आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के उपन्यासों में आधुनिकता

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आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी हिंदी साहित्य के एक ऐसे मूर्धन्य रचनाकार हैं, जिन्होंने इतिहास और परंपरा को जड़ रूप में नहीं, बल्कि एक गतिशील चेतना के रूप

आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के उपन्यासों में आधुनिकता


चार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी हिंदी साहित्य के एक ऐसे मूर्धन्य रचनाकार हैं, जिन्होंने इतिहास और परंपरा को जड़ रूप में नहीं, बल्कि एक गतिशील चेतना के रूप में देखा। उनके उपन्यासों—'बाणभट्ट की आत्मकथा', 'चारु चंद्रलेख', 'पुनर्नवा' और 'अनामदास का पोथा'—की पृष्ठभूमि भले ही ऐतिहासिक या पौराणिक हो, लेकिन उनकी अंतरात्मा पूरी तरह आधुनिक है। द्विवेदी जी के उपन्यासों में आधुनिकता किसी पश्चिमी प्रभाव के रूप में नहीं, बल्कि भारतीय समाज के नवजागरण और मानवीय मूल्यों के पुनर्मूल्यांकन के रूप में प्रकट होती है।

आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने अपने उपन्यासों हेतु जो क्षेत्र चुना था, वह अतीत से सम्बन्धित है, पर उनमें द्विवेदी जी की दृष्टि अतीतोन्मुखी नहीं, आधुनिक हैं। उन्होंने अतीत की सम्भावनाओं को वर्तमान के सन्दर्भ में स्पष्ट किया है, उसकी पुनर्रचना की है। आचार्य द्विवेदी के उपन्यास अतीत का बयान नहीं करते तथा न ही अतीतकालीन संस्कृति का चित्रण करके रह जाते हैं। उनमें आधुनिक मनुष्य अपनी सम्पूर्ण सत्ता के साथ उपस्थित है। वह अपनी सोच, कल्पना तथा जिजीविषा एवं क्रोध के साथ उपस्थित है।उनमें आज का सारा परिवेश अपनी तीव्र प्रश्नानुकूलता के साथ उपस्थित रहा है। द्विवेदी जी के उपन्यास अतीत तथा वर्तमान की दूरी मिटाने में समर्थ हैं। उनमें अतीत वर्तमान प्रतीत होता है तथा वर्तमान अतीत। यह एक प्रकार की अद्भुत फैंटेसी भी है तथा यथार्थ भी, इतिहास भी है तथा कल्पना भी।

आचार्य द्विवेदी ने आधुनिक सन्दर्भों में अतीत की नई व्याख्या की है। 'बाणभट्ट की आत्मकथा' उपन्यास में महावाराह का बार-बार उल्लेख प्राप्त होता है। पुराणों के अनुसार विष्णु के एक अवतार महावाराह ने जल में डूबी हुई धरित्री का उद्धार किया था । इस उपन्यास में भट्टिनी धरती के समान है, जिसका उद्धार बाणभट्ट को करना था। द्विवेदी जी ने महावाराह के मिथक को ही क्यों स्वीकार किया ? आज के सन्दर्भ में इस मिथक का चयन अत्यधिक सार्थक तथा महत्त्वपूर्ण है। कल्मष तथा कीचड़ में धँसी हुई धरित्री के समान ही आज उच्चतर मानव मूल्य भी धूलि-धूसरित हो रहे हैं। उनका उद्धार हमारे युग की सर्वाधिक महती चिन्ता है। जाति-वर्गों में जनशक्ति का विभाजन उस काल की अशांति तथा विखण्डन का कारण तो था ही, आज की अशांति तथा विखण्डन का भी कारण है । भट्टिनी बाणभट्ट से कहती है-"तुम यदि किसी यवन-कन्या से विवाह करो तो इस देश में यह एक भयंकर सामाजिक विद्रोह माना जाएगा। परन्तु यह क्या सत्य नहीं है कि यवन-कन्या भी मनुष्य और ब्राह्मण युवा भी मनुष्य है।"
 
