पुनर्नवा उपन्यास का नायक गोपाल आर्यक का चरित्र चित्रण वे कथा के नायक हैं और उनका चरित्र राजनीतिक परिवर्तन, सामाजिक चेतना और उदात्त प्रेम का प्रतीक है
पुनर्नवा उपन्यास का नायक गोपाल आर्यक का चरित्र चित्रण
आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी द्वारा रचित ऐतिहासिक-सांस्कृतिक उपन्यास 'पुनर्नवा' के प्रमुख पात्रों में गोपाल आर्यक (जिन्हें उपन्यास में 'आर्यक' भी कहा गया है) का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है। वे कथा के नायक हैं और उनका चरित्र राजनीतिक परिवर्तन, सामाजिक चेतना और उदात्त प्रेम का प्रतीक है।
वृद्ध गोप का पुत्र, आर्य देवरात का शिष्य, श्यामरूप का अनन्य मित्र एवं मृणालमंजरी का पति गोपाल आर्यक 'पुनर्नवा' उपन्यास का नायक है। जिसे फल प्राप्ति होती है, वही भारतीय काव्य- शास्त्र के अनुसार नायक माना जाता है। गोपाल आर्यक मगध के सम्राट् समुद्रगुप्त का अनन्य मित्र था। उसकी वीरता से प्रभावित होकर सम्राट् ने उसे अपना सेनापति बनाया था। चन्द्रा के कारण फैली बदनामी से आर्यक इतना लज्जित एवं भयभीत हुआ कि चुपचाप भाग खड़ा हुआ। सम्राट् भी उसके दुश्चरित्र होने से अप्रसन्न थे । उज्जयिनी के राजा पालक की हत्या करके वहाँ अधिकार करने के बाद भी उसे शान्ति नहीं मिली। उसकी निर्दोषता जानकर सम्राट् ने उसे अपने पास बुलाया एवं बटेश्वर में स्थित उसकी पत्नी मृणाल से मिलने का निर्देश दिया। यहाँ पत्नी, पुत्र एवं प्रेयसी को पाकर आर्यक के मन को शान्ति मिली। यहीं उपन्यास समाप्त हो जाता है। इस प्रकार शान्ति एवं सुयश प्राप्त करने वाला आर्यक ही इस उपन्यास का नायक है। उसके चरित्र में निम्नलिखित विशेषताएँ हैं-
साहसी युवक
आर्यक युवक होते-होते अत्यन्त साहसी बन जाता है। अत्याचार और अत्याचारी दोनों से उसे चिढ़ है। आचार्य देवरात की पत्नी का देहान्त हो चुका था । वेश्या मंजुला की आकृति आचार्य देवरात की पत्नी शर्मिष्ठा से मिलती थी। देवरात वैराग ले चुके थे फिर भी उनका मन मंजुला की ओर आकर्षित हुआ। उन्होंने अपने को वश में किया और अपनी भावना मंजुला को नहीं बतायी। जब महामारी से मंजुला की मृत्यु हो गयी तो आचार्य देवरात ने उसका अंतिम संस्कार किया तथा उसकी पुत्री मृणालमंजरी का अपनी पुत्री के समान पालन-पोषण किया। आचार्य देवरात के आश्रम में गोपाल आर्यक अध्ययन करता था। मृणालमंजरी और गोपाल आर्यक में प्रेम हो गया। दोनों ने विवाह करना चाहा, पर गोपाल आर्यक के पिता ने मृणालमंजरी को वेश्या की पुत्री बताकर अपनी पुत्रवधू बनाने से मना कर दिया। हलद्वीप के राजकुमार का नर्मसखा चन्दनक था। उसने मृणालमंजरी को बिना माता-पिता की समझकर अश्लील इशारे किये और उसे अश्लील पत्र लिखा। गोपाल आर्यक को जब इसका ज्ञान हुआ तो उसने मृणालमंजरी से विवाह कर लिया और जीवन भर उसकी रक्षा करने का वचन दिया। इसके बाद वह अपना कुन्त लेकर चन्दनक के आवास पहुँचा और उसे बुरी तरह फटकारा। हलद्वीप के राजकुमार के नर्मसखा चन्दनक द्वारा मृणाल को लिखे गये अशिष्टतापूर्ण पत्र को पढ़कर आर्यक का विशाल कुन्त हाथ में लेकर अकेले निकल पड़ना और चन्दनक के घर जाकर उसे खोजना कम साहस का काम नहीं था। चन्दनक के साथ राज - शक्ति थी । हलद्वीप की प्रजा पर राजा एवं राजसेवकों के अत्याचार रोकने के लिए आर्यक का 'लहुरावीर दल' बनाना भी अत्यन्त साहस का काम था।
