आधे अधूरे नाटक का सारांश | मोहन राकेश

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आधे अधूरे नाटक का सारांश मोहन राकेश 1969 में प्रकाशित यह नाटक मध्यवर्गीय समाज के पारिवारिक विघटन, वैवाहिक जीवन की नीरसता, स्त्री-पुरुष संबंधों के अंतर

आधे अधूरे नाटक का सारांश | मोहन राकेश


धे अधूरे , हिंदी नाटक के पुरोधा मोहन राकेश द्वारा रचित एक युगांतकारी नाटक है। सन् 1969 में प्रकाशित यह नाटक मध्यवर्गीय समाज के पारिवारिक विघटन, वैवाहिक जीवन की नीरसता, स्त्री-पुरुष संबंधों के अंतर्विरोध और मानसिक अकेलेपन को बेहद गहराई से उजागर करता है।

इस नाटक की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें 'पूर्णता' की तलाश में भटकते किरदारों के माध्यम से यह दिखाया गया है कि कोई भी इंसान अपने आप में पूरा नहीं है—सब 'आधे-अधूरे' हैं।

'आधे-अधूरे' मोहन राकेश का सामाजिक समस्या- प्रधान नाटक है! इस नाटक की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें एक ही पुरुष पात्र केवल वस्त्र-परिवर्तन के द्वारा चार पुरुषों की भूमिकाएँ निभाता है। यह व्यक्ति पुरुष एक, पुरुष दों, पुरुष तीन और पुरुष चार के रूप में मंच पर उपस्थित होता है। 'आधे अधूरे' की कथावस्तु इस प्रकार है-

नाटककार ने प्रारम्भ में ही यह स्पष्ट कर दिया है कि काले सूट वाला व्यक्ति जो चार पुरुषों की भूमिकाएँ निभाता है, उसकी आयु लगभग उन्चास-पचास वर्ष है। वह पुरुष एक की भूमिका में पतलून-कमीज, पुरुष दो के रूप में पतलून और बन्द गले का कोट, पुरुष तीन के रूप में पतलून और टीशर्ट तथा पुरुष चार के रूप में पतलून के साथ पुरानी काट का लम्बा कोट पहने दिखाई देता है। नाटक की स्त्री- पात्र सावित्री है, जिसकी आयु चालीस वर्ष के लगभग है। उसके चेहरे से यौवन की चमक मिट चुकी है, किन्तु अभी वासना नहीं मिट सकी है। उसकी बड़ी लड़की लगभग बीस वर्ष की है और संघर्ष का अवसाद उसके मुख पर साफ देखा जा सकता है। छोटी लड़की की आयु लगभग बारह अथवा तेरह वर्ष की है, उसके चरित्र में विद्रोह का भाव है। लड़का लगभग इक्कीस वर्ष का है, उसके चाल-चलन एवं चेहरे पर कड़वाहट बिखरी हुई है।
 
मंच पर एक साधारण-सा घर दिखाई देता है, जिससे यह सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि यह मध्य-वित्तीय स्तर से ढहकर निम्न-मध्य-वित्तीय स्तर पर आ चुका है। घर में टूटा हुआ सोफासेट पड़ा है, ऐसी ही डाइनिंग टेबल, कवर्ड और टेबिल भी हैं। इधर-उधर कुछ मोढ़े, कहीं फटी-पुरानी किताबों का एक शेल्फ और कहीं पढ़ने की एक मेज-कुर्सी भी है । पर्दा उठने पर पहले चाय पीने के बाद डाइनिंग टेबल पर छोड़ा गया अधटूटा टी-सेट अवलोकित होता है, फिर फटी किताबों पर और टूटी कुर्सियों आदि में से होता हुआ प्रकाश सोफे के उस भाग पर केन्द्रित हो जाता है, जहाँ बैठा हुआ काले सूट वाला आदमी सिगार के कश खींच रहा है।
 
काले सूट वाला व्यक्ति स्वयमेव बड़बड़ाता है-फिर एक बार फिर से वही शुरूआत इसके बाद वह सोफे पर से उठ खड़ा हाता है और बोलता चला जाता है-मैं नहीं जानता आप क्या समझ रहे हैं, मैं कौन हूँ, और क्या आशा कर रहे हैं, मैं क्या कहने जा रहा हूँ ? आप शायद सोचते होंगे कि मैं इस नाटक में कोई एक निश्चित इकाई हूँ-अभिनेता, प्रस्तुतकर्त्ता, व्यवस्थापक या कुछ और। परन्तु मैं अपने सम्बन्ध में निश्चित रूप से कुछ भी नहीं कह सकता-उसी तरह जैसे इस नाटक के सम्बन्ध में नहीं कह सकता।

