आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी के विचार दर्शन की समीक्षा

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आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी के विचार दर्शन की समीक्षा आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी का विचार दर्शन हिंदी साहित्य और भारतीय सांस्कृतिक चिंतन की एक

आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी के विचार दर्शन की समीक्षा

 
चार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी का विचार दर्शन हिंदी साहित्य और भारतीय सांस्कृतिक चिंतन की एक अत्यंत समृद्ध, जीवंत और प्रगतिशील धरोहर है। उनका पूरा चिंतन किसी एक संकीर्ण विचारधारा या वाद में बंधकर नहीं चलता, बल्कि वह अत्यंत व्यापक और उदार मानवतावाद से अनुप्राणित है। द्विवेदी जी के दर्शन की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे अतीत के गौरव के प्रति आग्रही होते हुए भी भविष्योन्मुखी हैं। वे इतिहास और परंपरा को जड़ वस्तु नहीं मानते, बल्कि उसे एक निरंतर बहती हुई नदी की तरह देखते हैं, जिसमें समय के साथ नए विचार मिलते जाते हैं और मैल छूटता जाता है।

आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी के उपन्यास 'बाणभट्ट की आत्मकथा' में भट्टिनी कहती है- "इस नरलोक से लेकर किन्नर लोक तक एक ही रागात्मक हृदय व्याप्त है।" कहा जा सकता है कि आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी की सर्जनात्मक प्रतिभा का अकुंठ विलास इसी रागात्मक हृदय का साक्षात्कार है। आचार्य द्विवेदी के सम्पूर्ण कृतित्व में यही एक रागात्मक हृदय व्याप्त है। संवेदनशीलता द्विवेदी जी के लेखकीय व्यक्तित्व की आत्मा है। यह वह अंत: सरिता है जो उनके संपूर्ण कृतित्व में प्रवाहित होती रहती है। यही कारण है कि आचार्य द्विवेदी का लेखन पाठक में संवेदना का संचार करने में समर्थ है। उसमें पाठक को संवेदनशील तथा कोमल बनाने की क्षमता है। साहित्य का इससे बड़ा दूसरा कोई लक्ष्य सम्भव नहीं है कि वह मनुष्य की जमी हुई अंत: सरिता को प्रवहमान करने में समर्थ हो सके, मनुष्य की क्रूर वृत्तियों को कोमल बना सके। आचार्य द्विवेदी ने लिखा है- "जो साहित्यकार अपने जीवन में मानव-सहानुभूति से परिपूर्ण नहीं है और जीवन के विभिन्न स्तरों को स्नेहार्द्र दृष्टि से नहीं देख सका है, वह बड़े साहित्य की सृष्टि नहीं कर सकता।"
 
आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी के विचार दर्शन की समीक्षा
आचार्य द्विवेदी के इस कथन में मानव सहानुभूति तथा स्नेहार्द्र दृष्टि जैसे प्रयोगों पर ध्यान देना आवश्यक है, क्योंकि यही उनके लेखन के स्रोत रहे हैं। इस मानव सहानुभूति तथा स्नेहार्द्र दृष्टि के ही कारण द्विवेदी जी के लेखन में कहीं-कहीं अतिरिक्त भाव-प्रवणता तथा अतिरिक्त उच्छ्वास भी प्रतीत होता है। कहीं-कहीं तो उनका लेखन 'लिरिकल' हो गया है। इसीलिए कुछ विद्वान आचार्य द्विवेदी को शुद्ध आलोचक स्वीकार नहीं करते। आचार्य द्विवेदी- शुद्ध आलोचक हैं अथवा नहीं, यह तो विवाद का विषय है, किन्तु उनका व्यक्तित्व मूलतः सृजनात्मक है तथा वे एक रचनाकार आलोचक भी हैं। एक रचनाकार जब आलोचक बनता है तो 'सूर साहित्य' तथा 'कबीर' जैसी कृतियाँ विरचित होती हैं। रचनाकार में अपने को डालकर आलोचना लिखना अत्यधिक कठिन साधना है। इसे वही रचनाकार कर सकता है, जिसमें सहानुभूति तथा स्नेहार्द्र दृष्टि हो, जो नरलोक से किन्नरलोक तक व्याप्त एकमात्र रागात्मक हृदय का साक्षात्कार करने में समर्थ हो । सृजनात्मक प्रतिभा तथा आलोचनात्मक चिन्तन का जैसा संतुलन आचार्य द्विवेदी के कृतित्व में सम्भव हो सका है, वैसा आधुनिक काल के शायद ही किसी हिन्दी लेखक में सम्भव हो। आधुनिक काल के किसी एक लेखक ने साहित्य को शायद ही उतनी कालजयी कृतियाँ प्रदान की हों, जितनी अकेले आचार्य द्विवेदी ने। द्विवेदी जी की कृतियाँ इस अर्थ में अद्वितीय हैं कि उनकी तुलना किसी अन्य लेखक की कृतियों से होनी असम्भव है। 'कबीर' और 'बाणभट्ट की आत्मकथा' जैसी कृतियों हेतु हिन्दी साहित्य को महती प्रतीक्षा करनी पड़ सकती है।

आचार्य द्विवेदी का साहित्य मनुष्य की विराट गरिमा का साहित्य है। वे मनुष्य को जड़ या पशु स्वीकार नहीं करते अपितु उसे विकास की अंतिम परिणति स्वीकार करते हैं। इस मनुष्य में आचार्य द्विवेदी की आस्था कभी खंडित नहीं होती। वे मनुष्य की जययात्रा में अमर विश्वास रखते हैं। सम्भवतः यही कारण है कि आज का नये से नया लेखक भी आचार्य द्विवेदी की परंपराप्रियता के होते हुए भी उन्हें स्वीकार करता है। आचार्य द्विवेदी की दृष्टि में यह मनुष्य ही साहित्य का लक्ष्य है। वे सारे मानव-समाज को सुंदर बनाने की साधना का ही नाम साहित्य मानते हैं। जो वाग्जाल मनुष्य को दुर्गति, हीनता, परमुखापेक्षिता से न बचा सके, जो उसकी आत्मा को तेजोदीप्त न बना सके, जो उसके हृदय को परदुखकातर और संवेदनशील न बना सके उसे साहित्य कहने में आचार्य द्विवेदी को संकोच होता था। साहित्य का इतिहास भी आचार्य द्विवेदी के अनुसार, "पुस्तकों, उनके लेखकों और कवियों के उद्भव और विकास की कहानी नहीं है। वह वस्तुतः अनादि काल-प्रवाह में निरंतर प्रवहमान जीवित मानव समाज की ही विकास कथा है। ग्रंथ और ग्रंथकार, संप्रदाय और उनके आचार्य उस परम शक्तिशाली प्राणधारा की ओर सिर्फ इशारा भर करते हैं।"
 
आचार्य द्विवेदी खंडसत्य को स्वीकार नहीं करते। उनकी दृष्टि में सत्य वह है जिससे लोक का आत्यन्तिक कल्याण हो। 'बाणभट्ट की आत्मकथा' में अघोर भैरव कहते हैं-"देखो, विरति, सत्य अविभाज्य है। तुम्हारे बौद्ध दार्शनिकों ने संवृत्ति सत्य (व्यावहारिक सत्य) और परमार्थ सत्य कहकर उसे विभक्त करने का दंभ फैलाया है। मानो ये दोनों परस्पर विरुद्ध हों। जो मेरा सत्य है वह यदि वस्तुतः सत्य है तो वह सारे जगत का सत्य है, व्यवहार का सत्य है, परमार्थ का सत्य है-त्रिकाल का सत्य है।"
 
