हजारी प्रसाद द्विवेदी रचित 'पुनर्नवा' उपन्यास की विस्तृत समीक्षा। इसमें कथावस्तु, प्रमुख पात्रों, स्त्री विमर्श व तत्कालीन सामाजिक चेतना को जानें।
पुनर्नवा उपन्यास की समीक्षा | हजारी प्रसाद द्विवेदी
आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी द्वारा रचित 'पुनर्नवा' हिंदी साहित्य के उत्कृष्ट ऐतिहासिक उपन्यासों में से एक है। सन १९७३ में प्रकाशित यह कृति मुख्य रूप से चौथी शताब्दी के गुप्तकालीन समाज और संस्कृति को जीवंत करती है। इस उपन्यास की कथावस्तु मुख्य रूप से शूद्रक के प्रसिद्ध संस्कृत नाटक 'मृच्छकटिकम्' और तत्कालीन लोककथाओं पर आधारित है। द्विवेदी जी ने इस रचना में इतिहास, मिथक और कल्पना का ऐसा अद्भुत समन्वय किया है, जो पाठकों को सीधे उस ऐतिहासिक युग में ले जाने के साथ-साथ गंभीर दार्शनिक विमर्शों से भी जोड़ता है।
आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी का व्यक्तित्व हिन्दी साहित्य में अनेक रूपों में प्रतिष्ठित है। मूलत: ज्योतिषी होते हुए भी आप मौलिक निबन्धकार, सहृदय समालोचक एवं सफल उपन्यासकार हैं। उन्होंने अपने ललित निबन्धों एवं उपन्यासों के माध्यम से भारतीय संस्कृति के उज्ज्वल पक्ष के दर्शन कराये हैं। आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी द्वारा लिखित उपन्यासों के नाम- बाणभट्ट की आत्मकथा, चारुचन्द्र लेख, पुनर्नवा एवं अनामदास का पोधा हैं। इन उपन्यासों के माध्यम से द्विवेदी जी ने भारत के भिन्न-भिन्न कालों का वातावरण पाठक की कल्पना में साकार करके भारतीय संस्कृति की एकरस एवं अविच्छिन्न धारा में स्नान कराया है। द्विवेदी जी ने भारतीय संस्कृति को विश्व संस्कृति अथवा मानवीय संस्कृति के रूप में प्रतिष्ठित किया है। उन्होंने अपने उपन्यासों में वैदिक काल से लेकर प्रसिद्ध हिन्दू सम्राट् हर्षवर्धन तक के समय का वर्णन किया है। द्विवेदी जी के उपन्यासों के ऐतिहासिक होने का भ्रम हो सकता है पर वे संस्कृति का ही गायन करते हैं। इस प्रकार आचार्य द्विवेदी के उपन्यास भारतीय संस्कृति के अक्षय कोष हैं।
द्विवेदी जी का उपन्यास 'अनामदास का पोथा' भारत की वैदिक संस्कृति पर आधारित है। इसमें आपने प्राकृतिक शक्तियों-जल, वायु, सूर्य आदि की शक्ति से वैदिक ऋषियों के परिचित होने से आरम्भ करके आत्म तत्व तक पहुँचने का विवेचन किया है। 'चारुचन्द्र लेख' में भारत में तांत्रिक साधना के युग का चित्र है। बौद्ध संन्यासियों के पतित होकर तांत्रिक बनने की बात तो ऐतिहासिक तथ्य है ही, पर वैदिक विद्वान् भी तन्त्र के प्रति आस्था रखते थे । पुराण काल में तन्त्र साधना का विकास हुआ। 'पुनर्नवा' में वैष्णव उपासना की झाँकी दिखाई गयी है। इसका नायक गोपाल आर्यक तहुरावीर का अवतार है। वैष्णव उपासना में कृष्ण के गोपाल रूप की प्रतिष्ठा है। द्विवेदी ने इसका सम्बन्ध दूसरी-तीसरी शताब्दी के सेनापति आर्यक से जोड़ा है एवं उसके पिता को वृद्ध गोप नामधारी बताया है। 'बाणभट्ट की आत्मकथा' में अन्तिम हिन्दू सम्राट् हर्षवर्धन के समय का वर्णन है। यह उपन्यास बाणभट्ट की आत्मकथा कर्म और हर्षवर्धन के समय का प्रमाणिक अभिलेख अधिक है।
आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी जी की शिक्षा संस्कृत माध्यम से आरम्भ हुई। उन्होंने आचार्य परीक्षात्मक ज्योतिष का अध्ययन किया, जो वेदांग के आदरपूर्ण नाम से पुकारी जाती है। अपनी शिक्षा के इस परिवेश के प्रभाव ने द्विवेदी जी को भारतीय संस्कृति का व्याख्याता होने पर विवश किया। आपने भारतीय संस्कृति को युगीन सन्दर्भों से जोड़कर भी उसकी एकरूपता एवं अविच्छिन्नता को बनाये रखा है। उनके उपन्यास निश्चय ही भारतीय संस्कृति के सूत्रों की व्याख्या एवं उसके मर्म के चित्र फलक हैं। उनका सांस्कृतिक चिंतन ही उपन्यास रचना के रूप में प्रकट हुआ है। यदि द्विवेदी जी के उपन्यासों के रचना काल पर ध्यान दें तो उनके उपन्यास वैदिक युग से लेकर भारतीय हिन्दू साम्राज्य के स्वर्ण युग तक का विवेचन करते हैं। कालखण्ड अथवा राजनीतिक व्यवस्था आपके उपन्यासों का आधार भले ही हो, पर प्रधान स्वर कभी नहीं रहा है। आपके उपन्यास राजनीतिक, धार्मिक, आर्थिक एवं सामाजिक व्यवस्थाओं एवं मान्यताओं की व्याख्या करते हुए भी अन्ततः उस चेतन ब्रह्म की ओर संकेत करते हैं, जिसकी ललित लीला यह सृष्टि है ।
'पुनर्नवा' उपन्यास की समीक्षा
'उपन्यास' शब्द चाहे संस्कृत व्याकरण के अनुसार व्युत्पन्न किया जा सकता हो, पर साहित्य की यह विधा पश्चिम से आई है। काव्यशास्त्र के आचार्यों एवं आलोचकों ने अंग्रेजी उपन्यासों एवं आलोचना के आधार पर उपन्यास के निम्नलिखित छः तत्व स्वीकार किये हैं-
- कथानक अथवा कथावस्तु,
- पात्र अथवा चरित्र-चित्रण,
- संवाद अथवा कथोपकथन,
- भाषा-शैली,
- वातावरण अथवा देशकाल,
- उद्देश्य ।
आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी के उपन्यास 'पुनर्नवा' का विवेचन उपर्युक्त तत्वों के आधार पर प्रस्तुत है-
कथानक अथवा कथावस्तु
इस उपन्यास का कथानक सम्राट् समुद्रगुप्त के समय के आधार पर कल्पित है। शकों एवं हूणों की सत्ता भारत से समाप्त करने की पृष्ठभूमि में सेनापति आर्यक के बचपन से यह उपन्यास आरम्भ होता है। हलद्वीप निवासी वृद्ध गोप का पुत्र आर्यक राजनर्तकी मंजुला की पुत्री एवं आर्य देवरात की पालिता मृणालमंजरी से विवाह कर लेता है। मृणाल के प्रति अभद्र व्यवहार करने वाले चन्दनक के प्रति आर्यक का जागा हुआ क्रोध हलद्वीप से अत्याचारी शासन समाप्त कर देता है। समुद्रगुप्त की मैत्री एवं सेनापति पद प्राप्त करके आर्यक को चन्द्रा के कारण भागना पड़ता है जोकि किसी अन्य की विवाहिता होकर आर्यक को अपना पति बताती थी। आर्यक का अनन्य मित्र और वृद्ध गोप द्वारा पालित पुत्र श्यामरूप भी पाठशाला से भागकर नटों के साथ पहलवानी सीखता हुआ मथुरा से उज्जयिनी पहुँच जाता है। आर्यक भी वहीं पहुँचता है। आर्यक वहाँ के अत्याचारी राजा पालक की हत्या करके चारुदत्त के परिवार की रक्षा करता है। सम्राट् समुद्रगुप्त आर्यक की पत्नी मृणाल से मिलकर आर्यक को निर्दोष समझ लेते हैं और बुलाकर समझा देते हैं। उन्हीं के निर्देश से आर्यक बटेश्वर में मृणाल, चन्द्रा एवं अपने पुत्र से मिलकर प्रसन्न होता है।
