अनामदास का पोथा उपन्यास की समीक्षा विश्लेषण आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी रचित अनामदास का पोथा हिंदी साहित्य का एक अत्यंत अनूठा और दार्शनिक उपन्यास है
अनामदास का पोथा उपन्यास की समीक्षा विश्लेषण
आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी द्वारा रचित 'अनामदास का पोथा' हिंदी साहित्य का एक अत्यंत अनूठा और दार्शनिक उपन्यास है। यह मुख्य रूप से छान्दोग्य उपनिषद की कथा पर आधारित है, जिसमें रैक्व ऋषि और राजा जानश्रुति के माध्यम से मानव जीवन, प्रेम और साधना के रहस्यों को सुलझाया गया है।
पाश्चात्य आलोचना से प्रभावित हिन्दी के आचार्यों ने उपन्यास के छः तत्त्व स्वीकार किये हैं— (1) कथावस्तु, (2) पात्र और उनका चरित्र-चित्रण, (3) संवाद अथवा कथोपकथन. (4) भाषा-शैली, (5) देशकाल और वातावरण, (6) उद्देश्य ।
आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी के उपन्यास 'अनामदास का पोथा' में इनका निर्वाह हुआ है अथवा नहीं, यह निर्णय करने के लिए निम्न बिन्दुओं का अध्ययन आवश्यक है-
कथावस्तु
इसे कथानक भी कहा जाता है । 'अनामदास का पोथा' की कथावस्तु उलझती हुई है, यह सत्य है, पर इसमें कोई सन्देह नहीं है कि इस उपन्यास में कथावस्तु अथवा कथानक का पूर्ण रूप से निर्वाह हुआ है । इस उपन्यास का कथानक ब्रह्मचारी रैक्व तथा राजकुमारी जाबाला की प्रेमकथा पर आधारित है । जाबाला एक दिन अपनी गाड़ी में बैठकर अपनी मौसी के घर जा रही थी। शाम के समय जोर की आँधी आयी और भयानक वर्षा हुई। गाड़ी कीचड़ में फँस गयी और बैल गाड़ी से निकलकर भाग गये । जाबाला बच गयी, पर अचेत हो गयी । लोक व्यवहार से सर्वथा अपरिचित तापस कुमार रैक्व ने जाबाला को सचेत किया। उसने उससे पहले कोई स्त्री नहीं देखी थी, इसलिए उसने जाबाला को देवलोक का प्राणी समझा । तापस कुमार रैक्व के भोलेपन पर जाबाला रीझ गयी । उसने रैवत्र को अपना नाम शुभा बताया। रैक्व भी शुभा को अपना हृदय दे बैठा । इसके बाद का कथानक रैक्व के वियोग में जाबाला की अस्वस्था और जाबाला अथवा शुभा को देखने के लिए व्याकुल रैक्व की गतिविधि से पूर्ण है । अनाथ रैक्व को ऋतम्भरा माता के रूप में, ऋषि औषस्ति पिता के रूप में और ऋजुका के रूप में दीदी मिल गयी । माता ऋतम्भरा ने उसके बालों और शरीर का परिष्कार किया । ऋषि औषस्ति ने उसे सत्संग करने और शास्त्रों के अध्ययन का आदेश दिया। जाबाला के प्रेम का ज्ञान उसके पिता को हो गया । ऋतम्भरा की अनुमति से रैक्व और जाबाला का विवाह हुआ। इस प्रकार इस उपन्यास का कथानक सुखान्त है।
पात्र एवं चरित्र चित्रण
पात्र और उनका चरित्र उपन्यास के कथानक को मानव जीवन से जोड़ता है। इस उपन्यास में पात्रों की संख्या पर्याप्त है। इन पात्रों में पुरुष पात्र नारी पात्रों से अधिक हैं। पुरुष पात्रों में रैक्व, आचार्य औदुम्बरायण, राजा जानश्रुति, नग्न रहने वाला तापस, ऋषि औषस्ति, आश्वलायन, भिक्षान्न न खाने वाले मुनि, मामा, नाटक का अभिनय करने वाले कोहली आदि हैं। स्त्री पात्रों में जाबाला, ऋजुका, माता ऋतम्भरा, जाबाला की मौसेरी बहन अरुन्धती है। आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने इनके चरित्र का भली-भाँति चित्रण किया है । रैक्व ऐसा भोला तपस्वी युवक है जो लोक व्यवहार से पूरी तरह अनभिज्ञ है। उसने कोई स्त्री नहीं देखी है । इसी आधार पर जाबाला को वह देवलोक का प्राणी समझता है।जाबाला भी रैक्व के सीधेपन से प्रभावित होती है । उसने व्याकरण में स्त्री पद तो पढ़ा है, पर स्त्री पदार्थ क्या है ? उसे उसने नहीं जाना है ।
