आधे अधूरे नाटक के आधार पर सावित्री का चरित्र चित्रण | मोहन राकेश

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आधे अधूरे नाटक के आधार पर सावित्री का चरित्र चित्रण मोहन राकेश नाटक की केंद्रीय और सबसे सशक्त पात्र सावित्री है, जो पूरे परिवार की धुरी है नायिका

आधे अधूरे नाटक के आधार पर सावित्री का चरित्र चित्रण | मोहन राकेश


मोहन राकेश द्वारा रचित 'आधे अधूरे' नाटक समकालीन हिंदी नाटक साहित्य की एक युगांतकारी कृति है। यह नाटक मध्यवर्गीय परिवार के विघटन, आंतरिक अंतर्विरोधों और वैवाहिक जीवन की विफलता को दर्शाता है। इस नाटक की केंद्रीय और सबसे सशक्त पात्र सावित्री है, जो पूरे परिवार की धुरी है।

'आधे अधूरे' नाटक में सबसे अधिक विवादास्पद और सशक्त पात्र सावित्री ही है। वह इस नाटक की नायिका है और लगभग प्रत्येक प्रसंग में उपस्थित रहती है। वह नाटक के प्रत्येक पात्र से सम्बद्ध है और नाटकीय कथावस्तु का मूल केन्द्र भी है। सावित्री का चरित्र इतना प्रत्यक्ष, बहुमुखी और नाटकीय है कि कोई भी पात्र उससे प्रभावित हुए बिना नहीं रहता। वह महेन्द्रनाथ की पत्नी है जो व्यापार में घाटे के कारण बेकार हो गया है और घर पर ही निठल्ला पड़ा रहता है। सावित्री चूँकि आधुनिक महत्वाकांक्षिणी नारी है, इसलिए सभी भौतिक सुख-सुविधाओं का उपभोग करना चाहती है। चूँकि महेन्द्रनाथ उसकी इन इच्छाओं की पूर्ति करने में असमर्थ है, इसलिए वह स्वयं घर से बाहर निकल पड़ती है। वह जीविकोपार्जन के लिए नौकरी करती है और घर से बाहर के संसार से परिचित होने के उपरान्त विपथगामिनी हो जाती है। उसे लगता है कि उसका पति आधा-अधूरा है, इसलिए वह अन्य लोगों के सम्पर्क में आती है। वह अन्य लोगों में पूर्णता का आभास पाकर उनके प्रति आकर्षित होती है, किन्तु हर बार उसे लगता है कि जिस व्यक्ति के प्रति वह आकर्षित हुई है, उसमें वह सभी कुछ नहीं है, जिसकी उसे तलाश है, इस कारण वह निरन्तर नये लोगों के सम्पर्क में आती चली जाती है।

सावित्री के चरित्र की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित बिंदुओं के अंतर्गत रेखांकित की जा सकती हैं:

ऐश्वर्य और धन की प्यासी

आधे अधूरे नाटक के आधार पर सावित्री का चरित्र चित्रण | मोहन राकेश
सावित्री में धन और ऐश्वर्य की पिपासा है। अपनी भौतिक इच्छाओं की पूर्ति के लिए वह धन और वैभव के पीछे भागती है। उसकी आत्मा धन और ऐश्वर्य की बुभुक्षा से आक्रान्त है। अपनी इस बुभुक्षा के शमन हेतु वह पारिवारिक दायित्व की आड़ लेकर नौकरी करती है और अधिक आवारा होती चली जाती है। वह बड़े-बड़े नामधारियों के सम्पर्क में आती है, क्योंकि उसे व्यक्ति नहीं, पद, वैभव और सामाजिक प्रतिष्ठा से प्यार है। सावित्री की यही पिपासा, एक अच्छे-खासे परिवार को दीमक की तरह चाट जाती है। जुनेजा उसकी इस मनोवृत्ति पर व्यंग्य करते हुए कहता है- "कुछ दिन पहले जुनेजा एक आदमी था तुम्हारे सामने। तुमने कहा है, तब तुम उसकी इज्जत करती थीं। पर आज उसके बारे में जो सोचती हो, वह भी अभी बता चुकी हो। जुनेजा के बाद जिससे कुछ दिन चकाचौंध रहीं तुम, वह था शिवजीत। एक बड़ी डिग्री, बड़े-बड़े शब्द और पूरी दुनियाँ घूमने का अनुभव। पर असल चीज वही कि वह जो भी था और कुछ ही था- - महेन्द्र नहीं था, पर जल्दी ही तुमने पहचानना शुरू किया कि वह निहायत दोगला किस्म का आदमी हैं। हमेशा दो तरह की बातें करता है। उसके बाद सामने आया जगमोहन । ऊँचे सम्बन्ध, आवाज की मिठास, टिप-टॉप रहने की आदत और खर्च की दरियादिली। पर तीर की असली नोंक फिर उसी जगह पर कि उसमें जो कुछ भी था, जगमोहन का-सा था-महेन्द्र का-सा नहीं था। पर शिकायत तुम्हें उससे भी होने लगी थी कि वह सब लोगों पर एक-सा पैसा क्यों उड़ाता है, दूसरे की सख्त बात को एक खामोश मुस्कराहट के साथ क्यों पी जाता है?"
 
यही कारण था सावित्री के नौकरी करने का, जिससे वह कई पुरुषों के सम्पर्क में आकर धन से खेल सके। वह धनिक वर्ग के इन लोगों की प्रशंसक हो गयी और यह स्पष्ट करने लगी कि उनकी सहानुभूति से ही उसका घर सुधर सकता है। दूसरी ओर वह अपने पति की उपेक्षा करने लगी, जिसका परिणाम यह हुआ कि बच्चों की दृष्टि में भी महेन्द्रनाथ एक खिलौना मात्र रह गया। सावित्री को धन की प्यास ने यहाँ तक गिरा दिया कि वह भारतीय नारीत्व, उसके प्राचीन गौरव और आदर्श को तिलांजति देकर कितने ही प्रेमियों के साथ रंगरेलियाँ मनाने लगी।
 

सुविधाभोगिनी नारी

सावित्री वास्तव में एक सुविधाभोगिनी नारी है। वह केवल अपनी सुविधाओं पर ध्यान देती है और यह भी नहीं सोचती कि उसकी भोगवादिता परिवार में घुन लगा रही है। वह अपने को घर की सबसे उत्तरदायी सदस्या समझती है, किन्तु वह आधुनिक कामुक और सुविधाजीवी नारियों का ही प्रतिनिधित्व करती है। अपना पति उसे आधा-अधूरा लगता है, क्यों ? इसलिए कि वह उसमें अपना एक माद्दा, अपनी एक शख्सियत नहीं देखती। वह आदमी में कई चीजें एक साथ देखना चाहती है-पद भी, व्यक्तित्व भी, वैभव भी और एक पूरा आदमी भी। इसलिए वह मार्ग से भटक जाती है और जब कुछ हाथ नहीं लगता तो मन मसोसकर रह जाती है। सावित्री के इस चारित्रिक पतन को पुरुष चार अर्थात् जुनेजा बड़े वीभत्स किन्तु सत्य रूप में उजागर करता है। वह जानता है कि सावित्री की सच्चाई क्या है, मुखौटे के भीतर का असली चेहरा कैसा विद्रोहपूर्ण है ? इसीलिए वह उसके चरित्र के इस पतन को रेशे रेशे करके स्पष्ट करता है और स्वयं सावित्री को चुनौती देता है कि वह अपने वास्तविक रूप को पहचान ले-
 
