अनामदास का पोथा उपन्यास का उद्देश्य

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अनामदास का पोथा उपन्यास का उद्देश्य आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी द्वारा रचित अनामदास का पोथा उनका एक अत्यंत गंभीर और वैचारिक उपन्यास है।

अनामदास का पोथा उपन्यास का उद्देश्य


चार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी द्वारा रचित 'अनामदास का पोथा' उनका एक अत्यंत गंभीर और वैचारिक उपन्यास है। यह छान्दोग्य और बृहदारण्यक उपनिषद की पृष्ठभूमि (रैक्व ऋषि और जाबाल आख्यान) पर आधारित है।ऊपरी तौर पर यह एक पौराणिक या ऐतिहासिक कथा लग सकती है, लेकिन इसका मुख्य उद्देश्य पूरी तरह आधुनिक, मानवीय और प्रासंगिक है।

उद्देश्य का तात्पर्य यह है कि 'अनामदास का पोथा' उपन्यास की रचना आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने किस प्रयोजन से की। बिना प्रयोजन अथवा उद्देश्य के तो कोई काम होता नहीं है। विधाता को पहले से ही पता चल गया होगा कि जिन जीवधारियों की वे रचना कर रहे हैं, वे महान् आलसी होंगे। बिना उद्देश्य के कोई कार्य नहीं करेंगे । शरीर को प्राण ही चेतन बनाता है। प्राण शरीर में न रहे अथवा प्राण शरीर से निकल जाये तो प्राणान्त अर्थात् मृत्यु हो जाती है । आजकल अंग्रेजी का बहुत प्रचलन है । हिन्दी में कही हुई बात अनपढ़ लोगों की ही नहीं, पढ़े-लिखों की भी समझ में नहीं आती। अगर वही बात अंग्रेजी में कही जाये तो समझने में देरी नहीं लगती । जिसे हम प्राण वायु कहते हैं, उसे अंग्रेजी में 'ऑक्सीजन' कहा जाता है। यह ऑक्सीजन शरीर को जीवित और सक्रिय रखती हैं । जिस व्यक्ति को साँस लेने में कठिनाई होती है, उसके शरीर में सिलेण्डर में भरी हुई ऑक्सीजन नाक में नलकी लगाकर पहुँचाई जाती है। इससे उसका जीवन कुछ समय के लिए बच जाता है। 

बात ब्रह्माजी और उनके द्वारा जीवधारियों के निर्माण की हो रही थी और मैं पहुँच गया विज्ञान की ऑक्सीजन पर । ब्रह्माजी जीवधारियों और विशेष रूप से मनुष्यों के आलसी स्वभाव से परिचित थे । वे जानते थे कि अगर साँस लेने का कार्य इन मनुष्यों पर छोड़ दिया गया तो ये साँस नहीं लेंगे और मर जायेंगे, इसलिए साँस को ऐसा बनाया गया कि वह अपने आप चलती रहे ।
 
अनामदास का पोथा उपन्यास का उद्देश्य
अब तक मैंने जो कुछ कहा है, उसका तात्पर्य यही है कि मनुष्य बिना किसी प्रयोजन अथवा उद्देश्य के कोई कार्य नहीं करता। यही सोचकर ब्रह्मा ने साँस को स्वतः चलने वाली क्रिया बना दिया। साँस अपने आप चलती रहती है। संस्कृत की एक कहावत है—प्रयोजनमनुद्दिश्य मन्दोऽपिन प्रवर्तते । इसका तात्पर्य यह है कि प्रयोजन को उद्देश्य बनाये बिना मन्द अर्थात् मूर्ख भी किसी काम में नहीं लगता । फिर कुशल और चतुर साहित्यकार बिना उद्देश्य के, बिना प्रयोजन के कोई कार्य क्यों करेगा ? आजकल हिन्दी में कही बात लोगों की समझ में नहीं आती अथवा हिन्दी में कही हुई बात समझना पढ़े-लिखे लोग अपनी हेठी या बुराई समझते हैं । वही बात अंग्रेजी में कही जाये तो अनपढ़ भारतीय की समझ में भी आ जाती है। रही बात संस्कृत की तो उसे तो अब देवताओं ने भी पढ़ना और समझना बन्द कर दिया है। कभी संस्कृत देववाणी भी कही जाती थी, पर अब तो वह मुनष्यों की वाणी भी नहीं रह गयी है। यही सोचकर मैंने उसका हिन्दी अनुवाद कर दिया है । संस्कृत की इस सूक्ति का मैं अंग्रेजी अनुवाद भी कर सकता था, पर उसे समझेगा कौन ?
 