इस सत्य तक पहुँचने के लिए 'आत्मदान' आवश्यक है-"अपने आपको दलित द्राक्षा की भाँति निचोड़कर जब तक सर्व के लिए निछावर नहीं कर दिया जाता, तब तक स्वार्थ खंडसत्य है, वह मोह को बढ़ावा देता है, तृष्णा को उत्पन्न करता है और मनुष्य को दयनीय कृपण बना देता है। कार्पण्य दोष से जिसका स्वभाव उपहत हो गया है, उसकी दृष्टि म्लान हो जाती है, वह स्पष्ट नहीं देख पाता, वह स्वार्थ भी नहीं समझ पाता, परमार्थ तो दूर की बात है।"
 
आत्मदान की चर्चा आचार्य द्विवेदी अपनी रचनाओं तथा भाषणों में बार-बार करते थे। आचार्य द्विवेदी के उपन्यासों के पात्र भी इसी को प्राप्त करने की ओर अग्रसर प्रतीत होते हैं। स्वयं द्विवेदी जी भी क्या इसी ओर उन्मुख प्रतीत नहीं होते ? क्या उन्होंने प्राचीन काव्य, दर्शन, ज्योतिष तथा संस्कृत के श्रेष्ठ साहित्य के अपने गहन अध्ययन को निचोड़ कर प्रस्तुत नहीं किया ? मेरे विचार से तो हिन्दी को यही उनकी सबसे बड़ी देन है, जिसे आधुनिक काल का कोई दूसरा साहित्यकार देने में समर्थ नहीं हुआ। आचार्य द्विवेदी ने बाणभट्ट तथा कालिदास को हिन्दी में उतार दिया है। उनके उपन्यासों में कादम्बरी, हर्षचरित, मृच्छकटिक, अभिज्ञानशाकुंतलम्, कुमारसंभव आदि कृतियों का रस अनुभव किया जा सकता है। आचार्य द्विवेदी के चिन्तन में संस्कृत की विशाल परंपरा का साक्षात्कार किया जा सकता है। कहना न होगा कि आचार्य द्विवेदी के कृतित्व की धरती पुरातन है, लेकिन वे प्राचीन ज्ञान को नये आलोक में जाँचते-परखते हैं। जैसे शव साधना की पूर्णावस्था में शव का मुख साधक के सामने हो जाता है, उसी प्रकार द्विवेदी जी भी अतीत का मुख वर्तमान की ओर मोड़ने में समर्थ हुए। जिन लोगों को द्विवेदी जी के साहचर्य का सौभाग्य प्राप्त हुआ, वे स्वीकार करेंगे कि उनके साथ रहना एक विशिष्ट अनुभव था। वे साधारण-सी बातचीत में भी शब्दों के अतीत में पहुँचकर उनके इतिहास से चमत्कृत कर देते थे। अपने उपन्यासों में भी उन्होंने अतीत की प्राचीन समझी जाने वाली बातों को नवीन आलोक में प्रस्तुत किया है।

द्विवेदी जी मानव देह को बहुत महत्त्व प्रदान करते थे। उसे देवता का मंदिर कहते थे। उसे सभी साधनाओं का केन्द्र स्वीकार करते थे। 'बाणभट्ट की आत्मकथा' में सुचरिता कहती है- "मानव देह केवल दंड भोगने के लिए नहीं बनी है आर्य! यह विधाता की सर्वोत्तम सृष्टि है। यह नारायण का पवित्र मंदिर है।" यही कारण है कि आचार्य द्विवेदी प्रवृत्तियों का मर्दन करने की बात नहीं करते। उन्होंने कहा है - "डरना किसी से भी नहीं । लोक से भी नहीं, वेद से भी नहीं, गुरु से भी नहीं, मंत्र से भी नहीं।" 

