असहयोग आंदोलन (Non-Cooperation Movement) भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का एक अत्यंत महत्वपूर्ण मोड़ था।
असहयोग आंदोलन की पृष्ठभूमि | Background of Non-Cooperation Movement
असहयोग आंदोलन (Non-Cooperation Movement) भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का एक अत्यंत महत्वपूर्ण मोड़ था। 1920 में महात्मा गांधी के नेतृत्व में शुरू हुआ यह पहला राष्ट्रव्यापी जन आंदोलन था। इसकी पृष्ठभूमि किसी एक घटना का परिणाम नहीं थी, बल्कि कई राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक कारणों का संचय थी।
एनी विसेन्ट एवं तिलक द्वारा शुरू किये गये होमरूल आन्दोलन ने भारतीय जनता के मन में स्वशासन के प्रति जागृति पैदा कर दी । 1917 में इस आन्दोलन के कमजोर पड़ जाने के बाद 1918 में माण्टेग्यू चेम्सफोर्ड सुधार योजना प्रस्तुत की गयी। इस योजना में कहीं भी भारतीयों को स्वशासन देने की बात नहीं रखी गयी थी । इस योजना से कांग्रेस के उदारवादी एवं उग्रवादी गुटों में पुनः दरार दिखलायी पड़ने लगी । उदारवादियों के प्रमुख नेता गोखले एवं फिरोजशाह मेहता की मृत्यु हो चुकी थी अतः कांग्रेस पर इस समय वास्तविक नियंत्रण उग्रवादियों का हो गया था । उग्रवादियों के नेता तिलक भी इस समय बिमार चल रहे थे । अब इस अवस्था में वे सक्रिय नेतृत्व लायक नहीं थे । विपिन चन्द्र पाल आदि उग्रवादी नेता भी अधिक उम्र के कारण निष्क्रिय से हो गये थे । अतः इस समय कांग्रेस को एक नये एवं सक्रिय नेतृत्व की तलाश थी जो उदारवाद एवं उग्रवाद के विवादों से ऊपर उठकर भारतीय जनता की आकंक्षाओं के अनुरूप राष्ट्रीय आन्दोलन का संचालन कर सके।
ऐसे समय में दक्षिण अफ्रीका में अपने सत्याग्रह के सफल प्रयोग के साथ वापस लौटे गाँधी जी ने भारतीय राजनीति में कांग्रेस के माध्यम से प्रवेश किया। गाँधी जी ने 1917 में चम्पारण, 1918 में अहमदाबाद एवं खेड़ों में अपने सत्याग्रह के प्रयोग में सफलता प्राप्त की थी। इन सफलताओं से गाँधी जी की लोकप्रियता भारतीय जनता में बढ़ी और वे जनप्रिय नेता के रूप में भारतीयों के हृदय में प्रतिष्ठित हो चुके थे।
प्रारम्भ मे गाँधी जी ने ब्रिटिश सरकार के प्रति सहयोगी रुख अपनाया लेकिन रोलेट ऐक्ट तथा कुछ अन्य इसी तरह के जनविरोधी भावनाओं ने उन्हें सरकार विरोधी या असहयोगी बना दिया। असहयोगी गाँधी ब्रिटिश सरकार को शैतान (Devil) की संज्ञा देते हुए इसके बिरुद्ध असहयोग आन्दोलन चलाने का कार्यक्रम बनाने लगे।असहयोग आन्दोलन की पृष्ठभूमि में निम्नलिखित उत्तरदायी कारणों को देखा जा सकता है -
प्रथम विश्व युद्ध का परिणाम
प्रथम महायुद्ध के दौरान मित्र राष्ट्रों ने घोषणा की कि वे लोकतंत्र की रक्षा के लिये युद्ध में प्रवेश किये हैं तथा वे आत्म निर्णय के सिद्धान्त का प्रतिपादन करते हैं । युद्ध की समाप्ति के बाद कई पराधीन देशों में लोकतंत्र की स्थापना की गयी । आत्म निर्णय के सिद्धान्त पर कई राज्यों का निर्माण किया गया। इसके परिणाम स्वरूप पराधीन क्षेत्रों में राष्ट्रीयता की भावना का उदय हुआ। कई क्षेत्रों में राष्ट्रीय आन्दोलनों को बल मिला । भारत भी इस प्रभाव से अछूता नहीं रहा। युद्ध के बाद, यद्यपि अंग्रेजों ने यहाँ अपेक्षित स्वशासन नहीं दिया लेकिन यहाँ राष्ट्रीयता की भावना बढ़ी, राष्ट्रीय आन्दोलन का स्वरूप बदला । अब यह आन्दोलन एक निश्चित परिणाम का अपेक्षी बना तथा राष्ट्रीय आन्दोलन की धार तेज हुई ।
