समय, स्थान, और ऊर्जा ये वो तीन चीजें है जो इस पूरे संसार को चलाती है , नियंत्रित करती है।
समय, स्थान और ऊर्जा — (सदाशिव, महाविष्णु और पराशक्ति)
समय, स्थान, और ऊर्जा ये वो तीन चीजें है जो इस पूरे संसार को चलाती है , नियंत्रित करती है। आधुनिक भौतिक विज्ञान अभी भी इन्हें समझने की कोशिश कर रहा है, परंतु समझ नहीं सका है । मुझे लगता है कि इसका एक ही कारण है , वैज्ञानिकों को लगता है कि ये चीजें जीवित नहीं है । मुझे ऐसा बिल्कुल नहीं लगता और न ही हमारे पुराने वैज्ञानिकों को लगता था , ये पुराने वैज्ञानिक हमारे ऋषि, मुनि और तपस्वी थे। ये वो लोग थे जिन्होंने अपने शरीर और इस संसार को एक माना था । इन्होंने अपने आपको इस ब्रह्मांड से जोड़ लिया था और उस महासत्य को जान लिया था जिसे आजके वैज्ञानिक अपनाना नहीं चाहते । समय, स्थान और ऊर्जा तीनों ही जीवित चीजें है, इनमें प्राण है, जैसे आपमें है। वास्तविकता में यही सारे जीवन का, सारे प्राण का केंद्र है , वही वो जीवन है जो आपके और मेरे अंदर है। यही वो सूक्ष्म और स्थूल जीवन (micro and macro life) है, जिसे हम हर पल महसूस करते है। और कभी कभी नहीं भी करते , कुछ बड़ी ही आसानी से महसूस कर पाते है तो कुछ कभी नहीं कर पाते।
जब ऋषियों को इसका पता चला तो उन्होंने इन्हें पूजना शुरू कर दिया , उस समय कोई मूर्तियां नहीं होती थी क्योंकि किसी ने भी समय, स्थान और ऊर्जा को देखा नहीं था । लोगों को बस ये चीज़ पता चली थी कि कुछ ऐसा जो उनके इतने पास और इतने दूर दोनों एक साथ है , वही कुछ या तीन चीजें, जीवित है । उन लोगों की जागरूकता बढ़ गई थी । क्योंकि समय, स्थान और ऊर्जा हर जगह है , कभी खत्म नहीं होती, और सब कुछ वही करती है। तो जब लोगों को पता चला कि ये चीजें जिंदा है , तो उन्होंने अपनी समस्याओं का हल इनसे मांगना शुरू कर दिया । अब ये चीजें जीवित तो थी , जीवित कहने का अर्थ ये नहीं कि इनका शरीर था, या ये भी हमारी तरह दिखती थी, बिल्कुल नहीं ऐसा नहीं है, जीवित का अर्थ है ये चीजें जागरूक थी । समय एक जागरूक तत्व है जो चलता रहता है, स्थान जो उसे स्थिरता देता है वो भी एक जागरूक तत्व है और ऊर्जा जो इनदोनों को कर्मक या सक्रिय (active) बनाती है, या इनदोनों के लिए अतिआवश्यक है, वो भी एक जागरूक तत्व है।
अब इन तीन चीजों को लोगों ने अपनी इच्छा अनुसार रूप दिया, इंसान की कल्पना की शक्ति बड़ी प्रबल है , उसने उन न दिखने वाली चीजों को देखना शुरू कर दिया, अपनी कल्पना में। अब आप मुझ पर गुस्सा होंगे पर यही सत्य है ,मै यहाँ ईश्वर के निराकार होने की बात कर रहा हूँ। आपको क्या लगता है आप समय, स्थान और ऊर्जा को देख सकते है, नहीं ऐसा संभव नहीं है ,ये कोई दिखने वाली चीज़ बिल्कुल नहीं है। आप इन्हें महसूस करते है, आप जागरूकता के एक स्तर से इन्हें लहरों,तरंगों, या एक आयाम (dimension) के रूप में देख सकते है, परंतु तब भी इनका कोई रूप नहीं है। वक्त के साथ मानव और जागरूक हुआ पर ऐसा सब के साथ नहीं था, कुछ मूर्ख ही रहे और अपने पूर्वजों यानी बंदरों की तरह ही जागरूक लोगों की देखा देखी करने लगे। आपको नहीं पता वो इंसान ऐसा क्यों कर रहा है, आपको नहीं पता उसने क्या अनुभव किया है ,कैसे अनुभव किया है , पर आप वही चीज़ करते है ताकि आप भी वो आनंद प्राप्त कर सके जो उसके पास है। हम इसपर कभी और बात करेंगे यह भी एक अच्छा विषय है ,पर अपने विषय पर वापस आते है । तो समय, स्थान, और ऊर्जा, इनमें एक खास ताल मेल है, समय और स्थान (time and space) ये दो आयाम (dimension) है , वही ऊर्जा इनदोनों ही आयामों में आवश्यकता के अनुसार फैली हुई है । समय और स्थान दोनों आपस में कुछ जगहों पर मिले हुआ है , इन कुछ खास जगहों पर ही निर्माण हुआ है , वही ये संसार है ,पर ये सब ऊर्जा के बिना संभव नहीं है , ऊर्जा वहाँ मौजूद है। परंतु अधिकांश जगहों पर ये तीनों अलग अलग ही है ,आपस में मिलते नहीं , पर जागरूक है और हमेशा जुड़े हुये है।
