माया ही मां है

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माया ही मां है मुझे इस चीज का एहसास उस दिन हुआ जब मैंने पहली बार मां महामाया के राधा-लक्ष्मी रूप को देखा

माया ही मां है


मुझे इस चीज का एहसास उस दिन हुआ जब मैंने पहली बार मां महामाया के राधा-लक्ष्मी रूप को देखा, उन्होंने मुझे अपना साक्षात्कार कराया, या जब मैंने उनको अपनी अल्पना में बनाया। मैंने पहली बार कृष्ण के साथ मां को भी भोजन कराया, मैं हमेशा कोशिश करता हूँ कि कृष्ण को खिलाने के बाद ही खाऊँ, पर कभी मैं ऐसे लोगों के सामने होता हूँ जो मुझे ऐसा करता देख टोक देंगे तो मैं वहाँ ऐसा नहीं कर पाता, ये मेरी सामाजिक भय के कारण भी है कि लोग मुझे पागल समझेंगे। एक और चीज है कभी-कभी मैं खुद ही खाना देख कर रुक नहीं पाता और पहले खा लेता हूँ, और खाना खत्म होने के एकदम पहले याद आता है कि कृष्ण को तो खिलाया ही नहीं। अब कोई दूसरा क्षमा माँगेगा, दूसरा भोजन लाएगा उनके लिए, लेकिन मैंने ऐसा कभी नहीं किया मैं अपना जूठा ही कृष्ण को अपने हाथों से खिला देता हूँ। मैं हमेशा पहले थोड़ा चख कर देख लेता हूँ कि अच्छा है कि नहीं, ज्यादा गर्म तो नहीं है, फूँक-फूँक कर अपने हाथों से उसको एक या दो निवाले खिलाता हूँ और फिर खुद खाने लगता हूँ, कभी-कभी खाना उसे अच्छा लगने पर वो और माँगते हैं। कभी-कभी तो बस रात को दूध पिलाकर सोने को कह देता हूँ। उस एक दिन कुछ अलग हुआ, ये कल की बात है मैं दोपहर का खाना खा रहा था एकदम से मेरे मन में प्रकट हुईं मां, कृष्ण के साथ। वो बोलीं जूठा नहीं खाऊँगी मैंने भी जिद कर के बोला कृष्ण तो कहता है, आपको भी खाना होगा और खिला दिया। खाने में मिर्ची ज्यादा थी तो मैंने उनको आम भी खिलाया, उस दिन सारा खाना एक-एक निवाला जैसे मैं खा रहा था, मन में मानकर खा रहा था कि उन दोनों को खिला रहा हूँ, एक-एक चीज का स्वाद पूरी तरह अच्छे से आ रहा था। जब से कृष्ण को खिलाकर खाना शुरू किया है, तब से उतनी भूख लगती नहीं, कम भोजन में ही तृप्ति हो जाती है। पर हाँ मैंने पहली बार मां को खिलाया, और वो भी कृष्ण की तरह ही नटखट हैं, उन्होंने मुझे हल्का सताया या कहें तो हल्का परेशान किया। जैसे एक मां कभी-कभी अपने बच्चे से हँसी-मजाक करती है वैसे, उसके बाद सब ठीक हो गया।

