पुनर्नवा उपन्यास के आधार पर आर्य देवरात का चरित्र चित्रण

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आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी द्वारा रचित ऐतिहासिक सांस्कृतिक उपन्यास पुनर्नवा में आर्य देवरात एक अत्यंत महत्वपूर्ण गरिमामयी और केंद्रीय पात्र हैं।

पुनर्नवा उपन्यास के आधार पर आर्य देवरात का चरित्र चित्रण


चार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी द्वारा रचित ऐतिहासिक-सांस्कृतिक उपन्यास 'पुनर्नवा' में आर्य देवरात एक अत्यंत महत्वपूर्ण, गरिमामयी और केंद्रीय पात्र हैं। वे केवल एक व्यक्ति नहीं, बल्कि त्याग, कर्तव्य, उदात्त नैतिक मूल्यों और दूरदर्शिता के प्रतीक हैं।

'पुनर्नवा' आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी का सांस्कृतिक उपन्यास है। इस उपन्यास का आरम्भ भारतीय संस्कृति के पर्याय आर्य देवरात के वर्णन से ही हुआ है। कोई भी पुरुषोचित गुण ऐसा नहीं है, जिसकी प्रतिष्ठा लेखक ने आर्य देवरात में नहीं की हो। इस उपन्यास को गरिमा प्रदान करने वाले एवं आधे से अधिक उपन्यास पर छाये रहने वाले तेजस्वी पुरुष आर्य देवरात के चरित्र में निम्नलिखित विशेषताएँ हैं-
 

पूर्ण पुरुष

आर्य देवरात पूर्ण पुरुष हैं। मानवता का ऐसा एक भी गुण नहीं बचता जो आर्य देवरात में न हो। उनका बाह्य एवं आभ्यान्तर दोनों ही श्रेष्ठ, कमनीय एवं उज्ज्वल है। द्विवेदी जी के शब्दों में वे साधु पुरुष थे। उनके गौर शरीर, प्रशस्त ललाट, दीर्घ नेत्र, कपाट के समान वक्षस्थल, आजानुविलम्बित बाहुओं को देखकर इसमें कोई सन्देह नहीं रह जाता था कि वे किसी बड़े कुल में उत्पन्न हुए हैं। उनके शरीर में पुरुषोचित तेज और शौर्य दमकता रहता था और मन में अद्भुत औदार्य और करुणा की भावना थी। वे संस्कृत और प्राकृत के अच्छे कवि भी थे और वीणा, वेणु, मुरज और मृदंग जैसे विभिन्न श्रेणी के वाद्य-यन्त्रों के कुशल वादक भी थे। चित्रकर्म में भी वे कुशल माने जाते थे। यह प्रसिद्ध था कि क्षिप्तेश्वरनाथ महादेव के मन्दिर के भीतरी भाग में जो चित्र बने थे वे देवरात की ही चमत्कारी लेखनी के फल थे। शील, सौजन्य, औदार्य और मृदुता के वे यद्यपि आश्रय माने जाते थे, परन्तु फिर भी उन्होंने वैराग्य ग्रहण किया था। 

प्रवृत्ति और निवृत्ति के संगम

आर्य देवरात वैराग्य धारण करके भी प्रवृत्ति नहीं थे। राजसभा में नर्तकी मंजुला का नृत्य देखना, उसकी कविता की प्रशंसा करना एवं स्वरचित कविता सुनाना उन्हें प्रवृत्तिमार्गी सिद्ध करता है। उन्होंने पत्नी की मृत्यु एवं गृह कलह के कारण भले ही वैराग्य धारण कर लिया हो, पर मंजुला की अपनी पत्नी के समान आकृति को देखकर उनके मन में प्रेमभाव उत्पन्न होता है। मंजुला की कन्या मृणालमंजरी का पालन गृहस्थ पिता के समान ही करते हैं। मृणाल का विवाह करने के पश्चात् ही देशाटन हेतु निकल पाते हैं। घूमते हुए भी उन्हें अपनी पालिता कन्या मृणाल एवं उसके पति अथवा अपने शिष्य आर्यक की चिन्ता लगी रहती है।

