महेश सांख्यधर व्यंग्य साहित्य के क्षेत्र में एक जाना-पहचाना नाम हैं। वे अपनी रचनाओं के माध्यम से समकालीन समाज की विसंगतियों और विडंबनाओं पर तीखा व्यंग
मिथक से यथार्थ तक : महेश सांख्यधर की नाट्य-दृष्टि
एक शीर्षक जिसने ठिठका दिया - महेश सांख्यधर व्यंग्य साहित्य के क्षेत्र में एक जाना-पहचाना नाम हैं। वे अपनी रचनाओं के माध्यम से समकालीन समाज की विसंगतियों और विडंबनाओं पर तीखा व्यंग्य करते हैं। वे ऊँच-नीच, अमीर-गरीब जैसे सामाजिक भेदभाव का विरोध करते हैं। साथ ही, अंधविश्वास और उन सामाजिक तथा प्रशासनिक व्यवस्थाओं पर भी प्रश्नचिह्न लगाते हैं, जो मानव-हित की उपेक्षा करती हैं।
हाल ही में प्रकाशित महेश सांख्यधर का नाटक-संग्रह ‘घटती ज़िंदगी का अहसास’ (2026) पढ़ने का अवसर मिला। सच कहूँ तो मुझे नाटक देखना हमेशा से पसंद रहा है, लेकिन नाटक पढ़ना मेरी रुचि का विषय कभी नहीं रहा। इसलिए इस पुस्तक को भी मैंने शुरुआत में सामान्य जिज्ञासा से ही हाथ में उठाया। पर जैसे ही मेरी नज़र इसके शीर्षक - ‘घटती ज़िंदगी का अहसास’ - पर पड़ी, मन ठिठक गया। शीर्षक में ऐसा आकर्षण और ऐसा प्रश्न निहित था कि पुस्तक के पन्ने पलटे बिना रहा नहीं गया।
248 पृष्ठों के इस संग्रह में कुल 19 नाटक संकलित हैं। केवल उनके शीर्षकों पर दृष्टि डालने से ही विविधता का आभास होने लगता है। कुछ शीर्षक पारिवारिक और सामाजिक जीवन की जानी-पहचानी परिस्थितियों का संकेत देते हैं, तो कुछ मिथकीय कथाओं की ओर ले जाते हैं। वहीं कुछ शीर्षकों में तीखे व्यंग्य की झलक दिखाई देती है। शीर्षकों की यह विविधता पाठक के मन में उत्सुकता जगाती है कि आखिर इन नाटकों के माध्यम से लेखक जीवन, समाज और समय की किन परतों को उद्घाटित करने वाला है।
महेश सांख्यधर की बहुआयामी सृजन-यात्रा
उत्तर प्रदेश के बदायूँ जनपद के बरौलिया गाँव में 1 जुलाई, 1950 को श्रीमती रामदुलारी और श्री वासुदेव प्रसाद के घर एक बालक ने जन्म लिया। माता-पिता ने स्नेहपूर्वक उसका नाम महेश चंद्र रखा। आगे चलकर यही बालक साहित्य-जगत में अपने सशक्त व्यंग्य लेखन के कारण महेश सांख्यधर के नाम से प्रतिष्ठित हुआ।
महेश सांख्यधर ने शिक्षा को अपने व्यक्तित्व का सुदृढ़ आधार बनाया। उन्होंने हिंदी साहित्य में एम.ए., बी.एड. तथा पीएच.डी. की उपाधियाँ प्राप्त कीं। इतना ही नहीं, ज्ञान के प्रति अपनी व्यापक दृष्टि का परिचय देते हुए उन्होंने एल.एल.बी. की डिग्री भी अर्जित की। साहित्य, शिक्षा और विधि - इन तीनों क्षेत्रों का यह समन्वय उनके चिंतन की व्यापकता और रचनात्मक दृष्टि को और अधिक समृद्ध बनाता है।
महेश सांख्यधर का साहित्यिक व्यक्तित्व किसी एक विधा तक सीमित नहीं है। उन्होंने अपनी सृजनात्मक प्रतिभा का परिचय कविता, कहानी, उपन्यास, पत्र-साहित्य, व्यंग्य और नाटक जैसी विविध साहित्यिक विधाओं में दिया है। प्रत्येक विधा में उनकी लेखनी ने जीवन और समाज के विभिन्न पक्षों को संवेदनशीलता, विचारशीलता तथा प्रभावशाली अभिव्यक्ति के साथ प्रस्तुत किया है। यही बहुआयामी रचनात्मकता उन्हें समकालीन हिंदी साहित्य में एक विशिष्ट स्थान प्रदान करती है।
महेश सांख्यधर की साहित्य-साधना किसी एक विधा तक सीमित नहीं है। उनकी रचनात्मक यात्रा जितनी व्यापक है, उतनी ही विविधतापूर्ण भी। कविता से आरंभ होकर उनकी लेखनी ने दोहा, उपन्यास, व्यंग्य, कहानी, पत्र-साहित्य और नाटक जैसी अनेक विधाओं में अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज कराई है।
सांख्यधर के कविता-संग्रह ‘समय की रेलपेल’ (1971) और ‘सिद्धभूमि’ (1999) उनकी काव्य-संवेदना के परिचायक हैं, जबकि ‘बना रंगोली आँगन’ (2024) दोहा-संग्रह के रूप में उनकी काव्याभिव्यक्ति का एक अलग आयाम प्रस्तुत करता है। कथा-साहित्य में ‘रात की छाँव में’ तिलिस्मी उपन्यास के रूप में उनकी कल्पनाशीलता का परिचय देता है, वहीं ‘ठगों की नगरी’ व्यंग्यात्मक उपन्यास के माध्यम से समाज की विसंगतियों पर तीखा प्रहार करता है।
व्यंग्य के क्षेत्र में उनकी लेखनी विशेष रूप से उल्लेखनीय है। ‘दलालों के देश में’, ‘सबसे बड़ा जुगाड़ तंत्र’ और ‘काँटे करील के’ जैसे व्यंग्य-संग्रह सामाजिक और राजनैतिक विडंबनाओं को बेबाकी से उजागर करते हैं। इसी क्रम में ‘लेखक की मौत’ व्यंग्य-नाटक संग्रह और ‘घटती ज़िंदगी का अहसास’ नाटक-संग्रह उनके नाट्य-लेखन की सशक्त पहचान हैं।
कहानी-विधा में ‘पिघलती हुई बर्फ’ और ‘नुचे हुए पंख’ जैसे संग्रह मानवीय संवेदनाओं के विविध रंगों को अभिव्यक्त करते हैं, जबकि ‘गलती मेरी है’ पत्र-साहित्य के रूप में उनकी अभिव्यक्ति की एक विशिष्ट शैली का परिचय कराता है।
महेश सांख्यधर केवल एक सृजनधर्मी लेखक ही नहीं, बल्कि दूरदर्शी और कुशल संपादक भी हैं। उनकी संपादकीय दृष्टि साहित्य को समाज से जोड़ने वाली दृष्टि रही है। उन्होंने ‘एक्सप्रेस नारद’ नामक साप्ताहिक पत्र का संपादन कर समसामयिक मुद्दों और साहित्यिक सरोकारों को प्रभावी स्वर प्रदान किया। इसके अतिरिक्त वे ‘आदर्श कौमुदी’ के सह-संपादक तथा ‘कनक प्रभा’ के परामर्श-संपादक के रूप में भी सक्रिय रहे, जहाँ उनकी साहित्यिक समझ और संपादकीय दक्षता का व्यापक परिचय मिलता है।
लेखन और संपादन के साथ-साथ उनके नियमित व्यंग्य स्तंभों ने भी पाठकों के बीच विशेष लोकप्रियता अर्जित की। ‘लट्ठ मेव जयते’, ‘काँटे करील के’ और ‘नशे की झोंक में’ जैसे चर्चित स्तंभों में उन्होंने तीक्ष्ण व्यंग्य, सहज भाषा और सामाजिक-राजनैतिक विसंगतियों पर निर्भीक प्रहार के माध्यम से अपनी विशिष्ट पहचान बनाई। उनकी लेखनी केवल मनोरंजन नहीं करती, बल्कि पाठकों को सोचने और व्यवस्था पर प्रश्न उठाने के लिए भी प्रेरित करती है।
हँसी के पीछे छिपा यथार्थ
महेश सांख्यधर की साहित्यिक पहचान मूलतः एक सशक्त व्यंग्यकार के रूप में स्थापित है। उनकी व्यंग्य-दृष्टि केवल हँसाने तक सीमित नहीं रहती, बल्कि समाज में व्याप्त विसंगतियों और विडंबनाओं का निर्भीक उद्घाटन करती है। उनकी चर्चित व्यंग्य-रचना ‘जिन लूटा तिन पाइयाँ’ इसका उत्कृष्ट उदाहरण है। इस रचना में उन्होंने ‘लूट’ जैसी प्रवृत्ति का अत्यंत मौलिक और व्यापक विश्लेषण प्रस्तुत किया है। वे लूट को मुख्यतः दो वर्गों - व्यक्तिगत और सामूहिक - में विभाजित करते हैं तथा यह स्पष्ट करते हैं कि पारिवारिक, क्षेत्रीय, राष्ट्रीय, अंतरराष्ट्रीय, धार्मिक और राजनीतिक स्तर पर होने वाली लूट वस्तुतः सामूहिक लूट के ही विविध रूप हैं। अपनी पैनी दृष्टि और तीक्ष्ण व्यंग्य के माध्यम से सांख्यधर यह स्थापित करते हैं कि लूट केवल आर्थिक अपराध नहीं, बल्कि एक ऐसी सामाजिक मानसिकता है, जिसने जीवन के लगभग प्रत्येक क्षेत्र में अपनी जड़ें जमा ली हैं। यही कारण है कि उनकी व्यंग्य-रचना पाठक को केवल मुस्कुराने का अवसर नहीं देती, बल्कि उसे व्यवस्था, समाज और स्वयं अपने समय के प्रति गंभीर आत्ममंथन के लिए भी विवश कर देती है।
