आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी (1907–1979) हिंदी साहित्य के आधुनिक काल के एक मूर्धन्य निबंधकार, प्रखर आलोचक, अद्वितीय उपन्यासकार और सांस्कृतिक इतिहासकार
आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी का साहित्यिक योगदान
आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी (1907–1979) हिंदी साहित्य के आधुनिक काल के एक मूर्धन्य निबंधकार, प्रखर आलोचक, अद्वितीय उपन्यासकार और सांस्कृतिक इतिहासकार हैं।भारतेंदु युग और द्विवेदी युग (महावीर प्रसाद द्विवेदी) के बाद, उन्होंने हिंदी गद्य को एक नई ऊंचाई और व्यापकता दी।
उनका साहित्यिक योगदान बहुआयामी है, जिसे निम्नलिखित प्रमुख बिंदुओं के अंतर्गत समझा जा सकता है:
साहित्य का विस्तृत क्षेत्र
जीवन का क्षेत्र अत्यन्त व्यापक होता है। इसकी बहुमुखी साधनाओं की कोई गणना नहीं की जा सकती। संस्कृति, सभ्यता, धर्म, दर्शन, राजनीति, विज्ञान प्रभृति इसके अनेक विभाग हैं। इन सब की व्यष्टि तथा समष्टि रूप साधना का मूल उद्देश्य जीवन को सम्पूर्ण एवं समृद्ध बनाना है। साहित्य जीवन की अखण्डता का गायक तथा स्वप्नदृष्टा दोनों है। यदि साहित्य अपने इस साध्य की सम्प्राप्ति में पूर्णत: सफल नहीं होता तो उसे साहित्य कहलाने का अधिकार नहीं है। आचार्य द्विवेदी का साहित्य को सर्वाधिक योगदान इसके साध्य को सम्पूर्ण व्यापकता, विशालता तथा विराटता के साथ कार्य रूप में परिणत करना है। द्विवेदीजी की साहित्य-साधना में संस्कृत भाषा की अविरल प्रतिध्वनि होने का यही रहस्य है। मानव-जीवन की सामाजिक, धार्मिक अथवा सांस्कृतिक दौड़ के सन्दर्भ में उसकी शुद्ध साधना का स्वरूप निर्धारित करना तथा परस्पर पड़े दोनों के अन्योन्याश्रित प्रभावों का औचित्य अंकन आचार्य द्विवेदी जैसे प्रमाता का ही कार्य था। घोर व्यक्तिवादियों को छोड़कर सभी कृतिकार साहित्य में जीवन तथा समाज की अपरिहार्य अभिव्यक्ति स्वीकार करते हैं। यदि तटस्थ दृष्टि से देखा जाय तो आचार्य रामचन्द्र शुक्ल जैसे लोकवादी भी साहित्य एवं जीवन को इस सन्दर्भ में स्वीकार नहीं कर सके हैं। इसका सर्वाधिक प्रबल प्रमाण यही है कि जहाँ एक ओर वे चेतनागत विकास की परंपरा में साहित्यिक उपलब्धियों को सम्मिलित नहीं कर सके, वहीं दूसरी ओर आदिकाल के अधिकांश जैन आदि कवियों की साधना को शुद्ध साहित्य के अन्तर्गत अन्तर्भाव करने में भी सफल नहीं हुए।
