथा कुमार अवस्था का ग्रह कुंडली में लगभग 50% परिणाम देता है। यदि ग्रह विषम राशि में 18° से 24° के बीच में हो तो इसे ग्रह की युवावस्था कहा जाता है और ऐसा ग्रह कुंडली में संपूर्ण परिणाम अर्थात् 100% परिणाम देने में सक्षम होता है। यदि ग्रह विषम राशि में 24° से 30° के बीच में हो तो उसे ग्रह की वृद्ध अवस्था कहा जाता है तथा ऐसा ग्रह कुंडली में 40% से 50% परिणाम ही दे पाता है। यदि ग्रह विषम राशि में 24° से 30° के बीच में हो तो इसे ग्रह की मृत अवस्था कहा जाता है तथा ऐसे ग्रह कुंडली में नगण्य परिणाम देते हैं। यदि ग्रह कुंडली में सम राशि में स्थित हो तो, वह 0° से 6° के बीच में मृत अवस्था में, 6° से 12° के बीच में वृद्ध अवस्था में, 12° से 18° के बीच में वह युवावस्था में, 18° से 24° के बीच में वह कुमार अवस्था में तथा 24° से 30° के बीच में वह बाल अवस्था में कहलाता है। जेमिनी में सर्वाधिक अंशों वाला ग्रह आत्मकारक कहलाता है तथा पत्रिका में उसका बहुत अधिक महत्व होता है। सामान्यतः आत्मकारक ग्रह के अंश 24° से 30° के बीच ही होता है। इसके विपरीत बालादि अवस्था में विषम राशि में 24° से 30° के बीच स्थित ग्रह मृत तथा सम राशि में 24° से 30° के बीच स्थित ग्रह बाल अवस्था का ग्रह कहलाता है। दोनों ही स्थितियों में ग्रह अपने पूर्ण परिणाम देने में असमर्थ होता है। इसप्रकार आत्मकारक ग्रह का सिद्धांत बालादि अवस्था के सिद्धांत से बिल्कुल ही अलग है, जो कि ज्योतिष शास्त्रियों के लिए एक तर्क का विषय है।
ज्योतिष शास्त्र में नवांश कुंडली का बहुत महत्व है। नवांश पत्रिका के द्वारा ही ग्रहों के बलाबल को भली प्रकार जाना जा सकता है। कोई भी ग्रह यदि लग्न पत्रिका और नवांश पत्रिका दोनों में एक ही राशि में हो तो वह वर्गोत्तम कहलाता है तथा ऐसे ग्रहों के संपूर्ण परिणाम प्राप्त होते हैं, चाहे उसके अंश कितने भी हों। चर राशियों (1, 4, 7, 10) में जब कोई ग्रह 0° से 3°20' के बीच हो तो वह वर्गोत्तम होता है, जो अपने संपूर्ण परिणाम देने में समर्थ होता है। जबकि बालादि अवस्था में ऐसा ग्रह बाल (1 व 7 राशियों के लिए) अथवा मृत (4 व 10 राशियों के लिए) होकर परिणाम देने में असमर्थ होगा। इसीप्रकार द्विस्वभाव राशियों (3, 6, 9, 12) में यदि कोई ग्रह 26°40' से 30° के बीच हो तो वह वर्गोत्तम होता है। यहाँ भी ग्रह विषम राशियों में मृत तथा सम राशियों में बाल अवस्था में होकर पूर्ण परिणाम देने में असमर्थ होता है। अतः वर्गोत्तम ग्रह का सिद्धांत भी बालादि अवस्था के सिद्धांत से बिलकुल अलग या विपरीत ही कहा जा सकता है।