जिन लोगों को इनका एहसास हुआ है ये अपने अनुभवों को लिखते रहे है, और हर अनुभव के साथ एक नई कहानी का जनम होता है। अपने वो बात तो सुनी होगी,” जब कोई बात किसी एक कान से दूसरे कान तक जाती है तो वो थोड़ी बदल जाती है” , बस यही हुआ उन अनुभवों के साथ । जो जागरूक हुआ था वो अपनी बात कह कर चला गया , दूसरों ने उसे बहुत बढ़ा चढ़ा कर बोला, दिखाने वालों को तो समझ ही नहीं आया कि वो समय , स्थान और ऊर्जा को कैसे दिखाएंगे ,अपने कटक और कहानियों में , अपने चित्रों में । और तब जा कर शुरू हुआ एक महासुंदर महाविनाश , ये तीन जीवित चीजें ,जो किसी को नहीं दिखती , चित्रों में दिखने लगी, परंतु ये अच्छा और बुरा दोनों एक साथ था । ऐसा मैंने इसलिए कहा क्योंकि ,महासुंदर क्योंकि अब जो नहीं जानता वो जानना चाहता है ,और अब इसे मानने लगा है , पहचानने लगा है, महाविनाश क्योंकि जिसे कोई मतलब नहीं है वो बस चीजों को बंदरों की तरह कर रहा है ,बिना किसी जागरूकता या आंतरिक इच्छा के, और इससे हो रहे अनुभव से भी वो अनजान रहना चाहता है । तो अब लोग और जागरूक है , उन्हें कुछ और भी पता चला समय और स्थान बदलते नहीं , ये वैसे के वैसे ही रहते है परंतु ऊर्जा बदलती रहती है ,कम-ज्यादा होती रहती है, अपने रूप बदलती है । लोगों को इन चीजों को दिखाना तो था ही, तो उन्होंने इनको दो आदमी और एक औरत के रूप में दिखाया , अब ऐसा क्यों , इसका उत्तर बहुत सरल है उनके पास यही था; आदमी ,औरत, जानवर, पक्षी, पौधे, और भी सारी चीजें जो वो देख सकते थे। उन दिनों मोटरसाइकिल नहीं थी तो आपको किसी भी ग्रंथ में मोटरसाइकिल वाले भगवान का कोई दर्शन नहीं मिलेगा। तो समय (time) ये आदमी शांत है परंतु गंभीर हो सकता है , जैसा कि हम कहते है “समय आज अच्छा है तो कल खराब भी हो सकता है” , समय के साथ हर चीज़ खत्म हो जाती है , समय ही असली विनाशक है , ये एक बड़े स्तर की बात है।
स्थान (space) , आपलोग सोच रहे होंगे कि मैंने “space” के लिए अंतरिक्ष शब्द का प्रयोग क्यों नहीं किया। तो मै आपको इसका उत्तर दे देता हूँ , इसका कारण यही है कि अंतरिक्ष से आप एक सीमा (boundary) का निर्माण करते है , परंतु स्थान हर जगह को कहा जा सकता है , इस शब्द की कोई सीमा नहीं है। तो स्थान ये आदमी सब अपना सकता है , अनंत है, ये खत्म नहीं होता , एक खाली जगह है , इसमें सब कुछ आ सकता है , और तब भी ये खाली ही होगा । ऊर्जा (energy) ये एक औरत है, जो हर समय और स्थान में है , इसकी जरूरत सब को है, यही सब कुछ करती है , बिना इसके वे दोनों आदमी पूरी तरह निष्क्रिय है। परंतु ये औरत हर पल बदलती है ,ये एक जैसी नहीं रहती , और दोनों आयामों समय और स्थान के साथ अलग अलग तरह से रहती है। अगर हम इसे समय के साथ देखे तो पाएंगे कि यह वहाँ बहुत तीव्रता (intensity) के साथ है, वही स्थान के साथ ये उतनी तीव्रता में नहीं रहती । इसका एक कारण है जो मुझे लगता है , समय एक ऐसी चीज़ है जिसे सब कुछ खत्म करना होता है, या तो हम कह सकते है कि ये चलता है , चलने के लिए ज्यादा ऊर्जा चाहिए , तो यहाँ ऊर्जा थोड़ी तीव्र है। जब हम स्थान की बात करते है तो यह चलता नहीं है, ये फैलता (expand) है, और फैलने में उतनी ऊर्जा नहीं चाहिए । आप इसे खुद देख सकते है जब आपको चलना हो तो आपको ज्यादा ऊर्जा की जरूरत होती है , परंतु जब आप किसी जगह लेट जाते है तब उतनी ऊर्जा की जरूरत नहीं होती। आप खाने के बाद बिस्तर पर फैल जाते है ,इसमें उतनी ऊर्जा नहीं लगती। तो अब तक मैंने आपको तीन चीजों से दो आदमी और एक औरत तक पहुँचा दिया है , अब आगे हम देखते है कि कैसे ये सब, जो इतना सरल (simple) था वो इतना जटिल (complex) कैसे हो गया। बिना किसी जटिल शब्दों के मै आपको सीधा उत्तर देता हूँ , इंसान मूर्खता में अनादित होता है, सब नहीं परंतु ज्यादातर लोग ऐसे ही है। क्योंकि आप नहीं समझ पाए कि समय, स्थान और ऊर्जा जीवित है या जागरूक है। तो आपने उनको अपनी तरह इंसान के रूप में मान लिया , परंतु आप जानते थे कि ये इंसान नहीं है , पर आपको सब को जागरूक करना था , बच्चों को भी । तो आपने कहानियों में उनको समझाना शुरू कर दिया, कि कुछ लोग है जो हमसे ज्यादा शक्तिशाली है । आप बच्चों और मूर्खों को समय ,स्थान और ऊर्जा के बारे में नहीं समझा सकते ये इसे नहीं जान पाएंगे , उनके पहले प्रश्न होंगे ये कहाँ है और कैसे दिखते है ।
