पुनर्नवा उपन्यास के स्त्री पात्रों में चन्द्रा का चरित्र चित्रण

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आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी द्वारा रचित ऐतिहासिक-सांस्कृतिक उपन्यास 'पुनर्नवा' में चन्द्रा एक अत्यंत महत्वपूर्ण, सशक्त और विशिष्ट स्त्री पात्र है।

पुनर्नवा उपन्यास के स्त्री पात्रों में चन्द्रा का चरित्र चित्रण


चार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी द्वारा रचित ऐतिहासिक-सांस्कृतिक उपन्यास 'पुनर्नवा' में चन्द्रा एक अत्यंत महत्वपूर्ण, सशक्त और विशिष्ट स्त्री पात्र है। वह केवल एक चरित्र नहीं, बल्कि उपन्यास की कथावस्तु को गति देने वाली और द्विवेदी जी के नारी-विषयक दृष्टिकोण को अभिव्यक्त करने वाली एक जीवंत कड़ी है।

आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी के सांस्कृतिक उपन्यास 'पुनर्नवा' में अनेक स्त्री पात्र हैं। मंजुला, मृणाल, चन्द्रा, धूतादेवी, वसन्तसेना, मदनिका ऐसे स्त्री पात्र हैं, जिनमें तनिक भी कलुष कालिमा नहीं है। सभी अपनी उज्ज्वलता से पाठक को प्रभावित करके उसके चरित्र को उदात्तता की ओर उन्मुख करते हैं। इसमें मृणालमंजरी एवं धूतादेवी वैध विवाहित पत्नियाँ हैं। मंजुला और वसन्तसेना गणिकाएँ होती हुई भी अपने एकनिष्ठ एवं सात्विक प्रेम के कारण आदर की पात्रा हैं।मदनिका दासी है जो श्यामरूप उर्फ छबीला पंडित उर्फ शार्विलक की प्रेयसी बनकर उसे पति रूप में प्राप्त करती है।इस उपन्यास के स्त्री पात्रों में शेष रह जाती है चन्द्रा, जो अपने साहस, स्पष्टवादिता एवं सच्चे प्रेम के कारण समाज में आदर के साथ-साथ अपने प्रिय आर्यक को अन्त में पतिरूप में प्राप्त करती है।चन्द्रा इस उपन्यास की ऐसी स्त्री पात्र है जो अपने विलक्षण एवं विवादास्पद चरित्र के कारण सभी को अत्यन्त प्रभावित करती है। इसके चरित्र में निम्नलिखित विशेषताएँ हैं- 

संकोच रहित

संकोच नारी की अनिवार्य विशेषता बताई गयी है, पर चन्द्रा के स्वभाव में संकोच तनिक भी नहीं है। उसे अपने पति से नहीं, गोपाल आर्यक से लगाव है। इस बात को वह सार्वजनिक रूप से स्वीकार करती है एवं अपने तथाकथित पति का घर त्यागकर आर्यक के घर आ जाती है। चन्द्रा से कोई कुछ भी कहे, वह बिना किसी संकोच के घूमती और सबकी बातों का उत्तर देती है।
 