काले सूट वाला व्यक्ति बताता है कि यह नाटक अनिश्चित है और अनिश्चित क्यों है, इसका कारण बताना वह बेकार समझता है। अपने विषय में वह बताता है किं-अपने बारे मे इतना कह देना ही काफी है कि सड़क के फुटपाथ पर चलते समय आप अचानक जिस आदमी से टकरा जाते हैं, वह आदमी मैं ही हूँ। मतलब यह है कि वह आदमी दर्शकों के लिए यद्यपि महत्वपूर्ण नहीं है, किन्तु फिर भी उसकी स्थिति को दर्शक स्वीकार करें, यही वह चाहता है। वह बताता है कि विभाजित होकर मैं किसी न किसी अंश में आप में से हर एक व्यक्ति हूँ और यही कारण हैं कि नाटक के बाहर हो या अन्दर, मेरी कोई एक निश्चित भूमिका नहीं है। इसी प्रकार की कुछ बातें करके और नाटक में कई बार दर्शकों से भेंट होने की बात कहकर वह चला जाता है। मंच पर कुछ देर तक अन्धकार छा जाता है, फिर वह प्रकाशित हो उठता है।
 
आधे अधूरे नाटक का सारांश | मोहन राकेश
कमरे के प्रकाशित होने पर वह खाली दिखाई देता है। सामने तिपाई पर एक विद्यार्थी का झोला खुला दिखाई देता है, जिसमें से आधी कापियाँ और पुस्तकें बाहर बिखरी हुई हैं, सोफे पर एक-दो पुरानी पत्रिकाएँ और कुछ कटी-अधकटी तस्वीरें रखी हैं। एक कुर्सी की पीठ पर उतरा हुआ पाजामा झूल रहा है। तभी नायिका कुछ सामान सँभाले बाहर से आती है और सामान को कुर्सी पर रखकर थकान-भरी आँखों से कमरे को देखने लगती है। घर में किसी को न देखकर उसे निराशा होती है। वह अपनी छोटी लड़की को 'किन्नी' कहकर पुकारती है, किन्तु जब घर में कोई है ही नहीं, तो जबाव कहाँ से आये। किन्नी की फटी किताबें देखकर वह झल्ला उठती है। इसी समय यह ज्ञात होता है कि कमरे में जो तस्वीरें काटकर रखी गयी हैं, उसके लड़के अशोक ने काटी हैं और वह तस्वीरें एलिजाबेथ टेलर, आंडे हेबनं आदि विदेशी अभिनेत्रियों की हैं। तभी पाजामा देखकर वह फिर झल्ला उठती है और पाजामे को तहाने लगती है। मेज पर पड़े चाय के बर्तनों को देखकर वह पाजामे को वहीं पटक देती है और प्यालियों को ट्रे में रखने लगती है।

स्त्री को इस बात का अफसोस होता है कि उसके पति ने चाय तो पी, किन्तु बर्तनों को रसोईघर में नहीं रख सके। उसी समय पुरुष एक, जो कि उसका पति है, वहाँ पर आ जाता है और उससे कहता है कि आज वह ऑफिस से जल्दी कैसे आ गयी ? स्त्री यह सुनकर ठिठक जाती है और उससे पूछती है कि वह कहाँ चला गया था ? पुरुष एक बताता है कि वह थोड़ी देर के लिए बाजार चला गया था। स्त्री उसके पाजामे को पकड़कर झल्लाती हुई कहती है कि इस तरह कमरे में सामान बिखेरना अच्छी आदत नहीं है। इस पर पुरुष हाथ बढ़ाकर पाजामा माँगता है। स्त्री पाजामे को झाड़कर तहाती हुई कहती है कि अब उसे क्यों दूँ ? पहले भी तो वह देख सकता था। इतना कहकर वह गुस्से से कवर्ड खोलती है और पाजामा उसमें ठूंस देती है। इसके बाद स्त्री पूछती है कि चाय किस-किसने पी थी, तो पुरुष अपराधी स्वर में बताता है कि चाय केवल उसी ने पी थी। स्त्री जब यह पूछती है कि छोटी लड़की किन्नी को दूध दिया था या नहीं, तो पुरुष बताता है कि उसने उसे देखा ही नहीं है।
 