आचार्य शुक्ल द्वारा कबीर, सूर, तुलसी, प्रसाद आदि कवियों के साथ समुचित न्याय न कर पाने का भी यही कारण रहा। एक शब्द में आचार्य शुक्ल के लोकवाद की यही सीमा रही। इसके विपरीत आचार्य द्विवेदीजी ने जहाँ एक ओर हिन्दी साहित्य की भूमिका प्रस्तुत करके पूर्व परंपरा की अनेक सरणियों तथा उनके चेतनागत प्रभावों को उन्मीलित करके हिन्दी-साहित्य को स्पष्ट रूप से देखने की दृष्टि प्रदान की है, वहीं दूसरी ओर विभिन्न पंथों, सम्प्रदायों, सामाजिक रहन-सहन, धर्म, संस्कृति आदि अनेक विषयों पर अनुसंधानात्मक ग्रन्थों की रचना द्वारा साहित्य के अभावों को अत्यधिक विस्तृत किया। धर्म, संस्कृति आदि पर ग्रन्थ रचना करने वाले साहित्यकारों का किसी भी साहित्य में सर्वथा अभाव नहीं होता, किन्तु द्विवेदीजी के इस कार्य का सबसे बड़ा महत्व इसके सन्देहास्पद रहस्यों से जीवन तथ्यों को पहचान लेने तथा समस्त साधना-सरणि से साहित्य के अन्योन्य सम्बन्ध स्थापित कर लेने में है। इस रूप में ऐसे स्थलों पर भी आचार्य द्विवेदी विशुद्ध साहित्यकार के रूप में प्रतीत होते हैं। द्विवेदीजी की साधना में साहित्य ही जीवन तथा जीवन ही साहित्य है। जीवन के किसी भी अंश का साहित्य से पृथक होना और साहित्य का किसी भी रूप में जीवन से पृथक होना सम्भव नहीं।
साहित्य के नवीन आयामों का अन्वेषण
साहित्य में आयाम से तात्पर्य भाव-विचार, विधा एवं शैली तीन आयामों से है। इन्हीं के वृत्त में सीमित होकर साहित्यकार की प्रतिभा कृति का साकार रूप ग्रहण करती है। साहित्य की प्रकृति के अनुरूप इन्हीं की समान अन्विति उत्कृष्ट लक्षण है। इस क्षेत्र में आचार्य द्विवेदी की मौलिकता मुख्यत: दो रूपों में परिलक्षित होती है-एक वस्तु के तीनों आयामों की अन्विति में तथा दूसरे इनके स्वरूप की विविधता में है। द्विवेदीजी की लगभग प्रत्येक कृति में भाव अथवा विचार अपनी प्रकृति के अनुरूप विधा में अत्यन्त सुरम्य शैली में ढले थे। शैली की हृदयग्राहकता सर्वत्र प्रत्यक्ष है। गंभीर से गंभीर विषय तथा विचार को द्विवेदीजी ने इतने कलात्मक रूप में अभिव्यक्त किया कि पाठक सहज ही उसमें तल्लीन हो जाये। कबीर, सूर-साहित्य जैसे आलोचनात्मक ग्रन्थों में ही नहीं, प्राचीन भारत के कलात्मक विनोद तथा मध्यकालीन धर्म साधना जैसे ग्रन्थों तक में भी इस शैलीगत विशेषता का आस्वादन सम्भव है।
यह तो हुई ऐसे ग्रन्थों की चर्चा, जिसमें शैलीगत सौन्दर्य हेतु विशेष अवकाश नहीं रहता। आचार्य द्विवेदी के ऐसे ग्रन्थों को देखना जो अपनी विशेष विद्या के आग्रहानुरूप शैलीगत सौन्दर्य से भी आचार्य होते हैं तथा जिनमें भाव, सत्य अथवा विचार के लिए प्रायः स्थान ही नहीं होता। उदाहरण के लिए आचार्य द्विवेदी के व्यक्तिनिष्ठ निबन्धों को लिया जा सकता है। इन्हें किसी सुनिश्चित विचार-पद्धति के अभाव में मन की बहक तथा इनकी शैली को प्रलाप शैली तक कहा गया है। इस प्रकार के अनेक ग्रन्थ प्राप्त हो सकते हैं, जिन्हें प्रलाप के अतिरिक्त दूसरा कुछ कहा ही नहीं जा सकता। द्विवेदीजी की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इस तरह के निबन्धों में भी आयाम के त्रिकोणों का संतुलन व्याप्त रहा है।
