पुनर्नवा उपन्यास का उद्देश्य | हजारी प्रसाद द्विवेदी

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पुनर्नवा उपन्यास का उद्देश्य | हजारी प्रसाद द्विवेदी आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी द्वारा लिखित उपन्यास 'पुनर्नवा' एक सांस्कृतिक उपन्यास है।

पुनर्नवा उपन्यास का उद्देश्य | हजारी प्रसाद द्विवेदी


चार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी द्वारा लिखित उपन्यास 'पुनर्नवा' एक सांस्कृतिक उपन्यास है। यह उपन्यास भारत की दूसरी-तीसरी शताब्दी का परिचय है, जब बौद्ध साधुओं का प्रभाव समाप्त होकर भारत में भागवत् धर्म की स्थापना हो रही थी, जिसके इष्टदेव गोपालकृष्ण थे।द्विवेदी जी के सभी उपन्यास भारतीय संस्कृति की विस्तृत व्याख्या को सरल एवं मनोहर रूप में प्रस्तुत करते हैं। उन्होंने संस्कृति के सभी अंगों का संकेत रूप में विस्तृत विवेचन अग्र प्रकार किया है-
 

धार्मिक भावना

धार्मिक भावना अथवा परलोक सम्बन्धी विश्वास अथवा आध्यात्मिक मान्यता संस्कृति का प्रमुख अंग है। जिस काल-
पुनर्नवा उपन्यास का उद्देश्य | हजारी प्रसाद द्विवेदी
खण्ड को लेकर द्विवेदी जी ने यह उपन्यास लिखा है, उसमें देवी-देवताओं की मान्यता लोक-कथाओं के रूप में प्रचलित थी ।कृष्ण के पुत्र साम्ब को लहुरावीर के रूप में पूजा जाता था। जनता के भक्षक एवं अत्याचारी शासक का विरोध करने वाले एवं वृद्ध गोप के पुत्र गोपाल आर्यक को लहुरावीर का अवतार माना जाने लगा था। लहुरावीर के विषय में लेखक ने अपना मत इस प्रकार प्रकट किया है- "मथुरा के कुषाणों पर विजय पाने के बाद किसी आभीर राजा ने अनुभव किया कि कुषाण लोग जिस प्रकार पंचध्यानी बुद्धों की उपासना करते हैं, उसी प्रकार की पंचमूर्ति अभीरों की भी उपास्य बननी चाहिए, क्योंकि मथुरा की जनता में पाँच की संख्या बहुत प्रिय है। भागवत् धर्म में चतुर्व्यूह की उपासना प्रचलित है। ये चार देवता हैं-बलराम, श्रीकृष्ण, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध। आभीर राजा ने इस मण्डली में श्रीकृष्ण के छोटे पुत्र साम्ब को भी जोड़कर पाँच वृष्णि वीरों की उपासना प्रचलित की है। सुना है कि मथुरा में उन्होंने पाँच वृष्णि वीरों का विशाल मन्दिर बनवाया है। यही साम्ब लहुरावीर है। पुराने चार वीरों के बाद इसका नम्बर है, कदाचित् इसीलिए इन्हें लहुरावीर कहा गया है।" धर्म निराकार है। उसका साकार रूप होते हैं, वे पुरुष और नारियाँ जो अपने जीवन द्वारा धर्म की नवीन व्याख्या प्रस्तुत करते हैं। आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने धर्म के साकार रूप में आचार्य देवरात को प्रस्तुत किया है।उपन्यास उन्हीं से आरम्भ होता है-