सभी ग्रह विशेष अंशों में ही परम उच्च व परम नीच के होते हैं, जैसे सूर्य मेष राशि में 10° पर, चंद्रमा वृषभ राशि में 3° पर, मंगल मकर में 28° पर, बुध कन्या में 15° पर, बृहस्पति कर्क में 5° पर, शुक्र मीन में 27° पर, शनि तुला में 20° पर परम उच्च के होते हैं। मंगल, मकर राशि में 28° पर बाल अवस्था में होगा इसीप्रकार शुक्र भी मीन राशि में 27° पर बाल अवस्था में ही होगा। बृहस्पति कर्क राशि में 5° पर मृत अवस्था में होगा तथा चंद्रमा भी वृषभ राशि में 3° पर मृत अवस्था में होगा। अतः ग्रहों के परम उच्च के सिद्धांत में भी बालादि अवस्था का कोई प्रभाव नहीं पड़ता। इसप्रकार किसी पत्रिका में ग्रहों के सभी पहलुओं को ध्यान में रखते हुए बालादि अवस्था का उपयोग बहुत सावधानी के साथ करना चाहिए।
लग्न की डिग्री बहुत महत्वपूर्ण होती है। पत्रिका में जितने भी ग्रहों की डिग्री लग्न की डिग्री के आसपास होते हैं, वे सभी अपना पूर्ण फल देने में समर्थ होते हैं। उदाहरण के लिए यदि किसी पत्रिका में लग्न 5° का हो तो पत्रिका में जो भी ग्रह किसी भी राशि में 5°अथवा उसके आसपास हो वे सभी अपना पूर्ण फल देने में समर्थ होते हैं। व्यावहारिक रूप से पत्रिका में जो भी ग्रह लग्न की डिग्री के तीन डिग्री आगे तथा तीन डिग्री पीछे के अंतराल में होते हैं, वे सभी पत्रिका में स्वतः ही बली हो जाते हैं। जैसे माना कि पत्रिका में लग्न 10° का हो तो 10°-3°=7° तथा 10°+3°=13°। अतः जो ग्रह किसी भी राशि में 7° व 13° के मध्य होंगे वे सभी बली होंगे। इसके अलावा उच्च के ग्रह (विशेषकर अपने अपने उच्चांश पर), वर्गोत्तम ग्रह, नवांश में बली ग्रह तथा ऐसे ग्रह जिनका विंशोपक बल अधिक हो, अपना पूर्ण फल देने में समर्थ होते हैं, भले ही बालादि अवस्था में वे वृद्ध अथवा मृत ही क्यों न हों। लेकिन यदि ग्रह अग्नितत्व राशि में हो अर्थात् मेष, सिंह व धनु (1, 5, 9) में हो तथा उसकी डिग्री 0° से 3° (अर्थात् प्रारम्भ की 3° के अंतर्गत) हो अथवा ग्रह जलतत्व राशि में हो अर्थात् कर्क, वृश्चिक व मीन (4, 8, 12) में हो तथा उसकी डिग्री 27° से 30° (अर्थात् अंतिम 3° के अंतर्गत) हो तो वे ग्रह गंडान्त के ग्रह कहलाते हैं तथा उनके परिणाम अच्छे प्राप्त नहीं होते।
यदि दो ग्रह एक ही राशि में हो लेकिन उनके अंशों में ज्यादा अंतर हो तो उनकी युति नहीं मानी जाती। लेकिन यदि दो ग्रह आस-पास की राशियों में अलग-अलग हों, लेकिन उनमें अंशों का अंतर ज्यादा न हो तो भी उनकी युति मानी जाती है। भाव चलित कुंडली बनाने के लिए सर्वप्रथम लग्न की डिग्री देखी जाती है। लग्न की डिग्री में 15 जोड़ने या 15 घटाने के पश्चात जो संख्या आती है, उसे नोट कर लिया जाता है। पत्रिका में जिन ग्रहों की डिग्री उस संख्या के अंदर आती हो वे सब भाव चलित कुंडली में उसी भाव में रह जाते हैं, जिनमें वे लग्न पत्रिका में हैं। लेकिन यदि किसी ग्रह की डिग्री उस संख्या के अंदर नहीं आती तो वह अपनी डिग्री के अनुसार आगे या पीछे के भाव में चला जाता