अब तक मैंने जो कुछ कहा, उसका तात्पर्य केवल इतना ही है कि 'अनामदास का पोथा' की रचना करने में आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी का कोई उद्देश्य रहा होगा । इस अनामदास का पोथा' के आगे और पीछे बहुत जोड़ा गया है, पर आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने इस उपन्यास के विषय में ऐसी एक भी पंक्ति नहीं लिखी है, जिससे इसकी रचना का उद्देश्य पता चल सके। वैसे लगभग सभी लेखक अपनी रचना का उद्देश्य स्पष्ट कर देते हैं।

गोस्वामी तुलसीदास जी ने अपने 'रामचरितमानस' की रचना का उद्देश्य स्वान्तः सुखाय बताया है । मुझ डूबते के तिनके का सहारा बनी हैं—इस पुस्तक के कवर या परिवेश के अन्त में दी गयी निम्नलिखित पंक्तियाँ-
 
"अनामदास का पोथा अथ रैक्व आख्यान । लेकिन कौन है ये रैक्व जिन्हें छान्दोग्य उपनिषद से उठाकर आचार्य द्विवेदी ने अपना कथा-नायक बना लिया ? रैक्व तापस कुमार हैं, पर समाधि उनसे सध नहीं पाती । उद्विग्न हो उठते हैं, पूछते हैं- "माँ ! आज समाधि नहीं लग पा रही है। आँखों के सामने केवल भूखे नंगे बच्चे और कातर दृष्टिवाली माताएँ दिख रही हैं। ऐसा क्यों हो रहा है—माँ ?" और माँ रैक्व को बताती है-"अकेले में आत्माराम या प्राणराम (प्राणायाम) होना भी एक प्रकार का स्वार्थ ही है ।" तो रैक्व इसी से उद्विग्न है। फिर तो नहीं ही साधेंगे यह समाधि, नहीं ही जियेंगे अपने और अपनी मुक्ति के लिए । सो छोड़-छाड़ समाधि कूद पड़े जीवन-संग्राम में और तपस्वी से गृहस्थ हो गये । वस्तुतः आचार्य द्विवेदी का यह बहुचर्चित उपन्यास मानवीय जिजीविषा की कहानी है, क्योंकि जिजीविषा है तो जीवन रहेगा और जीवन रहेगा तो उसे सुखी बनाने की अनन्त सम्भावनाएँ भी रहेंगी।"
 
यह रैक्व की ही विवशता नहीं है, मनुष्य मात्र की विवशता है कि उसे जो सामान्य से अलग हटकर अर्थात् असामान्य दिख जाता है, वह उसके हृदय रूपी पन्ने पर अमिट अक्षरों में लिख जाता है, मूर्ति बन जाता है। इस उपन्यास के कवर के अन्त वाले भाग पर जिन सज्जन ने रैक्व की समाधि न लगाने का कारण अकाल या दुर्भिक्ष में भूख-प्यास से व्याकुल बच्चों और माताओं का दिखना था। क्या पुरुष और उनमें भी वृद्ध भूख-प्यास से कम व्याकुल होंगे ? 

इसी उपन्यास में रैक्व ने अपनी माता ऋतम्भरा से समाधि न लगने का कारण उनके ध्यान में शुभा का आ जाना है समाधि में तो निराकर ब्रह्म का चिन्तन किया जाता है। यदि हृदय में किसी साकार प्राणी का चित्र बन जाये तो समाधि कैसे लगेगी, रैक्व ने जब पहली बार जाबाला को देखा था, तब वे क्या कम चकित हुए थे। इससे पहले उन्होंने कोई रूपसी युवती नहीं देखी थी। उसे उन्हें देवलोक का प्राणी समझा । जाबाला ने उनसे कहा था कि वे उसे 'शुभा' के नाम से सम्बोधित कर सकते हैं। उसके बाद रैक्व शुभा के गीत गाने लगे और शुभा को अपना गुरु बताने लगे।
 