"देवरात साधु पुरुष थे। कोई नहीं जानता था कि वे कहाँ से आकर हलद्वीप में बस गये थे। लोगों में उनके विषय में अनेक प्रकार की किंवदंतियाँ थीं। कोई कहता था, वे कुलूत देश के राजकुमार थे और विमाता से अनेक प्रकार के दुर्व्यवहार प्राप्त करने के बाद संसार से विरक्त होकर इधर चले आये थे। कुछ लोग बताते थे कि बाल्यावस्था में ही उनका मंश्वलि नामक किसी सिद्ध पुरुष से परिचय हो गया और उनके उपदेशों से वे संसार त्यागकर रमता राम बन गये। उनके गौर शरीर, प्रशस्त ललाट, दीर्घ नेत्र, कपाट के समान वक्ष:स्थल, आजानुलंबित बाहुओं को देखकर इसमें कोई संदेह नहीं रह जाता था कि वे किसी बड़े कुल में उत्पन्न हुए हैं। उनके शरीर में पुरुषोचित्त तेज और शौर्य दमकता रहता था और मन में अद्भुत औदार्य और करुणा की भावना थी। वे संस्कृत और प्राकृत के अच्छे कवि भी थे और वीणा, वेणु, मुरज और मृदंग जैसे विभिन्न श्रेणी के वाद्य यंत्रों के कुशल वादक भी थे। चित्र कर्म में भी वे कुशल माने जाते थे यह प्रसिद्ध था कि क्षिप्तेश्वर नाथ महादेव के भीतरी भाग में जो भित्ति चित्र बने थे, वे देवरात की ही चमत्कारी लेखनी के फल थे। शील, सौजन्य, औदार्य और मृदुता के वे यद्यपि आश्रय माने जात थे, परन्तु फिर भी उन्होंने वैराग्य ग्रहण किया था। हलद्वीप के राजपरिवार में उनका बड़ा सम्मान था। जब कभी राजा के यहाँ कोई उत्सव होता था, वे ससम्मान बुलाये जाते थे। वे यज्ञ-याग में उसी उत्साह के साथ सम्मिलित होते थे, जिस उत्साह के साथ मल्ल समाहवय में। वे पंडितों की वाद सभा में भी रस लेते थे और नृत्य गीत के आयोजनों में भी। लोगों का विश्वास था कि उन्हें संसार के किसी विषय में आसक्ति नहीं थी। उनका एकमात्र व्यसन था- दीन-दुखियों की सेवा, बालकों को पढ़ाना और उन्हीं के साथ खेलना। यद्यपि वे अनेक शास्त्रों के ज्ञाता थे और भगवद् भक्त भी माने जाते थे, परन्तु वे नियमों और संस्कारों के बन्धनों में कभी नहीं बँधे। साधारण जनता में उनकी रहस्यमयी शक्तियों पर बड़ी आस्था थी। परन्तु किसी ने उन्हें कभी पूजा-पाठ करते भी नहीं देखा था।" यही स्थिति 'मैना मांजर देई' नामक लोकपूजिता देवी की थी। पतिव्रता मृणालमंजरी ही लोक-कथाओं में मैना मांजर देई बन गई थी।
 

सामाजिक दशा

अत्याचारी राजाओं के कारण समाज का ढाँचा चरमरा रहा था। किसी का भी शील सुरक्षित नहीं था। युवतियाँ, कुमारियाँ एवं कुलवधुएँ दृप्त राजपुरुषों की वासना का शिकार बन रही थीं। आदरणीय देवरात के आश्रम में भी चन्दनक मृणालमंजरी को वासना भरा पत्र देने पहुँच गया, इससे नारियों की असुरक्षा का अनुमान लगाया जा सकता है। वर्ण-व्यवस्था भी परिवर्तित होने लगी थी । ब्राह्मण पुत्र श्यामरूप का कर्मकाण्ड से उकताकर मल्ल बनना इसका प्रमाण है । ब्राह्मणों के प्रति आदर भाव था, यद्यपि वह बहुत कम हो चुका था। उज्जैन में आर्य चारुदत्त का आदर ब्राह्मण होने के कारण ही था। इसी आदर भावना के कारण राजा पालक के सैनिक दो भागों में विभक्त हो गये थे। कुछ उस गाड़ी का पर्दा उतारकर देखना चाहते थे, जिसमें चारुदत्त की पत्नी धूतादेवी बैठी बताई गई थी।कुछ सैनिक ऐसा करना धूतादेवी का अपमान समझ रहे थे। वैसे चारुदत्त का प्रेम वसन्तसेना नाम की वेश्या से प्रसिद्ध था।
 
समाज में वेश्याओं, नर्तकियों एवं व्यभिचारिणी स्त्रियों को हीन दृष्टि से देखा जाता था। एक पुरुष से विवाहित नारी यदि दूसरे पुरुष से सम्बन्ध रखती थी तो समाज उसकी निन्दा करता था। अपने पति को छोड़कर आर्यक को प्रेम करने वाली चन्द्रा का उदाहरण लिया जा सकता है। स्त्रियों में सिंहवाहिनी एवं महिषमर्दिनी की प्रचलित थी। स्त्रियाँ पढ़ने भी लगी थीं। समाज में नवीन चेतना जागृत हो।