व्यंग्य की ऐसी पैनी दृष्टि से संपन्न महेश सांख्यधर के नाटक भी केवल मंचीय मनोरंजन का माध्यम नहीं हैं, बल्कि सामाजिक यथार्थ के सशक्त दस्तावेज़ हैं। उनके नाटकों में जीवन की विडंबनाएँ, मानवीय संवेदनाएँ और व्यवस्था की विसंगतियाँ इस प्रकार उभरकर सामने आती हैं कि पाठक स्वयं को उनसे अलग नहीं कर पाता। उनका नाटक-संग्रह ‘घटती ज़िंदगी का अहसास’ इसी रचनात्मक दृष्टि का सशक्त प्रमाण है। इसमें संकलित नाटक समाज के अनेक अनदेखे और अनकहे पक्षों को उजागर करते हुए पाठक को भीतर तक झकझोर देते हैं। ये नाटक केवल कथा का विस्तार नहीं करते, बल्कि प्रश्न उठाते हैं, आत्ममंथन के लिए प्रेरित करते हैं और जीवन तथा समाज को नए दृष्टिकोण से देखने की चेतना भी प्रदान करते हैं।
‘घटती ज़िंदगी का अहसास’ में संकलित तीन नाटक - ‘गुरु-दक्षिणा’, ‘यक्ष के प्रश्न’ और ‘वरदान’ - प्रथम दृष्टि में ही पाठक का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करते हैं। इनमें ‘गुरु-दक्षिणा’ और ‘यक्ष के प्रश्न’ की कथाभूमि ‘महाभारत’ से जुड़ी है, जबकि ‘वरदान’ की पृष्ठभूमि ‘रामायण’ पर आधारित है। यद्यपि इन कथाओं से भारतीय समाज भली-भाँति परिचित है, किंतु महेश सांख्यधर ने उन्हें केवल दोहराया नहीं है, बल्कि उनमें निहित अनकहे और अनदेखे पक्षों को उजागर करने का सफल प्रयास किया है।
विशेष रूप से ‘गुरु-दक्षिणा’ पढ़ते हुए मैं अनायास ही अपने बचपन की स्मृतियों में लौट गई। बचपन में देखी तेलुगु फ़िल्म ‘एकलव्य’ की यादें ताज़ा हो उठीं। उस फ़िल्म को देखने के बाद मेरे मन में एक प्रश्न बार-बार उठता था - जब एकलव्य ने बिना किसी प्रत्यक्ष शिक्षा के, केवल गुरु द्रोणाचार्य की प्रतिमा को अपना गुरु मानकर अथक अभ्यास किया और अपने परिश्रम से अद्वितीय धनुर्धर बना, तो फिर उसे गुरु-दक्षिणा के रूप में अपना अंगूठा क्यों देना पड़ा? मेरे इस बाल-सुलभ प्रश्न का उत्तर पिताजी ने बड़े सहज ढंग से दिया था। उन्होंने कहा कि द्रोणाचार्य ने भले ही एकलव्य को औपचारिक रूप से शिक्षा नहीं दी थी, किंतु एकलव्य ने उन्हें अपने हृदय में गुरु के रूप में प्रतिष्ठित किया था। उसकी साधना, श्रद्धा और समर्पण ने द्रोणाचार्य को मानसिक रूप से उसका गुरु बनने के लिए बाध्य कर दिया। दूसरी ओर, द्रोणाचार्य अर्जुन को संसार का सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर बनाने का वचन दे चुके थे। यही कारण था कि जब उन्होंने देखा कि एकलव्य अर्जुन से भी आगे निकल चुका है, तो उन्होंने गुरु-दक्षिणा के रूप में उसके दाहिने हाथ का अंगूठा माँग लिया।
एकलव्य ने बिना किसी शिकायत के अपना अंगूठा अर्पित कर दिया, किंतु उसका अदम्य साहस, साधना और प्रतिभा अंगूठे के साथ समाप्त नहीं हुई। अंगूठा खो देने के बाद भी उसने धनुर्विद्या में अपनी श्रेष्ठता और आत्मबल को बनाए रखा। महेश सांख्यधर का ‘गुरु-दक्षिणा’ इसी परिचित प्रसंग को नए प्रश्नों और नई दृष्टि के साथ प्रस्तुत करता है। यही कारण है कि यह नाटक केवल ‘महाभारत’ की कथा का पुनर्पाठ नहीं, बल्कि गुरु-शिष्य संबंध, न्याय, वचनबद्धता और सामाजिक विषमता पर गंभीर चिंतन का अवसर भी प्रदान करता है।
जब गुरु ने शिष्य के आगे शीश झुकाया
‘गुरु दक्षिणा’ नाटक में महेश सांख्यधर ने पारंपरिक कथा को एक नए वैचारिक धरातल पर स्थापित किया है। नाटक का सबसे प्रभावशाली क्षण वह है, जब गुरु द्रोणाचार्य एकलव्य की साधना, समर्पण और अद्वितीय प्रतिभा के आगे नतमस्तक होकर कहते हैं - “धन्य हो एकलव्य, तुम धन्य हो। तुमसे महान धनुर्धर विश्व में दूसरा नहीं है।” (पृ.49)। यह कथन केवल एक शिष्य की प्रतिभा का सम्मान नहीं, बल्कि उस ऐतिहासिक अन्याय की मौन स्वीकारोक्ति भी है, जिसका सामना एकलव्य ने किया था। इसी प्रसंग में एकलव्य का उत्तर नाटक को और अधिक ऊँचाई प्रदान करता है। वह व्यक्तिगत गौरव की अपेक्षा सामाजिक समरसता को अधिक महत्व देता है। वह द्रोणाचार्य से कहता है कि उन्हें शिष्य के रूप में स्वीकार कर उन्होंने केवल एकलव्य का ही नहीं, बल्कि समस्त जनजातियों और भील समुदाय का सम्मान बढ़ाया है। उसके शब्दों में, उन्होंने “जातिभेद और छूआछूत को मिटाकर विश्व को नव-ज्योति प्रदान की है।” (पृ.50)। यह संवाद नाटक की मूल चेतना को उद्घाटित करता है, जहाँ ‘महाभारत’ की कथा आधुनिक सामाजिक संदर्भों से जुड़कर समानता, मानवीय गरिमा और सामाजिक न्याय का सशक्त संदेश देती है।
‘गुरु-दक्षिणा’ का चरम दृश्य नाटक को एक नई वैचारिक ऊँचाई प्रदान करता है। यहाँ महेश सांख्यधर प्रचलित कथा को केवल दोहराते नहीं, बल्कि उसे नए अर्थों से समृद्ध करते हैं। नाटक में एकलव्य अपने गुरु द्रोणाचार्य की प्रतिष्ठा और गुरु-शिष्य परंपरा की मर्यादा बनाए रखने के लिए स्वेच्छा से अपने दाहिने हाथ का अंगूठा गुरु-दक्षिणा के रूप में अर्पित करता है। किंतु इस घटना के बाद द्रोणाचार्य के भीतर गहरा आत्मसंघर्ष जन्म लेता है। वे व्यथित होकर कहते हैं - “लोग कहेंगे कि अभिमानी, अत्याचारी, कायर, स्वार्थी और पदलोलुप था द्रोण ... गुरु की गरिमा को मिट्टी में मिला कर गुरु-शिष्य परंपरा को पतित किया ... एकलव्य का अंगूठा गुरु-दक्षिणा के नाम पर कटवा लिया।” (पृ. 53)। यह संवाद द्रोणाचार्य के अंतर्मन में उठते अपराधबोध और आत्मग्लानि का मार्मिक उद्घाटन करता है।
ऐसे समय में एकलव्य का उत्तर उसके विराट व्यक्तित्व को और भी ऊँचा उठा देता है। वह बिना किसी कटुता के दृढ़ स्वर में कहता है - “यह अंगूठा मैंने दिया है। स्वेच्छा से दिया है। अपने वचन और अपने मन की शांति से दिया है।” (पृ. 53)। यह कथन त्याग, निष्ठा और आत्मसम्मान का अद्भुत उदाहरण बन जाता है। यहाँ एकलव्य पीड़ित नहीं, बल्कि अपने निर्णय का स्वयं स्वामी दिखाई देता है।
