मेरा धर्म संकट

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मेरा धर्मसंकट आज से लगभग 17 वर्ष पहले घटित हुआ।वह समय था जब मैं तपेदिक (टीबी) से पीड़ित था। इस भय से कि शायद किसी भी क्षण मेरी मृत्यु हो सकती है, मैं

मेरा धर्म संकट


मेरा धर्मसंकट आज से लगभग 17 वर्ष पहले घटित हुआ।वह समय था जब मैं तपेदिक (टीबी) से पीड़ित था। इस भय से कि शायद किसी भी क्षण मेरी मृत्यु हो सकती है, मैं गहरी धार्मिक भक्ति में डूब गया।

मेरा जन्म और पालन-पोषण हिंदू धर्म में हुआ था। इसलिए जब मृत्यु का भय सामने आया, तो सबसे पहले मैं देवी-भक्ति की ओर मुड़ा।पूरे एक सप्ताह तक मैं बिना अंडा खाए ही स्तोत्रों का जप करता रहा। धीरे-धीरे वही मेरा पूरा संसार बन गया। कोई दूसरी आवाज़ मेरे कानों तक नहीं पहुँचती थी। मेरे मन में किसी और रूप का अस्तित्व नहीं था।

फिर एक आधी रात को कुछ हुआ।अधनींद में मुझे लगा कि एक स्त्री-रूप मुझे यौन रूप से ग्रसित कर रहा है। इतनी बीमारी में भी एक तीव्र सुख का अनुभव हो रहा था। अचानक मैं करवट बदल गया, और एक आवाज़ मेरे कान में फुसफुसाई—“मैं वही देवी हूँ जिसकी तुम पूजा करते हो। सीधे लेट जाओ। मुझे तुम्हारा अनुभव करने दो।
तुम मुझे प्रिय हो। तुम्हारी निष्कपट भक्ति से मैं बहुत प्रसन्न हूँ।”

लेकिन मेरी कल्पना में हमारे मंदिर की देवी माँ के समान थीं।क्या अपनी माँ के साथ संबंध बनाना पाप नहीं है?
यह सोचते ही मैंने ज़ोर से चिल्लाया—
“अम्मे!” (माँ!)
और रो पड़ा। घृणा से मैंने करवट बदल ली।
एक झुंझलाहट की ध्वनि— “छ्!” — के साथ वह स्त्री-रूप मुझे छोड़कर चला गया।
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अगले दिन मैं बहुत देर से जागा। सामान्यतः मैं भोर में उठकर स्तोत्र-पाठ शुरू कर देता था।
मेरी माँ ने पूछा—
“आज तुम्हारी दिनचर्या क्यों बिगड़ गई? क्या हुआ?”
मैंने कुछ नहीं कहा।
उस रात जो हुआ था, उसे मैं किसी से कैसे कह सकता था?

मेरे गाँव में देवी मंदिर के पास ही कृष्ण मंदिर भी था। देवी के बाद कृष्ण ही हमारे सबसे पूज्य देवता थे।इसलिए मैंने कृष्ण के मंत्र याद करने शुरू किए—

बाल-कृष्ण का मंत्र,
नरसिंह मंत्र,
गोपाल मंत्र।

मेरे मन में केवल एक ही विचार था—यदि देवी फिर से मेरे साथ संबंध बनाने आएँ — मेरी माँ के समान देवी — तो उसे रोकना होगा।माँ के साथ संबंध बनाना पाप है।इसलिए मैंने सोचा—यदि नरसिंह प्रकट होंगे तो देवी डरकर चली जाएँगी।इस प्रकार मेरा मंत्र-जप चलता रहा।