प्रायः वेश्याओं को ही नहीं, उनकी संतानों को भी हेयदृष्टि से देखा जाता था। गोपाल आर्यक मृणालमंजरी से विवाह करना चाहता था। उसके पिता वृद्ध गोप ने मृणालमंजरी को वेश्या की पुत्री बताकर अपने पुत्र से विवाह करना अस्वीकार कर दिया था। यह सोच पुरानी पीढ़ी की थी। नयी पीढ़ी के युवक गोपाल आर्यक ने मृणालमंजरी से न केवल विवाह किया, अपितु उसकी रक्षा का प्रण भी किया। गोपाल आर्यक ने उज्जयिनी का राजा बनने पर भी दूसरे विवाह का विचार नहीं किया।

चारुदत्त व्यापारी बन गये थे। वैसे वे कुलीन ब्राह्मण थे। उनका उज्जयिनी में विशेष आदर था, उन्होंने भी वेश्यापुत्री वसन्तसेना से विवाह किया था। यह बात अलग है कि वसन्तसेना वेश्या नहीं थी और चारुदत्त से प्रेम करती थी। श्यामरूप अथवा छबीला पंडित अथवा शार्विलक कुलीन ब्राह्मण था । उसने मदनिका को पत्नी रूप में स्वीकार किया था। वह नटों द्वारा दासी के रूप में वसन्तसेना को बेच दी गयी थी । तात्पर्य यह है कि समाज में नवीन सोच विकसित होने लगी थी।

राजनीतिक परिवेश

उस समय लगभग सम्पूर्ण उत्तर भारत पर शकों और हूणों का अधिकार था। भारतीय वीर उन्हें मार भगाने का प्रयत्न कर रहे थे। आर्य देवरात अपनी युवावस्था के आरम्भ में हूणों के विरुद्ध युद्ध करने गये थे। तभी उनकी विमाता ने उनके वीरगति पाने की सूचना देकर उनकी पत्नी शर्मिष्ठा को आत्मदाह करने की प्रेरणा दी थी। गोपाल आर्यक ने भी हलद्वीप से अत्याचारी राजा का शासन समाप्त करके शकों एवं हूणों को मार भगाने की प्रतिज्ञा की थी। उसने एवं उसके सेनानायक भटार्क ने मथुरा एवं उज्जयिनी के राजाओं के अत्याचारों से मुक्ति दिलाकर सम्राट् समुद्रगुप्त का शासन स्थापित किया था।

उस समय राजा प्रजा का पिता अथवा पोषक नहीं रह गया था। प्रजा को भाँति-भाँति से पीड़ित करना राजपुरुष अपना अधिकार समझते थे। राजसैनिक घरों में घुसकर नारियों को उठा लाते थे। राज- दरबार गान एवं नृत्य के अखाड़े बने हुए थे। कविताएँ उनमें कभी-कभी सुनने को मिलती थीं। कुछ राजा एवं राजपुरुष मनोरंजन के लिए मल्लों के दंगल कराते थे। श्यामरूप उर्फ छबीला पंडित उर्फ शार्विलक ने ऐसे ही दंगल में मागू पहलवान को पछाड़ कर कीर्ति पाई थी।
 