अदम्य साहस वाली

चन्द्रा सामान्य नारी नहीं है। उसका पति उसकी रक्षा करने के स्थान पर उसकी बदनामी करना ही अपना कर्त्तव्य समझता है। श्रीचन्द्र ने अपनी पत्नी चन्द्रा को अपने घर से निकाल दिया था। चन्द्रा का इतना ही दोष था कि वह गोपाल आर्यक की वीरता और साहस की प्रशंसा करती थी। वह गोपाल को 'गोपाल भैया' कहती थी। चन्द्रा के पति श्रीचन्द्र ने ही नहीं, ग्राम के अन्य लोगों ने भी यही अनुमान लगाया कि चन्द्रा गोपाल को भैया कहकर हम सबको धोखा देना चाहती है। यह बहन और भैया का स्वांग रचकर अपने व्यभिचार पर पर्दा डालना चाहती है। एक घटना ने चन्द्रा को गोपाल से स्थायी रूप से जोड़ दिया। चन्द्रा के पति श्रीचन्द्र ने उसे घर से निकाल दिया था। रात के समय कुछ बदमाश लोगों ने उसे पकड़ा और एक निर्जन वाटिका में ले गये। चन्द्रा ने उनका प्रबल विरोध किया और अपनी सहायता के लिए पुकार लगायी। तभी गोपाल और वीरक घूमते हुए निर्जन वाटिका से बाहर मार्ग पर पहुँचे। शस्त्र के नाम पर दोनों के हाथ में केवल लाठियाँ थीं। गोपाल ने अपनी लाठी धरती पर पटक कर दहाड़ लगायी - "मैं आ गया हूँ। दुष्टों को अपने किये का फल भोगना होगा। सावधान।"
 
पुनर्नवा उपन्यास के स्त्री पात्रों में चन्द्रा का चरित्र चित्रण
मनुष्य तो कोई नहीं आया। एक स्त्री बचाओ-बचाओ कहती आयी और गोपाल आर्यक के गले से लिपट गयी। उसके बाल अस्त-व्यस्त थे । वस्त्र इधर-उधर हो गये थे। वह स्त्री 'बचाओ-बचाओ' का कातर चीत्कार करती आ रही थी। वीरक स्त्री को भूतनी या चुड़ैल समझकर अचेत हो गया। गोपाल आर्यक के उसका सिर जोर से सहलाया और कहा-'डर नहीं वीरक' इसमें डरने की क्या बात है। वीरक ने आँखें खोली तो देखा कि वह स्त्री आर्यक की बगल में बैठी है। उस स्त्री के मुख पर किसी प्रकार का भय नहीं था। उलटे वह थोड़ा-थोड़ा हँस रही थी। वीरक ने ऐसी सुन्दर स्त्री अपने जीवन में नहीं देखी थी। कुछ लोग स्त्रियों के मुख को पूर्णिमा का चन्द्रमा कहते हैं, पर वीरक ने स्वीकार किया कि उसने उस दिन पूर्णिमा का चन्द्रमा देख लिया था।
 
आर्यक ने वीरक से कहा-"वीरक! यह पड़ौस के गाँव की श्रीचन्द्र की बहू चन्द्रा है। विपत्ति में फँस गयी थी, इसलिए डर गयी है। चलो, इसको इसके घर पहुँचा आवें। इसमें घबराने की कोई बात नहीं।" वीरक ने चन्द्रा को कभी देखा नहीं था, पर वह उसके नाम से परिचित था। आर्यक की बात सुनते ही वीरक का कलेजा धक से रह गया। वह जानता था कि चन्द्रा नाम की युवती ने आर्यक भैया पर अनेक बार डोरे डाले थे। इस चन्द्रा ने आर्यक भैया को अनेक पत्र लिखे थे। वीरक ने वे पत्र आर्यक की पत्नी मृणालमंजरी को दे दिये थे, जिसे वह भाभी कहता था। वीरक के मन में निश्चय दो गया कि इस चन्द्रा ने आर्यक भैया के लिए यह नया जाल रचा है। वीरक ने कह ही दिया कि यह तो छैछी अर्थात् दुश्चरित्र असती है। आर्यक ने वीरक के मन का भाव समझ लिया और उसे कुछ कहने से रोक दिया। बाद में वीरक को चन्द्रा के दुश्चरित्र होने का पूरा निश्चय हो गया। चन्द्रा इस बात की हठ पकड़ रही थी कि वह आर्यक भैया के साथ उनके घर जायेगी। गोपाल आर्यक उसे बार-बार समझा रहा था कि उसे घर जाना चाहिए। चन्द्रा की हठ देखकर वीरक को क्रोध आ गया और उसने जोर से कहा- "तुम अपने घर जाओ।" वीरक के क्रोध का चन्द्रा पर यह प्रभाव पड़ा कि वह वीरक के साथ अपने घर को चल दी। 

