संपादक के प्रति समर्पण

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संपादक के प्रति समर्पण बार-बार रचना पत्रिका के संपादक जी को भेजते-भेजते थक गये हैं। अगर पत्रिका में जगह नहीं मिली।

संपादक के प्रति समर्पण


बार-बार रचना पत्रिका के संपादक जी को भेजते-भेजते थक गये हैं।अगर पत्रिका में जगह नहीं मिली।इसका सीधा सरल उपाय है कि संपादक जी की शरणागत में नहीं पहुंच पाये।एक समर्पण का अभाव है।जी हुजूरी करने में आप सक्षम नहीं हैं। जिसके अभाव में साहित्यिक भाव न पैदा होने पर संपादक जी का आपकी रचना से मोहभंग हो जाता है।

संपादक के प्रति समर्पण
संपादक जी का हृदय जीतने का सहीं उपाय है। कुछ उनकी दानपेटिका में आनलाइन तथा आफलाइन का सहयोग राशि प्रेषित कर दीजिए। मुंह मिष्ठान भी करा सकते हैं। पत्रिका की सदस्यता भी ले लेना चाहिए। इससे भी उनका कठोर हृदय परिवर्तित हो जायेगा। आपकी सड़ांध रचना दूसरे या तीसरे पृष्ठ पर चमचमाती मिलेगी। यह पुरुष लेखक के लिए अनिवार्य शर्त है। महिला रचनाकार इन सब क्रिया से मुक्त है। युवा कवयित्री है तो मुख्यपृष्ठ पर चमचमाती तस्वीर के साथ श्रेष्ठ रचना के साथ पत्रिका में स्थान पा जायेगी। 

कुछ संपादक जी सरल स्वभाव के होते हैं। सब रचनाकारों को पचा लेते हैं। कुछ संपादक को प्रति रचना सौ रुपये गूगल पे करके पत्रिका में स्थान ग्रहण कर सकते हैं। कुछ संपादक दीन-हीन कवियों पर दया-रस की बरसात करते रहते हैं लेकिन इनकी पत्रिका भी असहाय प्राणी की तरह होता है। गति में तेजी नहीं होती है। 

कुछ संपादक कुत्ते की पूंछ की तरह होते हैं। इनको चाहे जितना तेल-मालिश, उबटन करिये। कुत्ते की पूंछ की तरह टेढ़े ही रहेंगे। आपकी रचना पर कभी नजर नहीं जाती। चाहे आप कलेजा फाड़ कर रख दीजिये। जिनसे इनका घरेलू संबंध हो जाता है। प्रत्येक अंक में उनकी हाजिरी लग जाती है और आप चाहे खेत की सारी मिट्टी उलप-पुलट दीजिये लेकिन सुई की नोंक के बराबर भी पत्रिका में जगह नहीं देंगे।

अगर कोई कवयित्री संपादक जी का फोन पर रोज हाल-चाल लेने लगे। प्रेमरस से युक्त दो-चार शब्दों का प्रेमरस पिला दे तो संपादक जी की कठोरता भंग हो जायेगी। उसके प्रति करुणा का स्वर उभर आता है। कुछ माह में उनकी प्रकाशित पुस्तक का स्वयं विमोचन के नाम पर हल्की मुस्कान का दर्शन करने के लिए पुस्तक विमोचन का कार्यक्रम पत्रिका की तरफ से नि:शुल्क करवा देते हैं।

कवयित्री का जैसे ही हृदय गदगद हुआ। संपादक जी का समर्पण और तेज हो जाता है। एक भव्य स्थान कवयित्री संपादक जी के हृदय में लेती हैं। कई सालों से अगर आप निवेदन पत्र भेजकर संपादक जी से प्रतिष्ठित पत्रिका में छापने के लिए कहते थक गये होंगे। वहीं एक दो माह से संपर्क में आयी युवा कवयित्री संपादक जी के रहमोकरम से पत्रिका का पूरा अंक परिशिष्ट के अंतर्गत कवयित्री के नाम पूरी पत्रिका समर्पित हो जाती है।



- जयचन्द प्रजापति 'जय'
प्रयागराज

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