समाज में राजाओं के प्रति श्रद्धा भावना उनके पद के कारण नहीं, उनके गुणों के कारण थी। जो राजा व्यसनी, आलसी और कायर थे, उनका विरोध राजसैनिक भी करते थे। उज्जयिनी का राजा पालक साहसहीन और अशक्त था। राजा पालक अपने साले भानुदत्त की मुट्ठी में था। भानुदत्त ही नहीं, उसके सैनिक भी प्रजा का धन और शील लूट रहे थे। राजा इस ओर कोई ध्यान नहीं दे रहा था। भानुदत्त ने वसन्तसेना को उसकी इच्छा के विपरीत अंकशायिनी ही नहीं, पर्यंकशायिनी भी बनाना चाहा। वसन्तसेना ने उसका प्रेम निवेदन अस्वीकार कर दिया तो भानुदत्त ने अपने सैनिकों को आदेश दिया कि वसन्तसेना के आवास को लूट लें। भानुदत्त के सैनिकों ने वसन्तसेना के राजसी प्रासाद जैसे आवास को न केवल लूट लिया, अपितु वसन्तसेना और उसकी दासी मदनिका को दृढ़ बंधन में बाँधकर एक कोठरी में डाल दिया था। नागरिक राज सैनिकों का विरोध कर रहे थे। उन्होंने भानुदत्त के सैनिकों को वसन्तसेना के आवास में आग नहीं लगाने दी। इससे स्पष्ट होता है कि प्रजा राजा के अनुचित कार्यों का विरोध करने लगी थी । राजा और प्रजा को अपनी संतान नहीं समझ रहा था, तो प्रजा भी उसे अपना रक्षक और पालनकर्त्ता नहीं समझ रही थी।
 
आर्य चारुदत्त की पत्नी धूता देवी की गाड़ी का पर्दा हटाकर देखने के राजकीय आदेश पर सैनिकों में दो वर्ग हो जाना इस बात का प्रमाण है कि सैनिक राजा या सेनापति की आज्ञा आँख बन्द करके मानने वाले नहीं रह गये थे। सभी सैनिकों और नागरिकों के सामने गोपाल आर्यक ने राजा पालक का वध कर दिया, पर न किसी सैनिक ने उसका विरोध नहीं किया और न किसी नागरिक ने। इसका एकमात्र कारण यह था कि उज्जयिनी की प्रजा ही नहीं, राजसैनिक भी राजा पालक से उकता गये थे । एक ओर अकेला गोपाल आर्यक और दूसरी ओर सीमित सैनिक तथा असीमित नागरिक, किसी ने राजा पालक की सहायता न करके संतोष की साँस ली कि एक अपदार्थ राजा से छुटकारा मिला। प्रजा का यह मानसिक परिवर्तन प्रजा की नवीन सोच का प्रमाण है। प्रजा राजा की अनुचित आज्ञा का विरोध करने का साहस सँजो चुकी थी।
 
आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने अपने उपन्यास 'पुनर्नवा' के द्वारा इन प्रतीकों के माध्यम से तत्कालीन संस्कृति का दिग्दर्शन कराया है। उन्होंने इस उपन्यास के माध्यम से उस काल में नारी के प्रति विशेष दृष्टिकोण का परिचय दिया है। उन्होंने मंजुला, चन्द्रा, मृणाल, वसन्तसेना तथा मदनिका के द्वारा नारी के प्रति उदार दृष्टिकोण प्रस्तुत किया है। मंजुला राजनर्तकी एवं गणिका थी। राजर्षि एवं वैरागी आर्य देवरात ने उसमें देवता का निवास बताया एवं उसे नारायण की स्मित रेखा के समान पवित्र घोषित किया। मृणालमंजरी इसी गणिका की पुत्री थी, पर एक कुलवधू के रूप में गोपाल आर्यक से ब्याही गई । चन्द्रा अपने पवित्र एवं दृढ़ प्रेम के कारण विवाहिता होकर भी आर्यक की प्रेयसी स्वीकार कर ली गयी थी ।वसन्तसेना उज्जयिनी की गणिका थी, पर नगर की शोभा समझी जाती थी। मदनिका भी दासी से श्यामरूप की पत्नी के रूप में कुलवधू बनी।
 

जाति अथवा वर्ण और कर्म का सम्बन्ध शिथिल

आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने अपने उपन्यास 'पुनर्नवा' में जिस समय का चित्र उपस्थित किया है, उस समय की वर्ण व्यवस्था के अनुसार निश्चित कार्य करने का बन्धन शिथिल हो गया था। वास्तविकता यह है कि आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी अपने समय के व्यापार और धन्धों की जो स्थिति देख रहे थे, उसी का कुछ अंश उन्होंने अपने उपन्यास 'पुनर्नवा' पर आरोपित किया है। आज सभी जातियाँ या सभी वर्ण व्यापार में संलग्न हैं। उस समय भी उत्तम कुल के ब्राह्मण चारुदत्त व्यापारजीवी थे।
 
