चारुचंद्रलेख उपन्यास में स्त्री पूजा का विकृत रूप | आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी

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आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी द्वारा विरचित उपन्यास 'चारुचन्द्रलेख' में लेखक ने उस युग में व्याप्त नारी पूजा का जो रूप प्रस्तुत किया है, वह आपकी अध्ययनश

चारुचंद्रलेख उपन्यास में स्त्री पूजा का विकृत रूप


चार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी द्वारा रचित ऐतिहासिक उपन्यास 'चारुचंद्रलेख' (12वीं-13वीं शताब्दी की पृष्ठभूमि पर आधारित) में उस दौर के भारतीय समाज के राजनीतिक, सामाजिक और धार्मिक पतन का अत्यंत सजीव चित्रण किया गया है। उपन्यास में 'स्त्री पूजा का विकृत रूप' तात्कालिक समाज में व्याप्त अंधविश्वास, तंत्र-मंत्र, वाममार्ग और भ्रष्ट धार्मिक साधनाओं के संदर्भ में उभरकर सामने आता है।

आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी द्वारा विरचित उपन्यास 'चारुचन्द्रलेख' में स्त्री पूजा के विकृत रूप का दर्शन होता है। इस उपन्यास में एक स्थान पर तांत्रिक सिद्ध नागनाथ चन्द्रलेखा से कहता है-"प्रकृति के जड़ पिण्डों का जितना सुन्दर और सामंजस्यपूर्ण संघात मानव देह में है, उतना और कहीं भी नहीं है। मानव देह में भी किशोरावस्था का शरीर सर्वोत्तम है। उसमें सब कुछ विकसित हो गया है और क्षयोन्मुख भी नहीं होता।क्रम वर्धमान किशोरावस्था देह प्रकृति के जड़ साधनों का सर्वोत्तम संघात है। इसको आश्रय करने वाला मन ऊपर होता है। बुद्धि सार ग्राहिणी होती है। आत्मा चिन्मुख होती है। परन्तु किशोर मानव देह में भी पुरुष देह की अपेक्षा स्त्री देह अधिक रहस्यमय, अधिक शक्तिशाली और अधिक औदार्य सम्पन्न होती है। देवी स्त्री देह प्रकृति का साक्षात प्रतिनिधि है। वह विधाता की सिसृक्षा का मूर्तिमान विग्रह है। वह जगत प्रवाह का मूल उत्सव है।"
 
जैसे चन्द्रलेखा ने कहा है कि यह तर्क केवल निचली श्रेणी के बुद्धिजीवियों को बहकाने वाला है। इस प्रकार के तर्कों पर आधारित स्त्री पूजा का आगे चलकर कैसा विकृत रूप हुआ, इसका उल्लेख भी आगे हुआ है। शव-साधना का भी उल्लेख इस उपन्यास में मिलता है। रस साधना में विगतजीव नागनाथ के शव पर बैठकर आकाश मार्ग में उड़ने वाली चन्द्रलेखा को मार्ग में रोककर अनंगवज्र नामक एक साधु उसे शव-साधना से परिचित कराता है। उसके अनुसार उत्तम पुरुष के शव का उपयोग करके अनेक सिद्धियाँ प्राप्त की जा सकती हैं। इसको सुनकर चन्द्रलेखा के मन में भी स्वार्थवृत्ति जाग्रत हो जाती है। इस सन्दर्भ में नागनाथ के वचन दर्शन करने योग्य हैं। वह कहता है- "परन्तु तुम अपने को इतना असहाय क्यों समझती हो; जो शव तुम ढोये लिये आ रही हो वह नयी सिद्धि पाने का बड़ा उत्तम साधन है। इस शव की पीठ पर बैठकर तुम त्रैलोक्य की समस्त सिद्धि को हस्तगत कर सकती हो।... मैं तुम्हें साधना मार्ग बताये देता हूँ। तुम इस शव को ही अपनी साधना का सोपान बनाओ। देवी, ऐसे सत्पुरुष का शव सहज ही नहीं प्राप्त होता।यह वीरेश्वर का साक्षात् रूप है।परानन्दनिष्क्रिय का महाकाल का पार्थिव विग्रह है, इच्छा द्वेष से परे योगेश्वर अवधूत के समान फल देता है।"
 