स्त्री बताती है कि आज उसका बॉस सिंघानिया आने वाला है, घर पर। पुरुष पूछता है कि क्या उसी ने उसे बुलाया है, तो स्त्री कहती है कि बॉस होने के नाते उसे घर पर बुलाना उसका कर्त्तव्य था। पुरुष एक पूछता है कि वह किस समय आयेगा ? सिंघानिया को लेकर स्त्री और पुरुष में काफी देर तक वाद-विवाद होता रहता है, क्योंकि पुरुष एक यह नहीं चाहता है कि उसके घर सिंघानिया-जैसे लोग आया करें। इसीलिए वह बताता है कि उसे जुनेजा के यहाँ जाना है। वास्तव में वह सिंघानिया के सामने घर में नहीं रहना चाहता है, इसलिए बहाना बनाता है। जुनेजा पुरुष एक का मित्र है और स्त्री उससे चिढ़ती है। वह यह मानती हैं कि व्यापार में पुरुष एक को, जो भी हानि उठानी पड़ी और इसके कारण आज उसकी जो दयनीय स्थिति हो गयी हैं, उसमें जुनेजा का ही हाथ था। यहीं पर यह भी स्पष्ट हो जाता है कि पुरुष एक का परिवार उन दिनों विलासपूर्ण जीवन बिताता था, चार सौ रुपये महीने का मकान था, टैक्सियों में आना-जाना होता था, किश्तों पर फ्रिज खरीदा गया था, लड़के-लड़की की कॉन्वेंट की फीसें जाती थीं, शराब आती थी और दावतें उड़ती थीं। पुरुष एक घर से चला जाना चाहता है। यहाँ पर फिर उनकी झड़प हो जाती है। स्त्री कहती है कि जैसे वह तीन-तीन दिन बाहर रहता है, उसी प्रकार उसका लड़का भी अब घर से बाहर रहने लगा है। पुरुष एक भी कह देता है कि उसकी लड़की भी तो अपनी माँ के चरण-चिह्नों पर चलकर किसी के साथ घर से भाग ही गयी, उसे किसने सीख दी ?
 
स्त्री कहती है कि वह बड़े लोगों को इसीलिए घर पर बुलाती है, ताकि किसी की संस्तुति से लड़का नौकरी पर लग जाय। इस पर पुरुष एक व्यंग्य करता हुआ कहता है कि हाँ, सिंघानिया तो जरूर लगवा देगा। स्त्री के झिड़कने पर पुरुष एक बताता है कि स्त्री हमेशा ही ऐसे नये-नये आदमियों को बुलाती रहती है। कभी जगमोहन आता था, फिर मनोज आने लगा और कभी कोई और। इन दोनों में कहा-सुनी हो ही रही थी कि बाहर से उनकी बड़ी लड़की आती है, जो अपने पति मनोज के घर से भाग आयी है। उसके साथ सामान न देखकर और आँखें सूजी हुई देखकर पुरुष एक कहता है कि यह सम्भवतः फिर भागकर आयी है। वह कहता है कि जिस मनोज की वह इतनी प्रशंसा किया करती थी, वही शह पाकर लड़की को ले उड़ा और अब लड़की बीना इस तरह भाग आयी है। वह स्त्री को उकसाता है कि वह बीना से पूछे कि वह क्यों आयी है ?
 
बीना उन दोनों को अपनी ओर घूरते देखकर पूछती है कि वे दोनों उसे क्यों घूर रहे हैं ? तब स्त्री उससे पूछती है कि वह बार-बार क्यों इस प्रकार चली आती है। लड़की बताती है कि मनोज. हर प्रकार से अच्छा है, किन्तु वही इस घर से कोई ऐसी चीज अपने साथ ले गयी है, जो उसको स्वाभाविक नहीं रहने देती। कोई ऐसी चीज क्या है, इसका पता मुझे अपने अन्दर से, अथवा इस घर के अन्दर से ही चल सकता है, मनोज स्वयं भी इस विषय में कुछ नहीं बता सकता। पुरुष एक इन दोनों की बातों में दखल देता है तो स्त्री के साथ उसकी फिर झड़प हो जाती है। तैश में आकर पुरुष एक फिर जगमोहन का प्रसंग ले बैठता है और बताता है कि उसका स्थानान्तरण फिर दिल्ली में ही हो गया है। एक दिन कनॉट प्लेस में मिलने पर वह बता रहा था कि कभी उनके घर आयेगा। स्त्री और बड़ी लड़की (बीना) दोनों ही इससे खीझ उठती हैं।

उसी समय छोटी लड़की किन्नी बाहर के दरवाजे से आती है और उन तीनों को खीझा हुआ देखकर अचानक ठिठक जाती है। छोटी लड़की सफाई देती हुई कहती है कि जब वह स्कूल से आयी थी तो घर पर कोई भी नहीं था, इसीलिए वह स्वयं भी बाहर चली गयी थी और अब लौटकर आयी है तो माँ, आप और बहिन तीनों हैं, पर सभी चुप साधे हुए हैं। स्त्री उससे पूछती हैं कि वह स्वयं कहाँ चली गयी थी तो छोटी लड़की किन्नी ढीठ होकर कहती है कि कहीं भी चली गयी थी, घर पर तो कोई था नहीं, जिसके पास वह बैठती। वह अपने दूध के विषय में पूछती है कि गर्म हुआ या नहीं और पुरुष एक स्त्री की त्यौरियाँ चढ़ी देखकर स्वयं दूध गर्म करने चला जाता है। किन्नी अपनी स्कूली वस्तुओं की माँग करती है और माँ के द्वारा फटकारे जाने पर गुस्से में आकर कहती है कि अशोक की तरह उसे भी स्कूल भेजना बन्द क्यों नहीं कर देते ? तभी पुरुष एक आकर व्यंग्यपूर्वक बीना को बताता है कि तुम्हारी माँ से मिलने आज नया आदमी आने वाला है-सिंघानिया । इस र्व्यग्य को सुनकर स्त्री रो पड़ने को हो आती है!
 