साधारण इंसान इसी तरह सोचता है , जो दिखता है वही है , जो नहीं दिखता वो नहीं है । तो गुरुओं को इसे समझाने में बहुत दिक्कत होने लगी । तो उन्होंने सोचा क्यों न इन चीजों का मानवीकरण (personification) कर दिया जाये, और हर घटना (phenomenon) को रूपांतरित कर दिया जाये , यानी कोई दूसरा रूप दे दिया जाये , रूपक (metaphor)। अब असली तमाशा शुरू हुआ, गुरुओं ने सोचा कि बच्चों को समझाने के लिए ये ठीक होगा और जब ये बड़े होंगे तो खुद ही इन कहानियों पर प्रश्न करेंगे और अपने आप ही जागरूक हो जाएंगे । परंतु ऐसा नहीं हुआ आलसी और सुस्त लोग बेवकूफों की तरह हर चीज़ को सच मान बैठे। ऐसा नहीं है कि समय , स्थान और ऊर्जा जीवित नहीं है ,बिल्कुल ये और उनके मिलन से जो कुछ भी आगे आता है ,बनता है , वो सब कुछ जीवित है और असली है , बस वो इंसान की तरह नहीं है । उन सभी में चेतना और भावना है , और ये मिलकर काम करते है , एक व्यवस्था (system) में काम करते है । परंतु ये वैसा कुछ भी नहीं जो आप कल्पना कर रहे है, आपको बचपन में समझाने के लिए वो चीजें कही गई थी; देवी, देवता, राक्षस, आत्मा, औरभी सारी चीजें। जीहाँ आत्मा भी बस आपको समझाने के लिए था, वैसा कुछ नहीं, अब आप मुझे एक पागल की तरह मानेंगे , लेकिन ये मेरा निजी अनुभव है। आत्मा उस “कुछ नहीं” को कहा गया है (nothingness), ये दिखती नहीं , इसे बस महसूस किया जाता है,ये वो खालीपन है जो आपके अंदर है, पहले आपको इससे डर लगेगा। आपको खालीपन अच्छा नहीं लगेगा , पर वास्तविकता में आपने अपनी आत्मा को महसूस किया है।
हम जब बहुत भावुक होते है, तोही इसे महसूस करते है । प्रकृति , जो आपकी भावनाओं का प्रतीक है , जब अपने चरम पर होती है । तभी आपके अंदर का ब्रह्म , चेतना (consciousness) भी अपने चरम पर आती है, और आपको एक खालीपन का एहसास होता है। अधिकांश लोग इससे डरते है, क्योंकि यह पहली बार है। परंतु एक दो बार के बाद आपका डर खत्म हो जाता है , और फिर एहसास होता है कि वही सत्य है । यह खालीपन ही आत्मा है , हम फिर एक और महाविषय की ओर जा रहे है, अब रुक जाते है , आत्मा पर चर्चा किसी और दिन। अपने विषय पर आते है, तो अब तक हमने देखा कि कैसे महाविनाश हुआ समय, स्थान और ऊर्जा का , देखिये अगर एक सरल बात को इतना जटिल कर दिया जाये कि लोग आपस में लड़ने लगे, तो ये एक महाविनाश ही है। मानवीकरण ने सब कुछ बिगाड़ दिया , जिसे जो आदमी पसंद आया उसने उसे ही सब कुछ मान लिया, और कुछ को औरत पसंद आगयी तो उन्होंने उसीको सब कुछ मान लिया। और फिर हुआ निर्माण त्रिमूर्ति का सदाशिव, महाविष्णु, और पराशक्ति का यही समय, स्थान और ऊर्जा है। अब आप मेरी जान के दुश्मन बन गए होंगे , अगर आपको पता चल जाए कि मै कहाँ हूँ तो आप मुझे मार देना चाहते होंगे। मैंने आपको बहुत दुख दिया है , परंतु मै यह नहीं कह रहा कि सदाशिव, महाविष्णु, और पराशक्ति नहीं है , वो है परंतु ये वैसे बिल्कुल नहीं है जैसे कि आप उनको देखते है। ये समय, स्थान और ऊर्जा है , जीवित, जागरूक, शक्तिशाली, और सबसे जरूरी, कल्पना के परे, इनका न आदि है और न ही अंत, ये हमेशा से ही थे और हमेशा रहेंगे। मेरी सारी बातें ईश्वर के बारे में है, पर उनके सबसे सरल और प्रबल स्वरूप, निराकार की बातें कर रहा हूँ । मैंने अब तक आपको जागरूकता से जो शुरू हुआ उसके बारे में बताया है और मूर्खता के कारण जो एक जगह रुक सा गया है। हमने दो को आदमी माना क्योंकि ये कुछ नहीं करते , करना चाहे भी तो उनको ऊर्जा की जरूरत है, और एक को औरत क्योंकि वही करती है और करवाती भी , परंतु अकेले कुछ नहीं कर सकती। अब लोगों को इनके संबंध को समझाना था , तो क्या किया जाये, समाज औरत और आदमी का एक ही संबंध जानता है ,पति और पत्नी। तो ऊर्जा को पत्नी के रूप में दिखाया गया है, परंतु किसकी पत्नी, ऊर्जा का तो समय और स्थान दोनों से ही गहरा संबंध है । तो उन्होंने देखा कि ऊर्जा समय के साथ ज्यादा तीव्र है, तो शायद ज्यादा गहरा संबंध है, तो समय जो आदमी है, उसकी पत्नी है ऊर्जा। पर हमारे समाज में एक आदमी की कई पत्नियां हो सकती है परंतु एक औरत के कई पति नहीं हो सकते , उन्होंने ऐसा कोई संबंध नहीं देखा था। परंतु ऐसा संबंध प्रकृति में है , कई मादा (female) जानवर और कीड़े एक से अधिक नर (male) के साथ संबंध बनाती है। परंतु मानव समाज इसे नहीं अपना सकता तो फिर क्या किया जाये।
