आधे अधूरे नाटक की मूल संवेदना चेतना | मोहन राकेश

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मोहन राकेश द्वारा रचित आधे अधूरे (1969) आधुनिक हिंदी नाटक के इतिहास में एक मील का पत्थर है। यह नाटक समकालीन मध्यवर्गीय समाज, पारिवारिक विघटन और महानगर

आधे अधूरे नाटक की मूल संवेदना चेतना | मोहन राकेश


मोहन राकेश द्वारा रचित आधे अधूरे (1969) आधुनिक हिंदी नाटक के इतिहास में एक मील का पत्थर है। यह नाटक समकालीन मध्यवर्गीय समाज, पारिवारिक विघटन और महानगरीय जीवन की त्रासदी को गहराई से उजागर करता है।

मोहन राकेश का तीसरा नाटक 'आधे-अधूरे' ऐतिहासिकता को त्यागकर पूर्ण रूप से काल्पनिक है। उन दोनों नाटकों की अपेक्षा यह नाटक इस दृष्टि से भी भिन्न है कि इसमें प्राचीन युगों को नहीं, वर्तमान को प्रस्तुत किया गया है। आधे-अधूरे का प्रकाशन तो सन् 1969 में हुआ है, पर इसमें भारत की स्वतंत्रता के बाद के मध्यवर्गीय समाज को प्रस्तुत किया गया है। डॉ. गणपति चन्द्र गुप्त के अनुसार 'आधे-अधूरे' में व्यक्ति एवं समाज के द्वन्द से उत्पन्न कतिपय स्थितियों का चित्रण विभिन्न कथानकों के माध्यम से किया गया है। इस नाटक में सावित्री महेन्द्रनाथ की पत्नी है। महेन्द्रनाथ का जीवन असफलताओं से भरा है। उसने जो भी काम किया उसमें घाटा उठाया है। उसने जो भी काम किया है, अपने मित्र जुनेजा के परामर्श से और उसके साझे में किया है। महेन्द्र के हिस्से में घाटा आया है और जुनेजा लाभ प्राप्त करता गया है।महेन्द्रनाथ एक प्रकार से रबड़ का ऐसा गुड्डा है, जिसकी चाबी भरना जुनेजा का अधिकार है। जब महेन्द्रनाथ निष्क्रिय हो गया तो उसकी पत्नी सावित्री को घर के बाहर निकलना पड़ा। वह सुन्दर और जवान थी, इसलिए उसे तुरन्त नौकरी मिल गयी।यह नौकरी उसे नहीं, उसके सौन्दर्य और जवानी को मिली थी।

जो सावित्री के अधिकारी हैं वे उसके घर आते रहे हैं और वह भी उनके साथ बाहर जाती रही है। अधिकारियों में पहले शिवजीत, जगमोहन और बाद में सिंघानिया की घनिष्ठता को लेकर सावित्री बहुत बदनाम रही है। सावित्री जब घर का खर्च चलाने लगी तो वह घर की मालकिन बन गयी। उसके पति को ज्ञात था कि उसकी पत्नी के कदम फिसल चुके हैं, पर वह निकम्मा था और बाद में उसे फालिज मार जाता है, वह चलने से भी मजबूर हो जाता है।
 
आधे अधूरे नाटक की मूल संवेदना चेतना | मोहन राकेश
महेंन्द्रनाथ समझता है कि घर में उसकी क्या स्थिति है, यह बात घर में आने वाला हर एक आदमी जानता है। यही कारण है कि जब सावित्री का बॉस सिंघानिया घर आता है तो महेन्द्रनाथ अपने मित्र जुनेजा से मिलने का बहाना करके घर से चला जाता है। सिंघानिया उच्च अधिकारी है, पर उसका व्याक्तत्व आकर्षक नहीं है। सावित्री ने सिंघानिया को इस आशा से घर बुलाया है कि उसके आवारा लड़के अशोक को नौकरी से लगा देगा।

सावित्री के कितने पुरुषों से सम्बन्ध रहे हैं, यह जुनेजा के इस कथन से स्पष्ट है- "कुछ दिन पहले जुनेजा एक आदमी था तुम्हारे सामने। तुमने कहा है, तब तुम उसकी इज्जत करती थी। पर आज उसके बारे में जो सोचती हो, वह भी अभी बता चुकी हो । जुनेजा के बाद जिससे चकाचौंध रहीं तुम वह था शिवजीत। एक बड़ी डिग्री, बड़े-बड़े शब्द और पूरी दुनिया घूमने का अनुभव। पर असल चीज वही कि वह जो भी था औरकुछ भी था महेन्द्रनाथ नहीं था। पर जल्दी ही तुमने पहचानना शुरू कर दिया कि वह निहायत दोगला किस्म का आदमी है। हमेशा दो तरह की बातें करता है। उसके बाद सामने आया जगमोहन । ऊँचे सम्बन्ध, आवाज की मिठास, टिपटाप रहने की आदत और खर्च की दरियादिली पर तीर की असली नोंक फिर उसी जगह पर कि जो कुछ भी था, जगमोहन का साथ महेन्द्र का सा नहीं था। पर शिकायत तुम्हें उससे भी होने लगी कि वह सब लोगों पर एकसा पैसा क्यों उड़ाता है? दूसरे की सख्त बात को एक खामोश मुस्कुराहट के साथ क्यों पी जाता है?
 