'अशोक के 'फूल', 'नाखून क्यों बढ़ते हैं' प्रभृति किसी भी निबन्ध को सामने रखकर इस सत्य की परीक्षा सम्भव है। अशोक के फूल में अशोक के माध्यम से एक प्रकार से भारतीय साहित्य तथा संस्कृति के विकास का क्रम तथा उसकी रूपरेखा, मानवीय मनोवृत्ति, इतिहास पुरुष की प्रवृत्ति, अशोक की उपयोगिता आदि न जाने कितने तथ्यों-सत्यों को ध्वनित किया गया है। यही बात 'नाखून क्यों बढ़ते हैं' में भी अनेक रूपों में परिलक्षित होती है। कहने का तात्पर्य यह है कि शैली तथा विधा के आगे भाव एवं विचार की उपेक्षा होने की बात कौन कहे, कहीं भी इनका संतुलन बिगड़ा नहीं है। यह दूसरी बात है कि विचारों अथवा तथ्यपूर्ण अनुसंधानों की इस प्रकार की प्रखरता के समक्ष अन्य निबन्धकारों के निबन्धों की व्यक्तिनिष्ठता के समाप्त होने की पूर्णरूप से आशंका हो जाती है। वास्तव में आयामों की अन्विति के इस कलात्मक रूप की जितनी भी प्रशंसा की जाय, कम है।
आचार्य द्विवेदी ने आयामों की विविधता के क्षेत्र में चेतना को वाणी का परिधान धारण कराने में जितनी अनेकरूपता प्रदर्शित की है उतनी अन्यत्र सुलभ नहीं है। चाहे भावों विचारों की विविधता हो, चाहे विधा की अनेकरूपता हो, चाहे शैली की भिन्नता हो, सब में यह विविधता दृष्टिगोचर होती है। एक ही विधा के अन्तर्गत भाँति-भाँति के विचारों तथा भावों से युक्त विषयों को न जाने कितनी शैलियों में प्रस्तुत करने में आचार्य द्विवेदी को सफलता प्राप्त हुई। इसके उदाहरणस्वरूप आचार्य द्विवेदी के निबन्ध साहित्य की परीक्षा की जा सकती है। जितने अधिक विषय तथा जितनी अधिक शैलियाँ आचार्य द्विवेदी के निबन्धों में प्रतीत होती हैं, उतनी अन्यत्र दिखाई नहीं देतीं। शैलीगत विविधता के सम्बन्ध में तो यह निश्चित रूप से व्यक्त किया जा सकता है कि हिन्दी के सभी निबन्धकार भी मिलकर इतनी अधिक शैलियों का सफल व्यवहार करने में असमर्थ रहे हैं। विधा के सम्बन्ध में भी यह बात सत्य है। व्याख्या की जो विधा आचार्य द्विवेदी ने स्वीकृत की, उसका हिन्दी में पूर्ण अभाव था। 'मेघदूत एक कहानी' की व्याख्या में जिस प्रकार से कवि कालिदास के अन्तस् की भाव-समृद्धि तथा विरही यक्ष के आतुर भावोद्वेग को ठीक-ठीक भावित करके उन्हें सजीव कथा-सूत्र में पिरोया गया है, वह विधागत वैशिष्ट्य का उत्कृष्ट उदाहरण है।
इस प्रकार आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी का संपूर्ण साहित्य भारतीय संस्कृति के गौरव, लोक-जीवन के प्रति अगाध प्रेम और मनुष्यता की रक्षा का दस्तावेज है। उन्होंने रूढ़ियों का विरोध किया और परंपरा के भीतर जो कुछ भी प्रगतिशील और जीवंत था, उसे अपनाकर आधुनिक हिंदी गद्य को समृद्ध किया। साहित्य में उनके इसी अद्वितीय योगदान के लिए उन्हें 'पद्म भूषण' और 'साहित्य अकादमी पुरस्कार' (आलोक पर्व के लिए) से सम्मानित किया गया था।


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