'पुनर्नवा' की कथावस्तु का पूर्वार्द्ध विशुद्ध काल्पनिक एवं उत्तरार्द्ध शूद्रक के संस्कृत नाटक 'मृच्छकटिकम्' पर आधारित है। 'लहुरावीर' एवं 'मैना मांजर देई' का सम्बन्ध क्रमशः गोपाल आर्यक एवं मृणालमंजरी से जोड़कर लोककथाओं को ऐतिहासिक रूप प्रदान किया गया है। कथानक अत्यन्त विस्तृत, सुगठित, उत्सुकतापूर्ण एवं रोचक है।
पात्र अथवा चरित्र-चित्रण
उपन्यास का कथानक पात्रों के द्वारा ही वास्तविकता का आवरण पाता है, जब तक पात्र व्यक्ति के रूप में चित्रित नहीं किये जाते, तब तक पाठक पूर्ण बिम्ब ग्रहण नहीं कर पाता। आर्य देवरात के विस्तृत परिचय से उपन्यास आरम्भ होता है, जो राजनर्तकी मंजुला से जुड़ जाता है। चरित्र की उच्चता एवं उज्ज्वलता के कारण इन्हीं पर नायक एवं नायिका होने का भ्रम होने लगता है। वास्तव में नायक एवं नायिका गोपाल आर्यक तथा मृणालमंजरी के रूप में बाद में आते हैं। गोपाल आर्यक के गले पड़ने वाली प्रेयसी चन्द्रा कुलटा से पतिव्रता बन जाती है । आर्यक का मित्र एवं भाई श्यामरूप छबीला पंडित बनने के बाद अन्त में शार्विलक नाम से उज्जयिनी में प्रसिद्धि पाता है। हलद्वीप की चन्द्रा पुंश्चली से जिस प्रकार पतिव्रता बन जाती है, उसी प्रकार उज्जयिनी की गणिका वसन्तसेना दरिद्र ब्राह्मण चारुदत्त को पति के समान मानती है । मृणाल के प्रति अभद्र व्यवहार करने वाला चन्दनक, उज्जयिनी का राजा आर्यक, मथुरा के राजा के साले के पालित मल्ल मागू को पछाड़कर शार्विलक बन जाने वाला श्यामरूप, सुमेर काका, माढव्य एवं विन्ध्याटवी वाले बाबा मनोरंजक पात्र हैं। उपन्यास में अधम पात्रों की न्यूनता होने पर न अन्त:संघर्ष में कमी है और न बाह्य संघर्ष में। सभी पात्र पूर्ण एवं जीवन्त हैं। छोटे-से-छोटे पात्र का चरित्र भी पूर्ण एवं प्रभावशाली है। पुरुषों की अपेक्षा इस उपन्यास में नारी पात्र कम हैं, पर जितने भी हैं, वे पुरुष पात्रों से अधिक प्रभावशाली हैं।
संवाद अथवा कथोपकथन
संवाद नाटक का सर्वस्व एवं अनिवार्यता होते हैं, पर उपन्यास एवं कहानी में वास्तविकता लाने के लिए इनका प्रयोग किया जाता है। शास्त्रीय मान्यता के अनुसार संवाद या कथोपकथन छोटे, सरल एवं स्वाभाविक होने चाहिए। 'पुनर्नवा' एक सांस्कृतिक उपन्यास है जो प्राचीन भारत की पृष्ठभूमि पर लिखा गया है। इसलिए अधिकांश संवाद बड़े एवं क्लिष्ट भाषा में लिखे गये हैं। सरल, स्वाभाविक एवं छोटे संवाद्र भी कहीं-कहीं मिल जाते हैं, जैसे स्वप्न से सम्बन्धित मृणाल और चन्द्रा का यह संवाद-
" अपनी सारी सोची बातों को आदमी कहाँ जानता है मैना !"