माया ही मां है
रात के भोजन का समय था, मेरी बहन थोड़ी परेशान रहती है, मैंने उसे देखा और मंत्रों को जपने लगा, मुझे दो रक्षा मंत्र आते हैं, गुरु प्रेमानंद महाराज ने बोला था संकट के समय पर प्रयोग (यूज़) करना। मैंने अपने पापों का दंड माँगा, अपनी बहन की रक्षा माँगी, पर इस बार केवल कृष्ण से ही नहीं मां से भी। कान्हा ही जाने ये क्या लीला थी, किसकी लीला थी, मेरा सर भारी होने लगा, और मैं अपने मन में मां के सामने उनसे दंड और रक्षा माँग रहा था, दंड मेरा और रक्षा मेरी बहन की, भय से, उसे किसी चीज का भय है। तभी अचानक एक भयानक सी देवी प्रकट हुईं मां राधा-लक्ष्मी के पीछे। ये मुझे पहले मां काली लगीं पर इनका रंग काला नहीं था, ये राख यानी भस्म के रंग की थीं, इनके केश (हेयर) पूरे काले नहीं थे, हल्के सफेद थे, इन महा देवी का दर्शन बड़ा दुर्लभ (रेयर) था। उन्होंने अपने बड़े-बड़े हाथ दोनों दिशाओं में फैलाए थे लंबे-लंबे सफेद नाखून, और तभी एक पल में इन्होंने मेरे सर पर अपने दोनों हाथों से मारा एक साथ एक ही बार में और मेरा सर चकनाचूर हो गया। मैंने कहा था मां से कि मुझे इन इंद्रियों से मुक्त करें, सर में ही सारी इंद्रियां होती हैं, मां ने मुझे उस सर से ही मुक्त कर दिया। जिन देवी का मुझे दर्शन हुआ था, कुछ समय बाद मुझे याद आया कि ये तो देवी धूमावती थीं, ये दस महाविद्याओं में से एक हैं, मां महाकाली के दस रूप हैं, उनमें से एक हैं ये देवी। मां धूमावती विधवा हैं, ये मां का इकलौता ऐसा रूप है जिसमें महादेव नहीं हैं। मां ने इस रूप में आने से पहले, महादेव को ही खा लिया था, और विधवा हो गई थीं। मां धूमावती न्याय की देवी हैं, वो निष्पक्ष न्याय करती हैं, उन्होंने मुझे मेरा दंड और वरदान दोनों दे दिया। मैं अभी भी अपनी ग्लानि (गिल्ट) में ही हूँ, पर मैं आनंद में भी हूँ, कि मां ने मुझे दर्शन दिए। उसके कुछ और समय बाद मुझे एहसास हुआ, एक महा सत्य का कि माया ही मां है। मैंने अपने जीवन में हमेशा से ही प्रभु से मिलन की प्रतीक्षा की है, उनको बुलाया है, और वो आए भी। भगवान को लोग ना जाने कैसे-कैसे बुलाते हैं, पूजते हैं, ना जाने क्या-क्या खिलाते हैं, और मैं बस कान्हा कान्हा कह कर बोलता हूँ, खाने आजा, खा लो, अपना जूठा खिला देता हूँ, पर वो आ जाते हैं, खा लेते हैं। मैंने यही माना कि मैं अपने पैरों पर कभी चला ही नहीं, कान्हा (नारायण) मुझे अपने कंधों पर रखते हैं और ले जाते हैं, वो मेरे पिता हैं ना, पिता, पुत्र, प्रभु, मित्र, और पति। वो हर रूप में मेरे रहे हैं, पर मैं कभी मां को उतना नहीं माना, ऐसा नहीं कि उनको महत्व नहीं दिया, बस वो प्रेम नहीं कर पाया। पर कल मुझे एहसास हुआ कि कृष्ण तो ब्रह्म हैं, पर जो आनंद, जो सुंदरता, जो प्रेम मैंने महसूस किया है, ये सब तो महामाया मेरी मां ही हैं। वो जो आनंद मुझे मिलता रहा है, ये प्रेम, ये सुंदर दर्शन, ये सब कुछ तो मां ही थीं, मेरी मां। प्रभु मुझे अपने कंधों पर रख कर संसार में लाते हैं और मां प्रभु के आगे मेरी तरफ देखती हुई, उल्टे पैर आगे चलती हैं, मुझे संसार की सुंदरता दिखाती हैं। मां शुरुआत से ही ज्यादा परिश्रम (हार्डवर्क) करती हैं और मैं मूर्ख की तरह प्रभु (ब्रह्म) को पाने में मां (प्रकृति) को दूर कर रहा था। मैं उस रात को सोने के समय ये सब कुछ सोच रहा था, मुझे याद आया कि मैंने अपनी पिछली कविता में माया को मकड़ी कह दिया था। मुझे उस चीज पर बहुत दुख हुआ मैंने अपनी मां को मकड़ी कहा, मैं रोते-रोते सो गया।