हमारे पास दो विकल्प (option) है, हमें स्थान का संबंध ऊर्जा से दिखाना या समझाना है। तो पहला विकल्प, इनका संबंध गहरा तो है पर ऊर्जा स्थान के साथ उतनी तीव्रता के साथ नहीं है, तो हमने ऊर्जा को उनकी पत्नी की जगह बहन बना दिया। परंतु तीव्रता कम होने से उस संबंध का गहरापन कम नहीं होता तो दूसरा विकल्प ऊर्जा का कम तीव्रता वाला रूप स्थान के साथ है, तो स्थान की पत्नी है ऊर्जा का कम तीव्रता वाला रूप। अब आपके लिए इसे सरल से कहूँ तो समय है शिव और उनकी पत्नी है ऊर्जा का तीव्र रूप काली, और ये काली स्थान यानी कि विष्णु की बहन है, और काली का एक रूप है कमला या लक्ष्मी जो विष्णु की पत्नी है। अगर समाज एक औरत के दो पतियों को स्वीकारता तो ऊर्जा के दो पति होते, समय और स्थान, अब आप जरूर मुझे मारना चाहेंगे। तो उन पुराने लोगों ने इन तीन सरल सी चीजों को सामाजिक संबंधों में उलझा दिया। अब एक और अच्छी चीज़ पर बात करते है, सदाशिव ही सबसे बड़े है , नहीं महाविष्णु बड़े है, नहीं पराशक्ति बड़ी है। लोग अब इसपर लड़ने लगे , जो जागरूक लोग थे उनको तो सच दिखगया था , बस उनकी शुरुआत की दिशा अलग अलग थी। समय, स्थान और ऊर्जा अलग अलग है , तो कही दो दो के जोड़ों में भी है । आपको पता है समय और स्थान के गहरे संबंध को भी पति पत्नी के रूप में दिखाया गया है, उन दोनों को शिव के कामेश्वर और विष्णु के मोहिनी रूप में, पति पत्नी की तरह दिखाया गया है। एक और कहानी इसी चीज़ पर है बस इस बार समय , यानी शिव गोपी (औरत) के रूप में स्थान ,यानी कृष्णा (आदमी,जो विष्णु का रूप है) उसके पास जाते है . देखिये ये समाज एक ही संबंध को जानता है पति और पत्नी , दो आदमी एक साथ क्या कर रहे है , नहीं ये तो नहीं चलेगा , एक को औरत बना दो, यही सब चीजों को मै मूर्खता मानता हूँ और कुछ नहीं। कुछ जगहों पर ,”हरिहर” आधे विष्णु और आधे शिव , इसमें दाया और बाया के तौर पर वो आधे आधे है, कमर से ऊपर-नीचे नहीं। जोड़ों की बात और अलग अलग की बात तो मैंने आपको कह दी अब , इन तीनों के एक साथ आने की बात . जी हा ये तीनों एक साथ भी आते है ; समय , स्थान और ऊर्जा यानी कि सदाशिव, महाविष्णु, और पराशक्ति एक साथ आते है। ये तीनों ही जागरूक है, चेतना के उच्च स्तर है, समय और स्थान ब्रह्मा है और ऊर्जा प्रकृति। अब आप मुझे फिर पागल कहेंगे पर वही सत्य है , ऊर्जा ही प्रकृति है , वो ब्रह्मा नहीं है , पर उससे कम भी नहीं है . ब्रह्मा और प्रकृति एक ही स्तर पर है , परंतु लोग इनमें से ब्रह्मा को उच्च समझते है , ये मूर्खता है , आप बिना प्रकृति के कुछ नहीं कर सकते , आप बस एक लाश बन जाएंगे और कुछ नहीं।
समय, स्थान और ऊर्जा एक स्तर पर है, ब्रह्मा और प्रकृति एक स्तर पर है, जब ये तीनों एक साथ आते है तो वो कहलाता है “परब्रह्म” . अब सवाल है कि ये किस तरह मिलते है तो लोगों को जिसमें ज्यादा इच्छा थी या जो उन्हें ज्यादा बड़ा लगा , उन्होंने बाकी दो को उसमें मिला दिया और कह दिया कि सबसे आखिर वाला परब्रह्म है, ये भी एक मूर्खता थी। मूर्खता क्यों , क्योंकि अधिकांश लोग इस पर लड़ते है , कौन परब्रह्म है ,सदाशिव, महाविष्णु या पराशक्ति . परब्रह्म वो चीज़ है जहाँ समय, स्थान, और ऊर्जा तीनों एक साथ आते है। अब एक जागरूक इंसान को पहले जिस चीज़ के जीवित होने के बारे में पता चला , वो उसके माध्यम से या उसके सहारे परब्रह्म तक जाने की कोशिश करता है। अब किसी को समय के जीवित होने की जागरूकता हुई, तो सदाशिव है , अब हर चीज़ आखिर में समय में ही समा जाती है , क्योंकि वो व्यक्ति समय को देख रहा है , या उसके सामने है , और बाकी दोनों चीजें ,उसमें