नाटक की एक और उल्लेखनीय विशेषता यह है कि द्रोणाचार्य गुरु-दक्षिणा तो स्वीकार कर लेते हैं, किंतु वे यह स्वीकार करने का साहस भी दिखाते हैं कि अर्जुन की श्रेष्ठता का दावा निर्विवाद नहीं है। उनके मन में एकलव्य की असाधारण प्रतिभा के प्रति सम्मान बना रहता है। यही परिवर्तन सांख्यधर की मौलिक दृष्टि को रेखांकित करता है। इस प्रकार ‘गुरु-दक्षिणा’ केवल महाभारत के एक प्रसिद्ध प्रसंग का पुनर्पाठ नहीं है, बल्कि गुरु-शिष्य संबंधों, न्याय, समानता और मानवीय गरिमा की नई व्याख्या प्रस्तुत करने वाला नाटक है। सांख्यधर इस मिथकीय कथा के माध्यम से जातिगत भेदभाव, सामाजिक असमानता और पूर्वाग्रहों पर प्रहार करते हुए मानवता, समरसता और न्यायपूर्ण समाज का प्रभावशाली संदेश देते हैं। इस संदर्भ में प्रो. देवराज का यह कथन उल्लेखनीय है - “महेश सांख्यधर ने अपने लेखकीय स्वातंत्र्य का प्रयोग करते हुए ‘गुरु दक्षिणा’ नाटक में महाभारत के प्रचलित कथानक में एक मौलिक परिवर्तन किया है। यह बहुत महत्वपूर्ण है और नाटक को अति प्रासंगिक बनाता है।” (पृ.19)
कहा जा सकता है कि ‘गुरु दक्षिणा’ में महेश सांख्यधर ने महाभारत के प्रसिद्ध एकलव्य-द्रोणाचार्य प्रसंग का पुनर्पाठ करते हुए समकालीन भारतीय समाज, राजनीति, शिक्षा और प्रशासन की गहरी विसंगतियों को व्यंग्य का विषय बनाया है। पौराणिक पात्रों और घटनाओं के माध्यम से वे लोकतांत्रिक व्यवस्था में व्याप्त भ्रष्टाचार, अवसरवाद, वंशवाद, सत्ता-लोलुपता, न्याय के दोहरे मानदंड तथा नैतिक मूल्यों के क्षरण पर तीखा प्रहार करते हैं। उनकी दृष्टि केवल व्यवस्था की आलोचना तक सीमित नहीं रहती, बल्कि वह पाठक को आत्ममंथन के लिए भी प्रेरित करती है कि आदर्शों और नैतिकता से विचलित समाज अंततः अपने ही लोकतांत्रिक आधार को कमजोर करता है। इस प्रकार गुरु दक्षिणा अतीत के मिथकीय आख्यान को वर्तमान की सामाजिक-राजनीतिक यथार्थभूमि से जोड़ते हुए यह सिद्ध करती है कि महेश सांख्यधर का व्यंग्य केवल हास्य उत्पन्न करने का माध्यम नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना जगाने और लोकतांत्रिक मूल्यों की पुनर्स्थापना का सशक्त साहित्यिक हस्तक्षेप है।
यक्ष के कटघरे में लोकतंत्र
‘महाभारत’ का यक्ष-प्रश्न प्रसंग भारतीय साहित्य की सबसे विचारोत्तेजक और दार्शनिक घटनाओं में से एक माना जाता है। वनवास के अंतिम चरण में प्यास से व्याकुल पांडव एक सरोवर के पास पहुँचते हैं। जैसे ही नकुल जल पीने का प्रयास करता है, एक अदृश्य यक्ष उसे चेतावनी देता है - पहले मेरे प्रश्नों का उत्तर दो, अन्यथा मृत्यु निश्चित है। किंतु चेतावनी की उपेक्षा करने पर नकुल, सहदेव, अर्जुन और भीम एक-एक करके भूमि पर निश्चेष्ट होकर गिर पड़ते हैं। अंततः युधिष्ठिर वहाँ पहुँचते हैं। अपने चारों भाइयों को मृतवत् देखकर भी वे धैर्य नहीं खोते और यक्ष के प्रश्नों का उत्तर देने का निर्णय लेते हैं। यहीं से आरंभ होता है ज्ञान, विवेक और धर्म की सर्वोच्च परीक्षा का वह अद्भुत संवाद, जिसने इस प्रसंग को कालजयी बना दिया।
यक्ष के प्रश्न केवल सामान्य जिज्ञासाएँ नहीं थे, बल्कि जीवन, मृत्यु, धर्म, सत्य, कर्तव्य, सुख, ज्ञान और मानव-स्वभाव से जुड़े गहन दार्शनिक प्रश्न थे। युधिष्ठिर ने प्रत्येक प्रश्न का उत्तर शांतचित्त, तर्कपूर्ण और धर्मसम्मत ढंग से दिया। उनके उत्तरों से प्रसन्न होकर यक्ष ने न केवल उन्हें विजयी घोषित किया, बल्कि उनके मृतप्राय भाइयों को भी पुनर्जीवित कर दिया। इस प्रकार यक्ष-प्रश्न का प्रसंग यह संदेश देता है कि संकट की घड़ी में शक्ति से अधिक महत्व बुद्धि, धैर्य, सत्यनिष्ठा और धर्मपरायणता का होता है। यही कारण है कि यह प्रसंग आज भी मानव जीवन के लिए नैतिकता, विवेक और संतुलित निर्णय का अनुपम आदर्श माना जाता है।
महेश सांख्यधर का ‘यक्ष के प्रश्न’ नाटक मिथकीय कथा का मात्र पुनर्कथन नहीं, बल्कि समकालीन लोकतांत्रिक व्यवस्था पर किया गया एक तीखा व्यंग्य है। इस नाटक में ‘महाभारत’ के युधिष्ठिर को एक राजनैतिक दल के अध्यक्ष और यक्ष को दस्युराज के रूप में रूपायित किया गया है। पात्रों का यह रूपांतरण नाटक को वर्तमान सामाजिक-राजनैतिक संदर्भों से जोड़ देता है, जहाँ सत्ता, नैतिकता और जनतंत्र के बीच का द्वंद्व पूरी तीव्रता के साथ उभरकर सामने आया है। नाटक का यह दृश्य व्यंग्य की दृष्टि से अत्यंत प्रभावशाली है। जब युधिष्ठिर की गाड़ी चंबल प्रदेश में प्रवेश करती है, तो चालक उसे सावधान करते हुए बताता है कि यह क्षेत्र दस्युराज यक्ष के अधिकार में है। अभी तक आत्मविश्वास से भरे दिखाई देने वाले युधिष्ठिर का स्वर यक्ष की आवाज़ सुनते ही बदल जाता है। सत्ता और प्रभाव का अहंकार पल भर में विनम्रता के आवरण में छिप जाता है। अपनी राजनैतिक चतुराई का परिचय देते हुए वह मीठे शब्दों में कहता है - “मैं तो आपका अदना सेवक हूँ। पार्टी के चारों महासचिव अनुभवहीन हैं, गलती कर बैठे। मैं ऐसी हिमाकत कैसे कर सकता हूँ?” (पृ.130)
इस छोटे-से संवाद में महेश सांख्यधर ने अत्यंत तीक्ष्ण व्यंग्य के साथ अवसरवादी राजनीति का यथार्थ प्रस्तुत किया है। परिस्थितियाँ बदलते ही नेताओं की भाषा, तेवर और सिद्धांत कैसे बदल जाते हैं, इसका सजीव चित्रण यहाँ देखने को मिलता है। सत्ता के सामने विनम्रता का मुखौटा और संकट टलते ही वही पुराना अहंकार - इसी राजनैतिक दोहरेपन को सांख्यधर ने बड़ी सहजता और प्रभावशीलता से उजागर किया है। यह प्रसंग पाठक को मुस्कुराने के साथ-साथ लोकतांत्रिक राजनीति के बदलते चरित्र पर गंभीरता से सोचने के लिए भी विवश कर देता है।
‘यक्ष के प्रश्न’ का सबसे सशक्त पक्ष यक्ष और युधिष्ठिर के बीच होने वाला व्यंग्यपूर्ण प्रश्नोत्तर है। महेश सांख्यधर ने इस संवाद को इस प्रकार रचा है कि प्रत्येक प्रश्न समकालीन राजनीति और सामाजिक व्यवस्था की किसी न किसी विडंबना को बेनकाब करता है। जब यक्ष पूछता है - संसार में “ऐसी कौन-सी वस्तु है, जिसे देने और लेने वाले दोनों प्रसन्न रहते हैं?” - तो युधिष्ठिर बिना किसी झिझक के उत्तर देता है - रिश्वत। (पृ.130)। बस एक ही उत्तर भ्रष्ट व्यवस्था की भयावह सच्चाई को उजागर कर देता है। इसी प्रकार वह कहता है कि आज सबसे अधिक बिकने वाली वस्तु ईमान है, जबकि नेतागिरी के अनिवार्य गुण झूठ, धोखा, नाटकीयता और निर्दयता बन चुके हैं। इतना ही नहीं, वह कटाक्ष करते हुए स्वीकार करता है कि अधिकांश नेता जनता के नहीं, केवल कुर्सी के प्रति वफादार होते हैं। (पृ.130)
सांख्यधर का व्यंग्य यहीं नहीं रुकता। वे लोकतंत्र और समाजवाद जैसी गंभीर राजनैतिक अवधारणाओं को भी नए अर्थ देकर व्यवस्था की विसंगतियों पर तीखा प्रहार करते हैं। युधिष्ठिर का यह कथन- “जनतंग शब्द अपभ्रंश है, तत्सम है जनतंत्र, अर्थात जिसमें जनता तंग रहे” (पृ.131) - लोकतांत्रिक व्यवस्था की विफलताओं पर एक करारा व्यंग्य बन जाता है। इसी प्रकार समाजवाद की उनकी परिभाषा - “पहले स्वयं, बाद में समाज” - राजनैतिक स्वार्थ और अवसरवाद का मुखौटा उतार देती है।