पराक्रमी वीर
आर्यक अत्यन्त पराक्रमी वीर है। उसके शरीर में असीम शक्ति और मन में अमित साहस है। वह अकेला ही हलद्वीप को अत्याचारी राजा से मुक्ति दिलाने की प्रतिज्ञा करता है और अपने कुछ मित्रों के सहयोग से पूर्ण करके दिखाता है। अपनी वीरता एवं पराक्रम की कीर्ति के सहारे मगध के सम्राट् की मैत्री एवं सेनापति पद प्राप्त कर लेना आर्यक की बहुत बड़ी उपलब्धि है। उज्जयिनी में भी अकेला ही आर्यक शस्त्र के बल पर निर्भय है और राजा पालक के सैनिकों की अशिष्टता पर बार-बार उसका हाथ कृपाण की मूँठ पर चला जाता है। आर्यक को पकड़कर मार डालने की आज्ञा हो चुकी है, पर चारुदत्त के परिवार के साथ गाड़ी के पर्दे के भीतर छिपकर बैठा आर्यक भयभीत नहीं है।ज्योंही सैनिक गाड़ी का पर्दा उठाते हैं, त्योंही आर्यक राजा के रथ पर पहुँचकर उसका सिर काट लेता है। राजसेना कुछ भी नहीं कर पाती । सेनापति के रूप में अनेक युद्ध जीतना भी उसके पराक्रमी योद्धा एवं कुशल सेनापति होने का प्रमाण है।
आदर्श प्रेमी
आर्यक देवरात के आश्रम में रहते-रहते उनकी पालिता पुत्री मृणालमंजरी से प्रेम करने लगता है। यह प्रेम सर्वथा निष्पाप, पवित्र एवं आदर्श प्रेम था। मृणालमंजरी को चन्दनक द्वारा अपमानित जानकर वह अपमान करने वाले चंदनक की हत्या को तत्पर हो जाता है और मृणाल को उसकी आजीवन रक्षा का वचन देता है। मृणाल उसकी पत्नी तो बाद में बनती है। आर्यक की दूसरी प्रेयसी है - चन्द्रा । चन्द्रा आर्यक की वीरता से प्रभावित होकर उससे प्रेम करने लगती है और उसे अपना पति मानती है। चन्द्रा किसी दूसरे की पत्नी है, इसलिए उसे स्वीकार करना आर्यक पाप समझता है। चन्द्रा उसका पीछा नहीं छोड़ती तो आर्यक चुपचाप भाग जाता है।
मृणालमंजरी से प्रेम करके गोपाल आर्यक उसके साथ अवैध सम्बन्ध स्थापित करना नहीं चाहता था। उसके पिता ने विवाह का निषेध किया तो वह मान गया। जब चन्दनक ने उसकी प्रेयसी मृणाल का अपमान किया तो उसने पिता की चिन्ता न करके उससे विवाह करके सच्चे प्रेम का परिचय दिया। यही बात गोपाल आर्यक ने चन्द्रा के विषय में की। वह चाहता तो चन्द्रा को लेकर कहीं चला जाता। वह अपनी पत्नी को धोखा नहीं देना चाहता था। जब उसने देख लिया कि चन्द्रा का प्रेम वासना नहीं है और मृणालमंजरी उसे अपनी बहन मान चुकी है तो उसने चन्द्रा को अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार कर लिया।
शीलवान
आर्यक वीर, शक्ति सम्पन्न एवं साहसी होकर भी अत्यन्त शीलवान युवक है। चन्द्रा उससे सच्चा प्रेम करती है और उसके पीछे लग जाती है। शील एवं संस्कार सम्पन्न आर्यक उससे बचना चाहता है। चन्द्रा के कारण फैली बदनामी से लज्जित होकर आर्यक अपनी पत्नी एवं मित्र सम्राट् समुद्रगुप्त के सामने पड़ने का साहस न करके अकेला मारा-मारा फिरता है। आर्यक ने कुछ नहीं किया है, वह सर्वथा निर्दोष है, फिर भी वह लोक-निन्दा के भय से मुँह छिपाता फिरता है।