तभी अन्दर से चीखती हुई किन्नी बाहर आती है जो अशोक से लड़ रही है। अशोक आकर बताता है कि किन्नी की उम्र अभी केवल बारह-तेरह वर्ष की है और यह अभी से गन्दी पुस्तकें पढ़ने लगी है। किन्नी प्रत्युत्तर में बताती है कि पुस्तक अशोक की ही है, जिसे वह छिपकर देख रही थी। पुरुष देखना चाहता है, किन्तु लड़का नहीं दिखाता। इस अपमान से तिलमिलाकर वह खूब खरी-खोटी सुनाता है। वह कहता है-अपनी जिन्दगी चौपट करने का जिम्मेदार मैं हूँ, तुम्हारी जिन्दगी चौपट करने का जिम्मेदार मैं हूँ। इन सबकी जिन्दगियाँ चौपट करने का जिम्मेदार मैं हूँ। फिर भी मैं इस घर से चिपका हूँ, क्योंकि अन्दर से मैं आरामतलब हूँ, घरघुसरा हूँ, मेरी हड्डियों में जंग लगा है। यह कहकर पुरुष एक उत्तेजना में घर से बाहर चला जाता है। कुछ देर के लिए घर के सभी लोग जड़वत् हो जाते हैं।
 
पिता को इस प्रकार गया हुआ देखकर बड़ी लड़की बिन्नी, माँ से पूछती है कि अब क्या होगा ? यह स्त्री कहती है कि मंगल-शनीचर को यही सब होता है यहाँ, लौट आयेंगे रात तक । अशोक को जब मालूम होता है कि सिंघानिया आज फिर आने वाला है तो उसका मन वितृष्णा से भर जाता है। यह सुनकर तो वह और भी तैश में आ जाता है कि माँ ने उसको नौकरी दिलवाने के लिए ही सिंघानिया को घर पर आमंत्रित किया है, जबकि अशोक उसे चुकन्दर समझता है, जिसे न बैठने का शऊर है, न बात करने का। यहाँ आकर वह जब भी बैठता है, अशोक ने उसकी पैंट के बटन सदैव खुले ही देखे हैं। वह सिंघानिया के अश्लील व्यवहारों की नकल करते हुए उसकी हँसी उड़ाता है। स्त्री अशोक से उलझ जाती है और इस बात का दुःख मानती है कि जिनके लिए वह आटा पीसने की मशीन बन गयी है, वे लोग ही उसे इस ढंग से अपमानित कर रहे हैं।
 
इसी बीच दरवाजे पर थपथपाहट सुनकर स्त्री चौंककर उधर देखती है और पुरुष दो उर्फ सिंघानिया को देखकर उसका स्वागत करती है। स्त्री सिंघानिया से बीना का परिचय कराती है। सिंघानिया बड़ी लड़की बीना को ललचायी निगाहों से देखता हुआ उल्टी-सीधी बातें करता है और बार-बार जाँघ खुजलाता रहता है। अशोक बाहर चला जाना चाहता है, किन्तु स्त्री उसे रोक लेती है। स्त्री पुनः सिंघानिया से अनुरोध करती है कि वह अशोक को कहीं नौकरी दिला दे। सिंघानिया को बताया जा चुका है कि वह बी. एस-सी. में फेल हो चुका है, किन्तु वह बार-बार यही पूछता है कि किस कॉलेज में पढ़ते हो, कौन-सी क्लास, किस श्रेणी में उतीर्ण की है ? कभी वह बीना को सम्बोधित करके कहता है कि इसका ध्यान वह अवश्य रखेगा। सिंघानिया बात करते-करते इतना बहक जाता है कि हर बार किसी अन्य महिला का नाम लेता रहता है। अशोक अवसर मिलते ही दराज़ से एक पैड निकाल लेता है और उस पर पेन्सिल से रेखाएँ खींचने लगता है। पुरुष दो अर्थात् सिंघानिया कुछ इधर-उधर की ऊलजलूल बातें करता है और फिर चला जाता है। उसके जाते ही अशोक हा-हा करके हँसने लगता है।

अशोक को इस प्रकार हँसते देखकर बीना इसका कारण पूछती है तो वह बताता है कि उसने सिंघानिया को किस प्रकार अब तक उल्लू बनाये रखा, फिर वह बीना को पैड पर बनाया हुआ वह खाका दिखाता है जो उसने सिंघानिया को देखकर अभी बनाया था। कार्टून के सिर पर दो सींग बने और फिर कटे हुए देखकर बीना पूछती है कि वह क्या है ? तो अशोक बताता है कि सींग बनाये थे, किन्तु फिर याद आ गया कि गधे के सींग होते ही नहीं। उसी समय स्त्री वापस आती है और बताती है कि सिंघानिया की गाड़ी की बैटरी डाउन हो गयी है, गाड़ी चल नहीं पा रही है, इसलिए धक्का लगाना पड़ेगा। लड़का व्यंग्य करते हुए कहता है-अभी तो नौकरी की बात तक नहीं की उसने । अगर उसने सचमुच नौकरी दिला दी, तब तो पता नहीं क्या होगा ? और यह कहते हुए वह बाहर के दरवाजे से चला जाता है। अशोक के जाते ही स्त्री बीना के हाथ में पैड देखकर पूछती है कि यह क्या है, तो वह बताती है कि अशोक न जाने क्या बना रहा था, उसी को देख रही हूँ। स्त्री उसके हाथ से खाका लेकर देखती हैं और व्यंग्य से कहती है कि यह तो तेरे डैडी-जैसा मुखौटा है। बीना यह सुनकर चौंक पड़ती है और कहती है कि वह तो उस आदमी का चेहरा बना रहा था, जो अभी गया है ।
 