समाती नज़र आती है। अब इसी तरह किसी को स्थान और ऊर्जा के जीवित होने के बारे में पता चला और वो इनके सहारे परब्रह्म तक जाने की कोशिश यानी कि बाकी दो चीजों को जानने की कोशिश करता है। वो जानना चाहता है कि जीवन को बनाने वाले कौन है। वास्तविकता में तो जीवन को समय, स्थान और ऊर्जा ने एक साथ होकर बनाया है पर लोगों का क्या कहना कोई तो बॉस होगा, मिलकर कौन रहता है , कोई नहीं . अब इसे ऐसे समझिये, आप किसी इंसान के अंदर है या उसपर है, आप इस तरह से देख रहे है कि आप को नहीं दिखता कि वो इंसान भी चल रहा है या बाकी दो लोगों के पास जा रहा है, तो आपने देखा कि वो दो लोग उसके पास आये और उसमें समा गये । और सरल करके बताऊँ तो जैसे आप इस पृथ्वी (earth) पर है और आपको ये बिल्कुल नहीं पता चलता कि ये ग्रह सूरज का चक्कर लगा रहा है , और आपको लगता है कि सूरज इस ग्रह का चक्कर लगा रहा है . ये सब बस दृष्टि का खेल है या देखने की असमर्थता (incapability) के कारण है।
सत्य तो ये है कि समय, स्थान और ऊर्जा , मिल कर परब्रह्म बनते है , और इसका भी कोई रूप नहीं है , इंसान ने अपनी मूर्खता और नासमझी के कारण इसका भी मानवीकरण कर दिया है . पर क्योंकि वो इसे अच्छे से नहीं देख सकता तो, कभी कोई कहता है सदाशिव परब्रह्म है , तो महाविष्णु है , नहीं पराशक्ति है परब्रह्म। वास्तव में ये तीनों मिल कर परब्रह्म है, और अकेले केवल दो ब्रह्म और एक प्रकृति है, ये तीनों ही एक स्तर पर शक्तिशाली, आदि और अनंत है। आप विश्वास नही करेंगे लेकिन अभी इस पल मेरी भावनाएं अपने चरम पर है , मुझे जोर जोर से रोना है, पता नही क्यों, मै इस बात को आपको क्यों कह रहा हूँ मुझे नहीं पता , चलिए हम आगे चलते है। भावनाओं से याद आया ये भावनाएं ऊर्जा का ही एक रूप है , ऊर्जा को एक औरत की तरह दिखाया गया है , पराशक्ति ये एक औरत है आदमी नहीं , ये परपुरुष नहीं है . ऊर्जा को जानने वालों ने पाया कि इसके सारे गुण औरतों वाले है , तांत्रिक ऊर्जा को पाना चाहते है। वो उनके हाथ नहीं आती और जो ब्रह्म के पीछे जाता है यानी समय और स्थान के पीछे उसे ये माया के रूप में अपनी ओर बुलाती है। एक औरत भी ऐसी ही होती है वो चाहती है आप उसे महत्व दे उसके आगे-पीछे घूमे परंतु आप उसके स्वामी नहीं बन सकते, जब तक वो न चाहे , तो आप ना जा सकते है और ना ही उसे पा सकते है .
अब कुछ ऐसी जगहें है हमारी इस पृथ्वी पर जहाँ ,समय, स्थान और ऊर्जा काफी प्रबल है मतलब आसानी से महसूस हो सकती है। हिमालय पर्वत एक ऐसी जगह है जहाँ समय थोड़ा अलग काम करता है , आप इसके बारे में लोगों से पूछ सकते है जो वहाँ गये हो या वहाँ जाने की कोशिश की हो। वहाँ समय आम जगहों से थोड़ा अलग काम करता है , तो वहाँ समय खुद है यानी हिमालय पर शिव रहते है . आपने कभी सोचा कि सदाशिव यानी कि समय को हमेशा ध्यान में बैठे ही क्यों दिखाया गया है , उनको लेटे हुये क्यों नहीं दिखाया गया। क्योंकि समय चलता है , केवल एक दिशा में इसी लिए हम इसे समय चक्र कहते है क्योंकि ये घूम कर वापस वही आ जाता है जहाँ से शुरू हुआ। ध्यान में एक व्यक्ति ऊपर की दिशा में जाता है, उसकी चेतना ऊपर उठती है यानी कि चलती है। और इसी तरह स्थान को ,यानी कि महाविष्णु को लेटे हुये ही दिखाया गया है , क्योंकि स्थान वैसा ही है फैला हुआ . पराशक्ति दोनों के ही साथ है , उनके हिसाब से ,उनको बैठे हुये सदाशिव के साथ दिखाया गया है और लेटे हुये महाविष्णु के साथ कभी कभी बैठे हुये ही। महाविष्णु के बारे में एक बात मुझे याद आई कहते है उनके अंदर कई सारे विष्णु और कई सारे ब्रह्मांड है, इस चीज़ को आप ऐसे समझ सकते है कि स्थान (space) के अंदर और भी स्थान (space) है। ऋषि मार्कंडेय की एक कहानी भी है , वो मरने वाले थे, या की उनका समय समाप्त होने वाला था , पर वो बच गए . अब लोग कहते है कि वहाँ शिव आये और उनको मौत से बचा लिया , इसे आप ऐसे समझिये उनको और वक्त केवल समय खुद ही दे सकता है , तो वहाँ शिव आ गये। लोग हर चीज़ को बढ़ा-चढ़ा कर बोलते है और कुछ नहीं , इसी लिए ये कहानियां वैज्ञानिक रूप से कोई अर्थ नहीं बनाती, लोगों ने सरल सी चीज़ को जटिल कर दिया। अब ऊर्जा ये हर जगह है पर कुछ जगहों पर ये काफी तीव्र है , ऐसे जगहों पर इसकी पूजा होती है। उदाहरण के लिए 51 शक्तिपीठ है जो बहुत पुराने है , ये प्राकृतिक रूप से तीव्र ऊर्जा के केंद्र है . इसी तरह समय के भी कुछ ऐसे ही खास केंद्र रहे है जैसे कि 12 शिव के ज्योतिर्लिंग।