जिनके पास शक्ति होती है, वे दुराचरण और अपराध करके भी लज्जित नहीं होते। वे समझते हैं कि हमारा कोई क्या बिगाड़ लेगा ? गोपाल आर्यक का हृदय सर्वथा निष्पाप है। वह अपने असत्य अपवाद को भी सहन नहीं कर पाता। जिस चन्द्रा को गोपाल आर्यक की पत्नी मृणालमंजरी ने अपनी बहन और सखी माना, उसी चन्द्रा का नाम अपने साथ जुड़ने से गोपाल आर्यक इतना लज्जित होता है कि अपना सेनापति पद छोड़कर हलद्वीप से भाग जाता है। वह लज्जा और ग्लानि से विगलित हुआ जा रहा था कि चन्द्रा से उसके शारीरिक सम्बन्ध की बात जानकर उसकी पत्नी और प्रेयसी मृणालमंजरी क्या सोच रही होगी ? गोपाल आर्यक के गुरु आचार्य देवरात ने भी गोपाल आर्यक की दुश्चरित्रता की बात पर विश्वास कर लिया था। आचार्य देवराज का दुःख यह सोचकर दूना हो गया था कि उनका शिष्य और उनकी पालिता पुत्री का पति गोपाल आर्यक चरित्रहीन कैसे हो गया। मगध के सम्राट समुद्रगुप्त ने भी अपने सेनापति के विरुद्ध फैले हुए अपवाद पर विश्वास कर लिया और गोपाल आर्यक को एक फटकार मारकर भेजा।
उत्तम पति
आर्यक का विवाह अपनी बाल सखी एवं प्रेयसी मृणालमंजरी से होता है। आर्यक पत्नी के प्रति पति का कर्त्तव्य समझता है। चन्द्रा को लेकर उसकी जो झूठी बदनामी उड़ती है, उससे लज्जित होकर आर्यक अपनी पत्नी मृणालमंजरी के सामने जाने का साहस नहीं कर पाता । चन्द्रा को मृणालमंजरी अपनी सखी और छोटी बहिन स्वीकार कर लेती है। अनेक वर्ष तक दोनों साथ-साथ रहती हैं, पर आर्यक चन्द्रा को बहुत बाद में पत्नी स्वीकार करता है, वह भी मृणाल के आग्रह पर।
सम्राट् से प्रतिबद्धता
मगध के सम्राट् समुद्रगुप्त आर्यक के मित्र एवं स्वामी हैं। आर्यक उनका बहुत आदर करता है एवं उनका सदा भक्त बना रहता है। चन्द्रा के विषय में आर्यक सर्वथा निर्दोष है। वह केवल यह जानकर लज्जा और ग्लानि से भरा रहता है कि इस कारण उसके स्वामी समुद्रगुप्त उससे अप्रसन्न हैं एवं उसे अपराधी समझते हैं। दूर रहकर भी वह अपनी प्रतिबद्धता सम्राट् समुद्रगुप्त के प्रति ही रखता है। वह जितने भी देश जीतता है, उनका राजा स्वयं न बनकर सम्राट् समुद्रगुप्त को ही घोषित करता है। अपनी पत्नी मृणाल एवं प्रेयसी चन्द्रा से भेंट भी वह सम्राट् की आज्ञा से विवश होकर करता है, अन्यथा उसका साहस उनके सामने जाने का नहीं था।
प्रजा का हितैषी
आर्यक बचपन से ही प्रजा का हितचिन्तक है। हलद्वीप की प्रजा को अत्याचारी राजा द्वारा दलित, शोषित एवं त्रस्त देखकर वह उसे सुरक्षित एवं निश्चिन्त बनाने की प्रतिज्ञा करता है। इतना ही नहीं, वह राजकोष की चिन्ता न करके अपने साथियों के साथ गली-गली घूमकर प्रजा को रक्षा एवं अत्याचार से बचाव का आश्वासन देता है। उज्जयिनी शासक पालक से भी उसका विरोध केवल इसलिए होता है कि वह प्रजा-पीड़क था। प्रजा का पक्ष लेने के कारण ही पालक के कोप का भाजन बना हुआ आर्यक छिपकर रहने को विवश हो जाता है।
भ्रातृ प्रेम
श्यामरूप आर्यक का सगा भाई नहीं है। वह ब्राह्मण पुत्र है । उसका पालन-पोषण वृद्ध गोप ने अपने पुत्र आर्यक के साथ किया है। आर्यक उसे अपना सगा भाई समझता है। श्यामरूप से आर्यक को बहुत लगाव है। ब्राह्मण पुत्र होने के कारण श्यामरूप कर्मकाण्ड सीखने पाठशाला में भेज दिया जाता है तो आर्यक को बहुत बुरा लगता है। जब आर्यक श्यामरूप के पाठशाला से भाग जाने की बात सुनता है तो उसका मन नहीं मानता। वह किसी को बिना बताये अपने भाई एवं मित्र श्यामरूप को खोजने निकल पड़ता है।
भावुक हृदय