वीरक जिस समय चन्द्रा को लेकर उसके घर पहुँचा तो उसका पति घर के बाहर ही मिल गया। चन्द्रा के पति ने कहा- "निकल जा भाग्यहीना मेरे घर से। जिसके साथ अभिसार करने गयी थी, उसी के यहाँ जा।" श्रीचन्द्र ने चन्द्रा और वीरक को सैकड़ों गालियाँ दीं। पास-पड़ौस के बहुत से लोग एकत्र हो गये। तभी श्रीचन्द्र वीरक को मारने झपटा। उसने गाँव के लोगों को ललकारा कि इस आदमी की पिटाई कर दो। सबने वीरक को चरित्रहीन समझ लिया। लोग वीरक की पिटायी करते, उससे पहले ही वीरक ने अपनी लाठी सँभाली और सबका मोर्चा तोड़कर भाग खड़ा हुआ। वीरक यह जानने के लिए उस गाँव के बाहर अँधकार में खड़ा हो गया कि आगे क्या होता है। थोड़ी देर तक हल्ला-गुल्ला होता रहा। थोड़ी देर बाद वीरक को लगा कि चन्द्रा को पीटा जा रहा है। चन्द्रा गालियाँ बकती हुई गाँव से बाहर चली आयी। चन्द्रा अपने पति को कापुरुष, नपुंसक तथा न जाने क्या-क्या कह रही थी। वह अकेली ही गाँव के बाहर निकल आयी। चन्द्रा को अकेली जाती हुई देखकर वीरक को भय हुआ कि यह चन्द्रा कहीं आत्महत्या करने तो नहीं जा रही है, अगर इस अकेली पर कोई संकट आ जाये तो यह बेचारी क्या करेगी ? मैं उस दशा में आर्यक भैया को कैसे मुँह दिखाऊँगा? ऐसा सोचकर वीरक चन्द्रा के पीछे-पीछे चल दिया। चन्द्रा ने वीरक को अपने पीछे आता हुआ देखकर कोई आश्चर्य नहीं किया। वह जानती थी कि मैं उसे यहीं मिलूँगा। वीरक को देखते ही चन्द्रा ने कहा- “देख लिया वीरक! जिसे मेरा पति कहा जाता है, वह कितना निकम्मा पुरुष है? वह मुझे घर में घुसने नहीं देगा, मगर उसके घर में घुसना ही कौन चाहता है। मैं तो आर्यक का मन रखने के लिए यहाँ तक चली आयी थी।"

जब वीरक ने चन्द्रा से पूछा- “अब तुम्हारा कहाँ जाने का विचार है ?" चन्द्रा ने हँसते हुए कहा- "क्यों, आर्यक के रहते हुए मैं और कहाँ जा सकती हूँ? उसी ने तो मेरी रक्षा करने का भार लिया है।" यह सुनकर वीरक के हृदय में धक्का लगा। उसने कहा - "चन्द्रा ! इसमें आर्यक की बदनामी होगी मेरी तो हो ही चुकी।" चन्द्रा ने हँसते हुए कहा- "क्या बदनामी हुई तेरी ? यही न कि तू चन्द्रा के साथ अनुचित सम्बन्ध रखता है। इसमें पुरुष की क्या बदनामी है ? तेरे जैसा जवान पुरुष मैं होती तो न जाने कितनी लड़कियों से प्रेम करती ? तू तो कायरों की तरह बात कर रहा है।"
 
