आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी की उपन्यास कला की समीक्षा

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आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी हिंदी साहित्य के मूर्धन्य निबंधकार और आलोचक होने के साथ-साथ एक अत्यंत विशिष्ट और श्रेष्ठ उपन्यासकार भी हैं।

आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी की उपन्यास कला की समीक्षा


चार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी हिंदी साहित्य के मूर्धन्य निबंधकार और आलोचक होने के साथ-साथ एक अत्यंत विशिष्ट और श्रेष्ठ उपन्यासकार भी हैं। यद्यपि उन्होंने केवल चार उपन्यासों की रचना की है, किंतु हिंदी उपन्यास साहित्य में उनका योगदान मील का पत्थर माना जाता है।उनके रचित चार उपन्यास हैं— 'बाणभट्ट की आत्मकथा' (1946), 'चारु चंद्रलेख' (1963), 'पुनर्नवा' (1973) और 'अनामदास का पोथा' (1976)।

डॉ. इन्दिरा जोशी ने लिखा है कि, "यह एक अत्यन्त विलक्षण तथा असाधारण साहित्यिक घटना है कि आचार्य द्विवेदीजी ने उपन्यास रचना बीसवीं सदी के पाँचवें दशक में प्रारम्भ की, जबकि वे हिन्दी साहित्य की सेवा में पिछले चार दशकों से प्रवृत्त हैं। इसलिये जब उनकी 'बाणभट्ट की आत्मकथा' 'विशाल भारत' में धारावाहिक रूप में निकली तो उसने पाठकों को हैरान कर दिया। 'चारुचन्द्र लेख' उनकी बीसवीं शती के सातवें दशक की कृति है, उनका 'पुनर्नवा' उपन्यास भी छपकर तैयार हो गया है। ये तीनों उपन्यास अपनी लेखन शैली में उपन्यासों में एकदम निराले और अभिनव हैं।"
 
द्विवेदीजी निबन्धकार हैं, उपन्यासकार हैं, समीक्षक हैं, शोधकर्त्ता हैं और इतिहास को सांस्कृतिक पीठिका पर रखकर उसे नयी भूमिका देने वाले इतिहासकार हैं। अतीत को वर्तमान से जोड़ने की उनमें अपार क्षमता है। 'शैव-साधना' के रहस्य का उन्होंने उद्घाटन किया है। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के बाद वाली साहित्य - पीढ़ी में द्विवेदीजी का सर्वोच्च स्थान है।
 
हिन्दी में ऐतिहासिक उपन्यासों में देशभक्ति का स्वर प्रधान है। प्राचीन और मध्यकालीन भारतीय सभ्यता और संस्कृति, जातीय शौर्य तथा अतीत के गौरवपूर्ण इतिहास का चित्रण इनमें प्रमुख रूप से हुआ है। राष्ट्रीय गौरव के लिये आत्मबलिदान का भाव इन उपन्यासों में प्रस्तुत है। हिन्दी के ऐतिहासिक उपन्यासकारों में वृन्दावन लाल वर्मा, चतुरसेन शास्त्री तथा डॉ. हजारी प्रसाद द्विवेदी के उपन्यास इसी प्रकार के इन लेखकों की कृतियों में मानववादी विचार व्यक्त हुए हैं। इनके उपन्यासों में एक आदर्शवादी दृष्टि प्राप्त होती है। हजारीप्रसाद द्विवेदी के 'बाणभट्ट की आत्मकथा अथवा वृन्दावन लाल वर्मा के 'झाँसी की रानी' को उदाहरण के लिये प्रस्तुत किया जा सकता है। झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई का आदर्श और प्रखर चरित्र राष्ट्रीय गौरव का प्रतीक है। 

हजारी प्रसाद द्विवेदी का उपन्यास साहित्य

आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी की उपन्यास कला की समीक्षा
आचार्य द्विवेदीजी ऐतिहासिक उपन्यासकार हैं, ऐतिहासिक उपन्यास ऐतिहासिक तथ्यों की रक्षा करते हुए तत्कालीन समाज एवं वातावरण को कल्पना के सहारे सजीव रूप देता है। द्विवेदीजी के उपन्यास इस प्रकार हैं- बाणभट्ट की आत्मकथा (1946), चारुचन्द्र लेख (1963), पुनर्नवा (1974), अनामदास का पोथा (1976)।