इनके वचनों में विश्वास करके चन्द्रलेखा शव को उनके पास रखकर, नालन्दा नगरी के महाविहारों में कुल कन्याओं की साधना करने वाले अमोघवज्र के पास जाती है। इस प्रकार महासिद्धियों के मोह में पड़कर कामरूप के गोरखनाथ के पास न चलकर नालन्दा के स्त्री-साधना क्षेत्र में पहुँचती है।
 
चारुचंद्रलेख उपन्यास में स्त्री पूजा का विकृत रूप
यहाँ स्त्री साधना या कुमारी-साधना का पूरा विवरण प्राप्त होता है। वहाँ की एक स्त्री अमोघवज्र की साधना के सम्बन्ध में बताती है-“पूर्वाचार्यों ने कुमारियों के भिन्न नाम और रूप की संज्ञा दी है। प्रथम वर्ष की कन्या को सन्ध्या कहते थे। द्वितीय वर्ष की कन्या को सरस्वती कहते हैं। इसी प्रकार पोडश वर्ष तक की कुमारियों के लिए अलग-अलग नाम हैं। इनकी पूजा अगर ठीक ढंग से की जाय तो समस्त सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं। अमोघवज्र ने बारह कुमारियों की साधना कर ली थी।"
 
वह स्त्री जो अपने नवम वर्ष में कुंजिका साधना का आधार बनी थी, उस साधना का विवरण उसने इस प्रकार प्रस्तुत किया है-"गुरु ने मेरी पूजा शुरू की... जब गुरु भाव-गद्-गद होकर मेरी स्तुति पाठ करते थे तो मेरा अन्तर विचलित हो उठता था। मैं उन्मत्त की भाँति विह्वल हो उठती थी। गुरु मुझे नित्य नूतन वस्त्र पहनाते थे, आसन पर बैठाकर पैर धो देते थे, चरणों को अपने हाथों से अलक्तक से रंग देते थे, सुगंधित पुरु सिन्दूर और अगरु धूम से मेरी पूर्णोपचार पूजा करते थे। मेरा अंग-अंग उल्लास और आत्म गौरव से आलोकित हो उठता था। हाय बहन ! मैं इसी दारुण साधना की बलि हो गई। मैं सिद्धियों के पीछे ऐसी पागल थी कि कभी श्मशान को जाती, कभी चंडिकायतन में रातभर जप करती, कभी नदी-जल में घंटों खड़ी रहकर अपराजित पुष्पों को अभिमंत्रित करती।"
 
दर्शन तथा साधना के नाम पर होने वाले इन सभी दुराचारों को देखते हुए मिसिलपाद ने अमोघवज्र से ठीक ही कहा था- "सिद्धियों के पीछे पागल होने का यही परिणाम हो सकता था। आज मैं समूचे मगध में एक भी मनुष्य को ऐसा नहीं देख रहा जो हमारी सहायता कर सके। साधारण प्रजा हमें सिद्ध समझती रही है। वह श्रद्धा से नहीं, भय से हमारी पूजा करती रही है। आज आततायी के खड्गाघात से सिद्धियों का यह सारा खिलवाड़ टूटकर गिर गया है। जिसका दिखावा करके हम पूजा पाते थे, उसके ऐसे दयनीय पतन को देखकर यहाँ की प्रजा केवल हँसेगी। आज भी हमारे बिहार के ढोंगी साधक मंत्रबल से तुर्कों की सेना की उड़ा देने की गप्पों पर विश्वास करते हैं। सारा विहार (नालन्दा के महान विहार का नाश करने के लिए तुर्क सेना सारनाथ के विहार के नाश के बाद आगे बढ़कर चली आ रही थी।) खाली हो गया है। सिद्धों की इस सेना का ऐसा मिथ्याभाषी ढोंगी रूप फिर देखने को नहीं मिलेगा।"
 