‘यक्ष के प्रश्न’ में महेश सांख्यधर सत्ता के सर्वोच्च पदों को भी व्यंग्य की कसौटी पर कसने से नहीं चूकते। नाटक में युधिष्ठिर के माध्यम से प्रधानमंत्री के अधिकारों का जो चित्र प्रस्तुत किया गया है, वह लोकतांत्रिक आदर्शों का नहीं, बल्कि सत्ता के दुरुपयोग का तीखा व्यंग्यात्मक रूपक है। युधिष्ठिर कटाक्ष करते हुए कहता है कि “देश को तबाह करके बेच देना, राज्यों की सरकारों को गिरा देना, योग्य और ईमानदार मंत्री को हटाकर उसके स्थान पर नामी-गिरामी बेईमान की नियुक्ति कर देना, चाहे जितना पैसा डकार जाना और अपने दल के अनुकूल परिस्थितियों में चुनाव कराना" (पृ.131) मानो प्रधानमंत्री के मूलभूत अधिकार बन गए हों। यह संवाद सत्ता की निरंकुश प्रवृत्ति, राजनैतिक स्वार्थ और लोकतांत्रिक मूल्यों के क्षरण पर करारा प्रहार करता है।
व्यंग्य की धार तो और पैनी हो जाती है, जब युधिष्ठिर प्रधानमंत्री के सबसे बड़े कर्तव्य का उल्लेख करते हुए कहता है कि उसका प्रमुख दायित्व है - “मंत्रिमंडल के किसी सदस्य को लोकप्रिय नहीं होने देना।” (पृ.131)। इस एक वाक्य में सत्ता-संतुलन के नाम पर चलने वाली राजनैतिक ईर्ष्या, असुरक्षा और व्यक्तिवादी नेतृत्व की मानसिकता उजागर हो जाती है। इसी प्रकार उन्होंने मुख्यमंत्री के प्रमुख कर्तव्यों को उजागर किया है - “मंत्रिपरिषद का गठन प्रधानमंत्री एवं उसके पुत्र से पूछकर करना, उनसे पूछकर ही मूत्र-विसर्जन करना, आठों याम प्रधानमंत्री के नाम की माला जपना, प्रधानमंत्री के पुत्र के जूतों को अपनी जीभ से चाटना, राज्य कर्मचारियों को रिश्वत लेने की खुली छूट देना तथा विपक्षियों को झूठे मुकदमों में फँसाना आदि।” (पृ.132)। यह उद्धरण सांख्यधर की तीखी व्यंग्यात्मक राजनैतिक दृष्टि का उत्कृष्ट उदाहरण है। यहाँ वे मुख्यमंत्री के वास्तविक संवैधानिक दायित्वों का वर्णन नहीं करते, बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में व्याप्त चाटुकारिता, सत्ता-केंद्रीकरण, वंशवाद, भ्रष्टाचार और राजनैतिक दमन पर करारा व्यंग्य करते हैं।
मुख्यमंत्री के कर्तव्यों की जो सूची सांख्यधर प्रस्तुत करते हैं, वह पहली दृष्टि में हास्यास्पद लगती है, किंतु उसी हास्य के भीतर गहरी राजनैतिक विडंबना छिपी हुई है। ‘मंत्रिपरिषद का गठन प्रधानमंत्री एवं उसके पुत्र से पूछकर करना’ कहकर वे संघीय व्यवस्था के क्षरण और वंशवादी राजनीति पर कटाक्ष करते हैं, जहाँ मुख्यमंत्री जनता या संविधान के प्रति नहीं, बल्कि शीर्ष नेतृत्व और उसके परिवार के प्रति अधिक उत्तरदायी दिखाई देता है। ‘उनसे पूछकर ही मूत्र-विसर्जन करना’ जैसी अतिशयोक्तिपूर्ण अभिव्यक्ति मुख्यमंत्री की पूर्ण पराधीनता और व्यक्तित्वहीनता का अत्यंत तीखा व्यंग्य है। इससे यह संकेत मिलता है कि सत्ता के शीर्ष पर बैठे व्यक्ति की स्वायत्तता समाप्त हो चुकी है और वह केवल कठपुतली बनकर रह गया है।
इसी प्रकार ‘प्रधानमंत्री के पुत्र के जूतों को अपनी जीभ से चाटना’ राजनैतिक चाटुकारिता और व्यक्तिपूजा की उस संस्कृति को उजागर करता है, जहाँ योग्यता और जनसेवा की अपेक्षा सत्ता के निकट रहने और खुशामद करने को अधिक महत्व दिया जाता है। वहीं ‘राज्य कर्मचारियों को रिश्वत लेने की खुली छूट देना’ और ‘विपक्षियों को झूठे मुकदमों में फँसाना’ जैसे कथन प्रशासनिक भ्रष्टाचार तथा सत्ता के दुरुपयोग पर तीखा प्रहार करते हैं। सांख्यधर यह दिखाना चाहते हैं कि जब शासन का उद्देश्य जनकल्याण न होकर सत्ता की रक्षा बन जाता है, तब प्रशासन भ्रष्टाचार का संरक्षण करने लगता है और कानून राजनैतिक प्रतिशोध का हथियार बन जाता है।
कहा जा सकता है कि यह पूरा प्रसंग व्यंग्य के माध्यम से लोकतांत्रिक मूल्यों के क्षरण की भयावह तस्वीर प्रस्तुत करता है। सांख्यधर हास्य और अतिशयोक्ति का सहारा लेकर यह संदेश देते हैं कि यदि मुख्यमंत्री संविधान, जनता और नैतिक उत्तरदायित्व के बजाय केवल शीर्ष नेतृत्व की चापलूसी में लिप्त हो जाए, तो लोकतंत्र का वास्तविक स्वरूप नष्ट होकर वह केवल सत्ता-समर्थित तंत्र में परिवर्तित हो जाता है। यही इस व्यंग्य की सबसे बड़ी शक्ति है कि पाठक हँसते-हँसते व्यवस्था की गंभीर विसंगतियों पर सोचने के लिए विवश हो जाता है। इसी क्रम में मुख्यमंत्री की स्थिति का चित्रण करते हुए उसे केंद्र सरकार की ‘कठपुतली’ (पृ.132) बताया गया है। इस प्रकार सांख्यधर लोकतांत्रिक व्यवस्था की संरचना पर तीखा व्यंग्य करते हुए संकेत करते हैं कि जब सत्ता जनहित के बजाय स्वार्थ और नियंत्रण का साधन बन जाती है, तब लोकतंत्र का वास्तविक स्वरूप विकृत हो जाता है।
‘यक्ष के प्रश्न’ में महेश सांख्यधर का व्यंग्य अपने चरम पर पहुँच जाता है, जहाँ राजनीति की चालाकियों और सत्ता-लोलुप मानसिकता का बेबाक चित्रण मिलता है। युधिष्ठिर सत्ता में बने रहने का सबसे बड़ा मंत्र बताते हुए कहता है कि सदैव मुख्यमंत्री बने रहने का गुर है “भजनलाली हथकंडा।” (पृ.134)। इस एक वाक्यांश में दल-बदल, अवसरवाद और राजनैतिक जोड़-तोड़ की पूरी संस्कृति समाहित हो जाती है। आगे बढ़ते हुए सांख्यधर नेताओं के स्वभाव का बड़ा ही चुटीला वर्गीकरण प्रस्तुत करते हैं - “नेता चार प्रकार के होते हैं - अकड़, बकड़, जकड़ और छकड़। अकड़ अकड़ने वाला, जैसे चरण सिंह; बकड़ बकने वाला, जैसे राजनारायण; जकड़ जकड़े रहने वाला, जैसे इंदिरा गांधी और छकड़ - छकड़ा गाड़ी जैसे जगजीवन राम।” (पृ.134)। यह वर्गीकरण केवल हास्य उत्पन्न नहीं करता, बल्कि भारतीय राजनीति के विविध चरित्रों पर तीखा व्यंग्य भी करता है।
यक्ष जब कानून की परिभाषा पूछता है, तब युधिष्ठिर का उत्तर - “जो नेताओं द्वारा जनता के लिए बनाया जाता है और केवल भले आदमियों पर लागू होता है” - लोकतांत्रिक व्यवस्था में कानून के असमान अनुप्रयोग पर तीखा व्यंग्य है। सामान्यतः कानून का उद्देश्य सभी नागरिकों के लिए समान न्याय सुनिश्चित करना होता है, किंतु यहाँ कानून को ऐसी व्यवस्था के रूप में चित्रित किया गया है, जो केवल ईमानदार और साधारण नागरिकों पर कठोरता से लागू होती है, जबकि सत्ता और प्रभाव से जुड़े लोग उसके दायरे से बाहर बने रहते हैं। इस एक वाक्य के माध्यम से लेखक न्याय-व्यवस्था की उस विडंबना को उजागर करते हैं, जहाँ अपराधी प्रभावशाली होने के कारण बच निकलते हैं और नियमों का पालन करने वाले लोग ही कानून की कठोरता का सामना करते हैं।
