आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के लोक साहित्य सम्बन्धी विचार

SHARE:

आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के लोक साहित्य सम्बन्धी विचार आचार्य द्विवेदी ने स्वीकार किया कि लोक-साहित्य के संकलन तथा अध्ययन की अत्यधिक आवश्यकता है।

आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के लोक साहित्य सम्बन्धी विचार


चार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी हिंदी साहित्य के एक ऐसे मूर्धन्य आलोचक, निबंधकार और सांस्कृतिक अध्येता हैं, जिन्होंने साहित्य को केवल राजा-महाराजाओं, दरबारों या संभ्रांत वर्ग की वस्तु न मानकर उसे सीधे जनता की चेतना से जोड़ा। उनके लोक-साहित्य और लोक-संस्कृति संबंधी विचार उनके गहरे सांस्कृतिक सरोकारों और मानवतावादी दृष्टिकोण को प्रकट करते हैं। द्विवेदी जी का मानना था कि जो साहित्य मनुष्य को दुर्गति, हीनता और परावलंबन से मुक्त न कर सके, वह व्यर्थ है। इसी 'मानुष सत्य' की खोज उन्हें लोक की ओर ले गई।

लोक-साहित्य शब्द का प्रयोग बहुत समय से अंग्रेजी के 'फोक-लोर' और 'फोक-लिट्रेचर' शब्द के पर्यायवाची के रूप में किया जा रहा है। आचार्य द्विवेदी ने लोक-साहित्य के अन्तर्गत समस्त विषयों को स्वीकार किया था। द्विवेदी जी ने अपने ऐतिहासिक अनुसंधान तथा आलोचना के क्षेत्रों में लोक-साहित्य को अधिक महत्व दिया। लोक-साहित्य के तत्व, उसका महत्व, उसके प्रयोजन, उसके अध्ययन की आवश्यकता पर आपने अत्यन्त महत्वपूर्ण विचार पाठकों के सामने इस प्रकार रखे हैं-
 

लोक साहित्य का महत्व

आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के लोक साहित्य सम्बन्धी विचार
आचार्य द्विवेदी ने स्वीकार किया कि लोक-साहित्य के संकलन तथा अध्ययन की अत्यधिक आवश्यकता है। अठारहवीं तथा उन्नीसवीं शताब्दियों में यूरोप में इसी प्रकार के महत्वपूर्ण प्रयत्न किये गये। अनेक देशों और जातियों के लोक-साहित्य का अध्ययन करने पर अनेक विचित्र तथ्य प्रकाश में आये। उनके आधार पर विद्वानों ने ज्ञात किया कि अनेक जातियों, सम्प्रदायों, मानव मण्डलियों तथा राष्ट्रीयताओं में विभाजित होने पर भी मनुष्यों की रुचि एक रही है। मनुष्य के सोचने-समझने का ढंग एक है; उसके प्रेम, द्वेष आदि करने की शैली एक है, उसके उत्साहित और हतोत्साहित होने की प्रक्रिया भी एक है। इन सब खोजों ने मानवीय समानता के महान सिद्धान्त को जन्म दिया। आचार्य द्विवेदी का विश्वास था कि हमारे देश की विभिन्न जातियों के विस्तृत लोक-साहित्य का अध्ययन करने से अन्य महत्वपूर्ण तथ्य प्राप्त किये जा सकते हैं।
 
मानवीय समानता की स्थापना के अतिरिक्त एक महत्वपूर्ण लाभ भी हुआ है। आदिम तथा असभ्य कहलाने वाली जातियों के मौखिक साहित्य उनकी सृष्टि सम्बन्धी पौराणिक कथाओं, मान्यताओं, मुहावरों और विविध कलाओं के अध्ययन से आदिम मनुष्य के सोचने-समझने और कल्पना करने के निर्विवाद मार्ग का संकेत प्राप्त होता है-"फ्रायड जैसे मनीषी को आदिम जातियों के 'टैबूज' (निषेध) के अध्ययन से उन मानस-ग्रन्थियों का परिचय प्राप्त हुआ जो आज भी सभ्य मनुष्य के चेतन चित्त के नीचे दबी पड़ी हैं और मौका पाते ही अपना प्रभाव फैलाती हैं। मार्क्सवाद के आचार्यों को अपने सिद्धान्त पर स्थिर करने में इन आदिम जातियों के आचार और साहित्य से बड़ी मदद मिली।"
 