पर शायद मेरा बुरा समय आ गया था।एक आधी रात बाल-कृष्ण मेरे सामने प्रकट हुए।मैं फिर अधनींद में था।बाल-कृष्ण ने पूछा—“मैं देवी को डरा कर भगा सकता हूँ।लेकिन बदले में तुम मुझे क्या दोगे?”मेरा मन रोने लगा।उस समय घर में चढ़ाने के लिए एक कटोरा चावल भी नहीं था।तब बाल-कृष्ण ने धीरे से कहा—“तुम्हारे पास एक मूल्यवान चीज़ है।यदि तुम सहमत हो, तो मैं उसे खुशी से स्वीकार करूँगा।और देवी को रोक दूँगा।”वह जो भी था, मैंने मान लिया।

मैं रोते हुए बोला—“कृष्ण, मैं देवी के साथ संबंध नहीं बना सकता।वह मेरी माँ के समान हैं!”तब कृष्ण ने बाल-स्वर में कहा—“तो तुम्हें मुझसे विवाह करना होगा।”मैंने वह भी स्वीकार कर लिया।मुझे बस देवी से बचना था।उसी क्षण मेरे चारों ओर उलूल ध्वनियाँ (मंगलध्वनि) सुनाई दीं।कृष्ण ने मेरे कान में फुसफुसाया—“तुम भामा हो। मेरी प्रिय सत्यभामा।”

फिर मुझे लगा कि वह बालक मेरे पूरे शरीर को चूम रहा है।उसने मेरे जननांगों को काटा और खींचा।मुझे लगा जैसे मेरे शरीर से कुछ बाहर निकल गया।मैं काँप उठा।फिर मुझे लगा कि एक छोटा लिंग मेरे भीतर प्रवेश कर रहा है।मैंने होंठ काट लिए और दर्द से रो पड़ा।“सीधे लेटे रहो!” बालक ने कहा।उसका छोटा शरीर मुझ पर दबा हुआ था और वह क्रिया जारी रही।

उस रात इसी तरह बीत गई।

इसके बाद यह हर दिन होने लगा।कुछ समय बाद मैं थक गया और विरोध करने लगा।तब कृष्ण धमकी देते— “क्या मैं देवी को बुलाऊँ?”मैं तुरंत समर्पण कर देता।क्योंकि देवी का विचार भी मैं सह नहीं सकता था।कृष्ण की वह बालसुलभ हँसी आज भी मेरे कानों में गूँजती है।

मैंने बस एक विनती की—“यह बात किसी को कभी पता नहीं चलनी चाहिए।”कृष्ण ने सहमति दे दी।

एक वर्ष बीत गया।मेरी टीबी ठीक हो गई।तब कृष्ण ने कहा—“अब तुम्हें मेरे मंदिर आना होगा।वही मेरा घर है।अब से तुम्हें वहीं रहना चाहिए।”वह मंदिर 20 किलोमीटर से भी अधिक दूर था।मुझे यात्रा से घृणा है।इसलिए मैंने तुरंत कहा—“नहीं।”लेकिन कृष्ण ज़िद करते रहे।आखिर मैंने कहा—“एक बार।केवल एक बार आऊँगा।उसके बाद मजबूर मत करना।”

कृष्ण हँसे—तुम सचमुच सत्यभामा हो।”उस दिन उन्होंने फिर मुझे तीव्रता से ग्रसित किया।मैं रो पड़ा और कहा—“मैं मर जाऊँगा!”वह एक व्रत-काल था जब मुझे उस मंदिर जाना था।मैंने कहा—“मुझे रास्ता नहीं पता।”कृष्ण ने उत्तर दिया—“रास्ता मुझे पता है।तुम्हें बस आना है।”

मैंने कहा—
“तुम तो छलिया हो, कृष्ण।
कहीं तुम मुझे धोखा न दे दो।”कृष्ण ने फिर देवी की धमकी दी।डर के मारे मैंने सहमति दे दी।

