मोहन राकेश के नाटकों में आधुनिक युगबोध की अभिव्यक्ति हिंदी नाट्य साहित्य की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है मोहन राकेश के नाटकों में आधुनिक युगबोध
मोहन राकेश के नाटकों में आधुनिक युगबोध
आषाढ़ का एक दिन में आधुनिक युगबोध
आषाढ़ का एक दिन में यह युगबोध सबसे स्पष्ट रूप से उभरता है। नाटक कालिदास के जीवन की एक काल्पनिक घटना पर आधारित है, लेकिन उसकी मूल संवेदना पूरी तरह समकालीन है। कालिदास एक ऐसे कलाकार का प्रतीक बन जाता है जो अपनी रचनात्मक स्वतंत्रता और प्रेम की इच्छा के बीच फंस जाता है। वह मल्लिका के साथ सादगी भरा जीवन चाहता है, लेकिन राजदरबार की चमक और महत्वाकांक्षा उसे खींच लेती है। यह द्वंद्व आधुनिक युग के उस व्यक्ति का प्रतिनिधित्व करता है जो अपनी पहचान, अपनी भावनाओं और अपनी रचनात्मकता को बचाने की कोशिश में असफल होता रहता है। नाटक में वर्षा का प्रतीक बहुत गहरा है—यह एक ओर जीवनदायिनी है, दूसरी ओर अनिश्चितता और विनाश की आशंका से भरी हुई। ठीक वैसे ही आधुनिक जीवन में व्यक्ति को लगता है कि वह आगे बढ़ रहा है, लेकिन हर कदम पर टूटन और असुरक्षा का सामना करता है। मल्लिका का चरित्र उस स्त्री का प्रतीक है जो परंपरागत प्रेम और त्याग की अपेक्षाओं के बीच कुचली जाती है, जबकि अंबिका जैसी महिलाएं सामाजिक ढांचे में अपनी जगह बनाने के लिए पुरुष की छत्रछाया पर निर्भर रहती हैं। इस प्रकार नाटक आधुनिक संबंधों की नाजुकता, विश्वासघात और भावनात्मक अलगाव को उजागर करता है।लहरों के राजहंस में आधुनिक युगबोध
लहरों के राजहंस में मोहन राकेश ने आध्यात्मिक खोज और सांसारिक आकर्षण के बीच के द्वंद्व को और गहराई से प्रस्तुत किया है। नंद का चरित्र आधुनिक मनुष्य की उस दुविधा को दर्शाता है जो भौतिक सुखों की ओर खिंचता है और साथ ही आंतरिक शांति की तलाश में बेचैन रहता है। सुंदरी का सौंदर्य और सांसारिक मोह नंद को बांधे रखता है, जबकि बुद्ध की उपस्थिति उसे उससे ऊपर उठने का आह्वान करती है। यह द्वंद्व आज के युग में और भी प्रासंगिक हो जाता है, जहां तकनीकी प्रगति और उपभोक्तावादी संस्कृति ने मनुष्य को भौतिक सुखों की दौड़ में झोंक दिया है, लेकिन उसकी आत्मा खाली और अशांत बनी हुई है। समुद्र की लहरों का प्रतीक यहां बार-बार आता है—वे कभी शांत होती हैं, कभी उफन पड़ती हैं, ठीक वैसे ही आधुनिक मनुष्य का मन स्थिरता और अस्थिरता के बीच झूलता रहता है। नाटक यह भी दिखाता है कि आध्यात्मिकता की खोज व्यक्तिगत स्तर पर कितनी कठिन हो सकती है जब समाज और परिवार का दबाव निरंतर बना रहता है।
आधे अधूरे में आधुनिक युगबोध
आधे अधूरे मोहन राकेश का सबसे प्रत्यक्ष रूप से आधुनिक नाटक है, जिसमें मध्यवर्गीय परिवार की टूटन और संबंधों की खोखलापन को बिना किसी ऐतिहासिक या मिथकीय आवरण के प्रस्तुत किया गया है। यह नाटक शहरी मध्यवर्ग के उस व्यक्ति की कहानी है जो नौकरी, परिवार और व्यक्तिगत इच्छाओं के बीच संतुलन नहीं बना पाता। ज्योति का पति, जो परिवार का मुखिया है, अपनी जिम्मेदारियों से भागता है और बाहर की दुनिया में सुख ढूंढता है। ज्योति स्वयं भावनात्मक रूप से असंतुष्ट है और बच्चों के साथ अपने रिश्ते में भी वह पूर्ण नहीं हो पाती। नाटक का शीर्षक ही इस युगबोध का सार है—आधे अधूरे। आधुनिक मनुष्य अपनी महत्वाकांक्षाओं, अपने सपनों और अपनी वास्तविकता के बीच आधा-अधूरा रह जाता है। वह न पूर्ण रूप से परिवार के प्रति समर्पित हो पाता है, न ही अपनी व्यक्तिगत इच्छाओं को पूरा कर पाता है। नाटक में संवादों की तीक्ष्णता और मौन के क्षण इस आंतरिक शून्यता को और गहरा करते हैं। यहां कोई नायक या खलनायक नहीं है, केवल सामान्य लोग हैं जो अपने-अपने स्तर पर असफल हो रहे हैं। यह असफलता व्यक्तिगत नहीं, बल्कि पूरे सामाजिक ढांचे की है, जो व्यक्ति को पूर्ण होने का अवसर ही नहीं देता।
स्त्री चरित्रों के माध्यम से आधुनिक युगबोध
मोहन राकेश के नाटकों में स्त्री चरित्र भी आधुनिक युगबोध का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। मल्लिका, सुंदरी, ज्योति—ये सभी महिलाएं परंपरा और आधुनिकता के बीच फंसी हुई हैं। वे अपनी इच्छाओं को व्यक्त करती हैं, लेकिन सामाजिक बंधनों के कारण उन्हें या तो त्याग करना पड़ता है या अपूर्ण रह जाना पड़ता है। यह स्थिति आज भी प्रासंगिक है, जहां स्त्री स्वतंत्रता की बात तो होती है, लेकिन वास्तविकता में वह अभी भी कई स्तरों पर बंधी हुई है।
नाटकों की समकालीन प्रासंगिकता
कुल मिलाकर मोहन राकेश के नाटक आधुनिक युग के उस मनुष्य की कहानी कहते हैं जो स्वतंत्र होना चाहता है, लेकिन हर कदम पर बंधनों से टकराता है; जो प्रेम चाहता है, लेकिन विश्वासघात का सामना करता है; जो सफलता की दौड़ में है, लेकिन आंतरिक शांति खो देता है। उनके नाटकों में कोई सुखद अंत नहीं होता, कोई निश्चित समाधान नहीं मिलता—क्योंकि आधुनिक जीवन में समाधान आसान नहीं हैं। यही उनकी सबसे बड़ी विशेषता है कि वे यथार्थ को सुंदर बनाने की कोशिश नहीं करते, बल्कि उसे जैसा है वैसा दिखाते हैं—कच्चा, असहज और अधूरा। इसी में उनका आधुनिक युगबोध निहित है, जो आज के पाठक और दर्शक को भी अपने भीतर झांकने पर मजबूर करता है।


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