देश की आर्थिक दुर्दशा
ब्रिटेन की तरफ से महायुद्ध में भाग लेने के कारण भारतीय सेना पर एक अरब पौण्ड से भी अधिक का व्ययभार बढ़ा । इस व्ययभार को बहन करने के कारण भारतीयों की आर्थिक स्थिति अत्यन्त दयनीय हो गयी । युद्ध के कारण मुद्रा स्फिति बढ़ी जिसके कारण वस्तुओं का मूल्य बढ़ गया । मूल्य वृद्धि एवं आवश्यक वस्तुओं) के अभाव से जनसाधारण का जीवन निर्वाह करना कठिन हो गया। किसानों, मजदूरों की दशा और भी खराब हो गयी । चम्पारण, अहमदाबाद और खेड़ा में इनकी दशा सुधारने के लिये गाँधी जी ने सत्याग्रह का सफलता पूर्वक प्रयोग किया। आर्थिक रूप से परेशान जनता सरकार विरोधी हो गयी । गाँधी जी एवं उनके सत्याग्रह आन्दोलन से प्रभावित होकर भारतीय जनता उनके समर्थन एवं सहयोग को उद्यत हो गयी ।
प्लेग, इनफ्लुएन्जा और अकाल के प्रति सरकारी नीति
बिगड़ी हुई आर्थिक स्थिति में ही प्लेग, इनफ्लूएन्जा की बिमारी फैल गयी । इन बिमारियों की रोक थाम के लिये सरकार ने सन्तोष जनक प्रयास नहीं किया। 1917 ई0 में अनावृष्टि के कारण अकाल पड़ गया । प्लेग, इनफ्लुएन्जा के साथ ही हजारों लोग अकाल के समय भूख से तड़प कर मर गये । सरकार ने जनता के दुःख-दर्द को दूर करने के लिये जो भी प्रयास किये अपर्याप्त थे जिससे जनता सरकार विरोधी बनी।
1919 के सुधार अधिनियम से निराश
भारतमंत्री मान्टेग्यू 1918 में भारतीयों को उत्तरदायी शासन प्रदान करने के उद्देश्य के साथ भारत आये । यहाँ वायसराय चेम्सफोर्ड ने भारत के अनेक प्रान्तों में भ्रमण करके अनेक राजनेताओं से बातचीत की । इसके आधार पर 1918 में ही माण्टेग्यू चेम्सफोर्ड सुधार योजना प्रस्तुत की गयी । इस योजना के आधार पर ही 1919 का सुधार अधिनियम पारित किया गया। इसमें केन्द्र में उत्तरदायी सरकार नहीं बनायी गयी । प्रान्तों में द्वैध शासन स्थापित कर दिया गया। स्थानीय स्वशासन को भी बढ़ावा नहीं दिया गया । कांग्रेस के उदारवादी इसके समर्थक एवं प्रशंसक थे परन्तु व्यापक स्तर पर इसके प्रति निराशा एवं क्षोभ का वातावरण पैदा हुआ जिसने लोगों को असहयोगी बनने को प्रेरित किया।
सरकार की दमनकारी नीति
भारतीयों के राष्ट्रीय आन्दोलन को कुचलने के लिये सरकार कड़ा से कड़ा कदम उठा रही थी। प्रेस ऐक्ट, सेडीशन ऐक्ट, एक्सप्लोसिव सब्सटेन्स ऐक्ट, क्रिमीनल लॉ एमेन्डमेन्ट ऐक्ट आदि दमनकारी कानूनों का निर्माण राष्ट्रीय आन्दोलन को कुचलने के लिये ही किया गया । क्रान्तिकारियों को फाँसी, कालापानी और कठोर कारावास की सजा देने में कोई कसर बाकी नहीं रखी गयी । होम रूल जैसे वैधानिक एवं शान्तिपूर्ण आन्दोलन को भी निर्ममता से दबा दिया गया । भारत सरकार की दमनकारी नीति ने जनता के असन्तोष को बढ़ा कर उन्हें असहयोगी बनाने में मदद की ।
रोलेट एक्ट (Rowlatt Act 1919 )