इस प्रकार मैं यात्रा पर निकल पड़ा।मेरी माँ ने पूछा—“कहाँ जा रहे हो?”मैंने कहा—“मंदिर।”
माँ ने आश्चर्य से कहा—“यह लड़का जो मंदिर के उत्सवों में भी नहीं जाता…जो पटाखों के खर्च की आलोचना करता है…अब खुद मंदिर जाना चाहता है।अवश्य कृष्ण ही इसे बुला रहे होंगे।”लेकिन मेरा मन भय से भरा था।

मेरा धर्म संकट
आखिरकार मैं मंदिर पहुँच गया।चारों ओर रोशनी, सजावट और भारी भीड़ थी।कृष्ण ने फुसफुसाया—“केवल मुझ पर ध्यान करो।चारों ओर की चीज़ों को अनदेखा कर मेरे घर आओ।”लेकिन दृश्य बहुत सुंदर थे।

मैंने मन ही मन कहा—“जाओ यहाँ से।इतने सुंदर दृश्य क्यों छोड़ूँ?मुझे तुम्हारे घर नहीं जाना।”उसी क्षण मैंने कुछ देखा—मेरी ही उम्र का एक लड़का।उसके पैर नहीं थे, और वह भीख माँग रहा था।मैं रो पड़ा।“कृष्ण, कृपया उसे बचाओ!”कृष्ण बोले—“तुमने मेरी बात नहीं मानी।लेकिन तुम मेरी भामा हो।मैं उसे बचाऊँगा।पर तुम्हें आज रात यहाँ रुकना होगा।”मैंने अनिच्छा से मान लिया।

बाद में मैं मंदिर की कतार में खड़ा था।दीवारों पर बने चित्र देख रहा था।अचानक मैंने बाल-कृष्ण का एक चित्र देखा।बाकी सब कुछ गायब हो गया।केवल कृष्ण रह गए।बिना सोचे मैंने उस चित्र को चूम लिया।मुझे लगा जैसे कृष्ण मुझे आलिंगन कर रहे हों।पीछे से किसी गर्म चीज़ का स्पर्श महसूस हुआ।लोग स्तब्ध होकर मुझे देखने लगे।

कुछ तो मेरे पैरों पर गिर पड़े, यह सोचकर कि मुझमें कोई दैवी शक्ति आ गई है।

मैं चिल्लाया—“अगर तुम्हें मैं नहीं चाहिए था, तो मुझे यहाँ क्यों लाए?”कुछ देर बाद मुझे होश आया और गहरा लज्जाबोध हुआ।मैं क्रोध में मंदिर छोड़कर निकल गया।पीछे से कृष्ण की आवाज़ आई—“तुम सचमुच सत्यभामा हो।”

फिर उसने मुझे घर लौटने के लिए पास के शिव मंदिर जाने को कहा।लेकिन मुझे डर लगा।शिव के गले में साँप होता है।मुझे साँपों से बहुत डर लगता है।कृष्ण ने फिर देवी की धमकी दी।डरते-डरते मैं वहाँ गया।मंदिर में मैंने प्रार्थना की—“प्रभु शिव, कृष्ण ने मुझे धोखा दिया है।उसे दंड दीजिए।लेकिन कृपया मेरे सामने मत प्रकट होना।मुझे साँपों से डर लगता है।”अचानक मंदिर में हँसी गूँज उठी।“मैं कृष्ण से निपट लूँगा।तुम सुरक्षित घर जाओ।”लेकिन तभी मैंने मंदिर का बोर्ड देखा—महाविष्णु मंदिरतब मुझे समझ आया कि फिर मुझे धोखा दिया गया।


भागते-भागते मैं एक अय्यप्पा मंदिर पहुँचा।वहाँ रोते हुए प्रार्थना की।मैंने अय्यप्पा की एक तस्वीर खरीदी।अनजाने में मैंने उस तस्वीर के होंठ काटकर चूम लिए।फिर मुझे लगा कि पीछे से कुछ मेरे शरीर में प्रवेश कर रहा है।शर्म से मैं भाग गया।