आर्यक वीर, पराक्रमी, शक्तिशाली एवं योद्धा होकर भी अत्यन्त भावुक हृदय वाला है। यह भावुकता ही उसे श्यामरूप को खोजने के लिए घर से भागने पर विवश करती है। इसी भावुकता के कारण वह चन्द्रा के सम्बन्ध में फैली बदनामी के कारण सबको छोड़कर भाग जाता है और किसी परिचित के सामने जाने का साहस नहीं कर पाता है।
राज्य के लोभ से सर्वथा रहित
गोपाल आर्यक को राज्य का कोई लोभ नहीं था। जब उसे पता चला कि मगध के सम्राट् ने उसके विषय में फैली दुश्चरित्रता की अफवाह पर विश्वास कर लिया है तो उसने मगध राज्य को त्याग दिया। इतने पर भी उसने बाद में जिन राज्यों को विजय किया, वह उनका सम्राट् नहीं बना, अपितु उन्हें मगध के राज्य में मिला दिया। वह चाहता तो उनका शासक बन सकता था। उज्जयिनी के राजा पालक का वध भी गोपाल आर्यक ने वहाँ का राज्य पाने के लिए नहीं किया। उज्जयिनी का शासक पालक इतना निकम्मा था कि उसे प्रजा के सुख और दुःख से कोई प्रयोजन नहीं था। राजा पालक का साला भानुदत्त प्रजा का शोषण कर रहा था। राजा पालक को उनके साले भानुदत्त ने मुट्ठी में कर रखा था। भानुदत्त जो समझा देता था, पालक उस पर विश्वास कर लेता था।
गोपाल आर्यक चुपचाप उज्जयिनी से निकल जाना चाहता था । भानुदत्त के सैनिक उसे पकड़ने के लिए प्रत्येक वाहन की कर रहे थे। आर्य चारुदत्त अपनी पत्नी धूता देवी के साथ पर्देदार गाड़ी में जा रहे थे। उन्होंने गोपाल आर्यक को शरण दी । भानुदत्त के सैनिकों के दो दल बन गये थे। एक दल आर्य चारुदत्त जैसे सम्मानित व्यक्ति की पर्दे वाली गाड़ी की जाँच करना अनुचित मान रहा था और दूसरा दल सेनापति भानुदत्त की आज्ञा का पालन करना चाहता था। इस स्थिति में तो गोपाल आर्यक शान्त रहा। जब राजा पालक ने आर्य चारुदत्त की पर्दे वाली गाड़ी की जाँच करने का आदेश दिया तो यह गोपाल आर्यक को आर्य चारुदत्त का अपमान जान पड़ा। गोपाल अपना क्रोध नहीं रोक सका। उसने नंगी तलवार लेकर राजा पालक के रथ पर आक्रमण किया और उसका वध कर दिया।
पालक का वध करने के बाद भी पालक की इच्छा उज्जयिनी का शासक बनने की नहीं थी। इसका प्रमाण पालक की मृत्यु के बाद गोपाल आर्यक द्वारा करायी गई घोषणा है। गोपाल आर्यक ने यह घोषणा करायी - “अब गोपाल आर्यक ने आदेश दिया कि नगर में घोषणा करा दो कि पालक मारा गया है और गोपाल आर्यक ने तब तक व्यवस्था सम्हालने के लिए राजपद ग्रहण किया है जब तक पाटलिपुत्र के महान् सम्राट् से कोई आदेश नहीं आ जाता। गोपाल आर्यक उस सम्राट् का सैनिक अधिकारी मात्र है।उसने और भी आदेश दिया कि राजभवन की किसी महिला का कोई असम्मान न होने पावे और नगर में जो भी दुःखी और सताया हुआ हो, वह अब से अपने को आर्यक के द्वारा रक्षित समझे। कहीं कोई कष्ट न पावे, भूखा न रहे, अत्याचारित न हो।" यदि गोपाल आर्यक को राज्य का लोभ होता तो वह ऐसी घोषणा क्यों कराता ? उसने पालक का वध अकेले किया था, मगध की सेना की सहायता से नहीं।
इस प्रकार आर्यक धीरोदात्त चरित्र का व्यक्ति है, जिसे भारतीय काव्यशास्त्र उत्तम कोटि का नायक मानता है।गोपाल आर्यक 'पुनर्नवा' उपन्यास के एक ऐसे धीरोदात्त नायक हैं जो व्यक्तिगत सुखों का त्याग कर समष्टि (समाज) के हित के लिए संघर्ष करते हैं। उनका चरित्र हजारीप्रसाद द्विवेदी जी के मानवतावादी दृष्टिकोण, सांस्कृतिक पुनर्जागरण और सामाजिक बदलाव के संदेश को पूरी तरह चरितार्थ करता है।


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