'जानता है, जानता है। मेरे मन में कभी कहीं ऐसी विचित्र बात नहीं आई ! नहीं आ सकती।"
"अरी भोली चन्द्रा का सत्संग भी तो तुझे मिला है।
"मिला है, प्राण ढालकर उसे ग्रहण किया है, पर ऐसा विचार मेरे मन में कभी नहीं आया। "
"तो तू सत्य मानती है।'
संवाद लम्बे-लम्बे एवं क्लिष्ट होने पर भी या तो किसी समस्या का समाधान करते हैं या किसी रहस्य को उजागर करते हैं। उन्हें पढ़ते समय पाठक ऊबता नहीं है (4) भाषा-शैली-'पुनर्नवा' सांस्कृतिक उपन्यास है एवं प्राचीनकाल को आधार बनाकर लिखा गया है। द्विवेदी जी संस्कृत के विद्वान् हैं। इस कारण भाषा संस्कृतनिष्ठ एवं गम्भीर होनी चाहिए। देवरात, मंजुला, धूता, चारुदत्त, चन्द्रमौलि जैसे पात्र जब कला एवं संस्कृति की व्याख्या करने लगते हैं तो भाषा स्वयं ही संस्कृतनिष्ठ, क्लिष्ट एवं दुरूह हो जाती है। उपन्यास को प्राचीनकाल का एवं वास्तविक बनाने के लिए यह आवश्यक भी था। उदाहरण के लिए एक उद्धरण लिया जा सकता है-
"देवराज का हृदय टूट गया। नगर की शोभा, अनुराग की दीपशिखा, कला की प्रतिमा, छन्दों की रानी, तालों की नर्म संगिनी, श्रृंगार की रंगस्थली, सम्मोहन की सूत्रधारिणी मंजुला चली गयी। बासी को ताजी बनाने की कुशल कलावती सदा के लिए सो गई। कोई पानी देने भी नहीं आया। हे विधाता ! देवरात ने दीर्घ निःश्वास लिया।"
वातावरण अथवा देशकाल
द्विवेदी जी का उपन्यास 'पुनर्नवा' सांस्कृतिक उपन्यास है एवं तीसरी-चौथी शताब्दी के काल को आधार बनाकर लिखा गया है। लेखक ने उस काल के अतिरिक्त हलद्वीप, मथुरा, उज्जयिनी आदि स्थानों का बिम्ब पाठक की कल्पना में सम्प्रेषित करने में पूर्ण सफलता प्राप्त की है। आर्य देवरात का आश्रम, राजसभा में मंजुला का नृत्य एवं काव्य-चर्चा, मथुरा में मल्लयुद्ध, उज्जयिनी में गणिका वसन्तसेना का आदर आदि ऐसी बातें हैं जो पाठक को बरवश उसी देश और काल में खींचकर ले जाती हैं। देवरात के आश्रम का यह वातावरण पाठक को सहज ही प्राचीनकाल के भाषा में खींच ले जाता है-
"एक बार थके निराश नेत्रों से उसने आश्रम के भीतर देखा । उसकी दृष्टि दो बड़े सुन्दर बालकों की ओर गई। बालक श्यामरूप और आर्यक थे। उसने इशारे से अपनी ओर बुलाया। दोनों बालक दौड़ते हुए उसके पास आये और बड़े शिष्ट भाव से बोले -" आर्ये ! आप क्या हमारे गुरुजी को खोज रही हैं ? क्या आप भी पढ़ने आती हैं ? हमारे गुरुजी आपको बहुत अच्छी तरह पढ़ायेंगे। आइये, आइये आपका स्वागत है।" हलद्वीप के राजा की सभा, विन्ध्याटवी के सिद्ध बाबा का आश्रम, मथुरा, उज्जयिनी कोई भी स्थान ऐसा नहीं है जिसके देशकाल के चित्रण में कमी रही हो।