फिर एक और आवाज़ ने मुझे पुकारा।लेकिन उसी क्षण कृष्ण ने फिर मुझे अपनी सत्यभामा कहकर अपना बताया।अंततः मैं भ्रमित अवस्था में घर लौट आया।

उस रात मेरी माँ को अचानक भयानक दुःस्वप्न आया और वह ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाने लगीं।मुझे क्रोध आया।

तभी कृष्ण की बाल-आवाज़ ने धमकी दी—“यदि तुम मेरे सामने समर्पण करोगे, तो तुम्हारी माँ बच जाएगी।”
मैंने इंकार कर दिया।मेरी माँ उग्र हो गईं।तभी अचानक मैं चिल्लाया—“यीशु, कृपया मेरी माँ को बचाओ!”तुरंत मेरी माँ शांत हो गईं और सो गईं।

मैंने चर्च स्कूल में पढ़ाई की थी और एक बार मुझे बाइबल मिली थी।मेरी माँ ने भी एक कॉन्वेंट में काम किया था, इसलिए मुझे यीशु पर हमेशा विश्वास था।टीबी के बाद मैं उन्हें भूल गया था।लेकिन उस रात मैं फिर यीशु की ओर लौटा।पूरी रात मैंने बाइबल पढ़ी।उसके बाद मैं चर्च जाने लगा।मिस्सा के समय नहीं — बल्कि शांत समय में।मैं यीशु से एक मित्र की तरह बात करता था।क्योंकि सच कहूँ तो जीवन में मेरा कोई मित्र कभी नहीं था।मेरी माँ भी पूरी तरह सामान्य हो गईं।

एक सुबह कुछ ऐसा हुआ जिसकी मैंने यीशु से भी अपेक्षा नहीं की थी।मैंने सोचा—“मैं बुरा हूँ।”मैंने आत्महत्या करने का निर्णय लिया।मैंने कमरे को बंद किया और एक ब्लेड लिया।कलाई पर रखा।प्रार्थना की—“हे भगवान, मुझे क्षमा करें। मेरे पास कोई और रास्ता नहीं है।”अचानक मेरा हाथ हिल गया।ब्लेड ने मेरी छोटी उँगली काट दी।खून बहने लगा।

मैं मृत्यु की प्रतीक्षा करता रहा।कुछ नहीं हुआ।जब मैंने देखा, मेरी छोटी उँगली का आधा हिस्सा कट चुका था।दर्द असहनीय था।मैं चीख पड़ा।माँ और दूसरे लोग दौड़कर आए।फिर मैं बेहोश हो गया।


जब होश आया, मैं अस्पताल के बिस्तर पर था।मेरी उँगली सिल दी गई थी।माँ मेरे सिर पर हाथ फेर रही थीं।मुझे गहरा अपराधबोध हुआ।मैं अपनी गरीब माँ को अकेला कैसे छोड़ सकता था?मैंने स्वयं से वचन लिया—“जो भी हो, मैं फिर कभी आत्महत्या का प्रयास नहीं करूँगा।”मैंने प्रार्थना की—“हे भगवान, मेरी माँ की रक्षा करो। मुझे क्षमा करो।”

उसी क्षण मेरे मन में एक दृश्य प्रकट हुआ।एक चौकोर संरचना।लोग सफेद कपड़े पहनकर उसके चारों ओर घूम रहे थे।पुरुष, महिलाएँ, बच्चे, बुज़ुर्ग।वे एक ऐसी भाषा में प्रार्थना कर रहे थे जिसे मैं नहीं जानता था।मेरे होंठ अनजाने में बुदबुदाए—“मेरे भगवान…अंततः मैंने अपने भगवान को पा लिया है।”

उसी क्षण शरीर और मन से परे एक गहरी शांति मुझमें भर गई।


- Binoy.M.B,
Thrissur district, pincode:680581,
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phone:9847245605(office)

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