अगली सुबह उठा और सोचने लगा और लिखना शुरू कर दिया। इंसान की सबसे बड़ी गलती यही है कि वो अपनी इंद्रियों का स्वामी बनना चाहता है। वो इंद्रियों को अपने हिसाब से चलाना चाहता है, यानी वो इंद्रियों से लड़ने लगता है। वो अपनी इच्छाओं (डिज़ायर्स) को मारने लगता है, और ना चाहते हुए भी उनका गुलाम हो जाता है। एक भूखा इंसान जो खुद से भोजन नहीं करता, चाहे कितना भी दिखाए कि उसे भोजन नहीं चाहिए और या वह उसके बिना भी रह सकता है, चाहे वो जो भी करे जो भी कहे, भूखा ही रहता है। उसके मन में केवल खाना ही चलता है वह केवल भोजन के बारे में ही सोचता है। बुद्ध, सद्गुरु, ओशो, इन सब ने उस महा परम चेतना (हायर कॉन्शियसनेस) को पा लिया था क्योंकि वो अपनी इच्छाओं से लड़ते नहीं हैं, बल्कि उसे पूरा करते हैं। एक बार इच्छा पूरी हो गई, तो वह दिमाग से निकल जाती है, इंसान मुक्त (फ्री) होने लगता है। बिना महामाया को समझे, उन्हें अपनाए बिना, ब्रह्म की प्राप्ति नहीं होती। आप अपनी हर इच्छा को सही और गलत के तराजू पर तोलते हैं, सही और गलत जो आपको आपके समाज ने सिखाया है। ये आपका सही और गलत नहीं है, वास्तविकता (रिएलिटी) में सही और गलत कुछ नहीं होता, ये मूर्ख लोगों की भटकी हुई बुद्धि है। बुद्ध को इसका एहसास हो गया था, वे एक कठिन तप के बाद भी ईश्वर तक नहीं पहुँच पाए थे, पर जब एक औरत ने उन्हें भोजन दिया तब वे जागृत हो गए। एक औरत क्या पता वो महामाया हो, महामाया ने शंकराचार्य को भी ऐसे ही दर्शन दिया था और उनको जागृत किया था। सच्चाई तो यह है कि बिना माया को जाने, जागृत नहीं हो सकते। राधा बोले बिना कृष्ण नहीं मिलते, आपको पहले अपनी इंद्रियों को तृप्त (सैटिस्फाई) करना होगा तब जाकर आप ब्रह्म को जान पाएँगे। ब्रह्म भी इंसान के रूप में जब आए तो अपनी इंद्रियों को तृप्त करते हैं। कृष्ण रूप में माखन चुराकर खाया, गोपियों के साथ रास किया, अपने से बड़ी उम्र की लड़की से प्रेम किया जिसका विवाह भी तय था (राधा), समाज के सारे नियम तोड़ दिए, आप इसे भगवान की लीला या, वो तो भगवान हैं ऐसा कहोगे पर मैं कहता हूँ ये सब उन्होंने हमें ये सिखाने के लिए किया कि एक बार इंद्रियों की पूर्ति हो जाए तो वो परेशान नहीं करतीं। कृष्ण ने अपने आगे के जीवन में कभी माखन नहीं चुराया, रास नहीं किया, राधा से नहीं मिले। मनोविज्ञान (साइकोलॉजी) में पाया गया है कि जीवन ऊर्जा (लिबिडो) शरीर के अलग-अलग अंगों (बॉडीपार्ट्स) में वास करती है, अगर इस ऊर्जा की तृप्ति या इसे निकाला नहीं गया तो यह इंसान को मानसिक रूप से जकड़ लेती है (फिक्सेशन)। मैं कृष्ण के जीवन और मनोविज्ञान पर किसी और दिन चर्चा करूँगा, वो एक और महा विषय है।