भारत का लोक साहित्य

भारतीय लोक-साहित्य के विषय में आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने अपनी अवधारणा इन शब्दों में व्यक्त की है- "हमारे यहाँ उच्च साहित्य और लोक-साहित्य दो विभिन्न धाराओं में अलग-अलग नहीं बहे; समय-समय पर उन दोनों में आदान होता रहा और एक का दूसरे पर प्रभाव भी पड़ता था।" यही कारण है कि लोक के अनेक छन्दों का, नाट्य रीतियों का तथा कथानकों का प्रवेश अभिजात वर्ग के साहित्य में समय-समय पर होता रहा। यदि कोई उच्च साहित्य के छन्दों, काव्य रूढ़ियों, नाट्य-रीतियों तथा यहाँ तक कि दार्शनिक विश्वासों को भी पूर्ण रूप से समझने का इच्छुक है तो उसके लिए लोक-साहित्य का अध्ययन अत्यन्त आवश्यक है। विशेष रूप से हिन्दी साहित्य के आदिकाल में साहित्य पर लोक का अत्यधिक प्रभाव पड़ा तथा लोक-साहित्य आभिजात्य साहित्य के अत्यधिक निकट पहुँच गया। भक्तिकालीन हिन्दी-साहित्य तो पूरे का पूरा लोक-साहित्य ही कहा जा सकता है।
 

लोक-साहित्य के संरक्षण की आवश्यकता

आचार्य द्विवेदी ने लोक-साहित्य को समाज की महत्वपूर्ण उपलब्धि तथा संस्कृति का एक अभिन्न अंग स्वीकार किया था।आजकल नवीन सभ्यता की झोंक में लोक-साहित्य नष्ट होता जा रहा है। इसी आधार पर आचार्य द्विवेदी का कथन है-"उस अमूल्य भंडार के संकलन एवं सुरक्षा की आवश्यकता है।" अभी तक लोक-साहित्य की रक्षा सुदूर ग्रामों के निवासी लोगों की मौखिक परंपरा द्वारा ही हुई है। आधुनिक युग की सभ्यता का प्रभाव हमारे गाँवों के साथ-साथ आदिम जातियों पर भी पड़ रहा है। इस प्रभाव को कोई रोक नहीं सकता और रोकना उचित भी नहीं है। खेद की बात यह है कि आज तक मौखिक परम्परा के द्वारा सुरक्षित लोक-साहित्य धीरे-धीरे लुप्त होता जा रहा है। आचार्य द्विवेदी ने दृढ़ता के साथ कहा था कि हर एक साहित्य प्रेमी और साहित्य मण्डली का प्रधान कर्तव्य यह होना चाहिए कि उसे यथाशक्ति इस प्रकार के लोक-साहित्य का, लोक-कथाओं, लोक-गीतों तथा अन्ध-विश्वासों का संकलन करना चाहिए। उन सबका बहुत अधिक मूल्य आँका जायेगा। कभी-कभी अत्यन्त महत्वपूर्ण ऐतिहासिक उलझनों और गुत्थियों को सुलझाने में लोक-साहित्य के उक्त तथ्य काम आ सकते हैं।

ऐसा भी हो सकता है कि यहाँ जनता के गीतों में, कहावतों में, कथानकों में, किंवदन्तियों में महत्वपूर्ण ऐतिहासिक तथ्य की गवाही बची रह गई हो। इसलिए इन सबका महत्व है। हो सकता है कि आज किसी को किसी गीत या किंवदन्ती का महत्व समझ में नहीं आये, फिर भी आपको उसे संग्रह कर लेना चाहिए। आगे चलकर किसी पंडित को उससे कुछ प्रकाश मिल सकता है। इसमें कुछ भी उपेक्षणीय नहीं है।

निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि हजारीप्रसाद द्विवेदी जी के लिए लोक-साहित्य केवल मनोरंजन या शोध की कोई निर्जीव वस्तु नहीं था, बल्कि वह धड़कते हुए मानवीय जीवन का साक्षात दस्तावेज था। उन्होंने लोक-साहित्य को शास्त्र के समकक्ष, और कई मायनों में उससे भी अधिक प्रामाणिक माना, क्योंकि वह सीधे 'जनता के चित्त की संचित वृत्ति' से उत्पन्न होता है। उनकी लोक-दृष्टि ने हिंदी आलोचना को एक नई और अधिक लोकतांत्रिक दिशा प्रदान की।

COMMENTS

Leave a Reply

इन्हें भी अवश्य पढ़ें -

Loaded All Posts Not found any posts VIEW ALL Readmore Reply Cancel reply Delete By Home PAGES POSTS View All RECOMMENDED FOR YOU LABEL ARCHIVE SEARCH ALL POSTS Not found any post match with your request Back Home Sunday Monday Tuesday Wednesday Thursday Friday Saturday Sun Mon Tue Wed Thu Fri Sat January February March April May June July August September October November December Jan Feb Mar Apr May Jun Jul Aug Sep Oct Nov Dec just now 1 minute ago $$1$$ minutes ago 1 hour ago $$1$$ hours ago Yesterday $$1$$ days ago $$1$$ weeks ago more than 5 weeks ago Followers Follow THIS PREMIUM CONTENT IS LOCKED STEP 1: Share to a social network STEP 2: Click the link on your social network Copy All Code Select All Code All codes were copied to your clipboard Can not copy the codes / texts, please press [CTRL]+[C] (or CMD+C with Mac) to copy बिषय - तालिका