सिंघानिया के अपमान की बात सुनकर स्त्री का गुस्सा बढ़ जाता है और अशोक के आते ही वह उस पर बरस पड़ती है, अतः दोनों में तीखी झड़प हो जाती है। फिर वह मेज की ओर बढ़ जाता है और वहाँ से तस्वीरें उठाकर देखने लगता है। स्त्री गुस्से में आकर कहती है-मैं मिन्नत- खुशामद करके लोगों को घर पर बुलाऊँ और तू आने पर उनका मजाक उड़ाये, उनके कार्टून बनाये- ऐसी चीजें अब मुझे बिल्कुल बर्दाश्त नहीं हैं। लड़का भी कह देता है-नहीं बर्दाश्त हैं, तो बुलाती क्यों हो ऐसे लोगों को घर पर, जिनके आने से यह सब बातें हों और हम जितने छोटे हैं, अपनी दृष्टि में उससे भी हीन हो जाएँ। अशोक स्त्री के सामने स्पष्ट रूप से यह कह देता है कि उसने आज तक जिस किसी को घर पर निमंत्रित किया, उसके पद को देखकर ही किया या उसके वेतन की लम्बी राशि को देखकर। अशोक की बातें सुनकर स्त्री का स्वर वितृष्ण हो उठता है और वह निर्णयात्मक रूप से कह देती है कि आज से वह केवल अपना जीवन देखेगी, बाकी सभी लोग अपने विषय में स्वयं निर्णय ले लें । वह घर को ही त्याग देने का विचार प्रकट करती है और यहीं मंच पर मौन छा जाता है। प्रकाश आकृतियों पर धुँधलाकर कमरे के अलग-अलग कोनों में सिमटता हुआ विलीन होने लगता है। मंच पर अँधेरा छा जाता है। 

नाटक में अन्तराल की स्थिति । 

मंच पर पुन: प्रकाश-वृत्त फैलता है और अशोक तथा बीना दिखाई देते हैं। अशोक सोफा पर पसरा एक पत्रिका पढ़ रहा है और बीना पढ़ने की मेज पर प्लेट रखे स्लाइसों पर मक्खन लगा रही हैं। तभी बीना अशोक के सामने एक डिब्बा रखती हुई कहती है कि इसे खोल दे तो अशोक. कहता है कि मुझसे नहीं खुल पायेगा। वह यह भी बताता है कि दुकानदार से जब वह सामान उधार लाया था, तो एक फोन भी उधार कर आया है। फोन उसने जुनेजा के यहाँ किया था, पिता से तो बात न हो सकी, किन्तु जुनेजा से पूछने पर पता चला कि वे अब घर लौटकर नहीं आएँगे। हाँ, जुनेजा स्वयं माँ से बात करने शाम को आयेगा। इस पर बीना कहती है कि एक तो माँ का मूड वैसे ही ऑफ है, ऊपर से जुनेजा आकर बात करेंगे। सबेरे माँ का मुख कैसा हो रहा था और वह चुप भी बहुत थी। इस पर लड़का कहता है कि साड़ी तो बहुत बढ़िया बाँधकर गई है-जैसे किसी ब्याह का न्यौता हो। बीना से ही यह ज्ञात होता है कि स्त्री यद्यपि उससे कह गई थी कि शाम को साढ़े पाँच तक वह आ जायेगी, किन्तु उसके मुख से तो ऐसा लगता था, जैसे वह सचमुच कोई निर्णय ले चुकी है। अशोक भी यही इच्छा प्रकट करता है कि निर्णय होना ही चाहिए।

अशोक की बातें सुनकर बीना काँप जाती है और फिर डिब्बे की ओर संकेत करती है। वह कहता है कि टिन-कटर की धार कुण्ठित हो चुकी है, इसलिए कोई अन्य वस्तु हो तो वह उससे खोल सकता है। अशोक यह भी कहता है कि न जाने इस घर में क्या है जो उसे अस्वाभाविक बना देता है। इस पर बीना सशंक होकर कहती है कि वह क्या चीज है, तो अशोक कहता है कि बीना से ही तो उसने भी उसे जाना है और यही अब ठीक है कि उस चीज को जानकर भी अनजाना कर दिया जाए। बीना अस्थिर हो उठती है और अशोक की बात सुनकर उसका हाथ ठीक से स्लाइस पर मक्खन नहीं लगा पाता। यह देखकर अशोक बाहर के दरवाजे से चला जाता है।
 
