आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी रचित 'पुनर्नवा' उपन्यास का सम्पूर्ण सारांश, कथावस्तु, पात्र परिचय एवं मूल संवेदना। इस ऐतिहासिक कृति का विस्तृत साहित्यिक
पुनर्नवा उपन्यास का सारांश | आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी
आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी द्वारा रचित 'पुनर्नवा' (1973) हिंदी साहित्य के सर्वश्रेष्ठ ऐतिहासिक और सांस्कृतिक उपन्यासों में से एक है। द्विवेदी जी हिंदी साहित्य में अपने गहन शोध, ऐतिहासिक दृष्टि और प्रगतिशील मानवतावाद के लिए जाने जाते हैं। 'बाणभट्ट की आत्मकथा' और 'चारु चंद्रलेख' के बाद 'पुनर्नवा' उनका एक अत्यंत प्रौढ़ और विचारोत्तेजक उपन्यास है।
हलद्वीप में आश्रम बनाकर रहने वाले संन्यासी देवरात शास्त्र और शस्त्र के अतिरिक्त कला एवं संगीत में भी निपुण थे। हलद्वीप के निवासी वृद्ध गोप का पुत्र और सपुत्र आर्यक और पाला हुआ पुत्र श्यामरूप देवरात के आश्रम में शिष्य के रूप में रहे थे।अपरूप सुन्दरी मंजुला के नृत्य, संगीत एवं कला का हलद्वीप के लोग बहुत आदर करते थे। देवरात ने मंजुला की कला-कुशलता की कभी प्रशंसा नहीं की। पहले तो मंजुला उनसे कुपित रहती थी, पर जब उसने देवरात को जाना तो उनके प्रति श्रद्धा रखने लगी । देवरात को मंजुला में अपनी मृत पत्नी की समानता प्रतीत होती थी। महामारी फैलने से मंजुला का देहान्त हो गया, पर वह अपनी पुत्री मृणालमंजरी को देवरात को सौंप गयी।
देवरात की सलाह पर श्यामरूप को कर्मकाण्ड सीखने पाठशाला भेजा गया। वहाँ मन न लगने से वह भागकर तमाशा करने वाले नटों के साथ होकर घूमने लगा । उसके भाग जाने से डरकर वृद्ध गोप ने आर्यक को घर से बाहर जाने से मना कर दिया।देवरात की पालिता पुत्री मृणालमंजरी और आर्यक परस्पर प्रेम करते थे। देवरात भी आर्यक से बहुत प्रभावित थे।मृणाल को वेश्या की पुत्री बताकर वृद्ध गोप ने अपने पुत्र आर्यक से उसका विवाह करना स्वीकार नहीं किया। राजा के साले ने एक बार मृणाल को अश्लील इशारे किये और भद्दा पत्र लिखा। वह पत्र जब आर्यक को मिला तो उसने मृणाल की जीवनभर रक्षा करने का वचन देकर उससे विवाह कर लिया।
हलद्वीप के दुराचारी एवं विदेशी राजा की सत्ता समाप्त करने के बाद आर्यक ने भारत-भूमि से विदेशियों को निकालने की प्रतिज्ञा की, क्योंकि मथुरा और उज्जयिनी पर यवनों का अधिकार था। आर्यक ने मगध के सम्राट समुद्रगुप्त के सेनापति के रूप में विदेशी शासकों को हराना आरम्भ कर दिया। इसी बीच अपने पुंस्त्यहीन पति को पति न मानकर आर्यक को पति मानने वाली चन्द्रा उसके पीछे लग गई। गोपाल आर्यक बदनामी के डर से राजा का साथ छोड़कर भाग उठा। वह अपने को पत्नी मृणाल के प्रति दोषी मानकर घर भी नहीं आया। इससे देवरात इतने दुःखी हुए कि उन्होंने अपना हलद्वीप वाला आश्रम छोड़ दिया और विचरण करने लगे।