वह यह भी नहीं जानता कि किसी युवक द्वारा किसी कुमारी को अपनी पीठ पर बैठाना पाप है । राजकुमारी जाबाला का चरित्र लज्जावती राजकुमारी का चरित्र है । वह भोले-भाले तापस कुमार रैक्व को हृदय दे बैठी । अपने मन की बात वह किसी से कह भी नहीं सकती थी । माता ऋतम्भरा प्रसिद्ध तपस्विनी हैं। पूरा जनपद उनका आदर करता है । बेचारी सन्तान वंचिता हैं। रैक्व को पुत्र के रूप में पाकर वे धन्य हो जाती हैं । अनाथ कृषक वधू ऋजुका को वे पुत्री बना लेती हैं और उसका कष्ट दूर कर देती हैं। ऋषि औषस्ति ऋतम्भरा के पति हैं। उन्होंने जीवनभर तपस्या की है और समाधि लगायी है । वे एक आश्रम के अधिपति हैं । जनपद में उनका विशेष आदर है । रैक्व को उन्होंने भी अपना पुत्र स्वीकार कर लिया। उन्होंने रैक्व को सत्संग और शास्त्र का अध्ययन करने का परामर्श देकर व्यावहारिक बना दिया है । राजा जानश्रुति शूद्र होते हुए भी ज्ञान के उपासक हैं । वे प्रजा पालन की अपेक्षा ज्ञान चिन्तन में अधिक रुचि लेते हैं । राजा की इससे अधिक उदासीनता क्या होगी कि उनके राज्य में दो वर्ष से अकाल पड़ा है और उन्हें उसका ज्ञान ही नहीं है । पुत्री जाबाला के बचपन में ही उसकी माता और राजा जानश्रुति की पत्नी का देहान्त हो गया था। राजा ने दूसरा विवाह नहीं किया । यह राजा के संयमी तथा जितेन्द्रिय होने का प्रमाण है । आचार्य औदुम्बरायण भी सम्भवतः सन्तानहीन हैं । उनकी पत्नी है. ऐसा कोई संकेत उपन्यास से प्राप्त नहीं होता । वे राजा के पुरोहित और राजकुमारी जाबाला के शिक्षक हैं । सन्तानहीन आचार्य औदुम्बरायण अपनी शिष्या जाबाला को अपनी पुत्री मान चुके हैं और उन्हें जाबाला के योग्य वर की खोज की चिन्ता उसके पिता से भी अधिक है। स्वाभिमानी ऐसे हैं कि जाबाला का विवाह उन्होंने अपने शिष्य आश्वालायन से निश्चित कर दिया। इसमें बाधा आने पर राजमहल ही नहीं, अपना घर छोड़कर ही भाग गये । आश्वलायन शास्त्रों का ज्ञाता और व्यवहार का ज्ञानी होने के साथ ही सच्चा मित्र है । वह रैक्व को अपना मित्र मानता है और उसकी उखड़ी-उखड़ी बातों से जान लेता है कि रैक्व जिस शुभा से प्रेम करता है, वह जाबाला ही है । इसी कारण वह जाबाला से विवाह का अपने गुरु आचार्य औदुम्बरायण के आदेश को भी अमान्य कर देता है। इसमें दो विचित्र तपस्वियों को भी पात्र के रूप में प्रस्तुत किया गया है। एक नग्न रहते हैं और ब्राह्मणों से चिढ़ते हैं। दूसरे ऐसे मुनि हैं जो घास छीलकर बेचते हैं और उससे अपनी भूख शान्त करते हैं। इस प्रकार इस उपन्यास की पात्र योजना सर्वथा उचित और सफल है ।
संवाद अथवा कथोपकथन
वैसे तो संवाद नाटक का अनिवार्य अंग हैं, पर पात्रों को जीवन्त बनाने के लिए उपन्यास और कहानी में भी पात्रों के संवाद दिये जाते हैं आपस में बातें करते हुए उपन्यास और कहानी के पात्र जीवन्त प्रतीत होते हैं । इस उपन्यास के कथोपकथन की कुछ पंक्तियाँ उदाहरण के रूप में प्रस्तुत हैं-
औषस्ति—इससे समझ हो सौम्य ! तुम्हारा झुकाव प्रिय ब्रह्म की ओर ही हो सकता है।प्राण के सूत्र को पकड़कर तुम परम सत्य को प्रिय रूप में पा सकते हो और प्रिय रूप का किंचित साक्षात्कार भी तुम्हें ब्रह्म तक, महासत्य तक पहुँचा सकता है।
रैक्व-अर्थात् !