इस उपन्यास का अन्त जाबाला और रैक्व के विवाह से होता है। रैक्व जाबाला से प्रेम करने लगे थे। रैक्व के माता-पिता चाहते थे कि उनका पुत्र विवाह करके गृहस्थ जीवन व्यतीत करे। रैक्व को जिन माता ऋतम्भरा ने अपना पुत्र स्वीकार किया था, वे और उनके पति ऋषि औषस्ति भी यही चाहते थे कि उनका पुत्र विवाह कर ले। महर्षि औषस्ति ने तो रैक्व को यहाँ तक बताया था कि तुम्हारे मन में जिस किसी के प्रति प्रेम है, वह बुरा नहीं है, वही प्रेम तुम्हें परम शक्ति अथवा वैश्वानर तक पहुँचने की सीढ़ी बनेगा । प्रेम व्यभिचार नहीं है। किसी युवक का किसी सुन्दर युवती को और किसी युवती का किसी आकर्षक युवक का को प्रेम करना बुरा नहीं है। बुरा है— विवाह से पूर्व शारीरिक सम्बन्ध बनाना या बनाने की इच्छा करना । विवाह वह सामाजिक प्रमाण-पत्र है जो सभी पुरुषों अथवा युवक-युवतियों को शारीरिक सम्बन्ध बनाने की अनुमति देता है । महर्षि औषस्ति ने रैक्व को गृहस्थ जीवन के विषय में तो कुछ नहीं बताया, पर गृहस्थ जीवन अपनाने का परामर्श दिया । इस उपन्यास 'अनामदास का पोथा' में यह प्रसंग इस प्रकार है- 

'अच्छा सौम्य ! तूने ब्रह्मचर्यवास कर लिया है। विधिपूर्वक नहीं हो सका, पर उसमें तुम्हारा कोई दोष नहीं है । अब गृहस्थ आश्रम में प्रवेश करने का समय आ गया है।'

'नहीं समझा भगवन् !' 
'कैसे समझेगा वत्स ? तूने गृहस्थ जीवन का सुख देखा ही नहीं । जानता है सौम्य पितृ ऋण से मुक्त होने के लिए कुलीन जन विवाह किया करते हैं । विवाह के माध्यम से ही पुरुष और स्त्री पूर्णता प्राप्त करते हैं, संसार के सबसे बड़े लक्ष्य प्रेम को प्राप्त करते हैं ।'

'नहीं समझा भगवन् ! ' 
'यह भी माताजी से पूछ लेना। अब तुम जा सकते हो। मेरी बातों पर मनन करने के बाद फिर आना। यदि कोई सन्देह रह गया हो तो उसका निराकरण कर लेना।'
 
रैक्व यह तो नहीं जानते थे कि वे विवाह करना चाहते हैं, पर यह चाहते थे कि वे शुभा अर्थात् जाबाला को देखें और उसके समीप रहें। यह इच्छा विवाह करने की कामना थी। रैक्व समाज से दूर रहे, इसलिए लोक व्यवहार नहीं जानते थे । रैक्व की यह इच्छा उनके पिता और उनकी माता ने पूर्ण की। रैक्व की माता यह तो जानती थीं कि उनका पुत्र रैक्व शुभा नाम की किसी सुन्दर युवती से प्रेम करता है, पर यह नहीं जानती थीं कि शुभा कौन है ? रैक्व ने बताया था कि शुभा राजा जानश्रुति की पुत्री है। माता ऋतम्भरा जानती थीं कि राजा जानश्रुति की कन्या का नाम तो जाबाला है।

वे इस रहस्य को जानने के लिए जाबाला से मिलीं । जाबाला ने स्वीकार किया कि मैं ही उन तापस कुमार की शुभा हूँ। माता ऋतम्भरा यह भी जान गयीं कि जाबाला रैक्व से प्रेम करती है। जाबाला के पिता राजा जानश्रुति ने भी जान लिया कि उनकी पुत्री रैक्व से प्रेम करती है। माता ऋतम्भरा की स्वीकृति से राजा जानश्रुति बहुत-सा सामान लेकर रैक्व के समीप गये तथा जाबाला और रैक्व का विवाह हो गया।

इस रैक्व आख्यान अथवा 'अनामदास का पोथा' उपन्यास का उद्देश्य यही है कि अकेले ध्यान करने अथवा समाधि लगाने में जीवन की पूर्णता नहीं है। अकेले रहने से तो संसार समाप्त हो जायेगा।प्रत्येक मनुष्य को विवाह करके गृहस्थ जीवन बिताना चाहिए। इसके बिना जीवन पूर्ण नहीं होता। इसके बिना पितृऋण से मुक्ति नहीं मिलती।

संक्षेप में कहें तो: 'अनामदास का पोथा' का मूल उद्देश्य मानव मन को रूखे वैराग्य से निकालकर करुणा, निश्छल प्रेम और सामाजिक कर्तव्य की ओर मोड़ना है। यह उपन्यास सिखाता है कि संसार को त्यागकर नहीं, बल्कि संसार के बीच रहकर, उससे प्रेम करके ही सच्ची मानवता को पाया जा सकता है।

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