"जो-जो बातें तुमने कही हैं अभी, वे गलत नहीं हैं. अपने में, लेकिन बाईस साल साथ जीकर जानी हुई बातें वे नहीं हैं। आज से बीस साल पहले भी एक बार लगभग ऐसी ही बातें मैं तुम्हारे मुँह से सुन चुका हूँ तुम्हें याद है? उस दिन पहली बार मैंने तुम्हें इस तरह घुलते देखा था। तुमने कहा था कि वह (महेन्द्र) बहुत लिजलिजा और चिपचिपा सा आदमी है। पर उसे वैसा बनाने वालों में नाम तब दूसरों के थे। पर जुनेजा का नाम क्यों नहीं था, बता दूँ न यह भी ?असल बात इतनी ही है कि महेन्द्र की जगह इनमें से कोई भी आदमी होता तुम्हारी जिन्दगी में तो साल दो साल बाद तुम यही महसूस करतीं कि तुमने एक गलत आदमी से शादी कर ली है।

"क्योंकि तुम्हारे लिए जीने का मतलब रहा है? कितना कुछ एक साथ पाकर और कितना कुछ एक साथ ओढ़कर जीना। वह उतना कुछ कभी किसी एक जगह न मिल पाता, इसलिए जिस किसी के साथ भी जिन्दगी शुरू करतीं, तुम हमेशा इतनी ही खाली बेचैन बनी रहतीं।"

विपथगामिनी

सुविधाभोगी कामुक नारी सावित्री अपनी सुविधाओं के व्यामोह में यहाँ से वहाँ भटकती है, किन्तु उसे हर पुरुष एक जैसा मिला, जिसने उसे निचोड़ा, रस लिया और फिरं निचुड़ी स्थिति में या तो उसकी लड़की को रात के अँधेरे में भगा ले गया था या फिर उसे सहानुभूति के दो-चार शब्द कहकर दुत्कार दिया। सावित्री अपनी विपथगामिता को एक ओर अंगीकार करती है- "सब के सब सब के सब एक-से । बिल्कुल एक-से हैं आप लोग! अलग-अलग मुखौटे, पर चेहरा- चेहरा सबका एक ही।"

किन्तु इतना होने और अनुभव कर लेने पर भी वह अपनी विपथगामिता को स्वीकार नहीं करती, वरन् प्रतिहिंसा से जलने लगती है। उसे लगता है, जैसे पुरुष-वर्ग ने उसके प्रति क्रांति का मार्ग अपना लिया है और सभी पुरुष उसे तोड़ डालने के लिए कटिबद्ध हैं। इसीलिए वह जुनेजा के साथ अपनी हेठी का प्रदर्शन करती हुई महेन्द्रनाथ को अपने ही पास रख लेने को कहती है। वह सभी पुरुषों की इस साजिश के प्रति असहनशील हो उठती है-"आप जाइये और कोशिश करके उसे हमेशा के लिए अपने पास रखिए। इस घर में आना और रहना सचेमुच हित में नहीं है उसके। और मुझे भी अपने पास उस मोहरे की बिल्कुन जरूरत नहीं है जो न खुद चलता है और जो न किसी और को चलने देता है।"

और जब जुनेजा उससे कहता है कि वह महेन्द्रनाथ को उससे विरक्त करेगा, ताकि वह आँख खोलकर अपने आस-पास की दुनिया को देख सके, तब भी सावित्री उसी वितृष्ण भाव से कहती है- "जरूर - जरूर। इस तरह उसका तो उपकार करेंगे ही आप, मेरा भी इससे बड़ा उपकार जिन्दगी में नहीं कर सकेंगे।"
 