भट्टिनी अनुभव करती है कि मनुष्य लोभवश, मोहवश तथा द्वेषवश पशुता की ओर अग्रसर हो रहा है। वह बाणभट्ट से आशा करती है कि वह उन्हें संवेदनशील तथा कोमल बना सकता है। वह बाणभट्ट से कहती है-

"तुम आर्यावर्त के द्वितीय कालिदास हो, तुम्हारे मुख से निर्मल वाग्धारा झरती है।... तुम्हारे मुख में सरस्वती का निवास है। तुम इस म्लेच्छ कही जाने वाली निर्दय जाति के चित्त में संवेदना का संचार कर सकते हो, उन्हें स्त्रियों का सम्मान करना सिखा सकते हो, बालकों को प्यार करना सिखा सकते हो।" प्रेम तथा करुणा के ये मूल्य मनुष्य मात्र के उच्चतर मूल्य हैं जो तब जितने आवश्यक थे, अब भी उतने ही आवश्यक हैं। 

आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के उपन्यासों में आधुनिकता
'चारुचंद्रलेख' उपन्यास में आचार्य द्विवेदी ने उस युग के द्वंद्व तथा संशय में वर्तमान युग को पहचानने का प्रयत्न किया है। उन्होंने स्पष्ट कहा है कि राजाओं का युग समाप्त हो गया। अब केवल आशा बची है तो प्रजा की संगठित शक्ति में। सिद्धियों तथा चमत्कारों का विरोध करते हुए उन्होंने कहा है कि सिद्धियाँ मनुष्य को कुछ नहीं दे सकतीं। एक साधारण कृषक जिसमें दया माया है, सत्य-असत्य का विवेक है, वह भी बड़े-से-बड़े सिद्ध से उच्च है। इस उपन्यास का एक पात्र सीदी मौला कहता है-"मैं स्पष्ट देख रहा हूँ कि आर्यावर्त नाश के कगार पर खड़ा है, भेद-बुद्धि से जर्जर, स्वार्थ और लिप्सा से अंधा, ग्रहग्रहीत भारतवर्ष महानाश की ओर बढ़ रहा है। सहज भाव यहाँ है ही नहीं। तुम कूट युद्ध से विजय पाना चाहते हो। मृगमरीचिका है यह। इस देश को वही बचाएगा, जिसके पास सहज जीवन का कवच होगा, सत्य की तलवार होगी, धैर्य का रथ होगा, साहस की ढाल होगी, मैत्रीपाश होगा, धर्म का नेतृत्व होगा।"
 
अतीत में बासी होने की सम्भावना बनी रहती है। पेड़-पौधे, वनस्पतियाँ, धर्म व्यवस्था, संस्कृतियाँ, हम, हमारे विचार तथा हमारे द्वारा निर्मित समस्त वस्तुएँ शनै: शनै: प्राचीन होती जाती हैं। प्राचीन होना तथा होते जाना सत्ता की नियति है। इस नियति को तोड़ना-तोड़ते जाना ही सम्भवत: जीवन का पर्याय है। 'पुनर्नवा' के देवरात कहते हैं-"पुनर्नवा देवी, तुम नित्य नवीन होकर मानसपटल पर उदित होती हो। जानती नहीं, किस मर्मवेदना को जगा जाती हो, किस बासी घाव को नया कर जाती हो। देवरात स्वयं मुर्झा गया है, उसमें पुनर्नवा के स्वागत करने की क्षमता नहीं है।... पुनर्नवा बनकर नित्य आती रहो। तुम्हारा कष्ट किसी को हरा कर जाए तो क्या हर्ज़ है देवि ! नहीं, तुम नित्य नवीन होकर हृदय में उतरा करो। नित्य नवीन होकर पुन:- पुनः नवीन होकर मेरी पुनर्नवा रानी!"
 