भटार्क सेनापति आर्यक का सेनानायक था। वह आर्यक के चले जाने पर भी उसी को सेनापति मानकर युद्ध करता हुआ मथुरा की ओर बढ़ा। नटों ने श्यामरूप को मल्ल विद्या सिखायी। नट युवतियों को पकड़कर बेचने का काम करते थे। मदनिका अर्थात् मांदी नाम की दासी से श्यामरूप को प्रेम हो गया। नटों ने उसे बेच दिया। श्यामरूप उसे खोजता हुआ मथुरा पहुँचा और वहाँ छबीला पंडित के रूप में प्रसिद्ध मल्ल बन गया। मथुरा के राजा के साले भानुदत्त के पाले हुए मल्ल मागू को कुश्ती में हराकर श्यामरूप ने बहुत प्रसिद्धि पाई। समुद्रगुप्त की सेना को लेकर भटार्क मथुरा की ओर बढ़ रहा था। राजा के चाचा चण्डसेन ने श्यामरूप की सुरक्षा में अपना परिवार मथुरा भेज दिया। इधर अपने पराक्रम के कारण गोपाल आर्यक लहुरावीर का अवतार और मृणालमंजरी अपने सतीत्व के कारण 'मैना मांजर देई' के रूप में लोक प्रसिद्ध देवी बन गयी।
श्यामरूप को पता चला कि मांदी बेचने के लिए उज्जयिनी ले जाई गई है तो उसे बहुत प्रसन्नता हुई। आर्यक भी विन्ध्याटवी पार करता हुआ उज्जयिनी की ओर ही चला। मार्ग में उसे चन्द्रमौलि एवं माढव्य शर्मा मिले। चन्द्रमौलि कवि हृदय राजकुमार था, घूमने निकल पड़ा। माढव्य शर्मा अपनी मूर्खता से राजा को प्रसन्न करने वाला विदूषक था। उज्जयिनी का राजा पालक मथुरा के राजा का सगोत्र था। प्रजा उसके अत्याचार से दुःखी थी। भटार्क ने मथुरा को जीतने के बाद अपनी सेना उज्जयिनी की ओर बढ़ाई।
चन्द्रा ने आर्यक को बहुत खोजा। जब नहीं मिला तो वह उसे खोजने हलद्वीप गयी। वहाँ आर्यक को न पाकर उसने आर्यक की पत्नी मृणाल को सगी बहन के समान प्रेम किया । हलद्वीप के धर्माधिकारी ने गोपाल व चन्द्रा को निर्दोष घोषित कर दिया । यह जानकर समुद्रगुप्त का मन आर्यक की ओर से साफ हो गया। वह उससे मिलने के लिए सेना समेत मथुरा की ओर चला। इधर चन्द्रा और मृणाल भी आर्यक से मिलने मथुरा की ओर चलीं।
श्यामरूप उज्जयिनी में था। आर्यक भी उज्जयिनी पहुँच चुका था। आर्य देवरात भी तीर्थों में घूमते-घूमते वहीं आ गये थे । चन्द्रमौलि मधुर कंठ से महाकाल की स्तुति कर रहा था। उससे आकर्षित होकर देवरात उसके पास गये। परिचय करने पर पता चला कि वह देवरात की पत्नी की बहन का लड़का है और पारिवारिक कलह के कारण घर छोड़ आया है। चन्द्रमौलि ने देवरात को गोपाल आर्यक का वृत्तान्त सुनाया और उसके उज्जयिनी में होने की बात कही। देवरात ने उसे खोजने का निश्चय किया। देवरात को श्रुतिधर की पाठशाला में श्यामरूप मिला। यहीं चण्डसेन का परिवार छिपा भी था। उज्जयिनी का राजा पालक आर्यक को बन्दी बनाना चाहता था, इसलिए वह छिप गया था। श्यामरूप एक दिन रात के समय मांदी की खोज में जा रहा था कि ब्राह्मण चारुदत्त के घर से आती हुई चीख उसे सुनाई दी। वसन्तसेना गणिका ने अपने प्रेमी चारुदत्त के घर अपनी दासी मदनिका अर्थात् मांदी को समाचार लेकर भेजा था।
राजसैनिक उसे पकड़ने चारुदत्त के घर में घुसे थे। यह जानकर श्यामरूप ने राजसैनिकों को मार भगाया। बाद में वह चारुदत्त की अचेत पत्नी धूतादेवी एवं दासी मदनिका को होश में लाने का प्रयत्न करने लगा। मदनिका एवं श्यामरूप दोनों ने एक-दूसरे को पहचान लिया, पर परिस्थिति देखकर शान्त रहे । श्यामरूप मदनिका को वसन्तसेना के घर पहुँचाकर लौट रहा था, तभी राजसैनिक उसे पहचानकर पकड़ने दौड़े। खाली हाथ श्यामरूप ने भागकर अपनी जान