तो अब तक मेरी बातें ईश्वर के सरल रूप के बारे में है। जिसे केवल लोगों को समझाने के लिए मानव रूप दिया गया था, पर लोगों ने उसी को पकड़ लिया और असलियत से मुँह मोड़ लिया, और आज सब आपस में लड़ते है। पर क्या ये जो आज लोग इतने पूजा की जगहों पर जाते है, मंदिरें बनती है, मूर्तियां स्थापित होती है ये सब क्या है। तो जब इंसान थोड़ा और जागरूक हुआ तो उसे पता चला कि वो कुछ खास चीजें करके (विधि) और कुछ खास चीजें इस्तेमाल करके ( यंत्र और मंत्र) समय,स्थान और ऊर्जा को एक जगह बुला सकता है और बांध भी सकता है, यानी कि केंद्रित कर सकता है, ये प्राकृतिक नहीं है। अब अगर आपने समय, स्थान और ऊर्जा को बुला लिया है, तो इसका ये मतलब बिल्कुल नहीं है कि ये वहाँ हमेशा रहेंगे, जब आप इन्हें जबरदस्ती अपनी जिद पर बुलाते है ,तो ये अपना एक छोटा सा हिस्सा वहाँ भेज देते है या जागरूक कर देते है, या केंद्रित कर देते है। अब आपको इनको वही रखना है तो क्या किया जाये, आप इनको ऊर्जा दे सकते है . जी हा ऊर्जा एक ऐसी चीज़ है जिसकी जरूरत समय और स्थान को रहती है अपना काम करने के लिए और ऊर्जा खुद भी ऊर्जा में मिल सकती है, तो कही वो तंत्र कमजोर ना हो जाये या वो केंद्रित ऊर्जा उस जगह से विलुप्त ना हो जाये। तो आप उस ऊर्जा के केंद्र में बाहर से ऊर्जा देते है। हवन में चीजों को जला कर उनकी ऊर्जा उस विशेष केंद्र को दी जाती है, बलि के माध्यम से आप जीवन ऊर्जा जो सबसे ज्यादा प्रबल है उसे देते है। परंतु इसमें आपकी अपनी कोई ऊर्जा नहीं है , आप अपनी ओर से कुछ नहीं जता . आपने पेड़ पौधों से फल और बाकी चीजें ले उनसे नहीं पूछा कि उनको अपनी ऊर्जा देनी है कि नहीं, आपने बलि में जानवर से नहीं पूछा कि क्या वो अपनी ऊर्जा देना चाहता है। आप अपने स्वार्थ की पूर्ति के लिए दूसरों की ऊर्जा देते है। समय, स्थान और ऊर्जा यानी कि सदाशिव, महाविष्णु और पराशक्ति इसे अपना लेते है ,वरना आप लगातार उनकी बनाई हुई हर चीज़ को तबाह करके, उसकी ऊर्जा उनके पास भेज देंगे .
आप का दिया हुआ कुछ भी इनके पास नहीं जा सकता, ये साधारण इंसान से बहुत दूर है, तो इनके पास एक ही चीज़ जा सकती है , वो है ऊर्जा। जी हा ऊर्जा यही चीज़ , क्योंकि ये हर जगह है, समय के साथ भी और स्थान के साथ भी , और ऊर्जा तो उस बड़ी ऊर्जा तक जा ही सकती है। तो अब आपको ये पता है कि क्या करना है, आपको ऊर्जा देनी है परंतु कोई भी ऊर्जा जो आपकी नहीं है वो उतनी ताकतवर नहीं कि उनको रोके रख सके या फिर बुला सके . अब आप अपनी ऊर्जा को ताप या उपवास, या फिर सीधे अपनी बलि के द्वारा उन तक पहुँचाते है, उनको बुलाते या रोकते है। अपनी बलि का क्या अर्थ है , रावण ने अपने सर काट कर समय को बुलाया था, सदाशिव आये थे ,ये आपको पता है, राम ने अपनी आँख निकाल कर ऊर्जा को बुलाया , और पराशक्ति आ गई थी। पर सब ऐसा नहीं करते , क्योंकि आप उतने जागरूक नहीं थे, राम, रावण, कृष्ण ये जागरूक लोग थे, इनको पता था कि समय, स्थान और ऊर्जा कहाँ है और उनको बुलाया जा सकता है। राम और कृष्ण की बात करे तो ये जागरूकता के सबसे ऊँचे स्तर पर थे, इन्हें पता था कि जहाँ भी जीवन है वहाँ समय, स्थान और ऊर्जा एक साथ है। तो इनको पता था कि इनके अंदर ये तीनों चीजें है ,और जब इनके अंदर है तब पूरी जागरूकता के साथ ये खुद भी यही है। इसी लिए ये ईश्वर की तरह पूजे भी जाते है। और वो सारी चीजें कर पाये थे जो हम या आप नहीं कर सकते या हमारी कल्पना में भी नहीं है।