पुनर्नवा अर्थात् पुनः नवीन, पुनः जाग्रत, पुनः प्राणवन्त होने की व्याप्त वेदना इस सम्पूर्ण उपन्यास के समस्त पात्रों को मथती रहती है। देवरात महाकाल के दरबार में पहुँचकर भी शांति प्राप्त नहीं करते। वे स्थिति की खोज में हैं परन्तु महाकाल केवल गति मात्र हैं, निरन्तर धावमान गति, एक क्षण के लिए भी न रुकने वाला प्रचंड वेग-"जो कुछ पुराना है, जीर्ण है, सड़ा-गला है, वह ध्वस्त होता जा रहा है, नवीन के निर्माण में प्रत्येक पग पर मृत्यु का तांडव दिखाई दे रहा है। काल की यह प्रचंड धारा रुक नहीं सकती, मृत्यु और जीवन की यह परस्पर सापेक्षिता दूर नहीं हो सकती।" यही समय के प्रवाह का सत्य है। यही पुनर्नवता है। चंद्रमौलि कहता है-"दो तरह की रचनाएँ होती हैं। एक प्रकार की रचनाएँ विधाता की सृष्टि हैं, दूसरी तरह की रचनाएँ मनुष्य की सृष्टि हैं। स्वयं मनुष्य पहली श्रेणी में आता है। मनुष्य और प्राकृतिक वस्तुओं, जीव-जन्तुओं, लता-पादपों की रचना एक ही कर्ता के द्वारा हुई है। इसीलिए हम इन प्राकृतिक वस्तुओं की निर्माण-विधि की आलोचना नहीं करते। वह जैसी बनी हैं, वैसी बनेंगी ही। हम उनसे सुख पा सकते हैं, दुख पा सकते हैं-पर वे हैं; हम यह कहने के अधिकारी नहीं हैं कि वे क्यों वैसी बनी हैं। हम स्वयं भी उसी की सृष्टि हैं, पर जो व्यवस्था मनुष्य ने बनाई है, उसकी बात और है। उसमें दोष हो तो उसे बदला जा सकता है।"
 
चंद्रमौलि की यह बात देवरात को व्याकुल कर देती है। वे सोचने लगते हैं- "यह धर्म-कर्म, संयम-नियम क्या व्यर्थ के ढकोसले हैं ? क्या विधाता की बनाई सृष्टि से भिन्न हैं ? क्या शास्त्रों में जो समाज सन्तुलन की व्यवस्था है, वह मनुष्य की बनाई है, विधाता के इंगित पर नहीं बनी है ? क्या सारा अपौरुषेय समझा जाने वाला ज्ञान, विधि-विधान का अंग नहीं है? क्या मनुष्य के बनाए घर-द्वार और ईंट-पत्थर के समान वह भी आलोच्य और परिवर्तितव्य है? आचार्य पुरगोभिल कहते हैं, अगर निरंतर व्यवस्थाओं का संस्कार और परिमार्जन नहीं होता रहेगा तो एक दिन व्यवस्थाएँ तो टूटेंगी ही, अपने साथ धर्म को भी तोड़ देंगी।... सामाजिक व्यवस्थाएँ ऐसी ब्रह्मरेख नहीं हैं जो मिट ही नहीं सकती। इसीलिए धर्म की रक्षा के लिए निरन्तर विचार करते रहने की आवश्यकता होती है।"
 