शैली और नितांत संवेदना के कारण द्विवेदीजी का प्रथम उपन्यास 'बाणभट्ट की आत्मकथा' हिन्दी का सर्वाधिक चर्चित ऐतिहासिक उपन्यास है, जिसका अनुवाद अनेक देशी भाषाओं में हुआ है। 'चारुचन्द्र लेख' द्विवेदीजी का दूसरा उपन्यास है जो एक बड़े अन्तराल के बाद प्रकाशित हुआ। तीसरा उपन्यास 'पुनर्नवा' अत्यन्त प्रसिद्ध है।
 
इन उपन्यासों के माध्यम से द्विवेदीजी ने इतिहास की पुनर्रचना की है। इतिहास की अर्थात् काल-स्रोत में रहते हुए जीवन्त समाज की पुनर्रचना करने में द्विवेदीजी को अद्भुत सफलता मिली है। द्विवेदीजी उन साहित्यिक विवरणों और वर्णनों को अपनी मनोरम कल्पना का पुट देकर एक ऐसे कथा-सूत्र में गूँथ देते हैं जो एक इन्द्रधनुषी सतरंगे पुष्पहार के जन्म का अनुपम सौन्दर्य बिखेरता रहता है। अपने सांस्कृतिक ऐतिहासिक उपन्यासों के लिए डॉ. हजारीप्रसाद द्विवेदी का हिन्दी उपन्यास साहित्य में एक विशिष्ट स्थान है, जिसके माध्यम से इन्होंने देशीय एवं जातीय संस्कृति तथा परम्परागत मान्यताओं का वर्तमान सामाजिक हित में चित्रण किया है। यद्यपि हिन्दी में ऐतिहासिक उपन्यासों की परम्परा बहुत लोकप्रिय नहीं हुई, किन्तु निश्चय ही कुछ महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक उपन्यास लिखे गये हैं, जिनमें 'बाणभट्ट की आत्मकथा' का उल्लेखनीय स्थान है। द्विवेदीजी की उपन्यासकार के रूप में समीक्षा करने के लिये उनकी उपन्यास-कला पर विचार करना आवश्यक है। उपन्यास-कला के तत्व इस प्रकार हैं-

कथा-संगठन या कथावस्तु

उपन्यास में घटनाओं के संगठन को कथानक कहा गया है। उपन्यास आधुनिक युग के साहित्यिक माध्यमों में सर्वप्रमुख माना जाता है। द्विवेदीजी ने अपने उपन्यास 'बाणभट्ट की आत्मकथा' में मध्यकालीन संस्कृति के सन्दर्भ में जीवन तथा जगत् का चित्रण एवं मूल्यांकन स्वच्छन्दतावादी दृष्टि के आधार पर किया है और इस दृष्टि के आधार पर सामंती मूल्यों की स्वीकृति भी है तथा अस्वीकृति भी और स्वीकृति में सामंजस्य स्थापित करने का प्रयास भी है। इस उपन्यास में कई कहानियाँ मिलती हैं-निपुणिका तथा बाण की कहानी, भट्टिनी तथा बाण की कहानी, महामाया तथा गृहवर्मा और अघोरवैभव की कहानी, सुचरिता और विरतिवज्र की कहानी एवं मिस कैथराइन तथा लेखक इत्यादि। 'बाणभट्ट की आत्मकथा' में ‘कादम्बरी' और ‘हर्षचरितम्' के युग की राजनीतिक और सामाजिक पृष्ठभूमि में संस्कृत के महान् लेखक बाणभट्ट के जीवनवृत्त को प्रस्तुत किया गया है। डॉ. हजारीप्रसाद द्विवेदी का दूसरा उपन्यास 'चारुचन्द्र लेख' 12वीं-13वीं शताब्दी के आर्यावर्त का जीवन-इतिहास प्रस्तुत करता है। इस उपन्यास में धर्म, दर्शन, विभिन्न साधना-पद्धतियों, शाश्वत आनन्द मार्गों आदि पर अमूल्य विचार बिखरे पड़े हैं। विभिन्न साधना मार्गों की सीमाओं का उल्लेख करते हुए स्थान-स्थान पर उनकी नवीन बुद्धि पर व्याख्या दी गई है।कथा का आधार-बिन्दु रानी चन्द्रलेखा है। अद्भुत असाधारण तत्वों से उनके व्यक्तित्व का निर्माण हुआ है।
 