माया को अपनाए बिना आप ब्रह्म तक नहीं पहुँच सकते, और उसे अपनाने का सबसे आसान तरीका है, सबको अपना बनाना, और सबको अपना बनाने का आसान तरीका है, खुद को अपनाना, अपनी इच्छाओं, भावनाओं, व्यवहार, तुम में जो कुछ भी है उसे बिना सही-गलत के तराजू पर रखे हुए, बस अपनाओ। आप अगर एक धार्मिक (स्पिरिचुअल) इंसान हैं, तो आप ये भूल जाते हैं कि, आपका कुछ नहीं है, सब ईश्वर (हायर कॉन्शियसनेस) का है, वही करता है, आप ही बेवकूफों की तरह लड़ रहे हैं (रेसिस्ट)। लड़िए मत वरना आप केवल लड़ाई ही करते रहेंगे, आप खुद लड़ाई बन जाएँगे। आप आनंद में रहें, प्रेम करें, अपने आपको अपनाएँ। आप देखेंगे कि आप खुद ही आनंद और प्रेम बन गए हैं, आप सब को अपनाने लगे हैं। अगर ईश्वर सब में है तो आप किसी के लिए भी बुरा भाव रखें वो भाव ईश्वर के लिए ही होता है, आप जब सबको अपनाते हैं तब आप ईश्वर को अपनाते हैं। आप अपनी इच्छाओं से नहीं बल्कि ईश्वर की इच्छा से लड़ते हैं। आप जब भोगों से भागते हैं तो आप ईश्वर के प्रेम से भागते हैं। कृष्ण ने भोगों को उनके समय में अपनाया और उनसे ऊपर उठ गए, वो युद्ध और लड़ाई से भागे और रणछोड़ कहलाए, आप भी इच्छाओं को उनके समय में ही पूरा करें, जब भूख लगे तब खा लो नहीं तो जो भी काम करोगे मन भोजन में ही लगा रहेगा। लेकिन हाँ जब भूख लगे तभी खाना चाहिए, अगर आप मन के हिसाब से खाओगे तब दिक्कत है, मन को मापना (मेज़रमेंट) नहीं आता, वो बस खाता जाएगा। तो जब भूख हो तभी खाना चाहिए, उचित समय और स्थान पर, वरना मन आपको कुछ भी और कभी भी खिला देगा, और एक दिन आप खुद को नाली में कचरा खाते हुए पाओगे। इच्छाएँ पूरी हो जाएँ तो दिमाग उनसे मुक्त हो जाएगा, आप मुक्त हो जाएँगे, मोक्ष यही है, और जागरूकता भी यही है। बुद्ध, ओशो, सद्गुरु, इन सब लोगों को जागरूक कहा जा सकता है, क्योंकि ये लड़ते नहीं। माया ही वो मां है जिसे अपनाने से आप जागरूक हो सकते हैं। खुद को माया को समर्पित (डेडिकेट/सरेंडर) करने पर ही ब्रह्म आपको स्वीकारते हैं। अगर आप माया से लड़ते रहेंगे तो कभी, उसे समझ नहीं पाएँगे और ब्रह्म से लड़ते रहेंगे और उनसे और दूर जाते रहेंगे।

एक इंसान जब किसी एक चीज की कामना को बिना उसे पूरा किए छोड़ देता है। तो चाहे उसने बाकी कामनाओं को पूरा, क्यों ना किया हो, कितनी बार भोगों का आनंद लिया हो, उस एक चीज जिसे वो पूरा नहीं कर सका या जिसका वो भोग नहीं कर सका, उस एक चीज की इच्छा जिंदा रहती है, और एक अग्नि के रूप में जलती रहती है, जो कभी शांत नहीं होती। और वो इंसान दूसरी चीजों में सुख खोजता है, और फिर लोग कहते हैं कि कामना कभी खत्म नहीं होती। ऐसा नहीं है कामना खत्म होती है, परंतु यदि किसी एक चीज की भी कामना बाकी है तो व्यक्ति का मन उसी में लगा होता है। भले ही वो उसे, उस रूप में ना पा सके परंतु वह उसे दूसरे भोगों में खोजता है। ये एक ऐसी मनोवैज्ञानिक स्थिति है जहाँ व्यक्ति, भूखा है, उसे भोजन चाहिए परंतु उसके पास भोजन नहीं है, तो वह पानी पीता है, पीता रहता है, और उसकी प्यास कभी नहीं बुझती।