चन्द्रा की बात सुनकर वीरक के पैरों के नीचे से जमीन निकल गयी। वह सोचने लगा कि मैं किस तरह की स्त्री से बात कर रहा हूँ? अगर यह आर्यक भैया के पास पहुँच गयी तो उनकी कितनी बदनामी होगी ? मेरी पार्वती जैसी भाभी मृणालमंजरी पर क्या बीतेगी ? यह सोचकर वीरक ने हाथ जोड़कर चन्द्रा से कहा- "चन्द्रा ! ऐसा अनुचित काम नहीं करना चाहिए। चलो, मैं तुम्हें अपनी माँ के पास पहुँचाये देता हूँ। कल सबेरे इसका कुछ फैसला होगा।" चन्द्रा ने क्रोधित होकर कहा-"तू कापुरुष है। तू मुझे अपने घर में बैठाना चाहता है। जा यहाँ से तू मेरा रास्ता छोड़ दे।" इस चन्द्रा के कारण वीरक तो अपना गाँव छोड़कर भाग ही आया था, आर्यक को भी इसी चन्द्रा के कारण अपना देश छोड़ना पड़ा था। इससे स्पष्ट होता है कि चन्द्रा साहसी नारी है। वह कोई बात छिपाना नहीं चाहती। उसके मन में जो आता है, उसे बिना यह सोचे कह देती है कि दूसरे को कितना बुरा लगेगा ?

जर्जर व्यवस्था को चुनौती

समाज की विवाह व्यवस्था इतनी जर्जर हो जाती है कि विवाह करते समय कन्या की रुचि अरुचि पूछना तो दूर रहा, यह भी नहीं विचार किया जाता कि यह वर कन्या के अनुरूप है भी या नहीं। चन्द्रा का विवाह एक ऐसे व्यक्ति से कर दिया है जो वास्तव में पुरुष है ही नहीं। चन्द्रा इस जर्जर समाज व्यवस्था को स्वीकार नहीं करती। सुमेर काका के साथ हुआ उसका अग्रलिखित वार्तालाप उसके साहस के साथ-साथ इस जर्जर व्यवस्था की अस्वीकृति का भी परिचय देता है-
 
"क्यों री चन्द्रा ! यहाँ जो सब बातें फैली हैं, वे सब झूठ हैं ? तू अपने पति को छोड़कर आर्यक के साथ भाग नहीं गई थी ? बोल चन्द्रा ! ये सब बातें झूठ हैं ?" 
चन्द्रा ने अस्खलित वाणी में कहा- "मैं क्या जानूँ कि यहाँ क्या-क्या बातें फैली हैं और उनमें कौन बात झूठ है ? कौन सच । तुम एक-एक करके पूछोगे तो सब बताऊँगी। फिर तुम स्वयं सच-झूठ का निर्णय कर लेना। अच्छा काका ! स्त्री का विवाह पुरुष से ही होता है न ?" 
और किससे होगा री ?" 
"और स्त्री का विवाह पुरुष से न होकर किसी ऐसे से हो जाये जो पुरुष न हो ? क्या ऐसा विवाह किसी भी दृष्टि से मान्य होगा ?" 
काका ने तड़ाक से उत्तर दिया- "नहीं।"

चन्द्रा ने फिर एक बार सुमेर काका के चरणों का स्पर्श किया। इस बार उसका आंचल भी उसके हाथ में था। बोली-" अब तुम्हें जो पूछना हो, पूछो। सबका उत्तर दूँगी।"
 

विवाह में प्रेम की प्रधानता

चन्द्रा उस विवाह को विवाह नहीं मानती, जिसमें कन्या का वर के प्रति प्रेम न हो। कन्या की रुचि एवं स्वीकृति के अभाव में किया गया विवाह भी कहीं विवाह होता है। चन्द्रा की दृष्टि में प्रत्येक कन्या को अपना मनचाहा वर चुनने की स्वतन्त्रता होनी चाहिए। यदि माता-पिता उसे किसी अनचाहे एवं अयोग्य वर से बाँध देते हैं तो कन्या उसे अस्वीकार करके मनचाहे पुरुष को पति बना सकती है। चन्द्रा प्रारम्भ से आर्यक के पौरुष पर रीझी हुई थी।वह आर्यक को अपना पति मानती थी। समाज और आर्यक दोनों की इच्छा के विरुद्ध चन्द्रा ने जो चाहा, उसे पा लिया। चन्द्रा के निश्छल प्रेम से प्रभावित होकर आर्यक को उसे पत्नी मानना पड़ा।
 