उद्देश्य
'पुनर्नवा' सांस्कृतिक उपन्यास है। इससे स्पष्ट है कि लेखक इस उपन्यास के द्वारा भारत की प्राचीन संस्कृति का परिचय कराना चाहता है। धर्म, कला, उपासना, युद्ध, उत्सव आदि संस्कृति के अंग हैं। इस उपन्यास के माध्यम से लेखक ने तत्कालीन भारतीयों की सांस्कृतिक मान्यताओं को रेखांकित किया है। आश्रम में रहकर शिष्यों को शिक्षा देने वाले वैरागी लोगों का समाज में मान था। राजसभा में मंजुला का नृत्य देखने नागरिक ही नहीं, देवरात जैसे वैरागी भी पहुँचते थे। मंजुला एवं वसन्तसेना के उदाहरणों से स्पष्ट है कि कलावती गणिकाएँ उस समय नगर की शोभा मानी जाती थीं। लोगों को मल्लों के दंगल कराने एवं देखने का शौक था। शासक अत्याचारी एवं अनाचारी भी होते थे।
उपन्यास के नाम 'पुनर्नवा' पर ध्यान दें तो इसका उद्देश्य नारी के विशुद्ध प्रणय को सामाजिक मान्यता प्रदान करता है। किसी अन्य से विवाहित होकर हृदय से आर्यक को पति मानने वाली चन्द्रा ही पुनर्नवा है। पुनर्नवा शब्द का अर्थ है-फिर से नवीन होने वाली। विवाहिता होकर भी चन्द्रा पुनः नवीन अर्थात् कन्या बन जाती है तथा आर्यक को पति के रूप में पाकर ही रहती है। उपन्यास की समाप्ति पर आर्यक को देखते ही अचेत हो जाने एवं पुनः सचेत हो जाने वाली चन्द्रा ही पुनर्नवा है।
नारी को विशेष सम्मानपूर्ण स्थान दिलाना भी उपन्यास का उद्देश्य प्रतीत होता है।मृणालमंजरी, धूतादेवी तो वैध पत्नी होने के कारण आदरणीय हैं हीं, मंजुला एवं वसन्तसेना को भी लेखक ने अत्यन्त आदरपूर्ण स्थान दिया है।
निष्कर्ष
समग्र रूप से देखा जाए तो, 'पुनर्नवा' केवल अतीत का एक ऐतिहासिक चित्र मात्र नहीं है, बल्कि यह वर्तमान और भविष्य के समाज के लिए भी एक बेहद सार्थक संदेश है। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने इतिहास के विशाल कैनवास पर मानवतावाद, सामाजिक समानता और प्रेम के शाश्वत मूल्यों के जो रंग उकेरे हैं, वे हिंदी गद्य साहित्य की एक अमूल्य निधि हैं। यह उपन्यास समाज की सड़ी-गली रूढ़ियों को तोड़कर जीवन को फिर से नया बनाने—यानी 'पुनर्नवा' होने—की एक सशक्त, काव्यात्मक और वैचारिक प्रेरणा है।


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