सावित्री और महेन्द्रनाथ के तीन बच्चे थे-एक पुत्र अशोक और दो पुत्रियाँ - बिन्नी और किन्नी। अशोक इन दोनों के बीच का है। ये तीनों बच्चे बिगड़े हैं-सावित्री की वजह से, पर सावित्री इसका आरोप महेन्द्रनाथ पर लगाती है। बड़ी लड़की बिन्नी तो सावित्री के प्रेमी मनोज के साथ भाग जाती है।अशोक बी. एस-सी. करने से पहले ही पढ़ाई छोड़कर आवारा बन जाता है। लड़की किन्नी बारह-तेरह वर्ष की अवस्था में ही स्त्री-पुरुष के सम्बन्ध जान जाती है।
 
सावित्री को लगा कि वह कहीं की नहीं रही। न घर में उसका आदर है और न बाहर उसका सम्मान । इधर यौवन भी उससे रूठा जा रहा है। उसने अपने बालों को इस प्रकार का बनाया कि वे सफेद बाल काले बालों के बीच छिप जायें। चेहरे की झुर्रियाँ छिपाने के लिए पाउडर को अधिक मात्रा में लगाया। वह अपनी सबसे अच्छी साड़ी पहनकर जगमोहन की कार में बैठकर उससे विवाह का निश्चय करके घर से निकली।जगमोहन से जब सावित्री का पहला परिचय हुआ था, उस समय सावित्री युवती थी और जगमोहन विधुर युवक। जगमोहन ने सावित्री से विवाह का प्रस्ताव किया तो उसने अपने घर के प्रति लगाव के कारण टाल दिया। जगमोहन दुबारा ट्रान्सफर पर सावित्री के नगर में आया तो सावित्री ने उसका प्रस्ताव स्मरण कराया। देर बहुत हो चुकी थी, इसलिए जगमोहन ने यौन शोषण तो करना चाहा, पर विवाह के प्रस्ताव पर कहा कि तुम्हारी और मेरी दोनों की असुविधा बढ़ जायेगी। इस प्रकार यहाँ भी नारी दो पुरुषों के द्वारा ठगी गयी।

सावित्री के पति महेन्द्रनाथ ने व्यापार आरम्भ किया और जब वह चलने लगा तो उस मध्यमवर्गीय परिवार में उच्चवर्गीय परिवार के खर्चे होते थे। सावित्री पर आरोप लगाता हुआ महेन्द्रनाथ कहता है-“चार सौ रुपये महीने का मकान था, टैक्सियों से आना जाना होता था, किश्तों पर फ्रिज खरीदा गया था, लड़के-लड़कियों की कान्वेंट की फीसें जाती थीं। शराब आती थी, दावतें उड़ती थीं, उस पर पैसा तो खर्च होता ही था।" महेन्द्रनाथ ने इस अपव्यय का कारण सावित्री को ठहराया, पर क्या यह सब अकेली सावित्री कर रही थी ? क्या उसके लिए महेन्द्रनाथ उत्तरदायी नहीं था ? उस समय तो वह घर का स्वामी था, उस समय सावित्री नौकरी नहीं करती थी ।
 
स्पष्ट है कि कालिदास और नन्द की नारी, इस बीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में भी छली गयी।इस समय भी दो पुरुषों ने उसे धोखा दिया-महेन्द्रनाथ ने और जगमाहन ने। महेन्द्रनाथ ने पतिधर्म नहीं निभाया और जगमोहन ने प्रेमी धर्म नहीं निभाया। यहाँ भी नारी जीत गयी, पुरुष हार गया।इस नाटक की मूल्य चेतना अथवा मूल चेतना भी उसी सनातन पुरुष की है। प्राचीनकाल में घर से बाहर निकलकर पुरुष का धर्म घर का पालन करने हेतु नौकरी या व्यापार करना था। यह भी पुरुष ने पत्नी से ही कराया। क्या विवाह का अर्थ है कि पत्नी अपना शरीर बेचकर घर का संचालन करे और पुरुष उसे कोसता हुआ निकम्मा बना बैठा रहे और उस पर अत्याचार करता रहे।

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