आदर्श प्रेमी एवं पति

देवरात एक आदर्श प्रेमी एवं पति सिद्ध होते हैं। उन्हें अपनी पत्नी से इतना प्रेम था कि उसके आत्मदाह कर लेने पर वे वैराग्य ग्रहण कर लेते हैं। योधेष राजकुमार देवरात बड़े होने के कारण राज्य के अधिकारी थे। विमाता अपने पुत्र को राजा बनाना चाहती थी। गृह कलह शान्त करने के लिए देवरात ने राजा न बनने की घोषणा कर दी, पर विमाता को सन्तोष नहीं हुआ। जब देवरात हूणों से लड़ने गये तो विमाता ने उनके मारे जाने की झूठी सूचना उनकी पत्नी को दी। सती शर्मिष्ठा ने आत्मदाह कर लिया। मंजुला में जब देवरात ने अपनी पत्नी का रूप सादृश्य देखा तो उनका प्रेम पुनः जाग्रत हो उठा, पर यह बात उन्होंने कभी मंजुला पर प्रकट नहीं होने दी। उन्होंने महामारी से पीड़ित मंजुला का अन्तिम संस्कार ही नहीं किया, उसकी पुत्री का अपनी पुत्री के समान पालन-पोषण भी किया।
 

वत्सल पिता

पुनर्नवा उपन्यास के आधार पर आर्य देवरात का चरित्र चित्रण
गणिका मंजुला की आकृति देवरात की पत्नी से मिलती-जुलती थी। उसे देखकर देवरात का बासी घाव ताजा हो गया था। वैरागी देवरात ने इस दुर्बलता को मंजुला के प्रति प्रकट न करके उसकी पुत्री मृणालमंजरी को अपना अकृत्रिम स्नेह प्रदान किया। मृणाल के साथ चन्दनक ने दुर्व्यवहार किया। उसने पिता देवरात को तो यह बात नहीं बतायी, पर उसका चेहरा मलिन हो गया। उसे देखकर देवरात की चिन्ता का वर्णन द्विवेदी जी ने इस प्रकार किया है- 

"देखा कि मृणाल की आँखें सूजी हुई हैं, मुख पीला पड़ गया है। निःसन्देह वह बहुत रोई थी । देवरात ने पुत्री का मुरझाया हुआ मुख देखा तो उन्हें बड़ा क्लेश हुआ । परन्तु पूछने पर उसने कुछ कहा नहीं, और भी अधिक रोने लगी। देवरात एकदम व्याकुल हो उठे।" अपनी कन्या का पीला एवं मुरझाया हुआ मुख देखकर यह दशा किसी सगे पिता की ही हो सकती है जो पुत्री को सच्चे मन से प्यार करता हो।
 

राजर्षि

आर्य देवरात राजर्षि हैं। राज्य त्यागकर उन्होंने वैराग्य ही धारण नहीं किया, बल्कि ऋषियों के समान आश्रम बनाकर उसमें रहते हुए बालकों को शिक्षा भी दी। उनका जीवन तपस्या से पवित्र है। अपने मन की अशान्ति मिटाने के लिए वे पवित्र तीर्थों में भ्रमण करते एवं महापुरुषों से भेंट करते हैं।
 

लोकोपकारी

वैरागी एवं राजर्षि होकर भी देवरात का जीवन लोकविमुख नहीं है। वे किसी के सुख में चाहे सम्मिलित न हों, पर दुःख में सहानुभूति प्रकट करने और सहायता देने अवश्य जाते हैं। हलद्वीप में जब महामारी फैलती है, तब आर्य देवरात अपने स्वास्थ्य, विश्राम एवं प्राणों की चिन्ता न करके रात-दिन रोगियों एवं मृतकों की सेवा में लग जाते हैं। इसी प्रकार जब देवरात उज्जयिनी में होते हैं और आर्यक के विरोधी तथा राजा पालक के पक्षधर सैनिक जगह-जगह आग लगाते हैं तो चन्द्रमौलि को साथ लेकर वे आग बुझाने वालों की सहायता करते हैं।
 

कला प्रवीण

आर्य देवरात सभी ललित कलाओं में पूर्णत: प्रवीण हैं एवं उनका मर्म भली-भाँति जानते हैं। राजसभा में मंजुला के नृत्य एवं गीत के विषय में उनके द्वारा की गई टिप्पणियाँ इसका प्रमाण हैं। मंजुला की कला का पूर्ण एवं परिपक्व होने की बात कहकर वे अपने कला-मर्मज्ञ होने का परिचय देते हैं। राजसभा में आर्य देवरात द्वारा सुनाई गई कविता उनके हृदय की कोमलता एवं काव्य-रचना की क्षमता की घोषणा करती है- 