इसी प्रकार, सत्य और झूठ की परिभाषा देते हुए युधिष्ठिर का यह कथन - नेता और मंत्री जो कुछ बोलते हैं, वही सत्य होता है और अन्य सब कुछ झूठ (पृ.132) - राजनैतिक सत्ता द्वारा सत्य के निर्माण पर तीखा कटाक्ष है। यहाँ सांख्यधर यह संकेत करते हैं कि लोकतंत्र में कभी-कभी सत्य का निर्धारण तथ्यों या नैतिकता से नहीं, बल्कि सत्ता की सुविधा और प्रचार-तंत्र से होने लगता है। सत्ता जिस बात को सत्य घोषित कर दे, वही आधिकारिक सत्य मान लिया जाता है, जबकि असहमति, आलोचना और वास्तविक तथ्य झूठ या दुष्प्रचार कहकर खारिज कर दिए जाते हैं। यह व्यंग्य केवल नेताओं की वाक्पटुता पर नहीं, बल्कि उस राजनैतिक संस्कृति पर प्रहार करता है जिसमें प्रचार वास्तविकता पर भारी पड़ने लगता है।
नाटक में युधिष्ठिर सत्ता के प्रति अपनी निर्भरता को भी बिना किसी संकोच के स्वीकार करता है। वह कहता है कि उसका वास्तविक रक्षक भीम या अर्जुन जैसे पराक्रमी भाई नहीं, बल्कि सत्ता है; क्योंकि सत्ता के बिना उसका कोई अस्तित्व नहीं बचेगा - “सत्ता के चले जाने पर मैं कहीं का नहीं रहूँगा।” (पृ.135)। यह स्वीकारोक्ति बताती है कि आधुनिक राजनीति में सिद्धांतों से अधिक महत्व सत्ता-सुरक्षा का हो गया है। युधिष्ठिर की इसी कूटनीतिक चतुराई, तर्क-कौशल और राजनैतिक व्यावहारिकता से प्रभावित होकर अंततः यक्ष उसे चुनाव-प्रचार की अनुमति दे देता है। इस प्रकार नाटक का यह प्रसंग लोकतंत्र की विडंबनाओं, नेताओं की सत्ता-केंद्रित मानसिकता और राजनैतिक नैतिकता के पतन पर तीखा, किंतु अत्यंत प्रभावशाली व्यंग्य प्रस्तुत करता है।
महेश सांख्यधर इन संवादों के माध्यम से पाठक को केवल हँसाते नहीं, बल्कि यह सोचने के लिए विवश कर देते हैं कि आदर्शों के नाम पर चल रही राजनीति वास्तव में किस दिशा में जा रही है। यही कारण है कि ‘यक्ष के प्रश्न’ केवल हँसी उत्पन्न करने वाला नाटक नहीं, बल्कि राजनैतिक व्यवस्था का निर्भीक और विचारोत्तेजक विश्लेषण भी है।
सांख्यधर ‘महाभारत’ के यक्ष-प्रश्नों को आधुनिक लोकतंत्र की विसंगतियों से जोड़कर यह स्थापित करते हैं कि आज की सबसे बड़ी त्रासदी केवल भ्रष्ट राजनीति नहीं, बल्कि कानून और सत्य जैसी मूलभूत लोकतांत्रिक अवधारणाओं का राजनैतिक स्वार्थ के अनुसार पुनर्परिभाषित हो जाना है। हास्य, विडंबना और अतिशयोक्ति के सहारे रचा गया यह संवाद पाठक को हँसाता अवश्य है, किंतु साथ ही उसे यह सोचने के लिए भी विवश कर देता है कि यदि कानून निष्पक्ष न रहे और सत्य सत्ता का उपकरण बन जाए, तो लोकतंत्र का नैतिक आधार ही संकट में पड़ जाता है। कहना होगा कि यही सांख्यधर के व्यंग्य की सबसे बड़ी साहित्यिक उपलब्धि है।
भय के साये में लोकतंत्र
महेश सांख्यधर का ‘वरदान’ मिथकीय कथा का केवल पुनर्पाठ नहीं, बल्कि समकालीन लोकतांत्रिक व्यवस्था का तीखा व्यंग्यात्मक पुनर्सृजन है। ‘रामायण’ के राम और जटायु के संवादों को आधार बनाकर लेखक ने वर्तमान राजनीति में नैतिक मूल्यों के निरंतर होते पतन को प्रभावशाली ढंग से उजागर किया है। वाल्मीकि ‘रामायण’ में राम और जटायु का प्रसंग करुणा, त्याग, कर्तव्य और मानवीय संवेदनाओं का अत्यंत मार्मिक चित्र प्रस्तुत करता है। जब रावण माता सीता का हरण कर पुष्पक विमान से लंका की ओर जा रहा था, तभी वृद्ध गिद्धराज जटायु ने इस अन्याय को देखकर उसे ललकारा। आयु और शक्ति दोनों में रावण से कमजोर होने के बावजूद जटायु ने धर्म की रक्षा के लिए प्राणों की बाज़ी लगा दी। उसने रावण के रथ को रोकने का साहस किया और भीषण युद्ध किया। अंततः रावण ने अपने तीक्ष्ण अस्त्र से जटायु के पंख काट दिए। घायल जटायु धरती पर गिर पड़ा, किंतु उसने अपने प्राण तब तक नहीं त्यागे, जब तक श्रीराम को सीता-हरण का समाचार न दे दिया।
वन में सीता की खोज करते हुए जब श्रीराम और लक्ष्मण की दृष्टि घायल जटायु पर पड़ी, तो वे पहले उसे शत्रु समझ बैठे। किंतु सत्य जानने पर राम का हृदय करुणा से भर उठा। जटायु ने अंतिम क्षणों में रावण की दिशा बताई और राम की गोद में ही प्राण त्याग दिए। श्रीराम ने उसे अपने पिता महाराज दशरथ के समान सम्मान दिया और पुत्रधर्म का निर्वाह करते हुए स्वयं उसका अंतिम संस्कार किया। यह प्रसंग केवल एक पक्षी के बलिदान की कथा नहीं, बल्कि इस सत्य का उद्घोष है कि धर्म और मानवता की रक्षा के लिए किया गया त्याग जाति, रूप और प्रजाति की सीमाओं से कहीं ऊपर होता है। यही कारण है कि जटायु भारतीय संस्कृति में साहस, निष्ठा और आत्मोत्सर्ग के अमर प्रतीक के रूप में स्मरण किए जाते हैं।
‘वरदान’ में महेश सांख्यधर ने जटायु को केवल राम का सहयोगी पक्षी नहीं रहने दिया है, बल्कि उसे एक निर्भीक सामाजिक-राजनैतिक चिंतक के रूप में रूपायित किया है। उसके संवादों में समकालीन व्यवस्था के प्रति असंतोष, व्यंग्य और गहरी वैचारिक चेतना एक साथ दिखाई देती है। जटायु राम से कहता है - “यह सतयुग नहीं, शठयुग है। आप बाप के आदेश से राज छोड़कर नंगे पाँव जंगल में भटक रहे हैं। दूसरा होता तो ऐसे बाप को कारागार में डाल देता। आप राजतंत्र की जगह प्रजातंत्र लाने के लिए लोगों को समझाते घूम रहे हैं...।” (पृ. 178)। इस संवाद में ‘सतयुग’ को ‘शठयुग’ कहना मात्र शब्दों का खेल नहीं, बल्कि वर्तमान युग की विडंबनाओं पर तीखा व्यंग्य है। लेखक संकेत करता है कि आदर्शों, त्याग और मर्यादा का स्थान अब स्वार्थ, सत्ता-लिप्सा और अधिकार-लोलुपता ने ले लिया है। जहाँ राम पिता की आज्ञा को धर्म मानकर राजसुख त्याग देते हैं, वहीं आज का मनुष्य अधिकारों की प्राप्ति के लिए नैतिक मर्यादाओं तक को भुला देता है। इस प्रकार राम के आदर्श चरित्र और आधुनिक मानसिकता के बीच का यह विरोध नाटक के व्यंग्य को और अधिक प्रभावशाली बना देता है।
इसी क्रम में जटायु का नेता और अभिनेता के संबंध में किया गया कटाक्ष नाटक की व्यंग्यात्मक चेतना को नई धार प्रदान करता है। वह कहता है - “नेता-अभिनेता के बारे में कुछ नहीं कहूँगा। इनके इतने मुखौटे होते हैं कि एकाध जन्म में तो पहचानना भी मुश्किल है।” (पृ.178)। यहाँ ‘मुखौटा’ छल, अवसरवाद और दोहरे व्यक्तित्व का सशक्त प्रतीक बन जाता है। सांख्यधर का आशय यह है कि आधुनिक सार्वजनिक जीवन में व्यक्ति का वास्तविक चेहरा पहचानना कठिन होता जा रहा है। नेता चुनाव के समय जनसेवक का मुखौटा पहनते हैं, सत्ता में आते ही उनका स्वरूप बदल जाता है। अभिनेता मंच और पर्दे पर अनेक भूमिकाएँ निभाते हैं, जबकि नेता वास्तविक जीवन में भी परिस्थितियों के अनुसार अपने चेहरे बदलते रहते हैं। इस व्यंग्य के माध्यम से लेखक लोकतांत्रिक राजनीति में बढ़ते पाखंड, नैतिक पतन और अवसरवाद को उजागर करते हैं। परिणामस्वरूप ‘वरदान’ केवल ‘रामायण’ के एक मिथकीय प्रसंग का नाट्यरूपांतरण नहीं रह जाता, बल्कि समकालीन लोकतंत्र और सार्वजनिक जीवन की विसंगतियों पर किया गया एक प्रखर सामाजिक-राजनैतिक मुठभेड़ बनकर सामने आता है।