सपत्नी भाव का अभाव

स्त्रियाँ स्वभाव से ही सौत से जलन, ईर्ष्या और द्वेष रखती हैं। चन्द्रा के मन में यह भाव नहीं है कि आर्यक की पत्नी मृणालमंजरी उसके और आर्यक के मिलन में बाधा है। चन्द्रा मृणाल को अपनी छोटी बहन का आदर और निश्छल प्रेम देकर इतना प्रभावित करती है कि मृणाल को उससे कोई शिकायत नहीं रह जाती। आर्यक के भाग जाने के कारण चन्द्रा मृणाल के पास रहना अपना कर्त्तव्य समझती हुई सुमेर काका से कहती है-"अपने घर ही तो आई हूँ। मैं नहीं आऊँगी तो मेरी छोटी बहन मृणाल की कौन देखरेख करेगा ? श्यामरूप भाग गया, आर्यक भाग गया, देवरात भाग गया। मैंने सुना तो दौड़ी चली आई। छोटा बच्चा भी तो है काका! मेरे रहते वह क्यों कष्ट पायेगा ? मैं उसे कैसे छोड़ सकती हूँ ?"
 

पतिव्रता होने का विश्वास

चन्द्रा को समाज भर पतिता एवं पुंश्चली समझकर बदनाम करता है, पर उसे अपने पतिव्रता होने का पूरा विश्वास है। वह आर्यक को अपना पति मानती है और एकमात्र उसी के प्रति उसके मन में प्रेमभाव है। सुमेर काका के प्रति कहे गये उसके इन शब्दों में कितनी दृढ़ता और आत्मविश्वास है-
 
"मैंने आर्यक को ही अपना पति माना था। वह मेरा था और रहेगा। मैं उसके साथ भागकर नहीं गई। वह भागा जा रहा था। मैं साथ हो ली थी। फिर कहीं भागा है, उसकी खोज में हूँ। मैं अगर कुलवधू नहीं हूँ तो संसार में कोई कुलवधू आज तक पैदा ही नहीं हुई।"
 
दृढ़ निश्चयी
चन्द्रा दृढ़ निश्चय वाली नारी है। आर्यक के घर जाकर जब वह देखती है कि पति के बिना मृणाल बहुत दुःखी है तो वह अपना दुःख भूल जाती है। वह मृणाल को सुखी बनाने के लिए आर्यक को खोजने का संकल्प लेती है। चन्द्रा के दृढ़ निश्चय और सच्चे प्रेम के सामने समाज एवं राज्य को झुकना पड़ा। दोनों ने चन्द्रा पर लगाये गये चरित्रहीनता के आरोप वापस ले लिये।
 

आर्यक की पत्नी मृणालमंजरी की बड़ी बहन

अगर चन्द्रा मृणालमंजरी की सौत होती अथवा उसके पति को उससे छीन रही होती तो मृणालमंजरी उसे अपनी बड़ी बहन मानकर आदर और प्रेम नहीं करती। मृणालमंजरी आर्यक को खोजने नदी के मार्ग से नाव द्वारा उज्जयिनी जा रही थी। एक स्थान पर रुकना पड़ा। जब मृणालमंजरी को चन्द्रा दिखाई नहीं दी तो वह चिन्तित हो उठी। मृणालमंजरी ने देखा कि उसका पुत्र शोभन अपनी बड़ी अम्मा अर्थात् चन्द्रा को न देखकर परेशान है। अन्त में शोभन ने सुमेर काका से पूछा- "कहाँ गयी मेरी बड़ी अम्मा।"
 
सुमेर काका ने मन्दिर में देखा, पटवास अर्थात् डेरे में देखा, नाव में देखा । चन्द्रा कहीं नहीं मिली तो वे सोचने लगे कि चन्द्रा कहाँ चली गयी ? काका ने बार-बार देखा, पर चन्द्रा नहीं मिली जितने भी साथी थे, सब विभिन्न स्थानों की ओर दौड़े। दोनों नावें अलग-अलग दिशाओं में भागीं। सभी पुकार रहे थे-चन्द्रा भाभी ! चन्द्रा भाभी ! 