इस विकट परिस्थिति में योगियों, सिद्धों तथा समस्त प्रजा को सम्बोधित करके गोरखनाथ की वाणी में आचार्य द्विवेदी की पुकार गूँज उठती है-"जब हमारी आँखों के सामने लाख-लाख निरीह प्राणियों का वध हो रहा है, दुर्दान्तम्लेच्छ सेना नगरों और संस्य क्षेत्रों को भस्म कर रही है, जब अधमरे युवकों, परित्यक्त शिशुओं और लांछित वधुओं के क्रन्दन और आह से वायुमण्डल व्याप्त है, उस समय क्या सहज समाधि सम्भव है ?... वेतनभोगी सैनिकों के वीर्य की परीक्षा हो चुकी है। गजनी से साकल (स्यालकोट) तक की प्रत्येक मुठभेड़ में उन्हें पराजित होना पड़ा है। आज सोमेश्वर तीर्थ का भविष्य संकट में है, पार्श्वनाथ की रत्नमूर्ति पर लुब्ध-भेड़ियों की दृष्टि पड़ चुकी है, ओदन्तपुरी और नालन्दा विहार की हुमूल्य बौद्ध मूर्तियों का भविष्य अन्धकाराच्छन्न है।... यदि हम अपने बाह्यविभेदों पर ही अब भी अड़े रहेंगे तो विनाश निश्चित है। एक प्रकार से बिना रीढ़ की साधना इन दिनों समूचे भारत को ग्रास किये जा रही है। सिद्धियों के नाम पर अत्यन्त निचली श्रेणी की कामुकता को उत्तेजना दी जा रही है। महाचीन के निम्नस्तर से आयी हुई यह साधना हमारे देश के बड़े-बड़े साधकों तक को अभिभूत कर रही है।... यह तो हर सम्प्रदाय में चतुश्चन्द्रा, पंचपवित्र, पंच मकार की साधना पर किये जा रही है। यह हमारे समूचे समाज को निर्वीर्य और आलसी बना देगी। योगी जिस समय गृहस्त-भीत और शंकित हैं, वेतन-भोगी सैनिक हतबुद्धि और कर्तव्य-भ्रष्ट हो गये हैं, साधु तरल कर्म और धर्महीन बन गये हैं। उस समय मैं उन लोगों का आह्वान करता हूँ जो विश्वास करते हैं कि नरदेह दुर्लभ वस्तु है, परम तत्व इससे बाहर नहीं है।"
 
गोरखनाथ के इन वचनों से साधनाओं तथा सिद्धियों का ढोंग चन्द्रलेखा को प्रतीत हुआ और वे इस मायाजाल से मुक्त होकर नाटी माता के घर आ गयीं। राजा से मिलने पर उन्हें लज्जा का अनुभव हुआ, किन्तु मैनासिंह की सहायता से बघेला के साथ राजा जब कुटी में पहुँच गये तथा रानी से मिले तब वह सन्तुष्ट हुई। लेकिन अपने को सिद्ध-योगिनी समझकर राजा से नहीं मिली। बाद में शत्रुओं के द्वारा घिरकर तथा असहाय होकर लड़ने वाले राजा को देखा तो उसका दम्भ टूट गया और वह युद्ध में कूद पड़ी। राजा की रक्षा करने में घायल भी हुई तथा वास्तविक संसार में पहुँच गयी।

उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट हैं कि आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी द्वारा विरचित उपन्यास 'चारुचन्द्रलेख' में लेखक ने उस युग में व्याप्त नारी पूजा का जो रूप प्रस्तुत किया है, वह आपकी अध्ययनशीलता का परिचायक है।

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