प्रवृत्तियों के दमन का विरोध आचार्य द्विवेदी ने मध्यकालीन कवियों के मूल्यांकन प्रसंग में भी किया है। 'सूर साहित्य' में आचार्य द्विवेदी ने गोपियों के स्वछंद प्रेम का समर्थन किया है। भक्तिकाल के अन्य कवियों के प्रसंग में भी आचार्य द्विवेदी ने प्रेम को बहुत महत्त्व दिया है। प्रेम भी एक प्रकार का सामंतवादी जड़ नैतिकता तथा वर्जना के विरुद्ध विद्रोह है। द्विवेदी जी प्रेम को पाप स्वीकार नहीं करते। भारतीय चिन्ताधारा के सम्बन्ध में आचार्य द्विवेदी ने स्पष्ट कहा है कि वह ईसाई पाप-बोध को स्वीकार नहीं करती। 'अनामदास का पोथा' में द्विवेदी जी जीवन की महत्ता का साक्षात्कार प्रेम के द्वारा ही करते हैं। भगवती कहती है - "तुम्हारा स्वभाव प्रेम है। उसी के माध्यम से तुम सत्य का साक्षात्कार कर सकते हो। 

आचार्य द्विवेदी अन्तर्देवता को बहुत महत्त्व देते थे। वे अंतर्यामी को ही प्रमाण स्वीकार करते थे। ‘बाणभट्ट की आत्मकथा' में बाबा कहते हैं-"देख रे, तेरे शास्त्र तुझे धोखा देते हैं। जो तेरे भीतर सत्य है, उसे दबाने को कहते हैं, जो तेरे भीतर मोहन है, उसे भूलने को कहते हैं, जिसे तू पूजता है, उसे छोड़ने को कहते हैं।" इसी प्रकार 'अनामदास का पोथा' में महर्षि औषस्ति कहते हैं-"किसी की बात पर तब तक विश्वास नहीं करना चाहिए, जब तक स्वयं उसकी परीक्षा न कर ली जाए। तुम्हारे भीतर जो देवता स्तब्ध रूप से बैठे हैं, उनको पहचानो । वे तुम्हारा ठीक मार्ग-दर्शन करेंगे। वही प्रज्ञा-रूप हैं। " 

अंतर में बैठे देवता को आचार्य द्विवेदी इतना महत्त्व देते थे,, इसका यह अर्थ नहीं कि वे लोक की उपेक्षा करते थे। वे तो 'अनामदास का पोथा' में ही एकांत तपस्या के स्थान पर समाज-सेवा के मूल्य को सशक्त रूप से प्रतिष्ठित करते हैं। वास्तविकता यह है कि वे ब्रह्मांड के प्रत्येक अणु को देवता स्वीकार करते थे। उनके अनुसार- "सारा चराचर जगत उसी परम वैश्वानर का प्रत्यक्ष विग्रह है, जिसका एक अंश तुम्हारे अंतरतर में प्रकाशित हो रहा है।" चिन्तन के इस स्तर पर पहुँचकर व्यक्ति तथा लोक में कोई विरोध शेष नहीं रहता। यही कारण है कि आचार्य द्विवेदी परम वैश्वानर और महाअज्ञात के प्रति समर्पण की बात करते थे तथा ज्ञान के सम्पूर्ण भंडार को लोकमंगल की कसौटी पर कसने के इच्छुक थे। 'लोक' तथा 'लोकमंगल' शब्द आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के चिन्तन के संदर्भ में जितने महत्त्वपूर्ण हैं, उतने ही आचार्य द्विवेदी जी के व्यक्तित्व तथा कृतित्व के संदर्भ में लोक तथा लोकधर्म । हिन्दी साहित्य की अधिकांश व्याख्या आचार्य द्विवेदी लोकधर्म के ही आधार पर करते थे। वे शास्त्र को लोक से सम्पृक्त करते थे तथा शिष्ट साहित्य की जड़ों की खोज हेतु बार-बार लोक की ओर उन्मुख होते थे।

आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी का चिन्तन मूलतः लोकधर्मी है। उन्होंने लोक-मानस को बहुत महत्त्व प्रदान किया है। 'अनामदास का पोथा' में आचार्य पुरगोभिल ने कहा है-"सुन लिया धर्मावतार, हर गाँव, हर हाट, हर गली में ये गाने सुनाई देंगे। आज आप इसे केवल भाव-लोक का विद्रोह कहकर टाल सकते हैं, पर लोक-मानस में शुष्क धर्माचार और रूढ मान्यताओं के प्रति यह भाव-लोक का विद्रोह किसी दिन वस्तुजगत के विद्रोह का रूप ले सकता है।"
 
आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी के निबंधों, उपन्यासों तथा आलोचनाओं में सर्वत्र लोकधर्मी चिन्तन के दर्शन होते हैं। इसी दृष्टि से आचार्य द्विवेदी ने साहित्य तथा साहित्यकारों का मूल्यांकन प्रस्तुत किया था। यह दृष्टि उन्हें अपने अध्ययन से भी प्राप्त हुई थी तथा अपने युग से भी मिली थी। आचार्य द्विवेदी ने प्राचीन भारतीय कालजयी रचनाओं तथा रचनाकारों का गहन अनुशीलन किया था। मध्यकालीन हिन्दी संत तथा भक्त कवियों के साहित्य को उन्होंने बड़ी रुचि से पढ़ा। इनमें आचार्य द्विवेदी को प्रेम, करुणा, त्याग, साधना आदि के उत्कृष्ट मानवीय मूल्य प्राप्त हुए। आप संस्कृत, ज्योतिष, आयुर्वेद, दर्शन, तंत्र, काव्य-शास्त्र आदि के विद्वान् थे। साथ ही आप आधुनिक वैज्ञानिक प्रयोगों तथा शोधों से भी परिचित थे।

आचार्य द्विवेदी के समग्र चिन्तन के केन्द्र में मनुष्य था। मनुष्य समूह को सुन्दर बनाने की साधना ही आचार्य द्विवेदी की दृष्टि में साहित्य है। 'जीवेत शरद: शतम्' शीर्षक निबन्ध में आचार्य द्विवेदी ऐसी व्यवस्था की आवश्यकता अनुभव करते थे, जिसमें प्रत्येक व्यक्ति को उसकी आवश्यकता का अन्न, वस्त्र तथा शिक्षा प्राप्त हो सके तथा उसे जितने की आवश्यकता है उससे अधिक संग्रह करने का अवसर प्राप्त न हो। जब सामूहिक रूप से ऐसी कोई व्यवस्था निर्मित हो सकेगी, तभी मनुष्य का ध्यान छोटी-छोटी बातों से हटकर बड़ी बातों की ओर उन्मुख होगा। इसी निबन्ध में वे यह भी अनुभव करते हैं कि आज जब हम सामूहिक शिक्षा, सामूहिक सुरक्षा आदि की ओर अग्रसर होने को विवश हो गए हैं, तब हमें सामूहिक रूप से जनता के चरित्र बल को सुरक्षित बनाने की व्यवस्था भी प्रयत्नपूर्वक निर्मित करनी होगी। यही आचार्य द्विवेदी की सन्तुलित दृष्टि थी। आचार्य द्विवेदी जी किसी भी दृष्टि से, चाहे वह प्राचीन हो अथवा आधुनिक, भारतीय हो अथवा पाश्चात्य सर्वथा प्रभावित नहीं हैं। आचार्य द्विवेदी उन परजीवी बुद्धिजीवियों के सबसे विशाल उत्तर थे जो बिना पश्चिम को उद्धृत किए अपने को अपदार्थ समझते हैं तथा प्रत्येक विचार के हेतु पश्चिम दिशा में मुख उठाकर सूँघते रहते हैं। आचार्य द्विवेदी मानते थे- “विभिन्न युगों में साहित्यिक साधनाओं के मूल में कोई-न-कोई व्यापक मानवीय विश्वास होता है। आधुनिक युग का यह व्यापक विश्वास मानवतावाद है। ... नवीन मानवतावादी विश्वास की सबसे बड़ी बात है इसकी ऐहिक दृष्टि और मनुष्य के मूल्य और महत्त्व की मर्यादा का बोध।"

