परिकल्पना की उपयोगिता और महत्व

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शोध, अनुसंधान (Research) और वैज्ञानिक अध्ययन में परिकल्पना (Hypothesis) की भूमिका एक मार्गदर्शक या दिशा-सूचक (Compass) की तरह होती है।

परिकल्पना की उपयोगिता और महत्व


शोध, अनुसंधान (Research) और वैज्ञानिक अध्ययन में परिकल्पना (Hypothesis) की भूमिका एक मार्गदर्शक या दिशा-सूचक (Compass) की तरह होती है। बिना परिकल्पना के अनुसंधान का कार्य दिशाहीन हो सकता है।

सामाजिक अनुसन्धान एवं सामाजिक सर्वेक्षण में परिकल्पना की अत्यधिक उपयोगिता का महत्त्व है। परिकल्पना की सहायता के बिना यदि कोई अनुसन्धानकर्ता अध्ययन कार्य करता है तो वह सामाजिक घटनाओं की दुनिया में ठीक उसी प्रकार भटकेगा जिस प्रकार एक ग्रामीण किसान किसी बड़े नगर के राजपथ पर अकेला छोड़ देने पर भटकेगा। परिकल्पना अनुसन्धानकर्ता को मार्ग-प्रदर्शक के रूप में इधर-उधर भटकने से रोकती है और सत्य के द्वार तक पहुँचाने में या झूठ को प्रमाणित करने में उसकी सहायता देती है। यह बात परिकल्पना की अग्रलिखित उपयोगिता या महत्त्व से स्पष्ट हो जाती है-

परिकल्पना अध्ययन कार्य के केन्द्र बिन्दु को निश्चित करती है- परिकल्पना किसी विषय या समस्या से सम्बन्धित अनुसन्धान या सर्वेक्षण के अन्तर्गत किए जाने वाले अध्ययन कार्य के बिन्दु या सीमा को निश्चित करती है। परिकल्पना के द्वारा अनुसन्ध नकर्त्ता को पता चल जाता है कि उसे क्या और कितना अध्ययन करना है, किन तथ्यों को चुनना है और किसको छोड़ना है।

सर्वश्री गुडे तथा हॉट के शब्दों में, “बिना इसके (परिकल्पना के) अनुसन्धान अकेन्द्रित होता है और वह अनिर्दिष्ट विचरण ही है।" उन्होंने आगे यह भी कहा है कि परिकल्पना से प्रयत्नों की बरबादी रुक जाती है और साथ ही अध्ययन कार्य में यथार्थता बढ़ जाती है। इसीलिए कहा जाता है कि अच्छे अनुसन्धान में परिकल्पना का निर्माण एक केन्द्रीय सफलता है।
 

परिकल्पना अनुसन्धान क्षेत्र को सीमित करती है

परिकल्पना की उपयोगिता और महत्व
परिकल्पनाएँ अनुसन्धान क्षेत्र को सीमित कर अध्ययन विषय के विशिष्ट पहलू पर अनुसन्धानकर्ता का ध्यान आकर्षित करती हैं। हम जानते हैं कि घटनाओं एवं तथ्यों की दुनिया बहुत बड़ी होती है। ऐसी स्थिति में किसी अनुसन्धानकर्ता के लिए यह सम्भव नहीं है कि वह एक विषय से सम्बद्ध समस्त पहलुओं का एक ही समय पर अध्ययन करे। यदि ऐसा हुआ तो अध्ययन विषय के सम्बन्ध में कोई भी विशिष्ट या यथार्थ ज्ञान हमको प्राप्त नहीं हो सकता और इस प्रकार का अध्ययन वैज्ञानिक दृष्टिकोण से सार्थक नहीं कहा जा सकता किन्तु परिकल्पनाएँ अनुसन्धान क्षेत्र को सीमित कर अध्ययन को यथार्थ तथा वैज्ञानिकता बनाती हैं।
 