'पुनर्नवा' चौथी शताब्दी की घटनाओं पर आधारित ऐतिहासिक उपन्यास है, लेकिन जिन प्रश्नों को इसमें उठाया गया है, वे चिरन्तन हैं और उनके प्रस्तुतीकरण तथा निर्वाह में आचार्य द्विवेदीजी ने अत्यन्त वैज्ञानिक एवं प्रगतिशील दृष्टिकोण का परिचय दिया है। यह उपन्यास द्विवेदीजी के पहले और दूसरे उपन्यासों की अपेक्षा श्रेष्ठ है।
 

पात्र योजना तथा चरित्र-चित्रण

उपन्यास के मुख्य तत्वों में कथानक के पश्चात् पात्र तथा चरित्र-चित्रण को दूसरा उपकरण माना जाता है। 'चारुचन्द्र लेख' में चरित्र दर्शन की व्याख्याएँ अधिक हैं। कथा का आधार - बिन्दु रानी चन्द्रलेखा है। अद्भुत तथा असाधारण तत्वों से उनके व्यक्तित्व का निर्माण हुआ है। उनके आचरण और व्यवहार में दृश्यमान असंगतियों की जन्मजात संस्कारों, जीवन स्थितियों एवं वातावरण के प्रकाश में मनोवैज्ञानिक व्याख्या की जा सकती है। इस उपन्यास में वन्दना, कथामुख और अन्त में उपसंहार है।

'बाणभट्ट की आत्मकथा' में काल्पनिक, ऐतिहासिक एवं संदिग्ध पात्र मिलते हैं काल्पनिक पात्र भी ऐतिहासिक पात्र के तुल्य लगते हैं। चरित्र-चित्रण की दृष्टि से यह उपन्यास सफल है। 'पुनर्नवा' ऐसे हीन - चरित्र व्यक्तियों की कहानी है जो युग-युग से समाज की लांछना सहते आये हैं, किन्तु शोभा और शालीनता की कोई किरण उनके अन्तर में छिपी रहती है और एक दिन वही किरण ज्योतिपुंज बनकर न केवल उनके. अपने बल्कि दूसरों के जीवन को भी आलोकित कर देती है। इस उपन्यास में मुख्य कथासूत्र एक अपहृता नारी को मुक्त कराकर उसके पिता को पुन: सौंपना है। प्रस्तुत उपन्यास में निपुणिका, भट्टिनी, सुचरिता, महामाया आदि सभी विचित्र विडम्बनाओं के शिकार हैं और उनके दारुण जीवन विभिन्न नारी समस्याओं को प्रकाशित करते हैं। 

संवाद या कथोपकथन

कथोपकथन की सफलता तभी सम्भव है जब वह कुछ आवश्यक गुणों-उपयुक्तता, स्वाभाविकता, संक्षिप्तता, उद्देश्यपूर्णता, सम्बद्धता, अनुकूलता, मनोवैज्ञानिकता, भावनात्मकता आदि से युक्त हो। डॉ. द्विवेदी के उपन्यासों में संवाद योजना इन सभी गुणों से भरपूर है। 'बाणभट्ट की आत्मकथा' उपन्यास से संवाद योजना का दिग्दर्शन इस प्रकार है-"आर्य ! इस बालक ने आपसे जो कहा, वह सत्य है, परन्तु इससे आपके चिन्तित या उद्विग्न होने की बात नहीं है। दूसरी नौका में दस क्षत्रिय कुमार आपकी रक्षा के लिये तैयार हैं। आर्य ! इन नाड़ियों में मौखरियों का उष्ण रक्त प्रवाहित हो रहा है।" इस प्रकार संवाद सर्वथा नाटकीय हैं। उनके संवादों में उनकी मनोस्थिति का परिज्ञान हो जाता है। पात्रों के हाव-भावों के समावेश से उनमें नाटकीय सौन्दर्य की समृद्धि होती है। द्विवेदीजी ने उबा देने वाले संवादों को नहीं लिखा है। आवश्यकता से अधिक वार्तालाप उबा देने वाला होता है और औचित्य का विचार न करके की गयी संवाद-योजना उपन्यास की प्रभावान्विति में बाधा डालती है। संक्षेप में कह सकते हैं कि द्विवेदीजी के संवाद सरल, स्वाभाविक, पात्रानुकूल, संक्षिप्त, प्रभावशाली एवं भावाभिव्यंजक हैं।
 