बोलने की स्वतंत्रता संविधान द्वारा प्रदत्त हमारा मौलिक अधिकार है, किंतु विडंबना यह है कि व्यवहार में आम जन स्वयं को इस अधिकार से वंचित अनुभव करता है। सांख्यधर अपने नाटक ‘वरदान’ में जटायु के माध्यम से इस विरोधाभास पर तीखा प्रहार करते हैं। जटायु कटाक्ष करते हुए कहता है कि ‘यदि जनता को सचमुच निर्भीक होकर बोलने की स्वतंत्रता मिल जाए, तो वह किसी को भी नहीं छोड़ेगी- यहाँ तक कि भगवान राम भी उसकी आलोचना से अछूते नहीं रहें, तो सामान्य लोगों की क्या बिसात!’ इस व्यंग्यपूर्ण कथन के माध्यम से लेखक लोकतांत्रिक व्यवस्था की उस विडंबना को उजागर करते हैं, जहाँ अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता केवल कागज़ों तक सीमित प्रतीत होती है। स्थिति इतनी विसंगतिपूर्ण है कि जटायु इसे रामराज्य नहीं, बल्कि रावणराज्य (पृ.178) कहने से भी नहीं हिचकता। सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि जिन लोगों को जनता की समस्याएँ सुनने और उनका समाधान करने के लिए नियुक्त किया गया है, वही यदि सुनने को तैयार न हों, तो आम नागरिक अपनी पीड़ा किससे कहे? इस प्रकार सांख्यधर का यह व्यंग्य केवल बोलने की स्वतंत्रता पर नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक संस्थाओं की संवेदनहीनता और जनता की विवशता पर भी गहरा प्रहार करता है।
सांख्यधर जटायु के माध्यम से उस सामाजिक विडंबना को उजागर करते हैं, जहाँ ‘बेचारा’ दिखाई देने वाला व्यक्ति भी संदेह से परे नहीं रह गया है। जटायु का कटाक्ष है कि इस रावणराज्य में बेचारों पर विश्वास करना भी खतरे से खाली नहीं, क्योंकि “बेचारों ने ही देश की दुर्दशा की है।” (पृ.178)। यह कथन केवल किसी व्यक्ति विशेष पर नहीं, बल्कि उस व्यवस्था पर व्यंग्य है जहाँ ईमानदारी, नैतिकता और विश्वास जैसी मानवीय मूल्य-वृत्तियाँ निरंतर क्षीण होती जा रही हैं। स्थिति इतनी भयावह है कि मात्र दस-दस रुपये में ईमान का सौदा होने लगा है। रावण के आतंकवादी, उसके दूत और गुप्तचर (पृ.179) - सभी ऐसे तंत्र के प्रतीक बन जाते हैं, जिनका सबसे बड़ा हथियार धन के बल पर लोगों का विवेक और ईमान खरीद लेना है। रावण के आतंकवादी, रावण के दूत, गुप्तचर केवल पात्र नहीं, बल्कि उस भ्रष्ट व्यवस्था के रूपक हैं, जहाँ सत्य, निष्ठा और नैतिकता बाज़ार की वस्तु बन चुकी हैं। इस प्रकार सांख्यधर व्यंग्य के माध्यम से यह संकेत करते हैं कि जब ईमान बिकाऊ हो जाए, तब केवल शासन ही नहीं, पूरा समाज रावणराज्य में परिवर्तित हो जाता है।
महेश सांख्यधर अपने तीखे व्यंग्य के माध्यम से ऐसे भयग्रस्त सामाजिक वातावरण का चित्र उपस्थित करते हैं, जहाँ व्यक्ति खुलकर बोलने से भी डरने लगता है। हर शब्द पर मानो अदृश्य निगाहें टिकी हों और हर बातचीत पर किसी अनजान कान की पकड़ हो। जटायु की चिंता इसी मनःस्थिति को व्यक्त करती है - आख़िर कौन जाने, “किस पशु के सींग में सी.सी. कैमरा चिपका हो, किस वृक्ष में टेप रिकॉर्डर छिपा हो, किस पक्षी पर ऐंटीना फिट हो।” (पृ.179)। यह कथन केवल कल्पना नहीं, बल्कि उस निगरानी-प्रधान व्यवस्था का तीखा रूपक है, जिसमें व्यक्ति स्वयं को हर समय संदेह और भय के घेरे में पाता है। परिणामस्वरूप अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता केवल संवैधानिक अधिकार बनकर रह जाती है, जबकि व्यवहार में लोग अपने ही विचार प्रकट करने से कतराने लगते हैं। सांख्यधर इस व्यंग्य के माध्यम से संकेत करते हैं कि जब समाज में अविश्वास और निगरानी का वातावरण इतना गहरा हो जाए कि पशु, पक्षी और वृक्ष भी जासूस प्रतीत होने लगें, तब समझ लेना चाहिए कि भय ने स्वतंत्रता पर विजय प्राप्त कर ली है।
सांख्यधर के ‘वरदान’ में राम और जटायु के संवाद केवल पौराणिक पात्रों की बातचीत नहीं हैं, बल्कि समकालीन भारतीय समाज और लोकतांत्रिक व्यवस्था की गहन पड़ताल भी हैं। लेखक संकेत करते हैं कि जिस समाज की पहचान कभी सभ्यता, संस्कृति, राष्ट्रभावना, भाईचारे और पारस्परिक विश्वास जैसे जीवन-मूल्यों से होती थी, वही आज दुर्बलता, आपसी कलह, व्यक्तिवाद, जातिवाद, भ्रष्टाचार, गरीबी, ईर्ष्या, द्वेष और हीनभावना के बोझ तले अपनी नैतिक पहचान खोता जा रहा है। परिणामस्वरूप सामाजिक चेतना बिखर रही है और लोकतंत्र की आत्मा निरंतर क्षीण होती दिखाई देती है।
ऐसी विषम परिस्थितियों में राम आशा का स्वर बनकर उभरते हैं। वे स्पष्ट करते हैं कि उनका उद्देश्य केवल रावण का वध नहीं, बल्कि जनतंत्र की पुनर्स्थापना है। उनके लिए रावणराज्य किसी एक शासक का नहीं, बल्कि निरंकुश, दमनकारी और अनैतिक राजतंत्र का प्रतीक है। इसलिए उसका अंत केवल शस्त्रबल से नहीं, बल्कि नैतिक जागरण और जनचेतना के उत्थान से संभव है। राम का विश्वास है कि वास्तविक शक्ति सिंहासन में नहीं, जनता में ही निहित है। जब जनशक्ति जागृत होती है, तब एक नहीं, हजारों रावण भी उसके सामने टिक नहीं सकते। किंतु राम के इस आदर्शवादी विश्वास के समानांतर जटायु यथार्थ का कठोर चित्र उपस्थित करता है। वह निःसंकोच स्वीकार करता है कि लोगों के मन में भय इस सीमा तक घर कर चुका है कि वे अन्याय का विरोध करने की कल्पना मात्र से सिहर उठते हैं। लोकतंत्र पर उनका विश्वास डगमगा चुका है और भय उनके व्यक्तित्व का स्थायी भाव बन गया है। ऐसी मानसिकता में अन्याय के विरुद्ध संघर्ष करने का साहस क्षीण पड़ जाता है और मौन ही जीवन की सबसे सुरक्षित रणनीति प्रतीत होने लगता है।
सांख्यधर इस प्रकार राम के आदर्श और जटायु के यथार्थ को आमने-सामने रखकर एक गहन व्यंग्यात्मक द्वंद्व रचते हैं। एक ओर जनशक्ति और नैतिक पुनर्जागरण की आशा है, तो दूसरी ओर भय, निराशा और अविश्वास से जकड़ा समाज। यही द्वंद्व नाटक को समकालीन संदर्भों में अत्यंत प्रासंगिक बनाता है और पाठक को यह सोचने के लिए विवश करता है कि लोकतंत्र की वास्तविक रक्षा केवल संविधान से नहीं, बल्कि निर्भीक, जागरूक और नैतिक नागरिकों से ही संभव है।