युद्ध काल में क्रान्तिकारियों को दबाने के लिये भारत सुरक्षा अधिनियम पारित किया गया। इसकी अवधि युद्धकाल तक ही थी । युद्ध के बाद सरकार ने न्यायाधीश सर सिडनी रोलेट ( Sir Sydney Rowlatt ) की अध्यक्षता में एक समिति का निर्माण इस बात की जाँच हेतु किया कि भारत में क्रान्तिकारी आन्दोलन किस सीमा तक फैला हुआ है और किन उपायों द्वारा इसका अन्त किया जाना सम्भव है । समिति की रीपोर्ट पर सरकार ने फरवरी 1919 में केन्द्रीय विधान सभा में दो विधेयक प्रस्तुत किये जिन्हें रोलेट विधेयक कहते हैं । इसके विरुद्ध सारे देश में आवाज उठायी गयी। सी0 वाई0 चिन्तामणि के शब्दों में " इस दोनों विधेयकों का विरोध परिषद के गैर सरकारी भारतीय सदस्यों, निर्वाचित सदस्यों और मनोनीत सदस्यों सबने समान रूप से किया, परन्तु सरकार अपने बात पर अड़ी रही और तनिक भी नहीं झुकी ।" सरकार ने भारतीय जनता एवं उनदे प्रतिनिधियों के विरोध की परवाह किये बिना इस विधेयक को 18 मार्च 1919 को कानून का रूप दे दिया, जिसे रौलेट ऐक्ट कहा गया ।
इस ऐक्ट के द्वारा मजिस्ट्रेटों को यह अधिकार दिया गया कि वे संदिग्ध व्यक्तियों को थोड़ी बहुत जॉच के बाद नजरबन्दी का आदेश जारी कर सकते हैं । इससे इण्डियन एविडेन्स ऐक्ट (Indian Evidence Act ) की उसधारा को समाप्त कर दिया गया जिसके अनुसार पुलिस अधिकारियों के सामने दी गयी गवाही सफाई की गवाही नहीं मानी जा सकती थी । इस प्रकार सरकार को दमनकारी अधिकार मिल गया और भारतीयों की स्वतंत्रता निरर्थक एवं महत्वहीन हो गयी।
महात्मा गाँधी ने रोलेट ऐक्ट का विरोध करते हुए रोलेट सत्याग्रह चलाया : कहीं कहीं 30 मार्च और अधिकांश जगहों पर 7 अप्रैल 1919 को शोक दिवस तथा हड़ताल मनायी गयी । 30 मार्च के विरोध दिवस आन्दोलन के दौरान दिल्ली पुलिस की गोली से 60 व्यक्ति हताहत हुए । गाँधी जी स्थिति को शान्त करने के लिये दिल्ली जा रहे थे । उन्हें गिरफ्तार कर बम्बई भेज दिया गया । जनता उत्तेजित हो उठी । पंजाब के गवर्नर डायर ने कांग्रेसी नेताओं के पंजाब प्रवेश पर रोक लगा दी । डॉ0 किचलू और डॉ० सत्यपाल को बन्दी बना लिया गया । अमृतसर के क्षुब्ध-नागरिकों ने जुलूस निकाला । शान्ति पूर्ण जूलूस पर पुलिस ने गोली चलायी । 10 व्यक्ति मारे गये बहुत से घायल हुए ।
जलियाँवाला बाग हत्या काण्ड
अमृतसर की आन्दोलित जनता को कुचलने के लिये नगर को सेना के हवाले कर दिया गया । 12 अप्रैल से शहर में सार्वजनिक सभा करने पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया, परन्तु इसकी पूरी जानकारी जनता तक नही पहुँचायी गयी। 13 अप्रैल 1919 को बैशाखी के दिन जलियाँ वाले बाग में हजारों की संख्या में स्त्री- पुरुष एकत्र हुए । यह बाग चारों तरफ से चहारदीवारी से घिरा हुआ मैदान था । सभा शान्तिपूर्वक चल रही थी तभी जनरल डायर 250 सैनिकों के साथ बाग में एकत्र लोगों पर गोलियों की बौछार करने लगा । इस अमानुषिक कार्यवाही में 400 लोग मारे गये, करीब दो हजार लोग घायल हुए । इसके दो दिन बाद ही पंजाब के 6 जिलों में सैनिक शासन मार्शलला (Martial Law ) लगा दिया गया ।
देश के कोने-कोने से इस घटना के विरोध में आवाज उठने लगी । रवीन्द्र नाथ ठाकुर ने नाइट (Knight) की उपाधि वापस कर दी । जनता के विरोध एवं जाँच की माँग को देखते हुए सरकार ने लार्ड हण्टर की अध्यक्षता में एक समिति बनायी जिसके तीन सदस्य अंग्रेज और दो भारतीय श्री चिमन लाल सितलबाड़ तथा जगत नारायण थे। इस आयोग ने डायर के कार्यों पर पर्दा डालते हुए सत्याग्रह को ही दोषी ठहराया ।