कुछ ही देर बाद छोटी लड़की किन्नी को अन्दर धकेलता हुआ अशोक आता है। किन्नी अपने को बचाकर बाहर भाग जाना चाहती है, पर वह उसे बाँह से पकड़े हुए है। बीना यह सब देखकर संभ्रम में पड़ जाती है कि यह क्या हो रहा है ? किन्नी बीना से सहायता की याचना करती हुई, झटके से बाँह छुड़ाने का प्रयत्न करती है, किन्तु अशोक उसे सख्ती से खींचकर अन्दर ले आता है। बीना पास आकर किन्नी की बाँह छुड़ाती है। अशोक खुला हुआ डिब्बा बीना को थमाते हुए कहता है कि इससे पूछ यह बाहर क्या बातें कर रही थी ? वास्तव में किन्नी बाहर अपनी सहेली से यह कह रही थी कि औरतें और मर्द किस प्रकार परस्पर सम्भोग करते हैं और वह भी पति-पत्नी नहीं, वरन् पति किसी अन्य स्त्री से और पत्नी किसी अन्य पुरुष से। किन्नी इस बात से इन्कार करती है कि वह नहीं, बल्कि सुरेखा ही बता रही थी और अशोक को पीछे खड़े होकर बातें सुनते देखकर वह भागने लगी थी कि अशोक ने उसे पकड़ लिया। बीना अशोक को चुप रहने को कहती है और किन्नी से पूछती है कि ठीक-ठीक बता क्या बात थी ?
 
किन्नी के मुख से उसी समय अशोक की भी पोल खुल जाती है कि वह किस प्रकार किन्नी को जन्म दिन पर मिली चूड़ियाँ और फाउण्टेन पेन उद्योग-सेन्टर वाली वर्णा को दे आया है और उसके पीछे जूतियाँ चटखाता फिरता है। अशोक उसे मारने दौड़ता है तो वह बाहर की ओर भाग जाती है। तभी अशोक उसके पीछे बाहर जाने लगता है कि अचानक स्त्री को अन्दर आते देखकर ठिठक जाता है। स्त्री को देखकर बीना चाय बनाने को कहती है, किन्तु स्त्री उपेक्षा से अस्वीकार कर देती है और कहती है कि उसे चाय के लिए किसी के साथ बाहर जाना है। जब उसे यह ज्ञात होता है कि उससे बात करने को जुनेजा आने वाला है. तो वह कह देती है कि उससे कह देना कि वह घर पर नहीं है और पता नहीं कब लौटे ? लड़की बीना के पूछने पर वह कहती है कि जुनेजा से कह दे कि जगमोहन आया था और उसी के साथ गयी है।
 
अशोक उसी समय घर चला जाता है। स्त्री बीना से कहती है कि अब शायद वह इस घर में कभी नहीं लौटेगी और वह अब जगमोहन के साथ ही रहेगी। बीना कुछ समय तक सोचती रहती है, फिर अन्दर को चली जाती है। स्त्री कभी इस सामान को उठाती है, कभी उस सामान को सँभालती विक्षिप्त-सी बड़बड़ाती रहती है। चेहरे की झुर्रियों को क्रीम-लोशन आदि से ढकती हुई स्वयं को सजाती है और कंघी से सफेद बालों को ढकने लगती है। तभी पुरुष तीन उर्फ जगमोहन कमरे में प्रवेश करता है। स्त्री की दृष्टि ज्यों ही उस पर पड़ती है, उसकी आँखों में चमक भर जाती है। वह बड़े द्रवित स्वर में उससे कहती है कि आज उसकी अतीव आवश्यकता थी। वह उसे बाहर चलकर बातें करने को कहती है। जगमोहन तैयार हो जाता है, वे दोनों घर से बाहर चले जाते हैं।
 
इसी समय पुरुष चार उर्फ जुनेजा घर में प्रवेश करता है। वह बताता है कि अशोक उसी के घर अपने डैडी से मिलने गया है। यह जानकर कि स्त्री अर्थात् सावित्री जगमोहन के साथ गयी है, वह उलझन में पड़ जाता है। वह बताता है कि पुरुष एक अर्थात् महेन्द्रनाथ सावित्री को बहुत प्यार करता है और सावित्री की गलत हरकतों के कारण ही उसका जीवन नरक बन गया है। वह यह भी बताता है कि महेन्द्र के कहने पर ही वह सावित्री को समझाने आया है। अगर जुनेजा यहाँ न आता तो महेन्द्र स्वयं आ जाता, जबकि ब्लड प्रेशर (रक्त चाप) का मरीज होने के कारण वह इस समय अस्वस्थ है।
 