आचार्य द्विवेदी की अपनी दृष्टि मानवतावादी थी, किन्तु उनका मानवतावाद किसी पार्टी के निर्देश से संचालित नहीं था। 'हिन्दी साहित्यः उसका उद्भव और विकास' में 'प्रगतिवाद' पर आचार्य द्विवेदी ने लिखा है-" इस नये तत्त्व-दर्शन से प्रभावित होकर अनेक लेखकों और कवियों ने लेखनी सम्हाली है। इसमें दो श्रेणी के लेखक हैं। एक तो वे जो कम्युनिस्ट पार्टी से सम्बन्धित हैं और पार्टी की निर्धारित नीति और अंगुली निर्देश पर साहित्य लिखते हैं। दूसरे वे जो पार्टी से सम्बन्धित नहीं हैं, पर उन विचारों को मानते और तदनुसार यत्न करते हैं। .... कम्युनिस्ट पार्टी से जिन साहित्यकारों का सम्बन्ध है उनको पार्टी के निर्देश पर चलना पड़ता है। पार्टी का इस प्रकार स्वतन्त्र चिन्तन के मार्ग में आना हितकर नहीं हो सकता। कई प्रगतिवादी लेखक पार्टी के अंकुश को बर्दाश्त न कर सकने के कारण उससे अलग हो गए हैं। भविष्य में या तो पार्टी को अपना अंकुश उठा लेना पड़ेगा या प्रथम श्रेणी के साहित्यकारों से वंचित रहना पड़ेगा।"

आचार्य द्विवेदी के उपर्युक्त कथन की प्रामाणिकता यह है कि रचना तथा सोच की दिशा में उन्होंने जिस बिन्दु को प्राप्त किया, उसे उन्होंने अपनी यात्रा का अन्त स्वीकार नहीं किया। आचार्य द्विवेदी के लेखन में सर्वथा एक व्याकुलता तथा असहनशीलता प्रतीत होती है - किंचित् अधिक कथन की, किंचित् अधिक जिज्ञासा की तथा विचारने की आकुलता एवं उद्विग्नता। उस व्याकुलता ने ही इस रचना स्रोत को सूखने तथा मरने नहीं दिया। कुछ निर्माण करके ही आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी मृत्यु को धक्का देते रहे। आचार्य द्विवेदी की निर्माणधर्मिता कभी समाप्त नहीं हुई। आचार्य द्विवेदी मृत्युपर्यन्त वस्तुओं को रचने तथा सुरक्षित रखने के लिये व्याकुल रहे। 

उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी का समस्त चिन्तन शास्त्रीय (क्लासिकल) गरिमा से विभूषित है। उन्होंने मानव विकास के इतिहास को दृष्टिगत रखते हुए, मानवता के आधारभूत मर्म को सुरक्षित रखते हुए, कालजयी रचनाओं तथा शास्त्रीय ग्रन्थों का मन्थन करते हुए साहित्य के प्रश्नों पर अत्यधिक गम्भीरता से विचार किया। यह उनके चिन्तन की स्वाभाविक विशेषता थी तथा इसी अर्थ में द्विवेदी जी 'आचार्य' थे। आचार्य द्विवेदी ने यद्यपि साहित्य शास्त्र सम्बन्धी कोई पृथक् व्यवस्थित ग्रन्थ विरचित नहीं किया, तथापि यत्किंचित् इतस्ततः विकीर्ण रूप में उन्होंने इस विषय पर जो भी लिखा है, वह उनके गम्भीर पांडित्य, मौलिक चिन्तन तथा उनकी सूक्ष्म ग्राहकता को प्रस्तुत करने हेतु पर्याप्त है।

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