है। उदाहरण के लिए वृषभ लग्न की पत्रिका में यदि लग्न 20° का हो और लग्न में ही शुक्र 3° पर और बुध 23° पर विराजमान हों तो यह युति नहीं मानी जाएगी, क्योंकि शुक्र और बुध के बीच 20° का अंतर है। एक दूसरे उदाहरण के अंतर्गत वृषभ लग्न की ही पत्रिका में यदि लग्न 20° का हो और लग्न में शुक्र 3° पर विराजमान हो तथा बारहवें भाव में बुध 29° पर स्थित हो तो शुक्र व बुध के बीच अंशात्मक अंतर 4° ही होगा। ऐसी स्थिति में शुक्र व बुध के अलग-अलग राशियों में स्थित होने के बावजूद उनकी युति मानी जाएगी। इसीप्रकार सूर्य के साथ यदि कोई ग्रह एक ही राशि में हो तो जरूरी नहीं है कि वो अस्त ही हो। यदि उनके बीच अंशों का अंतर कम होता है, ग्रह तभी अस्त होता है। लेकिन यदि कोई ग्रह सूर्य से अगली या पिछली राशि में हो, लेकिन सूर्य से उसकी अंशात्मक दूरी कम हो तो भी वह अस्त हो जाता है। अर्थात् अंशात्मक दूरी की सहायता से ही ग्रहों की युति अथवा उसका अस्त होना देखा जाता है।
ग्रहों की डिग्री से ही भाव चलित कुंडली भी बनाई जाती है उदाहरण के लिए यदि वृषभ लग्न की पत्रिका में लग्न 20° का है तथा लग्न में ही बुध 23° पर तथा शुक्र 3° पर स्थित है। अब लग्न की डिग्री में 15° घटाएंगे/जोड़ेंगे। चूँकि 15° जोड़ने से यह 30° से अधिक हो जाएगा, अतः केवल घटाएँगे। 20°-15°=5°, लेकिन शुक्र 5° से कम है, अतः भाव चलित पत्रिका में शुक्र पिछली राशि में ही रह जाएगा, इसलिए भाव चलित पत्रिका में शुक्र बारहवें भाव में स्थित होगा। यहाँ बुध और शुक्र के बीच 20° का अंतर होने के कारण उनकी युति नहीं मानी जाएगी। एक अन्य उदाहरण के अंतर्गत वृषभ लग्न की पत्रिका में लग्न 4° का है। लग्न में ही बुध 20° पर तथा शुक्र 17° पर स्थित है। लग्न की डिग्री में 15° घटाएँगे/जोड़ेंगे। चूँकि 4° में से 15° नहीं घटाया जा सकता है, इसलिए केवल जोड़ेंगे। 4°+15°=19°, अतः जो भी ग्रह 19° से अधिक डिग्री का होगा वह अगले भाव में चला जाएगा। चूँकि बुध 20° का है अतः भाव चलित पत्रिका में वह द्वितीय भाव में चला जाएगा। भाव चलित पत्रिका में बुध के अगले भाव में जाने के बावजूद भी लग्न पत्रिका में शुक्र व बुध की युति प्रभावी होगी क्योंकि इनके बीच अंशात्मक अंतर 3° है। इसप्रकार युति केवल ग्रहों के अंशात्मक अंतर पर ही निर्भर करती है।
ग्रहों की दृष्टि का प्रभाव भी उनके अंशों पर ही निर्भर करता है। उदाहरण के लिए निम्नलिखित कुंडली पर विचार करते हैं:
लग्न 7° में 15° जोड़ेंगे/घटाएँगे। 7°+15°=23°, 7° में से 15° को नहीं घटा सकते। अतः जो भी ग्रह 23° से अधिक का होगा वह भाव चलित पत्रिका में अगले भाव में चला जाएगा। अतः शुक्र, भाव चलित पत्रिका में दूसरे भाव में चला जाएगा। शनि 17° का है इसलिए वह सप्तम भाव में ही रहेगा। शुक्र की पूर्ण दृष्टि जानने के लिए शुक्र के अंशों में 15° जोड़ेंगे तथा 15° घटाएँगे। अतः 27°+15°= 42°=अगले भाव में 12°, 27°-15°=12°। अतः शुक्र की पूर्ण दृष्टि धनु राशि में 12° से प्रारम्भ होकर मकर राशि के 12° के बीच होगी। चूँकि सप्तम भाव में शनि इसी के अंतर्गत स्थित है इसलिए शुक्र की पूर्ण दृष्टि शनि पर पड़ेगी, भले ही भाव चलित पत्रिका में शुक्र द्वितीय भाव में चला गया हो।
एक अन्य उदाहरण:
उपरोक्त उदाहरण में लग्न 20° का है तथा लग्न में ही शुक्र 21° पर स्थित है। सप्तम भाव में शनि 2° पर स्थित है। लग्न की 20° में 15° घटाने/जोड़ने पर, 20°-15°=5° प्राप्त होता है, अतः लग्न पत्रिका में जो भी ग्रह 5° से कम के होंगे, वे भाव चलित पत्रिका में पिछले भाव में चले जाएँगे (20° में 15° जोड़ने पर 30° से अधिक हो जाएगा अतः यह नहीं करेंगे)। अतः सप्तम भाव में स्थित शनि, जो कि 2° का है, भाव चलित पत्रिका में षष्ठम भाव में चला जाएगा। शुक्र लग्न में 21° पर है। 21°+15°= 36° (अर्थात् अगले भाव में 6°), 21°-15°=6°। अतः शुक्र की सीधी दृष्टि सप्तम भाव के 6° से शुरु होकर अष्टम भाव के 6° तक रहेगी। शनि पर इसकी दृष्टि का प्रभाव नहीं पड़ेगा। इसप्रकार ग्रहों की युति और दृष्टि दोनों में केवल ग्रहों के अंशों का ही महत्व है।
भाव चलित पत्रिका ग्रहों के अंशों पर निर्भर करती है।कई बार लग्न पत्रिका के किसी विशेष भाव में स्थित ग्रह भाव चलित पत्रिका में आगे या पीछे के भावों में चले जाते हैं, जिसके कारण लग्न पत्रिका में भाव विशेष में बनने वाले योग बदल जाते हैं। उदाहरण के लिए यदि किसी लग्न पत्रिका में गुरु चंद्रमा से सप्तम भाव में स्थित हो तो सामान्य दृष्टि में यह गजकेसरी योग होगा, लेकिन यदि भाव चलित पत्रिका में गुरु अष्टम भाव में चला जाए तो गजकेसरी योग नष्ट होकर सकट योग बन जाता है। उसीप्रकार यदि किसी पत्रिका में मंगल नवम भाव में हो तो सामान्य दृष्टि में यह मंगल दोष नहीं होगा, लेकिन यदि भाव चलित पत्रिका में मंगल अष्टम भाव में आ जाए तो यह मंगल दोष का निर्माण करता है। इसप्रकार जिन योगों अथवा दोषों में भावों का महत्व है, वहाँ भाव चलित पत्रिका देखना अनिवार्य हो जाता है। यह लेख मैंने गुरुदेव श्रीमान् नितिन कश्यप जी के व्याख्यानों से प्रेरित होकर उनके श्री चरणों में सादर नमन करते हुए लिखा है।
इस प्रकार ज्योतिषशास्त्र में लग्न तथा ग्रहों के अंशों का अत्यधिक महत्वपूर्ण स्थान है, क्योंकि इसके आधार पर ही पत्रिका का उचित विश्लेषण किया जा सकता है। लग्न तथा ग्रहों के सटीक अंश तभी प्राप्त किए जा सकते हैं जब जन्म समय, स्थान व तिथि सटीक हो, और जातक के जन्म का विवरण, उसके पूर्व कर्मों के आधार पर केवल विधाता ही तय करते हैं।
ग्वालियर, मध्यप्रदेश
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