उसी समय स्त्री बाहर से आती है और जुनेजा से उलझ जाती है। उसे यह जानकर भी अपने पति महेन्द्र के प्रति सहानुभूति नहीं उपजती कि वह इस समय जुनेजा के घर अस्वस्थ पड़ा है। वह जुनेजा के सम्मुख महेन्द्रनाथ की आलोचना करती हुई कहती है-आदमी होने के लिए क्या यह जरूरी है कि उसमें अपना एक माद्दा, अपनी एक शख्सियत हो ? जब से मैंने उसे (महेन्द्रनाथ को) जाना है, मैंने हमेशा हर चीज के लिए उसे किसी न किसी का सहारा ढूँढते पाया है। खास तौर से आपको यह करना चाहिए या नहीं- जुनेजा से पूछ लूँ। यहाँ जाना चाहिए या नहीं- जुनेजा की पसन्द से, कोई बड़े से बड़ा खतरा उठाना है-तो भी जुनेजा की सलाह से, यहाँ तक कि मुझसे ब्याह करने का फैसला भी कैसे किया उसने ? जुनेजा के हामी भरने पर, जो जुनेजा सोचता है, जो जुनेजा चाहता है, जो जुनेजा करता है, वही वह चाहता है, वही उसे भी करना है, क्योंकि जुनेजा तो एक पूरा आदमी है अपने में, और वह खुद ? वह खुद एक पूरे आदमी का आधा-चौथाई भी नहीं है। 

पुरुष चार उर्फ जुनेजा स्त्री के सभी आरोपों को सुनता रहता है और अपने पक्ष को प्रबल बनाने का प्रयत्न करता है, किन्तु स्त्री अर्थात् सावित्री उसके सभी तर्कों को काटती हुई न केवल महेन्द्र की, वरन् जुनेजा की भी कटु आलोचना करती हुई कहती है-पर आपके महेन्द्र के लिए जिन्दगी का मतलब रहा है, जैसे सिर्फ कुछ दूसरों के खाली खाने भरने की ही वह एक चीज है। वह (सावित्री) नफरत करती है इस सबसे-इस आदमी के ऐसा होने से। वह एक पूरा आदमी चाहती है, अपने लिए। गला फाड़कर वह यह बात कहती है।
 
जुनेजा भी तैश में आ जाता है और सावित्री को उसके विगत जीवन की याद दिलाता हुआ कहता है कि इसका उत्तरदायित्व स्वयं सावित्री पर ही है, क्योंकि- आज से बीस साल पहले भी एक बार लगभग ऐसी ही बातें मैं तुम्हारे मुँह से सुन चुका हूँ। तुम्हें याद है ? मेरे घर में हुई थी, वह बात। तुम बात करने के लिए ही खास तौर से आयी थीं वहाँ और मेरे कन्धे पर सिर रखे देर तक रोती रही थीं। उस दिन भी बिल्कुल इसी तरह तुमने महेन्द्र को मेरे सामने उधेड़ा था। कहा था कि वह बहुत लिजलिजा और चिपचिपा सा आदमी है। पर उसे वैसा बनाने में नाम तब दूसरों के थे। एक नाम था, उसकी माँ का और दूसरा उसके पिता का। किन्तु जुनेजा का नाम तब नहीं था, ऐसे लोगों में। क्यों नहीं था, कह दूँ न यह भी ? बहुत पुरानी बात है, कह देने में कोई हर्ज नहीं है। मेरा नाम इसलिए नहीं था कि एक आदमी के तौर पर मैं महेन्द्र से, तुम्हारी नजर में, कुछ बेहतर था। मुझसे उस वक्त तुम क्या चाहती थीं, मैं ठीक-ठीक नहीं जानता। लेकिन तुम्हारी बात से इतना जरूर जाहिर था कि महेन्द्र को तुम तब भी वह आदमी नहीं समझती थीं, जिसके साथ तुम जिन्दगी काट सकतीं (इसीलिए) पहले कुछ दिन जुनेजा एक आदमी था तुम्हारे सामने, जुनेजा के बाद जिससे तुम चकाचौंध रहीं अर्थात् प्रभावित रहीं, वह था शिवजीत। एक बड़ी डिग्री, बड़े-बड़े शब्द और पूरी दुनिया घूमने का अनुभव, पर असल चीज यही कि वह जो भी था और ही कुछ था-महेन्द्र नहीं था। पर जल्द ही तुमने पहचानना शुरू किया कि वह निहायत दोगला किस्म का आदमी है। हमेशा दो तरह की बातें करता है। उसके बाद सामने आया -जगमोहन। ऊँचे सम्बन्ध , जबान की मिठास, टिप-टॉप रहने की आदत और खर्च की दरिया दिली, पर तीर की असली नोंक फिर उसी जगह पर थी कि उमसें जो कुछ भी था, जगमोहन का-सा था- महेन्द्र का-सा नहीं था। असल बात इतनी ही कि महेन्द्र की जगह इनमें कोई भी आदमी होता तुम्हारी जिन्दगी में तो साल-दो साल बाद फिर तुम यही महसूस करतीं कि तुमने एक गलत आदमी से शादी कर ली है। उस जिन्दगी में भी ऐसे कोई महेन्द्र, जुनेजा कोई शिवजीत या कोई जगमोहन होते, जिसकी वजह से तुम वही सब सोचतीं, यही सब महसूस करतीं। क्योंकि तुम्हारे लिए जीने का मतलब रहा है-कितना कुछ एक साथ होकर, कितना कुछ एक साथ पाकर और कितना कुछ एक साथ ओढ़कर जीना। वह उतना कुछ कभी तुम्हें किसी एक जगह मिल पाता, इसलिए जिस किसी के साथ भी जिन्दगी शुरू करतीं, तुम हमेशा इतनी ही खाली, इतनी ही बेचैन बनी रहतीं।
 