बचायी। इधर आर्यक भी उज्जयिनी से निकलने के लिए परेशान था। महाकाल मन्दिर में एक संन्यासिनी ने उसे सलाह दी कि वह इस सम्बन्ध में चारुदत्त से मिले। चारुदत्त एक पर्देदार गाड़ी में परिवार सहित बैठकर बाहर जा रहे थे। उन्होंने आर्यक को भी उसी में बैठा लिया। रास्ते में राजा के सैनिकों ने गाड़ी रोककर पर्दा खोलना चाहा। कुछ राजसैनिकों ने इसका विरोध किया। तभी राजा पालक ने आकर पर्दा हटाने की आज्ञा दी। गोपाल आर्यक ने रथ पर चढ़कर राजा को मार डाला।
बहुत से नागरिक और राजसैनिक आर्यक की जय-जयकार करने लगे। आर्यक ने राजमहल पर अधिकार करके चारुदत्त के परिवार के रहने की व्यवस्था की। सैनिकों के दो दल बन गये थे। कुछ आर्यक के समर्थक और कुछ उसके विरोधी थे। इनमें परस्पर संघर्ष होने लगा। नगर में मारकाट और आग लगाने की घटनायें जानकर श्यामरूप मांदी अर्थात् मदनिका को बचाने वसन्तसेना के घर पहुँचा।आर्यक के विरोधी सैनिकों ने वह घर घेर लिया था । श्यामरूप उनसे लड़ता हुआ भीतर पहुँचा और एक खम्भे से बँधी अचेत वसन्तसेना और मदनिका को बचाकर श्रुतिधर की पाठशाला में पहुँचाया।
उज्जयिनी में जब यह सामाचार मिला कि सेनानायक भटार्क की सेना इधर आ रही है तो गोपाल आर्यक का विरोध शान्त हो गया। सम्राट समुद्रगुप्त की सेना भी उज्जयिनी के समीप पहुँच चुकी थी। मार्ग में समुद्रगुप्त की भेंट चन्द्रा से हुई। समुद्रगुप्त ने अपना परिचय तो उसे नहीं दिया, परन्तु उसकी बातों से समझ गये कि आर्यक सर्वथा निर्दोष है।
उज्जयिनी को विजय करने के बाद जब आर्यक ने सुना कि सम्राट् समुद्रगुप्त आ रहे हैं तो वह उनके सामने न पड़ने के विचार से उज्जयिनी से भागने का विचार करने लगा। चारुदत्त की पत्नी धूतादेवी ने उसे समझाया कि वह जाकर अपनी पत्नी मृणाल से मिले। तभी आर्यक को समुद्रगुप्त का बुलावा मिला। आर्यक समुद्रगुप्त से मथुरा मार्ग पर मिला। समुद्रगुप्त ने आर्यक को बताया कि उसकी पत्नी मृणाल बटेश्वर में है। वह वहाँ जाकर अपनी पत्नी से मिल ले। गोपाल आर्यक की पत्नी मृणालमंजरी थी । चन्द्रा को वह अपनी बहन मानती थी। चन्द्रा का पति पुरुषत्वहीन था, इसलिए वह गोपाल आर्यक के पीछे लग गयी। मंजुला एक कलाकुशल वेश्या थी। उसकी आकृति आचार्य देवरात की पत्नी से मिलती थी। इससे उनके मन में मंजुला के प्रति आकर्षण बढ़ा। आचार्य देवरात पथभ्रष्ट नहीं हुए, पर उन्होंने मंजुला की पुत्री मृणालमंजरी का पालन-पोषण अपनी पुत्री के समान किया। आचार्य देवरात का शिष्य गोपाल आर्यक और मृणालमंजरी आपस में प्रेम करने लगे थे, पर गोपाल आर्यक ने मृणालमंजरी को वेश्या की पुत्री बताकर उससे गोपाल का विवाह करने से मना कर दिया। राजा के साले ने मृणालमंजरी को अश्लील पत्र लिखा। मृणालमंजरी ने वह पत्र गोपाल आर्यक दिया। उस पत्र को देखकर गोपाल आर्यक ने मृणाल-मंजरी से विवाह कर लिया।