यंत्रणाओं की शिकार

सावित्री के चरित्र में उपर्युक्त दुर्गुण क्यों पैदा हुए? क्या केवल उसकी कामुकता ही उसे विपथगामिनी बनाती रही ? क्या पारिवारिक दायित्व के प्रति वास्तव में वह जागरूक नहीं है? आदि कई प्रश्न उसके चारित्रिक अध्ययन के अन्तर्गत उठते हैं। यदि हम इन प्रश्नों को भुला दें या दुर्गुणों के मूल कारणों की उपेक्षा कर दें तो उसके समग्र चरित्र को समझने का दावा नहीं कर सकते। यह ठीक है कि वह पद, सम्मान, वैभव और पूरे आदमी की तलाश में स्वयं को भटकती रही है, किन्तु इसके पीछे एक मनोवैज्ञानिक प्रतिक्रिया है जो उसे महेन्द्र के व्यवहार में मिली। महेन्द्र की पत्नी के रूप में जब वह आई तो उसने देखा कि महेन्द्र सदैव परमुखापेक्षी रहने वाला व्यक्ति है। उसकी यह परमुखापेक्षिता सावित्री सहन नहीं कर सकी। महेन्द्र के दोस्तों ने मित्रता के नाम पर पति-पत्नी में तनाव की स्थिति उत्पन्न कर दी। महेन्द्र जो स्वभाव से ही दब्बू प्रकृति का व्यक्ति था, अपने मित्रों के बहकावे में आ गया। वह बराबर सावित्री पर हावी रहने का प्रयत्न करने लगा, और 'प्रयत्न' भी ऐसा ताकि उसके मित्र उसे 'जोरू का गुलाम' न समझें। महेन्द्रनाथ के हीनताबोध का परिणाम सावित्री को भुगतना पड़ा और उसका नारीत्व विद्रोह करने को उद्यत होता गया । महेन्द्र को वह इसीलिए आधा-अधूरा समझती है, क्योंकि वह कोई भी काम बिना अपने मित्रों के परामर्श के नहीं कर सकता था। उसे इस बात से चिढ़ है कि महेन्द्रनाथ ने उससे विवाह तक अपने मित्र जुनेजा के परामर्श से ही किया था। यही कारण था कि महेन्द्र को पति के रूप में पाने के बाद भी वह पूरे आदमी की तलाश में भटकती रही और एक अयाचित यंत्रणा को झेलती रही। उसके ये शब्द उसकी हार्दिक वेदना को ही अभिव्यक्त करते हैं- "मत कहिये मुझे महेन्द्र की पत्नी। महेन्द्र भी एक आदमी है, जिसके अपना घर-बार है, पत्नी है, यह बात महेन्द्र को अपना कहने वालों को शुरू से ही रास नहीं आई। 

महेन्द्र ने ब्याह क्या किया, आप लोगों की नजर में आपका ही कुछ आपसे छीन लिया। महेन्द्र अब पहले की तरह हँसता नहीं। महेन्द्र अब दोस्तों में बैठकर पहले की तरह खिलखिलाता नहीं। महेन्द्र अब वह पहले वाला महेन्द्र नहीं रह गया । और महेन्द्र ने जी-जान से कोशिश की कि वह वही बना रहे किसी तरह; कोई यह न कह सके, जिससे कि वह पहले वाला महेन्द्र रह ही नहीं गया और इसके लिए महेन्द्र घर के अन्दर रात-दिन छटपटाता है। दीवारों से सिर पटकता है। बच्चों को पीटता है। बीबी के घुटने तोड़ता है। दोस्तों के लिए जो फुर्सत काटने का वसीला है, वही महेन्द्र के लिए उसका मुख्य फाम है जिन्दगी में। और उसका ही नहीं, उसके घर के लोगों का भी वही मुख्य काम होना चाहिए। तुम फलां जगह चलने से इन्कार कैसे कर सकती हो? फलां से तुम ठीक से बात क्यों नहीं करतीं? तुम अपने को पढ़ी-लिखी कहती हो? तुम्हें तो लोगों के बीच उठने-बैठने तक की तमीज नहीं है। और वही महेन्द्र जो दोस्तों के बीच दब्बू-सा बना हल्के-हल्के मुस्कराता है, घर आकर एक दरिन्दा बन जाता है। बोल, बोल, बोल चलेगी उस तरह कि नहीं, जैसे मैं चाहता हूँ? मानेगी वह सब कि नहीं जो मैं कहता हूँ? पर सावित्री फिर भी वैसे नहीं चलती। वह सब नहीं मानती। वह नफरत करती है इस सबसे-इस आदमी के ऐसा होने से। वह एक पूरा आदमी चाहती है। अपने लिए-एक पूरा आदमी। गला फाड़कर वह यह बात कहती है। कभी आदमी को वह आदमी बना सकने की कोशिश करती है। कभी तड़पकर स्वयं को इससे अलग कर लेना चाहती है, परन्तु यदि उसकी कोशिशों से तनिक भी फर्क पड़ने लगता है इस आदमी में, तो दोस्तों में इसका गम मनाया जाने लगता है। सावित्री महेन्द्र की नाक में नकेल डालकर उसे अपने ढंग से चला रही है। सावित्री बेचारे महेन्द्र की रीढ़ तोड़कर उसे अपने ढंग से चला रही है। सावित्री बेचारे महेन्द्र की रीढ़ तोड़कर उसे अपने लायक नहीं रहने दे रही है। जैसे कि भ होकर भी बिना हाड़-माँस का पुतला हो वह एक - बेचाए महेन्द्र ।"
 