परिकल्पना अनुसन्धान की दिशा निर्धारित करती है

परिकल्पनाएँ अनुसन्धानकर्त्ता का ध्यान अध्ययन विषय के एक विशिष्ट पहलू पर केन्द्रित कर उसी के अनुसार उसे एक निश्चित दिशा की ओर उन्मुख करती हैं। इस प्रकार ये अनुसन्धानकर्त्ता के लिए ध्रुव तारे का काम करती हैं। वह अपनी परिकल्पना के आधार पर यह जानता है कि उसे क्या करना है और क्या नहीं करना, क्या उसके लिए काम की चीज है और क्या व्यर्थ की, किस दिशा की ओर उसे अग्रसर होना होता है और किस दिशा की ओर नहीं। यदि परिकल्पना का निर्माण सोच-समझ कर किया जाता है तो न केवल अध्ययन क्षेत्र का बल्कि अध्ययन विषय का भी स्पष्टीकरण हो जाता है और साथ ही अनुसन्धानकर्ता का प्रत्येक प्रयत्न उद्देश्यपूर्ण, अर्थयुक्त एवं वैज्ञानिक धारणा के अनुकूल हो जाता है।
 

परिकल्पना सम्बद्ध तथ्यों के संकलन में सहायक होती है

परिकल्पना अनुसन्धान के क्षेत्र को सीमित कर तथा उसकी दिशा निर्धारित कर केवल उन्हीं तथ्यों के संकलन के लिए हमें उन्मुख करती है जो कि हमारे विषय से सम्बद्ध होते हैं। इस सम्बन्ध में श्रीमती यंग ने लिखा है, “परिकल्पना के प्रयोगों में उन तथ्यों की अन्धी खोल व अन्धाधुन्ध संकलन पर नियंत्रण होता है जो कि बाद में अध्ययन की जाने वाली समस्या के लिए अप्रासंगिक या व्यर्थ सिद्ध हो।" यदि आरम्भ में हम सभी तथ्यों को संकलित भी कर लेते हैं तो हमें अपनी परिकल्पना की सत्यता या असत्यता को प्रमाणित करने के लिए कुछ विशिष्ट तथ्यों को छाँटना पड़ता है। 

परिकल्पना सत्यता को ढूँढ़ने में सहायक होगी

परिकल्पना हमें प्रत्येक दिशा में सत्य को ढूँढ़ निकालने के कार्य में सहायता प्रदान करती है। जैसा कि हम पहले भी संकेत कर चुके हैं कि परिकल्पना के निर्माण के बाद हम इसके वास्तविक तथ्यों के आधार पर जाँच करते हैं। इस परीक्षा में हम या तो यह प्रमाणित करते हैं कि वह परिकल्पना सही है या सिद्ध करते हैं कि यह गलत है। दोनों ही दिशा में हम सत्य को ढूँढ़ निकालते हैं क्योंकि किसी वस्तु या वस्तु या विषय को गलत सिद्ध करना भी इसकी वास्तविकता या सत्यता से परिचित होता है जिसका कि अब तक कोई ज्ञान न था । उदाहरण के लिए यदि हम यह सिद्ध करते हैं, कि यह परिकल्पना केवल पेशा ही भारतीय जाति-व्यवस्था की उत्पत्ति का कारण है गलत है, तो हम वास्तव में इन गलत धारणाओं से मुक्त हो जाते हैं जो कि जाति व्यवस्था की उत्पत्ति के लिए केवल पेशा सम्बन्धी सिद्धान्त के कारण लोगों के मस्तिष्क में तब तक जड़ पकड़े थी। इसी दृष्टि को सामने रखते हुए श्रीमती यंग ने लिखा है “वैज्ञानिक के लिए नकारात्मक परिणाम प्रायः उतने ही महत्त्वपूर्ण एवं रोचक होते हैं जितने सकारात्मक परिणाम।

संक्षेप में कहें तो, परिकल्पना अनुसंधान रूपी भवन की वह नींव है जिसके बिना एक व्यवस्थित और वैज्ञानिक अध्ययन की कल्पना नहीं की जा सकती। यह केवल एक 'तुक्का' या 'अंदाजा' नहीं है, बल्कि एक तार्किक और विचारणीय पुल है जो समस्या (Problem) को समाधान (Solution) से जोड़ता है।

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