सावित्री अपने पर लग रहे इन आरोपों को सुनकर रुलाई-भरी हँसी हँसने लगती है और जुनेजा कहता जाता है-आज महेन्द्र एक कुढ़ने वाला आदमी है। पर एक वक्त था, जब वह सचमुच हँसता था, क्योंकि तब वह अपने को इतना हीन नहीं समझता था। मनोज से तुमने बहुत आशाएँ बाँधी थीं, पर तुम एकदम बौरा गयीं, तब तुमने पाया कि उतने नाम वाला आदमी तुम्हारी लड़की को साथ लेकर, रातों-रात इस घर से चला गया। इसके बाद तुमने एक अन्धाधुन्ध कोशिश शुरू की-कभी महेन्द्र को ही और झकझोरने की कभी अशोक को ही चाबुक लगाने की। ऐसे में पता चला जगमोहन यहाँ लौट आया है। आगे के रास्ते बन्द पाकर तुमने फिर पीछे की तरफ देखना चाहा और आज जगमोहन ने भी अपनी असमर्थता व्यक्त कर दी। उसकी जगह मैं होता, तो मैंने भी तुमसे यही सब कहा होता।
 
जुनेजा की इस सच्चाई-भरी फटकार को सुनकर सावित्री चीख पड़ी-सब के सब एक से ! बिल्कुल एक से हैं आप सब लोग ! अलग-अलग मुखौटे, पर चेहरा- चेहरा सबका एक ही। और जुनेजा जब यह कहता है कि वह महेन्द्रनाथ को मुक्त क्यों नहीं कर देतीं, तो सावित्री कहती है कि मुझे उस मोहरे की बिल्कुल भी जरूरत नहीं है जो खुद न चलता है, न किसी और को चलने देता है। इस पर जुनेजा कुछ पल चुपचाप उसे देखता रहता है और फिर हताशा भरे निर्णय के सथ-साथ कहता है-तो ठीक है। वह नहीं आयेगा। वह कमजोर है, मगर इतना कमजोर नहीं है। तुमसे जुड़ा हुआ है, मगर इतना जुड़ा नहीं है। इतना बेसहारा भी नहीं है, जितना वह अपने को समझता है, वह ठीक से देख सके, तो एक पूरी दुनिया है उसके आस-पास। मैं कोशिश करूँगा कि वह आँख खोलकर देख सके उसे ।
 
जुनेजा जाने को तत्पर होता ही है कि बाहर से अशोक आ जाता है। उसका चेहरा काफी उतरा हुआ है। जुनेजा के यह पूछने पर कि वह वहाँ से क्यों चला आया, अशोक उत्तर देता है कि महेन्द्रनाथ स्वयं वापस आ गया है और उसकी तबियत काफी खराब है, इसलिए छड़ी के सहारे उसे बाहर खड़े स्कूटर-रिक्शा से उतारकर लाना है। बीना आश्चर्य से पूछती है-डैडी लौट आये हैं? जुनेजा भी आश्चर्य व्यक्त करते हुए कहता है तो आ ही गया वह आखिर ? इस पर अशोक मुरझाये स्वर में कहता है-हाँ, आ ही गये हैं। 

जुनेजा के मुख पर व्यथा-रेखाएँ उभर आयी हैं और उसकी आँखें स्त्री से मिलकर झुक जाती हैं। स्त्री एक कुर्सी की पीठ थामे चुप खड़ी रहती है। तभी बाहर से ऐसा शब्द सुनाई देता है, जैसे पाँव फिसल जाने से किसी दरवाजे का सहारा लेकर अपनी रक्षा की हो। अशोक भागकर वहाँ पहुँच जाता है और महेन्द्रनाथ को सहारा देकर लाने लगता है। स्त्री अर्थात् सावित्री स्थिर आँखें से बाहर की तरफ आहिस्ता से देखती कुर्सी पर बैठ जाती है, तभी लगभग अँधेरे में लड़के की बाँह थामे पुरुष एक अर्थात् महेन्द्रनाथ की धुँधली आकृति अन्दर आती दिखाई देती है और यहीं पर नाटक समाप्त हो जाता है।

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