तभी आर्यक की नाव किनारे पर लगी। इससे मन्दिर के चारों ओर भागदौड़ मच गयी। सब लोगों के साथ मृणालमंजरी भी चिल्ला रही थी- "चन्द्रा दीदी ! चन्द्रा दीदी।"
 
सोमेश्वर ने एक घने कुंज में देखा और चिल्लाकर कहा- "चन्द्रा ! चन्द्रा, भाभी दौड़ो ! काका दौड़ो। देखो, चन्द्रा भाभी को क्या हो गया है? अरे जल्दी दौड़ो ! हे भगवान् ! क्या हो गया है इन्हें चन्द्रा भाभी! चन्द्रा भाभी! उठो! दौड़ो काका! दौड़ो भाभी।"
 
मृणालमंजरी पागल के समान दौड़ी। वह चिल्ला रही थी-हे भगवान्! सुमेर काका दूर थे। वे बालक शोभन को लेकर हाँफते-हाँफते दौड़े।आर्यक भी दौड़े! किसी अशुभ आशंका से उनका हृदय धड़क रहा था। मृणालमंजरी ने चन्द्रा को गोद में उठा लिया। वह बोली-दौड़कर पानी लाओ। सोमेश्वर पानी लाने दौड़े। आर्यक दौड़कर कुंज में पहुँचे और मृणालमंजरी से पूछा- क्या हुआ मैना ?
 
मैना की आँखों से अश्रुधारा बह रही थी। उनके मुख पर पानी छिड़का गया, पर कोई प्रभाव नहीं हुआ। आर्यक उसे देखकर सहम गये। मृणालमंजरी ने चुप रहने का आग्रह करके आर्यक से चन्द्रा के मुँह में पानी डालने को कहा। मृणालमंजरी चन्द्रा को हवा करने लगी। शोभन बहुत परेशान था। वह चिल्लाया बड़ी अम्मा। इस स्वर का जादू-सा प्रभाव हुआ । चन्द्रा हड़बड़ाकर उठ बैठी। उसने देखा कि मृणालमंजरी उसके पाँव दबा रही है और वह आर्यक की गोद में है। वह उठ बैठी और आर्यक के चरणों में गिर पड़ी। इसके बाद चन्द्रा मृणालमंजरी के कंधे पर सिर रखे और आर्यक का हाथ पकड़े डेरे में आ गयी।

इस प्रकार अन्तर्विरोधों से भरे चरित्र वाली एवं विचित्र स्वभाव की स्वामिनी चन्द्रा सभी का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करती है। उसकी मान्यताएँ, क्रियाकलाप एवं आचरण चाहे व्यवस्था विरोधी हैं, पर उसका पक्ष सबल है, यह सभी को स्वीकार करना पड़ता है।संक्षेप में, 'पुनर्नवा' की चन्द्रा नारीत्व के एक नए और सशक्त रूप का प्रतिनिधित्व करती है। वह आधुनिक चेतना से युक्त, प्रेम में समर्पित, किंतु अपने अस्तित्व और अधिकारों के प्रति सजग स्त्री है। आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने उसके चरित्र के माध्यम से यह दिखाया है कि स्त्री केवल पुरुष की अनुगामिनी नहीं है, बल्कि वह इतिहास और समाज को बदलने की क्षमता रखने वाली एक स्वतंत्र शक्ति है।

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