हण्टर कमीशन निष्पक्ष नहीं था । गाँधी जी की अध्यक्षता में कांग्रेस ने भी एक जाँच समिति बनायी जिसके सहायक चितरंजन दास, मोती लाल नेहरू, अब्बास तैयब और डॉ0 जयकर थे। समिति ने अपनी रिपोर्ट में अधिकारियों के अमानुषिक कार्यों की घोर निन्दा की पंजाब की घटना की जाँच पड़ताल के बाद जनरल डायर को नौकरी से अलग दिया गया। लेकिन ब्रिटेन की लार्ड सभा में जनरल डायर को क्षमा कर देने का प्रस्ताव लाया गया, उसे ब्रिटिश साम्राज्य का शेर कहा गया और उसे प्रतिष्ठा की तलवार (Sword of Honour) तथा 2 हजार पौण्ड भेंट दी गयी । महात्मा गाँधी पर इस घटना का तत्काल प्रभाव पड़ा और वे अंग्रेजों के कट्टर असहयोगी बन गये ।
खिलाफत आन्दोलन
प्रथम विश्व युद्ध में टर्की जर्मनी के साथ अंग्रजों के विरुद्ध लड़ा था । भारतीय मुसलमानों से सहयोग लेने के लिये उन्हें ब्रिटिश सरकार ने आश्वासन दिया था कि युद्ध की समाप्ति के बाद इंग्लैण्ड टर्की के विरुद्ध प्रतिरोध की नीति नहीं अपनायेगा और न ही टर्की साम्राज्य को छिन्न-भिन्न होने देगा । लेकिन युद्ध के बाद अंग्रेज अपने वचन से हट गये। सेब की संधि द्वारा टर्की को छिन्न- भिन्न कर दिया गया । टर्की के कुछ प्रदेशों को स्वतंत्र राज्य बना दिया गया और कुछ प्रदेशों को ब्रिटेन तथा फ्रान्स के अधीन कर दिया गया । खलीफा पद के लिये तुर्की के सुल्तान के स्थान पर मक्का के हाकिम एवं लारेन्स के कृपा पात्र शेख हसन के दावे को स्वीकार किया गया और उसका प्रचार किया गया।
ब्रिटेन एवं मित्र राष्ट्रों द्वारा तुर्की के सुल्तान के साथ किये गये इस व्यवहार से काफी उत्तेजना फैली एवं ब्रिटिश सत्ता के खिलाफ भारत में शक्तिशाली खिलाफत आन्दोलन उठ खड़ा हुआ । खिलाफत के समर्थकों की माँग थी " तुर्की साम्राज्य का सम्मान किया जाय तथा आध्यात्मिक संस्था के रूप में खलीफा का अस्तित्व बनाये रखा जाय । गाँधी जी ने खिलाफत अन्दोलन का समर्थन किया एवं आगे चलकर खिलाफत आन्दोलन को असहयोग आन्दोलन के साथ मिलाकर चलाया।
आन्दोलन का स्थगन
इस बीच 5 फरवरी 1922 को ही गोरखपुर के चौरी - चौरी थाना क्षेत्र में कांग्रेस एवं खिलाफत के जुलूस पर पुलिस ने गोली चलायी । आन्दोलनकारियों ने चौरी - चौरी थाने को घेर कर उसमें आग लगी दी । इसमें 22 पुलिस कर्मी जिन्दा जल गये । इस घटना की खबर पाकर गाँधी जी ने 22 फरवरी 1922 को आन्दोलन वापस ले लिया ।
आन्दोलन की सफलता असहयोग आन्दोलन पहला जन आन्दोलन था । इस आन्दोलन में पूरे देश के लोगों ने हिस्सा लिया। लोगों का सरकार से भय समाप्त गया। अब जनता स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए मरने मारने पर उतारू हो गयी तथा जेल उसके लिए घर बन गया । बच्चे और स्त्रियां तक जेल जाने लगे। लोगों में रचनात्मक कार्यों में भाग लेने के लिए होड़ होने लगी। लोग स्वदेशी वस्तुओं, स्वदेशी शिक्षा, स्वदेशी संस्कृति को गौरव की वस्तु मानने लगे । इस आन्दोलन की सबसे बड़ी सफलता यह है कि उसने जनता को जगा दिया और उसके भीतर के भय को निकाल दिया ।
निष्कर्ष:
इन सभी परिस्थितियों—आर्थिक बदहाली, रौलट एक्ट का दमन, जलियांवाला बाग का घाव और खिलाफत का मुद्दा—ने मिलकर एक बारूद का ढेर तैयार कर दिया था। सितंबर 1920 में कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में और बाद में दिसंबर 1920 के नागपुर अधिवेशन में असहयोग आंदोलन के प्रस्ताव को औपचारिक स्वीकृति दे दी गई। गांधी जी का मानना था कि यदि भारतीय अंग्रेजों का सहयोग करना बंद कर दें, तो ब्रिटिश शासन साल भर के भीतर ढह जाएगा और 'स्वराज' प्राप्त हो जाएगा।


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