रोवन दै सखि आजि तू, मति बरजै, रहिमौन । 
ललन चलन लखि काल्हि जौ, प्राण वचैं रोऔन।
 
इसे बासी बताकर मंजुला द्वारा सुनाई हुई निम्नलिखित कविता को प्रत्यग्र मनोहर कहकर उन्होंने अपने सहृदय एवं कला-मर्मज्ञ होने का प्रमाण दिया- 

दुर्लभजन अनुराग बस लज्जा परबस प्रान । 
सखि मन विषम सनेह बस मान सरन नहिं आन ।

शास्त्रों के ज्ञाता

देवरात का व्यक्तित्व कमल से अधिक कोमल तथा वज्र से अधिक कठोर है। वे एक ओर जहाँ कला-मर्मज्ञ एवं रसिक होकर अपनी कोमलता का प्रमाण देते हैं, वहीं दूसरी ओर समस्त शास्त्रों के ज्ञाता, कुशल, तार्किक एवं दार्शनिक के रूप में उनका व्यक्तित्व गम्भीरता की भी सीमाओं को छू लेता है। धर्म और दर्शन का देवरात को पूरा ज्ञान है। देवरात के तर्क लोगों को उनकी बात मानने पर विवश कर देते हैं। उनका चिन्तन सर्वथा मौलिक एवं मान्य होता है। राजसभा की गणिका मंजुला जब स्वयं को पापिनी एवं अपराधिनी बताती है तो उसे विश्व के अन्य लोगों के समान सिद्ध करने वाले देवरात की यह उक्ति दर्शनीय है-"तुम बार-बार अपने को अपराधिनी और पापिनी कहती हो तो मेरा अन्तरतर काँप उठता है। यहाँ शुद्ध सुवर्ण कहीं नहीं है, सब जगह खाद मिला हुआ है। सब कुछ शुद्ध सुवर्ण और खाद से बना हुआ हेमालंकार है । किसने यह आभूषण पहन रखा है ? उसी को खोजो । पाप और पुण्य जब उसी को समर्पित हो जाते हैं तो समान रूप से धन्य हो जाते हैं।

त्यागी एवं पराक्रमी

आर्य देवरात क्षत्रिय एवं राजकुल में जन्म लेकर उसी के अनुकूल वीर योद्धा एवं पराक्रमी युवक रह चुके हैं। युद्ध में हूणों को पराजित करने का श्रेय उन्हें प्राप्त है । उनको पराक्रमी सिद्ध करने के लिए इतना पर्याप्त है। पत्नी मृत्यु के पश्चात् वैराग्य धारण करने वाले देवरात गृह कलह को शान्त करने के लिए अपनी विमाता के पुत्र के पक्ष में पहले ही राज्य-त्याग की घोषणा कर चुके थे। उनका बाद का जीवन त्यागपूर्ण एवं स्वाभिमान से भरा है ही। 

राख से ढँकी हुई अग्नि के समान

देवरात का व्यक्तित्व उस आग के समान है जो राख से ढँकी हुई है। वैरागी देवरात अपनी पत्नी के वियोग की ज्वाला सदा मन में छिपाये रहते हैं। मंजुला को देखकर उनकी यह व्यथा उमड़ उठती है, पर वैरागी जीवन की कैसी विवशता है कि एक शब्द तक नहीं बोल पाते। वे मंजुला का आत्म-समर्पण भी स्वीकार नहीं कर पाते, जबकि मन से उसे बहुत चाहते हैं। मृणाल को पाल-पोसकर बड़ा करते समय वे मंजुला की स्मृति करके सदैव उद्विग्न रहे।
 