औषस्ति--अर्थात् तुम्हारा स्वभाव प्रेम है । उसी के माध्यम से तुम सत्य का साक्षात्कार कर सकते हो ।
भाषा शैली
भाषा के बिना कोई भी साहित्य रचना आकार ग्रहण नहीं कर सकती । भाषा ही निराकार भावों को साकार बनाती है । इस उपन्यास की विषय-वस्तु आध्यात्मिक है । इसका सम्बन्ध तपस्वियों तथा ज्ञानियों से है, इस कारण इसकी भाषा का संस्कृत तत्सम प्रधान होना स्वाभाविक है । उदाहरण के रूप में इस उपन्यास के कुछ वाक्य देखे जा सकते हैं-
"कोई भी वस्तु या प्राणी इसलिए प्रिय नहीं है कि वह अपने आप में प्रियता रखता है, वस्तुतः सचराचर रूपराशि भगवन्त अर्थात् परम् वैश्वानर रूप-रूप के अपने को अभिव्यक्त कर रहे हैं । हर मनुष्य में वे अपने को अभिव्यक्त कर रहे हैं।"
देश-काल और वातावरण
इस उपन्यास का देश अर्थात् स्थान कौन-सा है, यह निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता। वैसे इसका स्थान, राजा जानश्रुति का जनपद है, पर यह निश्चित नहीं है कि वह जनपद कहाँ था । एक स्थान पर इसका संकेत प्राप्त होता भी है, आज वह कहाँ है, यह कहना सम्भव नहीं है । रैक्व की कथा छान्दोग्य उपनिपद के चौथे प्रपाठक में है । उसमें जो संकेत है, उसका अनुवाद इस प्रकार है-
"जहाँ रैक्व ऋषि ने निवास किया, उस स्थान का नाम रैक्व पर्ण प्रसिद्ध है। यह स्थान महावृष नामक उपवनों में से एक है ।" इस उद्धरण से इस उपन्यास के देश अर्थात् स्थान का ज्ञान नहीं होता । यही स्थिति काल अर्थात् समय की है । इस उपन्यास में याज्ञवल्क्य का नाम आया है । याज्ञवल्क्य जनक के यज्ञ में सम्मिलित हुए थे। जनक का समय त्रेता युग है । इस उपन्यास का काल त्रेता युग के बाद का हो सकता है । इस प्रकार इसका समय भी निश्चित नहीं है । वैसे वेदों के पश्चात् ब्राह्मण ग्रन्थों की रचना हुई । इसके पश्चात् उपनिषद् रचे गये । कुछ विद्वान् उपनिषदों से पूर्व आरण्यकों का काल स्वीकार करते हैं । उपनिषदों और आरण्यकों में विशेष अन्तर नहीं है । उपनिषदों का समय भी अनिश्चित है। इसके विषय में विद्वानों में मतभेद है ।
अब प्रश्न रह जाता है-वातावरण का । इस उपन्यास का वातावरण आध्यात्मिक है । इसके जितने भी पात्र हैं, वे सभी आध्यात्मिक चिन्तन में रत हैं । कुछ पात्र तो चमत्कारी सिद्ध हैं । रैक्व ने समाधि के द्वारा ऐसी सिद्धि प्राप्त की है कि वे जड़ पदार्थों को गतिशील कर सकते हैं। रैक्व को माता ऋतम्भरा के आश्रम के समीप जो स्वाभिमानी मुनि मिले थे, वे ऐसे योगी थे कि समधि के द्वारा अपने आपको अपनी माताजी में बदल देते थे ।
इस उपन्यास का कोई भी पात्र दुष्ट, चोर और व्यभिचारी नहीं है । कुछ पात्र दरिद्र और अनपढ़ अवश्य हैं, पर वे भी स्वाभिमानी हैं। ऋजुका जब माता ऋतम्भरा के आश्रम में गयी तो उसने कोई काम चाहा । भिक्षान्न वह खाना नहीं चाहती थी । उसने अपने आपको किसान की कन्या और पत्नी बताया । राजा भी अपनी प्रजा को भिक्षाजीवी बनाना नहीं चाहता था। उसने नाटक के रंगमंच के निर्माण के द्वारा प्रजा को अन्न देना आरम्भ किया।