देशकाल तथा वातावरण

उपन्यास में देश-काल अथवा वातावरण का चित्रण प्राय: कथा-काल और कथा-प्रकार की विशिष्टता के अनुसार किया जाता है। 'चारुचन्द्र लेख' में तत्कालीन समाज-व्यवस्था और विविध प्रकार की साधनाओं, विशेषतः सिद्धों की तन्त्र-साधना और नाथ-पंथियों की योग-साधना का पांडित्यपूर्ण चित्रण हुआ है। लेखक ने अतीत के सन्दर्भ में वर्तमान की अनेक समस्याओं का भी उद्घाटन किया है। द्विवेदीजी ने 'बाणभट्ट की आत्मकथा' में प्रत्येक युग के विशिष्ट वातावरण को उपस्थित किया है। 'पुनर्नवा' में राजनीति, समाज, धर्म, वीरता, प्रेम, करुणा, सौन्दर्य, त्याग, सेवा आदि का ऐसा वर्णन किया गया है, जिनका सम्मिलित योग एक ऐसे उदात्त भाव की सृष्टि करता है, जिससे मानवीय चेतना के परिष्कार के. साथ मूल मानवीय समस्याओं का समाधान हो सके। 'बाणभट्ट की आत्मकथा' में कहानी जहाँ मार्मिक है, वहाँ 'चारुचन्द्र लेख' में कथानक नाम की कोई वस्तु ही नहीं है। खड़ी बोली में रहस्यवाद का प्रचलन छायावादी कवियों द्वारा पहले ही हो चुका था, गद्य में उसकी कसर रह गयी थी। उस कमी की पूर्ति हजारीप्रसाद द्विवेदी के कथा-साहित्य से होती है। संक्षेप में कह सकते हैं कि द्विवेदीजी ने मध्यकालीन तांत्रिक संस्कृति का, देशकाल के विशाल और व्यापक फलक का चित्रण किया है।
 

भाषा शैली

साहित्य की किसी भी विधा में भाषा का प्राथमिक महत्व है, परन्तु उसका सबसे जटिल रूप हमें उपन्यास और काव्य में मिलता है। उपन्यास की कथा की वे सभी शैलियाँ हो सकती हैं जो सामान्य रूप से वर्णन शैली के अन्तर्गत परिभाषित की जाती हैं। डॉ. द्विवेदीजी ने 'बाणभट्ट की आत्मकथा', 'चारुचन्द्र लेख' तथा 'पुनर्नवा' इन तीन उपन्यासों के माध्यम से वर्णन की नूतन शैली का परिचय दिया है। इनकी भाषा की आकर्षकता तथा तत्सम्-बहुलता नियमानुसार है। भाषा के आधार पर इनकी थोड़ी-बहुत तुलना अज्ञेय से की जा सकती है। द्विवेदीजी की भाषा-शैली उनके व्यक्तित्व का प्रतीक है। उसमें संस्कृत-भाषा का पूर्ण वैभव, हिन्दी की सम्पूर्ण शक्ति और लोक जीवन की सरस व्यंजना एक साथ समाविष्ट है। द्विवेदीजी की मानसिक स्थिति के अनुसार उसका स्वरूप बदलता रहता है। उपन्यासों में वह पात्र और परिस्थिति के अनुकूल मर्यादित हो जाती है। डॉ. रामचन्द्र तिवारी ने लिखा है कि समाज बहुल संस्कृतष्ठि अलंकृत गद्य का प्रयोग द्विवेदीजी अच्छी तरह जानते हैं। इसलिये वे अतीत में कल्पना का संचार करके किसी प्राचीन कवि को उद्धृत करते हुए या किसी सांस्कृतिक तत्व की व्याख्या करते हुए समाज-बहुल पदावली का प्रयोग करते हैं। 'बाणभट्ट की आत्मकथा' में इस प्रकार के गद्य का सर्वाधिक प्रयोग हुआ है। बाणभट्ट की वाणी होने के नाते उस सन्दर्भ में यही शैली सहज हो गई है। 'चारुचन्द्र लेख' का 'भंभल' भूमि पुत्र है। वह सहज है। इसलिये उसकी भाषा भी सहज है। द्विवेदीजी के इस सहज व्यावहारिक गद्य का अपना आकर्षण है। 'पुनर्नवा' की भाषा काव्यात्मक और स्तरीय है। यह कृति 'बाणभट्ट की आत्मकथा' से कुछ हल्की और 'चारुचन्द्र लेख' से श्रेष्ठतर है।
 