अब ऊर्जा (energy) यानी पराशक्ति , इस पर एक वैज्ञानिक चीज़ कही जाती है “energy can never be created nor destroyed ,it can only be transformed.” ये वही चीज़ है ऊर्जा अमर है, उसका ना कोई आदि है ना कोई अंत। तो ऊर्जा का एक रूप है जो बहुत ही सरल है , जिसे आप इन तक पहुँचा सकते है बिना किसी मुश्किल के . और ये रूप आपकी ऊर्जा से ही बनता है और ये आपकी ऊर्जा है जो उन तक जाती है ,इसमें कोई दूसरा नहीं है, पर ये अंदर से आता है अगर ये है या अगर आप इसे बना सकते है , तो ये सबसे सरल तरीका है, उन तीनों से जुड़ने का और जागरूक होने का . तो ऊर्जा का ये रूप है आपकी भावनाएं (emotions), जी हा आपकी हर भावना असल में बस ऊर्जा है, जो कभी बहुत तीव्र (intense) है तो कभी कम तीव्र है . आपने सोचा कि द्रौपदी ने वस्त्र हरण के पल कृष्ण (महाविष्णु का रूप या सरलता के साथ कहे तो स्थान) को कैसे बुलाया था, कैसे उसकी इज्जत बची होगी, कोई कृष्ण के पास संदेश ले कर नहीं गया था। तो फिर कैसे बची थी द्रौपदी ,उसने अपनी तीव्र भावनाओं को अपनी ऊर्जा को एक साथ किया , ध्यान लगाया , और स्थान (कृष्ण) को पुकारा, उसने अपनी ऊर्जा भावनाओं के रूप में भेजी थी . क्योंकि केवल ऊर्जा ही उन तक जा सकती है , और भावना आपकी अपनी ऊर्जा है, तो आप समय, स्थान और ऊर्जा को , अपनी भावनाओं से बुलाते है . आपने सुना होगा कि, “ भगवान तो भाव (भावनाओं यानी कि emotions) के भूखे है”। वास्तव में वे बिल्कुल भी भूखे नहीं है , पर हा आपकी ऊर्जा ,भावनाओं के रूप में उन तक बड़ी आसानी से जा सकती है। आज कल की नई पीढ़ी जो जागरूक है या होना चाहती है वो इसी पर काम कर रही है। वो कुछ नहीं करते, पूजा पाठ , ये वो , कुछ नहीं लेकिन पुरानी पीढ़ी के मुकाबले वो अपनी भावनाओं को उन तक बहुत अच्छे से पहुँचा रहे है।
जागरूक इंसान काम कर रहा है , उसे पता है कि और जागरूक होने के लिए उसे और काम करके खुद को जानना होगा , ताकि वो शुद्ध भावनाएं बना सके या उसमें केवल अपनी भावनाएं हो ना कि दूसरों के कारण . आप जानते है या आप में से अधिकांश लोग नहीं जानते पर हमारी सारी भावनाएं , हमारी नहीं है। दूसरों के कारण आपको गुस्सा आता है, खुशी होती है ,दुख होता है, तो फिर ये आपकी भावनाएं कैसे हुई। ये भावनाएं अंदर से आनी चाहिए ना कि बाहर से , बाहर से आई हुई भावना उतनी प्रभाव शाली नहीं होती ना ही वो उतनी स्थाई होती है। ऐसी भावनाएं कुछ पल या कुछ और पलों के बाद बदल या खत्म हो जाती है। तो लोग खुद पर काम करते है ताकि अपनी और दूसरों के द्वारा पैदा हुई भावनाओं में अंतर कर सके और , जो दूसरी वाली भावनाएं है उनसे छुटकारा पा सके . अब इसके लिए भी कुछ सरल तरीके है, आप भावनाओं को निकाल दीजिये या तो उनको बदल दीजिये। तो इन्हें निकाला कैसे जाये ,अब मै कुछ मनोविज्ञान की बातें करूँगा जो कि मेरे निजी अनुभव है, आप नहीं जानते पर मै एक मनोविज्ञान का छात्र हूँ या मनोविज्ञान को पढ़ता हूँ। तो आप इन भावनाओं को शरीर को थका कर निकाल सकते है , हाथ पैर हिलाइये, कसरत करिये , दौड़िये, भागिये, नाचिये, गाइये, रोइये, हँसिये। तो अब आप जान गये , मै एक पागल हूँ मनोविज्ञान और चेतना का। हँसने और रोने से भी भावनाएं बाहर निकलती है, शरीर इसमें भी थकता है। एक और तरीका है भावनाओं से छुटकारा पाने का आप इसे कोई दूसरा रूप दे , और ये अपने आप बाहर आ जाएगी। ठीक से कहूँ तो इसे एक रूप दीजिये , कोई अपनी भावनाओं को एक कविता का रूप देता है, कोई चित्र का , कोई मूर्ति का , और भी बहुत कुछ, आप इस भावना को एक नया रूप दे और ये अपने आप बाहर निकल जाएगी।
ऐसा करते करते आपके अंदर से सारी भावनाएं निकल जाएंगे जो दूसरों के कारण पैदा होती है। और फिर बस आपकी भावनाएं ही बचेंगी और फिर आप इसे समय, स्थान और ऊर्जा तक पहुँचा सकते है, एक बार आपकी सारी भावनाएं उन तक पहुँच गई तो आप मुक्त हो जाएंगे . पर ये इतना आसान नहीं, आपकी अपनी भावनाएं (emotions) भी आपकी स्मृतियों (memories) और कर्मों (actions) से जुड़ी है और हर नयी स्मृति और हर नये कर्म के साथ एक नया भाव अपने अंदर आता है . आप अपने सारे भाव उन तीनों को एक साथ नहीं दे सकते , ऐसा संभव तो है पर सबके लिए नही। तो आप ध्यान करते है ताकि अपने बारे में सब कुछ जान सके और फिर अपना सब कुछ उन तीनों को दे सके . आपको