ऐसा प्रतीत होता है कि उस समय अच्छी सड़कें नहीं थीं। अच्छे कच्चे मार्ग भी नहीं थे । राजा जानश्रुति ऋषि औषस्ति के दर्शन के लिए उनके आश्रम तक गये तो उन्हें पैदल जाना पड़ा । वहाँ तक रथ या गाड़ी नहीं जा सकती थी।
आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने इस उपन्यास के अंश 'रैवव आख्यान' के आरम्भ से उपन्यास के वातावरण को प्रस्तुत करने का प्रयास किया है—
"उन दिनों देश का अधिकांश भाग जंगलों से घिरा हुआ था। उन जंगलों में जहाँ अनेक हिंसक जन्तु फैले हुए थे, वहाँ ज्ञान के साथ कुछ तपस्वी भी यत्र तत्र अपनी कुटिया बनाकर रहा करते थे । कुछ तपस्वी तो केवल तपश्चर्या में ही सारा समय लगा देते थे लेकिन कुछ ऐसे भी थे जो अध्ययन-अध्यापन किया करते थे । उनके यहाँ जिज्ञासु विद्यार्थियों की उपस्थिति बराबर बनी रहती थी। ये ऋषि कहलाते थे। वे गृहस्थ रूप में रहते थे, उनके अपने बाल-बच्चों के अतिरिक्त गायें भी हुआ करती थीं और किसी-किसी के यहाँ बकरियाँ भी हुआ करती थीं। बकरियों को 'अजा' कहा जाता था । उनके दूध से जो घी बनता था, उसे 'अजा' कहा जाता था । ऋषियों के यहाँ यज्ञ आदि हमेशा हुआ करते थे और आज्य का हवन आवश्यक माना जाता था। बाद में गाय के घी को भी आज्य कहा जाने लगा । दोनों प्रकार के घी हवन के काम आते थे और पौष्टिक भोजन के लिए भी आवश्यक माने जाते थे। रिक्व ऋषि बड़े मेधावी तपस्वी थे। उनके यहाँ अध्ययन-अध्यापन भी होता था । यज्ञ-याग के अनुष्ठान भी होते थे।'
उद्देश्य
बिना उद्देश्य के कभी कोई काम नहीं होता । मूर्ख व्यक्ति तक बिना उद्देश्य के कोई गतिविधि नहीं करता तो सचेतन और विचारशील माना जाने वाला साहित्यकार बिना उद्देश्य के क्यों कोई कार्य करेगा । आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने इस उपन्यास की रचना भारत के अध्यात्मचिन्तन और त्याग वाले युग को सबके सामने प्रस्तुत करने के लिए की है। हजारीप्रसाद जी ने इसकी भूमिका में कुछ संकेत किया है कि उपन्यास की रचना में उनका उद्देश्य क्या रहा है । वे लिखते हैं— “इस देश में अनेक बड़े-बड़े ऋषि-मुनि हुए हैं। उनकी तपस्या और मनन चिन्तन से हम आज भी प्रभावित हैं। ऐसे ही एक ऋषि थे— रैक्व । उपनिषद् में इनकी चर्चा आती है। जितना कुछ मालूम है, उससे यही लगता है कि वे एक-रथ के नीचे बैठकर अपना शरीर (शायद पीठ) खुजला रहे थे। उसी समय राजा जानश्रुति तत्त्व ज्ञान की भिक्षा माँगने पहुँचे । कोई नहीं जानता कि रैक्व और सारी चीजें छोड़कर रथ की छाया में ही क्यों बैठे थे ।" इससे स्पष्ट है कि द्विवेदी जी का उद्देश्य रैक्व का परिचय देना है।
इस विवेचन के आधार पर कहा जा सकता है कि इस रचना में उपन्यास के तत्त्वों का पूर्ण निर्वाह हुआ है।उपन्यास के तत्त्वों की कसौटी पर 'अनामदास का पोथा' एक उत्कृष्ट और कालजयी रचना सिद्ध होती है। यह उपन्यास मनोरंजन के उद्देश्य से ऊपर उठकर पाठक को आत्ममंथन की ओर ले जाता है और भारतीय मनीषा (दर्शन) को आधुनिक परिप्रेक्ष्य में पुनर्परिभाषित करता है।


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