चतुर्थ शताब्दी की घटनाओं पर आधारित आचार्य द्विवेदी का 'पुनर्नवा' उपन्यास युग की सीमा को लाँघकर आज के प्रश्नों को रेखांकित करता है तथा उनका एक विवेकसम्मत समाधान खोजने का प्रयत्न करता है। धर्म तथा सामाजिक विधि-व्यवस्था के प्रति आज जो अवमानना की प्रवृत्ति वृद्धि पा रही है, लोक-मानस में शुष्क धर्माचार तथा रूढ़ मान्यताओं के प्रति आज जो भावलोक का विद्रोह प्रतीत हो रहा है, उसके प्रति द्विवेदी जी पूर्णरूप से सचेत थे तथा उन्होंने उस भावलोक के विद्रोह की वास्तविकता को स्वीकार करते हुए अपनी प्रगतिशील मानववादी दृष्टि का परिचय दिया। आचार्य पुरगोभिल ने बदली हुई परिस्थितियों के साथ सम्मिलित करके सामाजिक विधि-व्यवस्था का जो विश्लेषण किया, वह उपन्यासकार की अत्यन्त जागरूक दृष्टि का परिचायक है। मृत मान्यताओं, अप्रासंगिक व्यवस्थाओं तथा नीति-अनीति की सड़ी रूढ़ियों को तोड़कर जीवन की प्रवहमान धारा से उत्पन्न नये मूल्यों को स्वीकारने का साहसपूर्ण प्रयास इस उपन्यास में हुआ। समाज-व्यवस्था, विधि-व्यवस्था, धर्म-व्यवस्था को परिस्थितियों तथा मानवीय आकांक्षाओं के अनुरूप ढालते जाना ही शायद पुनर्नव होना है तथा इस पुनर्नव होने के स्वागत का साहस ही आचार्य द्विवेदी के इस उपन्यास का विशेष सन्देश है।
 
'अनामदास का पोथा' में आचार्य द्विवेदी ने उपनिषद्कालीन समाज में आज के लिये प्रासंगिक मूल्य खोजने का प्रयत्न किया है। उन्होंने एकांत तप के स्थान पर समाज-सेवा की प्रतिष्ठा की है- "एकांत का तप बड़ा तप नहीं है। देखो, संसार में कितना कष्ट है, रोग है, शोक है, दरिद्रता है, कुसंस्कार है। लोग दुख से व्याकुल हैं। उनमें जाना चाहिए। उनके दुख का भागी बनकर उनका कष्ट दूर करने का प्रयत्न करो। यही वास्तविक तप है। जिसे यह सत्य प्रकट हो गया कि सर्वत्र एक ही आत्मा विद्यमान है, वह दुख-कष्ट से जर्जर मानवता की कैसे उपेक्षा कर सकता है ?"
 
इसी प्रकार आचार्य द्विवेदी ने पाप-पुण्य की व्याख्या भी नवीन सन्दर्भ में की है-“हाँ बेटा, तूने ठीक प्रश्न किया है। बादरायण व्यास ने कहा है कि जिस कार्य से किसी को शारीरिक या मानसिक कष्ट होता है, वह पाप कार्य है। पर जिससे किसी का दुख दूर हो, उसका इहलोक और परलोक सुधर जाए, रोगी निरोग हो जाए, दुखिया सुखी हो जाए, भूखा अन्न पाए, प्यासा जल पावे, कमज़ोर लोग आश्वासन पावें, वे सब पुण्य हैं; क्योंकि इनसे अंत:करण में विराजमान परम-देवता प्रसन्न होते हैं।"

इस प्रकार स्पष्ट है कि आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी के उपन्यासों में उपर्युक्त सन्देश ही सबसे महत्त्वपूर्ण तथा महान है।संक्षेप में कहा जा सकता है कि हजारीप्रसाद द्विवेदी जी के उपन्यासों में आधुनिकता ऊपर से थोपी हुई कोई पश्चिमी अवधारणा नहीं है, बल्कि वह भारतीय नवजागरण (Indian Renaissance) की कोख से उपजी हुई चेतना है। वे अतीत की खिड़की से झांककर आधुनिक मनुष्य को अपनी जड़ों से जोड़ते हैं और एक ऐसे समतामूलक, मानवीय और रूढ़िमुक्त समाज की परिकल्पना करते हैं जो आज भी प्रासंगिक है।

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