मुक्ति चाहिए , स्वर्ग चाहिए, और दुख तो बिल्कुल नहीं चाहिए, बस आप इसी में फिर फंस गए है। इतना जागरूक होने के बाद भी आप यही फंस गए है, आपको ये जानना जरूरी है कि आप मरने के पल जो भी भावना रखते है वही स्वर्ग और नरक निर्धारित करती है। तो अब आपको पता है कि समय, स्थान और ऊर्जा ही सदाशिव, महाविष्णु, और पराशक्ति है, और उन तक जागरूकता के साथ अपनी भावनाओं यानी कि अपनी ऊर्जा के सहारे पहुँचा जा सकता है . और जब आप उन तीनों के लिए एक साथ जागरूक हो जाते है, तब आप परब्रह्म में मिल जाते है जो समय ,स्थान और ऊर्जा का केंद्र है। अब आपके मन में एक प्रश्न आ रहा होगा कि बिना समय, स्थान और ऊर्जा के एक साथ आये जीवन या कुछ भी संभव तो नहीं यानी कि ये हर जगह है। तो फिर मै जो इनके एक साथ आकर परब्रह्म की जो बात कह रहा हूँ उसका क्या मतलब है। तो इसे थोड़ा और स्पष्ट कर देता हूँ, ये तीनों है तो हर जगह पर उस तीव्रता के साथ या एक जगह इतने केंद्रित नहीं है . आप इसे ऐसे समझिये कि आसमान है उसमें हवा चल रही है और वहाँ बादल भी है, चारों तरफ स्थान है उसमें समय चल रहा है और ऊर्जा भी है। पर आसमान में हर जगह बादल नहीं होते या हवा हर जगह नहीं बहती, उसी तरह समय स्थान और ऊर्जा भी हर पल एक जगह नहीं रहते , इधर से उधर होते रहते है। परन्तु परब्रह्म वो जगह है जहाँ ये तीनों हर पल एक साथ ही रहते है, और इसी लिए ये वहाँ सबसे ज्यादा केंद्रित है या सबसे ज्यादा प्रबल है। ये चीजें ऐसी है कि आपको इन्हें सरलता के साथ समझना होगा आप इनको इनके सबसे सरल स्वरूप में समझे, और अपनी चेतना (consciousness) को और भी बढ़ाएं या और जागरूक हो जाये।
मेरे शिक्षक डॉ. आलोक कुमार चौधरी की कुछ बातें आपसे कहता हूँ, वो मेरी यूनिवर्सिटी में मेरे डिपार्टमेंट के हेड है (HOD)। तो उन्होंने कुछ बातें कही थी , चीजों को समझो उनसे लड़ो मत , उनको अपनाओ, चीजों को सिंपल रखा करो, कॉम्प्लेक्स मत करो, अपनी अवेयरनेस (जागरूकता) को बढ़ाओ, और प्रश्न करना सीखो। ये उनकी कही चीजें है जो मैंने सुनी थी, और मेरे अंदर ही थी और आज जब भावनाएं आई है तो ये बातें इस लेख के रूप में बाहर आई है। आप जो कुछ भी करते है या सोचते है या आपकी भावनाएं भी , इनपर एक बार प्रश्न जरूर करे। प्रश्न करना जरूरी है, पर उत्तर कब मिलेगा या मुझे इस प्रश्न का उत्तर अभी चाहिए ये ना सोचे, बस एक सवाल जरूर हो हर चीज़ पर और एक ना एक दिन उत्तर खुद आपके पास आ जायेगा। इन प्रश्नों के जवाब खुद आने का मतलब नहीं कि ये चलकर आपके पास आयेगा या फिर उड़कर। हर प्रश्न का उत्तर आप ही के पास है, बस आपको जागरूक होने की जरूरत है, जैसे जैसे आप जागरूक होंगे हर प्रश्न का उत्तर आपको मिल जायेगा यानीकि आप उस चीज़ को समझने लगेंगे। मुझे मेरे प्रश्न का उत्तर 5 से 6 साल बाद मिला , तब मै उतना जागरूक नहीं था, अभी का भी मै कह नहीं सकता, पर है मुझे कुछ उत्तर मिले जो मैंने आपके सामने रख दिये। ये चीजें जो मैंने आपसे कही या यहाँ लिखी है ये कुछ मेरा निजी अनुभव है, थोड़ी सी चेतना और चीजों की जागरूकता है,और कुछ गुरुओं और किताबों की पढ़ी हुई बातें है। इसमें कई सारी चीजें मिली हुई है, मै लड़ नहीं रहा, ना ही आपके मान्यताओं या भावनाओं को गलत कह रहा हूँ। मै तो बस एक अलग , नया या पुराना इसे क्या कहूँ मै नहीं जानता, पर हा यह भी एक दृष्टिकोण है, समय, स्थान और ऊर्जा यानी कि सदाशिव, महाविष्णु और पराशक्ति , को देखने का या समझने का। यह सब कुछ जागरूकता से ही शुरू हुआ और वही जा कर खत्म होगा
.
कुमार आर्यन, जिन्हें साहित्य और लेखन की दुनिया में उनके उपनाम 'काल' के रूप में जाना जाता है, कोलकाता के ब्रेनवेयर यूनिवर्सिटी (Brainware University) के मनोविज्ञान विभाग में B.Sc. (Honours) मनोविज्ञान के छात्र हैं। मानव मन की गहरी समझ और मनोविज्ञान के अकादमिक ज्ञान के साथ-साथ वे लेखन और रचनात्मकता में भी रुचि रखते हैं।उनसे संपर्क करने के लिए उनके मोबाइल नंबर 9341901449 अथवा ईमेल kumararyan28062003@gmail.com के माध्यम से संवाद किया जा सकता है।


COMMENTS