प्राचीन वर्ण व्यवस्था के अनुसार शिक्षा देना केवल ब्राह्मण का कार्य था, पर आजकल सभी जातियों के लोग शिक्षक बन रहे हैं। उसी प्रकार क्षत्रिय जाति के देवरात आश्रम बनाकर रहने लगे थे और बालकों को शिक्षा दे रहे थे।
 
श्यामरूप ब्राह्मण था, पर उसकी रुचि पौरोहित्य कर्म की ओर नहीं थी। पौरोहित्य ब्राह्मण का शास्त्रानुमोदित कर्म था। वह नटों के साथ रहकर मल्ल विद्या सीख गया, जबकि यह कार्य ब्राह्मण का नहीं था। मदनिका के विषय में यह निश्चित नहीं था कि वह किस जाति की थी। वह पर्याप्त समय तक उन नटों के समूह में रही थी, जिनके लिए नारी एक मांस पिण्ड के अतिरिक्त कुछ नहीं थी। वे युवतियों को बेचने का धन्धा करते थे। मदनिका वसन्तसेना की दासी रह चुकी थी। शार्विलक बने ब्राह्मण श्यामरूप ने उससे विवाह किया। आजकल अन्तर्जातीय विवाह होने लगे हैं। शासन की ओर से इस प्रकार के विवाहों को पुरस्कृत किया जाता है। इस प्रकार के अधिकांश विवाह प्रेम-विवाह होते हैं, पर कुछ विवाह माता-पिता की अनुमति से भी होने लगे हैं।
 
आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने आज से लगभग 1800 वर्ष पहले की समाज व्यवस्था को अपने उपन्यास 'पुनर्नवा' में प्रस्तुत किया है, उसमें भी आज के उच्छृंखल समाज की कुछ छाया दिखायी है। अपने इस उपन्यास के माध्यम से आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने साहसी नारी चन्द्रा को प्रस्तुत किया जो अपने क्लीव पति के होते हुए साहसी और वीर गोपाल आर्यक को अपना पति मानती ही नहीं, कहती भी थी। नारद स्मृति और पराशर स्मृति नपुंसक पति के होते हुए भी नारियों के अन्य पति का विधान करती है- 

अपत्यार्थं स्त्रियः सृष्टाः स्त्री क्षेत्रं बीजिनो नराः । 
क्षेत्रं बीजवते देयं नाबीजी क्षेत्रमर्हति ॥ (नारद स्मृति)

(स्त्रियों की रचना संतान उत्पत्ति के निमित्त की गयी है। स्त्री खेत है और मनुष्य बीज वाले हैं। खेत बीज वाले को देना चाहिए। बीजरहित पुरुष खेत का अधिकारी होने का पात्र नहीं है।)
 
नष्टे मृते प्रव्रजिते क्लीवे च पतिते पतौ । 
पञ्चस्वापत्सु नारीणां पतिरन्यो विधीयते ॥ (पराशर स्मृति)
 
(पति नष्ट हो जाये, मर जाये, संन्यास ले ले, नपुंसक अथवा पतित हो गया हो - इन पाँच आपत्तियों में नारियों के अन्य पति का विधान है।)

चन्द्रा का पति श्रीचन्द्र नपुंसक अर्थात् क्लीव था इसलिए चन्द्रा उसे अपना पति नहीं मानती थी। उसने साहसी और सशक्त पुरुष गोपाल आर्यक को अपना पति मान ही नहीं लिया था, अपितु सार्वजनिक रूप से घोषित भी कर रखा था। 

इस प्रकार इस उपन्यास के द्वारा नारी के प्रति विशेष पवित्र भाव प्रकट करना ही लेखक का उद्देश्य है। अपने कालखण्ड अर्थात् समुद्रगुप्त के समय की भारतीय संस्कृति की पूर्ण झाँकी प्रस्तुत करने में इस उपन्यास को पूर्ण सफलता मिली है।संक्षेप में कहें तो, हजारी प्रसाद द्विवेदी जी ने 'पुनर्नवा' के माध्यम से मनुष्य की अदम्य जिजीविषा (जीने की इच्छा), उसके भीतर छिपी अच्छाई और समाज को बदलने की उसकी क्षमता में गहरा विश्वास व्यक्त किया है। यह उपन्यास हर युग के मनुष्य को निराशा से निकलकर नवजीवन की ओर बढ़ने की प्रेरणा देता है।

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