सावित्री इसी की प्रतिक्रियावश वह सब करती है जो उसे फ्लर्ट अथवा आवारा बना देता है। पति निठल्ला है और घर में जब खाने को भी नहीं रहता है तो वह नौकरी करने को विवश हो जाती है। क्या यह उसके उत्तरदायित्वपूर्ण व्यक्तित्व का प्रमाण नहीं है? दूसरे, उसी के कथनानुसार वह बड़े-बड़े लोगों से इसलिए सम्पर्क साधती है, ताकि लड़के की नौकरी का कहीं प्रबन्ध किया जा सके। अन्य पात्र घर को घर नहीं समझते और जहाँ-तहाँ कूड़े का ढेर लगा देते हैं, किन्तु सावित्री को घर की बहुत चिन्ता रहती हैं। यह सच है कि वर्तमान आर्थिक विसंगतियों, पति के निठल्लेपन और यंत्रणाओं ने उसके चरित्र को आवारा बना दिया है, किन्तु ऐसा उसने स्वेच्छा से नहीं किया है। हम तो यही कहेंगे कि वर्तमान जीवन की क्रूर विसंगतियों ने अपने आर्थिक वैषम्य के शिकंजे में सावित्री को जकड़ रखा है- व्यक्तिगत रूप से इसमें उसका अपना कोई दोष नहीं है।

परिस्थितियों ने उसे भटकाया है, केवल भटकाया ही नहीं है, अपितु छला भी है और इस रूप में छला है कि वह टूटकर रह गयी है। यहाँ तक कि अपनी परिणति पर वह खुलकर रो भी नहीं सकती। उसका रुदन भी विद्रूपतापूर्ण हास्य-सा लगता है। अपने पति को आधा-अधूरा समझकर वह जिस पूरेपन की तलाश में भटकती है, वह उसे नहीं मिलता है, हाँ, अन्धी गुफा में भटककर वह अपनी अस्मिता से भी अजनबी बन जाती है और वहाँ से जब लौटती है तो अपने टूटे हुए अधूरे व्यक्तित्व को लेकर ही लौटती है। अधूरेपन को सहेजने के बाद भी उसे अधूरापन ही मिलता है-वह भी लँगड़ाकर आते हुए महेन्द्रनाथ के रूप में ही।

इस प्रकार सावित्री कोई आदर्श भारतीय नारी (सती-सावित्री) नहीं है, बल्कि वह वास्तविक हाड़-मांस की बनी एक आधुनिक स्त्री है जो अपनी परिस्थितियों से लड़ रही है। मोहन राकेश ने सावित्री के माध्यम से मध्यवर्गीय समाज की उस त्रासदी को उभारा है जहाँ व्यक्ति अपनी इच्छाओं और विवशताओं के बीच पीसकर 'आधा-अधूरा' रह जाता है। वह एक खलनायिका नहीं, बल्कि परिस्थितियों की शिकार एक सहानुभूति-योग्य पात्र है।

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