व्यक्ति को शरीर चाहिए भोग के लिए परंतु समाज उसे रोकता है, उससे लड़ता है, तो व्यक्ति भी अपनी इच्छाओं से लड़ता है, और फिर धीरे-धीरे सब से लड़ने लगता है। इसमें उसकी कोई गलती नहीं है, वो तो बस वही कर रहा है जो उसे करना है, यहाँ ईश्वर ने अपनी सारी इच्छाएँ पूरी कीं, अपनी परेशानियाँ भी झेलिं। परंतु समाज केवल परेशानियाँ झेलने को ही कर्म समझता है, भोगों की पूर्ति कर्म नहीं पाप है, और यही बेवकूफों की तरह जनम लेते रहते हैं। भोजन की भूख तृप्त हुई नहीं और ईश्वर की भूख को तृप्त करने की कोशिश करते हैं। इसमें भी कुछ गलत नहीं है, आप ऐसा भी कर सकते हैं परंतु ऐसा सब नहीं कर सकते, ऐसा राम ने किया था, उनके भक्तों ने भी किया, हनुमान, तुलसीदास, शबरी। परंतु ऐसा कृष्ण ने नहीं किया, बुद्ध ने नहीं किया, ओशो ने भी नहीं किया, और ना ही रामकृष्ण परमहंस ने परंतु हाँ उनके शिष्य विवेकानंद ने ऐसा ही किया था। जहाँ बुद्ध, ओशो, कृष्ण, रामकृष्ण परमहंस ने भोगों और माया को अपनाया और लड़ना बंद कर दिया।

वहीं राम और उनके भक्तों ने और विवेकानंद ने भोगों पर विजय प्राप्त की। इन दोनों ही तरीकों से आप ईश्वर को पा सकते हैं, और ईश्वर बन भी सकते हैं। आप एक विशाल चेतना (हायर कॉन्शियसनेस) का रूप ले सकते हैं जो सबसे परे है, और वही हर मान्यता में हर धर्म में ईश्वर कहलाती है। सब में लड़ने की काबिलियत नहीं होती, और ना ही सब लड़ना पसंद करते हैं, पर हमें लड़ने को ही कहा जाता है। हिंदू धर्म में, सनातन पद्धति में गीता सबसे महान पुस्तक है, और महाभारत सबसे महान कहानी, ये इसलिए नहीं है कि वहाँ किसी सारथी ने अपना विराट स्वरूप दिखाया था बल्कि इस लिए है क्योंकि वहाँ लड़ना सबसे अंतिम चीज है। कृष्ण ने लड़ना एकदम अंतिम बार में चुना। और वो अंतिम बार तक लड़े नहीं, वही तो गीता का वास्तविक सार है। कृष्ण ने सबको अपना बनाकर रखा अंतिम बार तक, और मैं केवल युद्ध की बात ही नहीं कर रहा उसके भी बाद।


कुमार आर्यन, जिन्हें साहित्य और लेखन की दुनिया में उनके उपनाम 'काल' के रूप में जाना जाता है, कोलकाता के ब्रेनवेयर यूनिवर्सिटी (Brainware University) के मनोविज्ञान विभाग में B.Sc. (Honours) मनोविज्ञान के छात्र हैं। मानव मन की गहरी समझ और मनोविज्ञान के अकादमिक ज्ञान के साथ-साथ वे लेखन और रचनात्मकता में भी रुचि रखते हैं।उनसे संपर्क करने के लिए उनके मोबाइल नंबर 9341901449 अथवा ईमेल kumararyan28062003@gmail.com के माध्यम से संवाद किया जा सकता है।

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