उद्देश्य

उपन्यास आधुनिक युग में साहित्य के सभी माध्यमों की अपेक्षा अभिव्यक्ति का सबसे सशक्त माध्यम माना जाता है। वास्तव में बात यह है कि जहाँ एक ओर उपन्यास का प्रचार और प्रसार आधुनिक युग में बढ़ गया है, वहीं दूसरी ओर उसके कुछ उत्तरदायित्व भी बढ़ गये हैं। द्विवेदीजी की मानवतावादी लेखनी भविष्य के लिये भी महान् संदेश दे जाती है। अतीत की जिस कथा को लेखक ने उठाया, उसमें उसकी कल्पना को खुलकर खेलने का पूर्ण अवसर मिला है, किन्तु आत्मकथा की कमजोरियाँ 'चारुचन्द्र लेख' में भी हैं। इसके अतिरिक्त शिल्प की बाह्य कमजोरियों के होते हुए भी यह उपन्यास अपने कथ्य, विचार और सन्देश में महान् है। उपन्यास में लेखक ने अतीत के सन्दर्भ में वर्तमान स्थितियों को पहचानने का प्रयत्न किया है तथा मानव-जीवन के स्थायी मूल्यों को सजाकर रखा है। 'पुनर्नवा' ऐसे ही लोकापवादों से दिग्भ्रान्त चरित्रों की कहानी है। वस्तुस्थिति के कारणों को न समझकर वे समाज से ही नहीं, अपने आपसे भी पलायन करते हैं और कर्त्तव्याकर्त्तव्य का बोध उन्हें नहीं रहता। सत्य की तह में जाकर जब वे उन अपवादों और स्तुतियों के भ्रमजाल से मुक्त होते हैं, तभी अपने वास्तविक स्वरूप का परिचय उन्हें मिलता है और नवीन शक्ति प्राप्त कर वे नये सिरे से जीवन संग्राम में प्रवृत्त होते हैं। 'पुनर्नवा' में लेखक विवाह और प्रेम दोनों को एक साथ मान्यता प्रदान करता है और पत्नी तथा प्रेमिका को पुरुष की दो आँखें बतलाकर उनमें सामंजस्य घटित करता है।

उपसंहार - इस प्रकार प्रेमचन्दोत्तर काल में अनेक उत्कृष्ट ऐतिहासिक उपन्यासों की रचना हुई है।इस युग के ऐतिहासिक उपन्यासकारों में वृन्दावन लाल वर्मा, चतुरसेन शास्त्री, राहुल सांकृत्यायन, रांगेय राघव, यशपाल और हजारीप्रसाद द्विवेदी के नाम उल्लेखनीय हैं।कुल मिलाकर, आचार्य द्विवेदी ने हिंदी उपन्यास को नई दिशा दी। उन्होंने इसे मात्र कहानी कहने की विधा नहीं, बल्कि सांस्कृतिक इतिहास, दर्शन और मानवीय संवेदना का सशक्त माध्यम बनाया। उनकी उपन्यास कला परंपरा का विकास करती हुई आधुनिकता से जुड़ती है और आज भी प्रासंगिक है।

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