यौधेय रक्त

आचार्य देवरात यौधेयवंशी क्षत्रिय थे। उन्हें इस बात का गर्व था कि उनकी नसों में यौधेय वंश का रक्त बहता है। वे वृद्ध हो जाने पर भी पर्याप्त सशक्त थे। अपने शिष्य गोपाल आर्यक की खोज में वे उज्जयिनी पहुँचे। उस समय उज्जयिनी का राजा पालक था। वह अपने साले भानुदत्त की मुट्ठी में था। भानुदत्त के सिपाही गुंडे थे। वे किसी को पकड़कर बन्दी बना लेते थे या मार डालते थे। वे नगर में लूटपाट भी करते थे और आग लगा देते थे। आचार्य देवरात जब उज्जयिनी में पहुँचे तो उनके साथ उनकी पत्नी की बहन का पुत्र चन्द्रमौलि और राजा का विदूषक माढव्य थे। वे वसन्तसेना के आवास में पहुँचने का मार्ग खोज रहे थे। तभी आठ-दस सैनिकों ने आकर तीनों को पकड़ लिया। तीनों के मुँह पर कपड़ा बाँधा और हाथ पीछे बाँधकर एक घर में अँधेरे कक्ष में डाल दिया। युवक होने पर भी चन्द्रमौलि और माढव्य अचेत बने रहे। सबसे पहले वृद्ध देवरात को चेत आया। उन्होंने किसी प्रकार अपने को बन्धन मुक्त करके अपने साथियों को सचेत और स्वतन्त्र किया, इसके विषय में आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने लिखा है-

"मुँह कपड़े से कसकर बाँध दिये गये। भुजाएँ पीठ की ओर कस दी गयीं। तीनों को बोरे की तरह बैलगाड़ी में पटक दिया गया। बँधे हुए अर्धमूच्छित तीन मानव एक घर में ठूंस दिये गये। बाहर से द्वार बन्द कर दिया गया। देवरात की संज्ञा बनी हुई थी। xxx हाथ इतने कसकर बँधे थे कि बहुत जोर मारने पर भी वे उन्हें हिला नहीं सके। धरती पर सिर रगड़कर आँखों के ऊपर बँधे कपड़े को हटाने में सफल तो हो गये, पर उस सूचीभेद्य अंधकार में आँखों के खुलने पर भी कुछ देख नहीं सके। वे इधर-उधर लुढ़कते रहे, पर सब बेकार। फिर भी प्रयत्न उन्होंने नहीं छोड़ा। लुढ़कते हुए वे दरवाजे तक पहुँचे । x x x उन्हें ऐसा लगा कि किवाड़ों में पीतल के कुछ नागदन्त बने थे। बँधे हाथों को साधकर उनसे टिकाया। खूँटियाँ नुकीली थीं। बन्धन में आसानी से घुस गयीं। फिर बार-बार फँसाकर नीचे ऊपर करने लगे। कठिन परिश्रम से हाथ खुल गये। फिर तो मुँह के बन्धन बहुत आसानी से खोले जा सके। x x x रुद्ध कक्ष में हवा आने का कोई मार्ग नहीं था। लगता था, वे भी मूच्छित हो जायेंगे, पर मन में अदम्य संकल्प शक्ति थी। किसी प्रकार कपाट खुलना चाहिए। वे फिर टटोलने लगे। कहीं कुछ नहीं मिला। xxx एक बड़ा-सा वस्त्र-खण्ड उठाकर हवा करने लगे। xxx अचानक कपड़ा किवाड़ों की खूँटियों में उलझ गया। उन्होंने झटके से खींचा। उन्हें जान पड़ा कि किवाड़ भी खिंचे आ रहे हैं। उन्होंने और भी बल लगाया। कपड़ा उलझा ही रहा, मगर किवाड़ खुल गये। स्वच्छ वायु का एक झोंका आया और उनके मन और प्राणों को जगा गया। दोनों किवाड़ खोलने पर हल्का-सा प्रकाश भी दिखायी दिया। सामने आँगन था। वे बाहर आ गये। " 

इस प्रकार आर्य देवरात का चरित्र एक अतिमानवीय व्यक्ति का चरित्र जान पड़ता है। परस्पर जान पड़ने वाले गुणों का भी निवास उन्हें महापुरुष मानने को विवश करता है। उनका व्यक्तित्व सर्वथा आदरणीय है।संक्षेप में कहा जाए तो 'पुनर्नवा' उपन्यास में आर्य देवरात एक ऐसे प्रकाश-स्तंभ हैं, जो अंधकार से घिरे समाज को सही रास्ता दिखाते हैं। उनका चरित्र पाठक के मन में श्रद्धा, त्याग और उदात्तता का भाव पैदा करता है। हजारीप्रसाद द्विवेदी जी ने उनके माध्यम से भारतीय संस्कृति के सर्वश्रेष्ठ और जीवंत आदर्शों को मूर्त रूप दिया है।

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