चन्द्रा के प्रति गोपाल आर्यक को कोई आकर्षण नहीं था । चन्द्रा उसे अपना पति मानती थी, इससे गोपाल आर्यक की बहुत बदनामी हुई। गोपाल आर्यक इस लज्जा से मृणालमंजरी को छोड़कर चला गया। इससे आचार्य देवरात और मगध नरेश समुद्रगुप्त भी गोपाल आर्यक को चरित्र भ्रष्ट मानकर क्रोधित भी हुए। सम्राट् समुद्रगुप्त ने तो गोपाल आर्यक को पत्र लिखकर गोपाल आर्यक की भर्त्सना भी की। बाद में सम्राट् समुद्रगुप्त के पुरोहित ने बिना उचित जानकारी के गोपाल आर्यक को पत्र लिखने का विरोध किया। सम्राट् को उनकी बात उचित लगी और उन्होंने गोपाल आर्यक को यह बताने के लिए मगध से मथुरा की यात्रा की, पर तब तक गोपाल आर्यक मथुरा से उज्जयिनी चला गया था।
आचार्य देवरात गोपाल आर्यक से इसलिए अप्रसन्न थे कि उनके शिष्य ने उनकी पालिता पुत्री को धोखा दिया। मृणालमंजरी चन्द्रा और पुत्र शोभन को साथ लेकर गोपाल आर्यक को खोजने चली। एक स्थान पर चन्द्रा कहीं चली गयी। उसकी खोज होने लगी। आचार्य देवरात भी साथ थे। वहीं पर गोपाल आर्यक भी आ गया। सभी जगह चन्द्रा की खोज होने लगी। तभी किसी ने सूचना दी कि चन्द्रा कुछ दूर झाड़ियों में अचेत पड़ी है। यह सूचना पाकर गोपाल आर्यक वहाँ गया और चन्द्रा को उठा लाया । उसने चन्द्रा को अपनी गोदी में लिटा लिया और मृणालमंजरी उसके पैर दबाने लगी। गोपाल आर्यक और मृणालमंजरी का पुत्र शोभन उसे 'बड़ी अम्मा' कहकर पुकारने लगा । सहसा चन्द्रा की चेतना लौटी। सखी मृणालमंजरी के पुत्र शोभन का 'बड़ी अम्मा' शब्द सुनकर चन्द्रा पर जादू का सा प्रभाव हुआ। वह सहसा सचेत हो गयी। जब उसने देखा कि वह गोपाल आर्यक की गोद में लेटी है तो सहसा उठ खड़ी हुई और गोपाल आर्यक के पैरों पर इस प्रकार गिर पड़ी, जिस प्रकार कटा हुआ वृक्ष धरती पर गिर पड़ता है । चन्द्रा के आँसू गोपाल आर्यक के पैरों को धो रहे थे।
उज्जयिनी में गोपाल आर्यक बहुत बड़ी सफलता प्राप्त कर चुका था। आर्य चारुदत्त अपनी पत्नी के साथ पर्दे वाली गाड़ी में कहीं जा रहे थे। गोपाल आर्यक छिपकर उज्जयिनी से निकलना चाहता था। उसने आर्य चारुदत्त से शरण माँगी तो उन्होंने गोपाल आर्यक को अपने पर्दे वाली गाड़ी में बैठा लिया। जो भी वाहन उज्जयिनी से बाहर जा रहा था, उस वाहन की जाँच राजा पालक के सैनिक कर रहे थे। आर्य चारुदत्त की गाड़ी का पर्दा हटाकर देखने के प्रश्न पर सैनिकों के दो दल हो गये। तभी राजा पालक वहाँ आया और उसने आर्य चारुदत्त की गाड़ी का पर्दा हटाने की आज्ञा दी। गोपाल आर्यक को आर्य चारुदत्त के परिवार का यह अपमान सहन नहीं हुआ। वह नंगी तलवार लेकर पालक राजा के रथ पर चढ़ गया और उसका वध कर दिया। इससे राजा पालक के साले भानुदत्त के सैनिकों ने नगर में लूटमार करना और आग लगाना आरम्भ कर दिया। राजमहल में गोपाल आर्यक का राज्याभिषेक होने पर भी भानुदत्त के सैनिक नगर को लूटते रहे। आर्य देवरात का प्रिय शिष्य श्यामरूप उज्जयिनी में मल्ल शार्विलक के रूप में प्रसिद्ध था। उसने आचार्य देवरात के साथ उज्जयिनी में आकर नागरिकों की सहायता से भानुदत्त के सैनिकों को मार भगाया। नगर में शान्ति होने पर गोपाल आर्यक से मिला। शार्विलक अपनी प्रेयसी मदनिका को वसन्तसेना से छुड़ाकर विवाह करने आया था। उसने एक कक्ष में बन्दी वसन्तसेना और मदनिका को बाहर निकाला था। अपने पूरे परिवार अर्थात् चन्द्रा, मृणाल एवं पुत्र से मिलकर आर्यक के मन की ग्लानि जाती रही।


COMMENTS