सांख्यधर के ‘वरदान’ में राम का चरित्र पारंपरिक दैवी नायक की सीमाओं से निकलकर एक जागरूक, उत्तरदायी और लोकतांत्रिक नागरिक के रूप में सामने आता है। वे स्वयं को किसी अलौकिक शक्ति का स्वामी नहीं, बल्कि एक साधारण नागरिक बताते हैं। उनका विश्वास है कि समाज का वास्तविक परिवर्तन किसी एक ‘सुपरमैन’ के हाथों नहीं, बल्कि जागरूक और संगठित जनशक्ति से संभव है। इसलिए वे कहते हैं कि उनका कार्य साधारण नागरिकों को संगठित करना और स्वयं को असाधारण समझने वाले ‘सुपरमैनों’ को पुनः साधारण जन के स्तर पर लाना है (पृ.180)। यही उनके लिए सच्ची लोकसेवा और राष्ट्रनिर्माण का मार्ग है जिसे परशुराम ने प्रारंभ किया।
इसी प्रसंग में कथा एक रोचक मोड़ लेती है। जटायु के मन में यह संशय उठता है कि कहीं राम और परशुराम एक-दूसरे के प्रतिद्वंद्वी तो नहीं। किंतु राम इस भ्रम को सहज मुस्कान के साथ दूर करते हैं। वे स्पष्ट करते हैं कि वे परशुराम के विरोधी नहीं, बल्कि उनके स्वप्न और संकल्प के उत्तराधिकारी हैं। उनके शब्दों में परशुराम ने उस युग में राजतंत्र के उन्मूलन का अभियान प्रारंभ किया था। उन्होंने अत्याचारी राजाओं के वर्चस्व को समाप्त कर सत्ता को जनता के अधिकार के रूप में स्थापित करने का प्रयास किया। जब आयु ने उनका साथ छोड़ना शुरू किया, तब उन्होंने शिव-धनुष भंग की घटना के माध्यम से अपने योग्य उत्तराधिकारी की परीक्षा ली। राम के अनुसार, धनुष-भंग केवल पराक्रम का प्रदर्शन नहीं था, बल्कि जनतांत्रिक चेतना के अगले वाहक के चयन का प्रतीक था।
इस प्रकार राम स्वयं को परशुराम की अधूरी यात्रा का सहयात्री मानते हैं। वे शस्त्र के बल पर नहीं, बल्कि जनसंगठन, नैतिक चेतना और लोकशक्ति के माध्यम से राजतंत्र की मानसिकता को समाप्त करने का संकल्प लेकर आगे बढ़ते हैं। सांख्यधर इस पुनर्पाठ के माध्यम से राम और परशुराम के संबंध को प्रतिस्पर्धा का नहीं, बल्कि वैचारिक उत्तराधिकार का रूप प्रदान करते हैं। यहाँ राम एक ऐसे नेतृत्व के प्रतीक बन जाते हैं, जो सत्ता प्राप्त करने के लिए नहीं, बल्कि सत्ता को जनता के हाथों सौंपने और लोकतांत्रिक मूल्यों को सुदृढ़ करने के लिए संघर्षरत है।
महेश सांख्यधर ‘वरदान’ में रावण के खुफिया तंत्र का चित्रण केवल एक पौराणिक राज्य की प्रशासनिक व्यवस्था के रूप में नहीं करते, बल्कि उसे आतंक और निगरानी पर आधारित सत्ता-तंत्र के रूपक के रूप में प्रस्तुत करते हैं। जटायु राम को सावधान करते हुए बताता है कि रावण का जासूसी नेटवर्क इतना व्यापक और सशक्त है कि कोई भी गतिविधि उसकी दृष्टि से ओझल नहीं रह सकती। वह कहता है - “रावण का खुफिया तंत्र इतना गहन है कि पल-पल कल-कल की सूचना उसे रहती है। … जो उसे स्वीकार नहीं करता, काट दिया जाता है, जड़ से उखाड़ फेंका जाता है। हमारी बातचीत सीधी रावण के कंट्रोल रूम में पहुँचती है। आपके घर से चलने से पूर्व ही रावण को यह सब सूचना मिल गई थी।” (पृ.181)। इस कथन में केवल आश्चर्य नहीं, बल्कि भय और असुरक्षा का गहरा बोध भी निहित है।
यहाँ रावण का खुफिया तंत्र आतंकवादी मानसिकता से संचालित उस दमनकारी व्यवस्था का प्रतीक बन जाता है, जो जनता को हथियारों से पहले भय के माध्यम से नियंत्रित करती है। ऐसी व्यवस्था में हर व्यक्ति स्वयं को निगरानी के घेरे में पाता है; हर शब्द संदिग्ध हो जाता है और हर संवाद पर अदृश्य पहरेदारों की छाया मंडराती रहती है। आतंक का सबसे प्रभावी हथियार यही होता है कि लोग विरोध करने से पहले ही भयभीत हो जाएँ। सांख्यधर इसी मनोविज्ञान को रावण के गुप्तचर तंत्र के माध्यम से उजागर करते हैं।
अतः कहा जा सकता है कि इस प्रकार रावण केवल एक पौराणिक खलनायक नहीं रह जाता, बल्कि वह उस समूची आतंकवादी और निरंकुश प्रवृत्ति का प्रतीक बन जाता है, जिसकी शक्ति केवल शस्त्रों में नहीं, बल्कि सूचना-संग्रह, निगरानी, भय और मनोवैज्ञानिक दबाव में बखूबी निहित है। लेखक संकेत करते हैं कि जब सत्ता का खुफिया तंत्र जनता की सुरक्षा के बजाय उन्हें भयभीत और नियंत्रित करने का माध्यम बन जाए, तब वह लोकतंत्र नहीं, बल्कि आतंक के साये में जीने वाली व्यवस्था का रूप धारण कर लेता है।
‘वरदान’ नाटक में लेखक जटायु और राम के संवाद के माध्यम से भ्रष्ट व्यवस्था की जड़ों पर अत्यंत मार्मिक और विचारोत्तेजक टिप्पणी करते हैं। जटायु व्यथित स्वर में उस सामाजिक यथार्थ का चित्र खींचता है जहाँ कानून का भय केवल सामान्य नागरिक के लिए रह गया है, जबकि दलाल और गुंडे खुलेआम राइफलें लहराते हुए घूमते हैं और व्यवस्था मूकदर्शक बनी रहती है। उसकी पीड़ा केवल अपराधियों के साहस की नहीं, बल्कि शासन-तंत्र की निष्क्रियता और मिलीभगत की भी है। जटायु की इस व्यथा पर राम का उत्तर नाटक को एक गहरी वैचारिक ऊँचाई प्रदान करता है। वे समस्या का कारण किसी एक व्यक्ति के चरित्र में नहीं, बल्कि पूरी व्यवस्था की संरचना में खोजते हैं। राम स्पष्ट कहते हैं कि व्यक्ति जन्म से भ्रष्ट नहीं होता, भ्रष्ट तो तंत्र होता है। जब व्यवस्था ही अनैतिकता, पक्षपात और स्वार्थ पर आधारित हो जाए, तब ईमानदार व्यक्ति के लिए उसमें टिके रहना असंभव-सा हो जाता है। इसके विपरीत यदि तंत्र पारदर्शी, न्यायपूर्ण और नैतिक हो, तो भ्रष्ट व्यक्ति स्वयं ही वहाँ टिक नहीं सकता। (पृ.182)
सांख्यधर भ्रष्टाचार को केवल व्यक्तिगत नैतिक पतन का परिणाम नहीं मानते, बल्कि उसे व्यवस्था की विफलता के रूप में देखते हैं। उनके अनुसार अपराधियों का निर्भय होकर हथियारों के साथ घूमना केवल कानून-व्यवस्था की कमजोरी नहीं, बल्कि उस तंत्र का प्रमाण है जिसने अपराध और सत्ता के बीच की दूरी मिटा दी है। राम के विचार इस सत्य को रेखांकित करते हैं कि समाज का वास्तविक परिवर्तन केवल व्यक्तियों को बदलने से नहीं, बल्कि व्यवस्था को नैतिक, उत्तरदायी और जनोन्मुख बनाने से ही संभव है। यही इस संवाद का सबसे सशक्त और दूरगामी संदेश है।
‘वरदान’ में महेश सांख्यधर जटायु और राम के संवाद के माध्यम से लोकतंत्र की स्थापना के साथ जुड़ी आशाओं और उसके भविष्य में उत्पन्न होने वाली विडंबनाओं का अत्यंत दूरदर्शी चित्र प्रस्तुत करते हैं। जटायु का यह कथन कि “लोग रामराज्य से नहीं, रावणराज्य से डरते हैं; भय मरने का नहीं, जीने का है” (पृ.183) केवल एक भावात्मक अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि उस समाज की मानसिक स्थिति का सटीक चित्रण है, जहाँ भय जीवन का स्वाभाविक अंग बन चुका है। यहाँ रावण केवल एक व्यक्ति नहीं, बल्कि दमन, आतंक, अविश्वास और निरंकुश सत्ता का प्रतीक है। उसका नाम लेते ही लोगों का विश्वास डगमगा जाता है और साहस मौन में बदल जाता है।
इसके विपरीत राम एक ऐसे भविष्य का स्वप्न देखते हैं जहाँ राजतंत्र का अंत होगा और प्रजातंत्र की स्थापना के साथ शासन में समाज के प्रत्येक वर्ग और क्षेत्र को समान प्रतिनिधित्व मिलेगा। यह केवल सत्ता-परिवर्तन का नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय, सहभागिता और समान अवसरों पर आधारित लोकतांत्रिक व्यवस्था का स्वप्न है। राम का विश्वास है कि जब शासन जनता का होगा, तब भय का स्थान विश्वास लेगा और सत्ता विशेषाधिकार नहीं, बल्कि उत्तरदायित्व का माध्यम बनेगी। किंतु सांख्यधर यहीं नहीं रुकते। वे भविष्य की एक नई विडंबना का संकेत भी देते हैं। जब जटायु अपनी जाति के भविष्य को लेकर प्रश्न करता है, तब राम का उत्तर अत्यंत अर्थगर्भित है। वे कहते हैं कि एक समय ऐसा आएगा जब जातियों की पारंपरिक पहचान और उनके बाहरी चिह्न इतिहास के पन्नों में सिमट जाएँगे, परंतु विडंबना यह होगी कि जातिवाद जीवित रहेगा। अर्थात् जाति का सामाजिक स्वरूप भले बदल जाए, उसकी राजनैतिक उपयोगिता समाप्त नहीं होगी। यही जातिवाद आगे चलकर ऐसी घुटनभरी राजनीति को जन्म देगा, जिसमें समाज को जोड़ने के बजाय वोटों के गणित के लिए बार-बार विभाजित किया जाएगा। (पृ.184)
यदि इस संवाद को आज के सामाजिक-राजनैतिक परिदृश्य में पढ़ें, तो सांख्यधर की दूरदृष्टि विस्मित करती है। आज संविधान समानता और सामाजिक न्याय की बात करता है, शिक्षा और शहरीकरण ने अनेक पारंपरिक सीमाओं को कमजोर भी किया है, फिर भी चुनावी राजनीति में जातीय समीकरण, पहचान की राजनीति और सामाजिक ध्रुवीकरण बार-बार प्रमुख मुद्दे बनकर उभरते हैं। अनेक बार नागरिक की पहचान उसकी योग्यता, विचार या नागरिकता से अधिक उसकी जातीय या सामुदायिक पहचान के आधार पर निर्धारित की जाने लगती है। इस प्रकार लोकतंत्र का उद्देश्य जहाँ नागरिकों को एक सूत्र में बाँधना था, वहीं संकीर्ण राजनैतिक स्वार्थ उसे खाँचों में विभाजित करने का प्रयास करते दिखाई देते हैं।
महेश सांख्यधर का व्यंग्य इसी अंतर्विरोध को उजागर करता है। वे यह नहीं कहते कि लोकतंत्र असफल है, बल्कि यह चेतावनी देते हैं कि यदि लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा नहीं की गई, तो राजतंत्र की निरंकुशता का स्थान पहचान-आधारित राजनीति ले सकती है। इसलिए उनके राम केवल शासन-परिवर्तन का संदेश नहीं देते, बल्कि ऐसी लोकतांत्रिक चेतना का आह्वान करते हैं, जहाँ नागरिक की पहचान उसकी जाति नहीं, उसका चरित्र, उसकी संवेदनशीलता और राष्ट्र के प्रति उसकी प्रतिबद्धता हो। यही संदेश ‘वरदान’ को आज भी उतना ही प्रासंगिक बनाता है, जितना उसके रचनाकाल में था।
कहा जा सकता है कि नाटक में जटायु केवल सीता-हरण का साक्षी नहीं रह जाता, बल्कि लोकतंत्र का सजग प्रहरी बनकर सत्ता से असहज प्रश्न करता है। वहीं राम के संवाद आदर्श शासन और जनकल्याणकारी राजनीति की अवधारणा को सामने रखते हैं। इन दोनों पात्रों के संवादों के माध्यम से सांख्यधर यह संकेत करते हैं कि जब सत्ता सेवा के स्थान पर स्वार्थ का माध्यम बन जाती है, तब लोकतांत्रिक मूल्यों का क्षरण अवश्यंभावी हो जाता है। इस प्रकार ‘वरदान’ अतीत और वर्तमान के बीच एक ऐसा सशक्त सेतु निर्मित करता है, जो पाठक को लोकतंत्र की वास्तविक आत्मा, राजनीतिक नैतिकता और मानवीय मूल्यों पर गंभीर आत्ममंथन के लिए प्रेरित करता है।
मिथक की आँखों से वर्तमान का सच
समग्र अध्ययन से स्पष्ट होता है कि महेश सांख्यधर ने ‘रामायण’ और ‘महाभारत’ के पात्रों और प्रसंगों का उपयोग केवल पौराणिक कथा के पुनर्पाठ के लिए नहीं, बल्कि समकालीन भारतीय समाज, राजनीति और लोकतांत्रिक व्यवस्था की विसंगतियों को उद्घाटित करने के लिए किया है। उनके राम आदर्शवादी राजा नहीं, बल्कि जागरूक नागरिक और लोकतांत्रिक चेतना के वाहक हैं, जबकि जटायु सामान्य जन की पीड़ा, आशंका, भय और विवशता का प्रतिनिधि बनकर उभरता है। दोनों के संवादों में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, भ्रष्ट तंत्र, आतंकवाद, निगरानी-व्यवस्था, जातिवाद, नैतिक पतन, जनशक्ति और लोकतांत्रिक मूल्यों जैसे प्रश्न अत्यंत प्रभावशाली ढंग से उभरते हैं। सांख्यधर का व्यंग्य किसी व्यक्ति या सत्ता-विशेष पर नहीं, बल्कि उन प्रवृत्तियों पर केंद्रित है, जो लोकतंत्र की आत्मा को भीतर ही भीतर क्षीण करती रहती हैं। इसी कारण उनका नाटक मिथकीय कथा से आगे बढ़कर समकालीन यथार्थ का सशक्त राजनैतिक और सामाजिक आख्यान बन जाता है।
‘यक्ष के प्रश्न में’ यक्ष-युधिष्ठिर संवाद के माध्यम से लोकतंत्र, न्याय, कानून, सत्ता, नैतिकता, भ्रष्टाचार और सामाजिक विडंबनाओं पर तीखा व्यंग्य किया गया है, वहीं ‘गुरु दक्षिणा’ में द्रोणाचार्य-एकलव्य प्रसंग का पुनर्पाठ शिक्षा-व्यवस्था, सामाजिक विषमता, प्रतिभा के दमन, अवसरों की असमानता तथा गुरु-शिष्य संबंधों में व्याप्त सत्ता-चेतना को उद्घाटित करता है। दोनों नाटकों में मिथक वर्तमान का दर्पण बनकर सामने आता है, जहाँ प्राचीन पात्र समकालीन मनुष्य की समस्याओं, संघर्षों और अंतर्द्वंद्वों के प्रतिनिधि बन जाते हैं। सांख्यधर इतिहास और वर्तमान के बीच ऐसा सृजनात्मक सेतु निर्मित करते हैं, जो पाठक को केवल अतीत का स्मरण नहीं कराता, बल्कि वर्तमान की विसंगतियों से भी सीधा साक्षात्कार कराता है।
इन नाटकों का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि महेश सांख्यधर व्यंग्य को केवल हास्य या कटाक्ष का माध्यम नहीं रहने देते, बल्कि उसे सामाजिक परिवर्तन की चेतना से जोड़ देते हैं। उनके पात्र प्रश्न उठाते हैं, स्थापित मान्यताओं को चुनौती देते हैं और पाठक को आत्ममंथन के लिए प्रेरित करते हैं। ‘यक्ष के प्रश्न’ लोकतंत्र और नैतिक मूल्यों की पुनर्समीक्षा की माँग करता है, जबकि ‘गुरु दक्षिणा’ समानता, न्याय और मानवीय गरिमा पर आधारित शिक्षा-व्यवस्था की आवश्यकता को रेखांकित करता है। इस प्रकार दोनों नाटक यह सिद्ध करते हैं कि मिथक तभी जीवंत रहता है, जब वह अपने समय के प्रश्नों से संवाद करता है। सांख्यधर का मिथकीय पुनर्पाठ इसी अर्थ में समकालीन हिंदी नाटक को नई वैचारिक दृष्टि प्रदान करता है और यह स्थापित करता है कि साहित्य का वास्तविक उद्देश्य केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना का विस्तार और मानवीय मूल्यों की पुनर्स्थापना भी है।


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